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माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु की एक कथा

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माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु की एक कथा भगवान् विष्णुजी और सौभाग्य और धन की देवी माँ लक्ष्मीजी के साथ मृत्युलोक भ्रमण की कथा का अमृत पान करेंगे, परमेश्वर के तीन मुख्य स्वरूपों में से एक भगवान विष्णुजी का नाम स्वयं ही धन की देवी माँ लक्ष्मीजी के साथ लिया जाता है, शास्त्रों में कथाओं के अनुसार माँ लक्ष्मीजी हिन्दू धर्म में धन, सम्पदा, शान्ति, सौभाग्य और समृद्धि की देवी मानी जाती हैं। माता लक्ष्मीजी भगवान् श्री विष्णुजी की अर्धांगिनी हैं. सुख व समृद्धि की प्रतीक माँ लक्ष्मी व भगवान् विष्णुजी को युगों-युगों से एक साथ ही देखा गया है, यदि कोई व्यक्ति अपने जीवन में धन का वास चाहता है, तो हमेशा ही मां लक्ष्मी के साथ भगवान विष्णु की आराधना अवश्य करे. इन दोनों का रिश्ता काफी शुद्ध व सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। परंतु ऐसा क्या हुआ था? जो लक्ष्मीजी के कारण भगवान् विष्णुजी की आंखें भर आईं? एक कथा के अनुसार लक्ष्मीजी की किस बात से विष्णु जी इतने निराश हो गयें, एक बार भगवान विष्णुजी शेषनाग पर बैठे-बैठे उदास हो गयें और धरती पर जाने का विचार बनाया, धरती पर जाने का मन बनाते ही विष्णुजी जाने की तैयारियों में लग गये। अपने स्वामी को तैयार होता देख कर लक्ष्मीजी ने उनसे पूछा- स्वामी, आप कहां जाने की तैयारी में लगे हैं? जिसके उत्तर में विष्णुजी ने कहा, हे देवी! मैं धरती लोक पर घूमने जा रहा हूँ, यह सुन माता लक्ष्मीजी का भी धरती पर जाने का मन हुआ और उन्होंने श्रीहरि से इसकी आज्ञा माँगी। लक्ष्मीजी द्वारा प्रार्थना करने पर भगवान् विष्णुजी बोले आप मेरे साथ चल सकती हो, लेकिन एक शर्त पर, तुम धरती पर पहुँच कर उत्तर दिशा की ओर बिलकुल मत देखना, तभी मैं तुम्हें अपने साथ लेकर जाऊंगा. यह सुनते ही माता लक्ष्मीजी ने तुरंत हाँ कह दिया और विष्णुजी के साथ धरती लोक जाने के लिए तैयार हो गयीं। माता लक्ष्मीजी और भगवान् विष्णुजी सुबह-सुबह धरती पर पहुँच गए. जब वे पहुंचे तब सूर्य देवता उदय हो ही रहें थे, कुछ दिनों पहले ही बरसात हुयी थी, इसलिये धरती पर चारों ओर हरियाली ही हरियाली थी, धरती बेहद सुन्दर दिख रही थी, अतः माँ लक्ष्मीजी मन्त्र मुग्ध हो कर धरती के चारों ओर देख रही थीं, माँ लक्ष्मीजी भूल गयीं कि पति को क्या वचन दे कर साथ आई हैं। अपनी नजर घुमाते हुए उन्होंने कब उत्तर दिशा की ओर देखा उन्हें पता ही नहीं चला? मन ही मन में मुग्ध हुई माता लक्ष्मीजी ने जब उत्तर दिशा की ओर देखा तो उन्हें एक सुन्दर बागीचा नजर आया. उस ओर से भीनी-भीनी खुशबू आ रही थी. बागीचे में बहुत ही सुन्दर-सुन्दर फूल खिले थे. फूलों को देखते ही मां लक्ष्मी बिना सोचे समझे उस खेत में चली गईं और एक सुंदर सा फूल तोड़ लायीं। फूल तोड़ने के पश्चात जैसे ही माँ लक्ष्मीजी भगवान् विष्णुजी के पास वापस लौट कर आयीं तब भगवान् विष्णुजी की आँखों में आँसू थे. माँ लक्ष्मीजी के हाथ में फूल देख विष्णुजी बोले, कभी भी किसी से बिना पूछे उसका कुछ भी नहीं लेना चाहियें, और साथ ही माँ लक्ष्मीजी को विष्णुजी को दिया हुआ वचन भी याद दिलाया, और फिर भगवान् विष्णुजी जी ने दी माँ लक्ष्मीजी को सजा। माँ लक्ष्मीजी को अपनी भूल का जब आभास हुआ तो उन्होंने भगवानक्ष विष्णुजी से इस भूल की क्षमा मांगी, विष्णुजी ने कहा कि आपने जो भूल की है उस की सजा तो आपको अवश्य मिलेगी? जिस माली के खेत से आपने बिना पूछे फूल तोड़ा है, यह एक प्रकार की चोरी है, इसीलिये अब आप तीन वर्षों तक माली के घर नौकर बन कर रहो, उस के बाद मैं आपको बैकुण्ठ में वापस बुलाऊँगा। भगवान् विष्णुजी का आदेश माता लक्ष्मीजी ने चुपचाप सर झुका कर मान स्वीकार किया, जिसके बाद माँ लक्ष्मीजी ने एक गरीब औरत का रूप धारण किया और उस खेत के मालिक के घर गयीं, माधव नाम के उस माली का एक झोपड़ा था जहां माधव पत्नी, दो बेटे और तीन बेटियों के साथ रहता था, माता लक्ष्मीजी जब एक साधारण औरत बन कर माधव के झोपड़े पर पधारी, तो माधव ने पूछा- बहन आप कौन हो? तब मां लक्ष्मी ने कहा- मैं एक गरीब औरत हूं, मेरी देखभाल करने वाला कोई नहीं, मैंने कई दिनों से खाना भी नहीं खाया, मुझे कोई भी काम दे दो. मैं तुम्हारे घर का काम कर लिया करूँगी और इसके बदले में आप मुझे अपने घर के एक कोने में आसरा दे देना, माधव बहुत ही अच्छे दिल का मालिक था, उसे दया आ गयीं, लेकिन उस ने कहा, बहन मैं तो बहुत ही गरीब हूं, मेरी कमाई से मेरे घर का खर्च काफी कठिनाई से चलता है। लेकिन अगर मेरी तीन बेटियां है उसकी जगह अगर चार बेटियां होतीं तो भी मुझे गुजारा करना था, अगर तुम मेरी बेटी बन कर और जैसा रूखा-सूखा हम खाते हैं उसमें खुश रह सकती हो तो बेटी अन्दर आ जाओ। माधव ने माँ लक्ष्मीजी को अपने झोपड़े में शरण दी, और माँ लक्ष्मीजी तीन साल तक उस माधव के घर पर नौकरानी बन कर रहीं, कथा के अनुसार कहा जाता है कि जिस दिन माँ लक्ष्मीजी माधव के घर आईं थी, उसके दूसरे दिन ही माधव को फूलों से इतनी आमदनी हुई कि शाम को उसने एक गाय खरीद ली। फिर धीरे-धीरे माधव ने जमीन खरीद ली और सबने अच्छे-अच्छे कपड़े भी बनवा लियें, कुछ समय बाद माधव ने एक बडा पक्का घर भी बनवा लिया, माधव हमेशा सोचता था कि मुझे यह सब इस महिला के आने के बाद मिला है, इस बेटी के रूप में मेरी किस्मत आ गई है एक दिन माधव जब अपने खेतों से काम खत्म करके घर आया, तो उसने अपने घर के द्वार पर गहनों से लदी एक देवी स्वरूप औरत को देखा, जब निकट गया तो उसे आभास हुआ कि यह तो मेरी मुंहबोली चौथी बेटी यानि वही औरत है, कुछ समय के बाद वह समझ गया कि यह देवी कोई और नहीं बल्कि स्वयं माँ लक्ष्मीजी हैं, यह जानकर माधव बोला- हे माँ हमें क्षमा करें, हमने आपसे अनजाने में ही घर और खेत में काम

July 9, 2022 / 0 Comments
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केतु देव जी की कहानी

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केतु देव जी की कहानी केतु की दो भुजाएँ हैं। वे अपने सिर पर मुकुट तथा शरीर पर काला वस्त्र धारण करते हैं। उनका शरीर धूम्रवर्ण का है तथा मुख विकृत है। वे अपने एक हाथ में गदा और दूसरे में वरमुद्रा धारण किये रहते हैं तथा नित्य गीध पर समासीन हैं। भगवान विष्णु के चक्र से कटने पर सिर राहु कहलाया और धड़ केतु के नाम से प्रसिद्ध हुआ। केतु राहु का ही कबन्ध है। राहु के साथ केतु भी ग्रह बन गया। मत्स्य पुराण के अनुसार केतु बहुत-से हैं, उनमें धूमकेतु प्रधान है। भारतीय-ज्योतिष के अनुसार यह छायाग्रह है। व्यक्ति के जीवन-क्षेत्र तथा समस्त सृष्टि को यह प्रभावित करता है। आकाश मण्डल में इसका प्रभाव वायव्यकोण में माना गया है। कुछ विद्वानों के मतानुसार राहु की अपेक्षा केतु विशेष सौम्य तथा व्यक्ति के लिये हितकारी है। कुछ विशेष परिस्थितियों में यह व्यक्ति को यश के शिखर पर पहुँचा देता है। केतु का मण्डल ध्वजाकार माना गया है। कदाचित यही कारण है कि यह आकाश में लहराती ध्वजा के समान दिखायी देता है। इसका माप केवल छ: अंगुल है। यद्यपि राहु-केतु का मूल शरीर एक था और वह दानव-जाति का था। परन्तु ग्रहों में परिगणित होने के पश्चात् उनका पुनर्जन्म मानकर उनके नये गोत्र घोषित किये गये। इस आधार पर राहु पैठीनस-गोत्र तथा केतु जैमिनि-गोत्र का सदस्य माना गया। केतु का वर्ण धूम्र है। कहीं-कहीं इसका कपोत वाहन भी मिलता है। केतु की महादशा सात वर्ष की होती है। इसके अधिदेवता चित्रकेतु तथा प्रत्यधिदेवता ब्रह्मा हैं। यदि किसी व्यक्ति की कुण्डली में केतु अशुभ स्थान में रहता है तो वह अनिष्टकारी हो जाता है। अनिष्टकारी केतु का प्रभाव व्यक्ति को रोगी बना देता है। इसकी प्रतिकूलता से दाद, खाज तथा कुष्ठ जैसे रोग होते हैं। केतु की प्रसन्नता हेतु दान की जानेवाली वस्तुएँ इस प्रकार बतायी गयीं हैं- वैदूर्य रत्नं तैलं च तिलं कम्बलमर्पयेत्। शस्त्रं मृगमदं नीलपुष्पं केतुग्रहाय वै॥ वैदूर्य नामक रत्न, तेल, काला तिल, कम्बल, शस्त्र, कस्तूरी तथा नीले रंग का पुष्प दान करने से केतु ग्रह साधक का कल्याण करता है। इसके लिये लहसुनिया पत्थर धारण करने तथा मृत्यंजय जप का भी विधान है। नवग्रह मण्डल में इसका प्रतीक वायव्यकोण में काला ध्वज है। केतु की शान्ति के लिये वैदिक मन्त्र- \’ॐ केतुं कृण्वन्नकेतवे पेशो मर्या अपेश से। सुमुषद्भिरजायथा:॥\’, पौराणिक मन्त्र- \’पलाशपुष्पसंकाशं तारकाग्रहमस्तकम्। रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहम्॥\’, बीज मन्त्र- ॐ स्रां स्रीं स्रौं स: केतवे नम:।\’, तथा सामान्य मन्त्र- ॐ कें केतवे नम:\’ है। इसमें किसी एक का नित्य श्रद्धापूर्वक निश्चित संख्या में जप करना चाहिये। जप का समय रात्रि तथा कुल जप-संख्या 17000 है। हवन के लिये कुश का उपयोग करना चाहिये। विशेष परिस्थिति में विद्वान् ब्राह्मण का सहयोग लेना चाहिये।

July 8, 2022 / 0 Comments
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अग्नि देव जी का इतिहास

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अग्नि देव अग्निदेवता यज्ञ के प्रधान अंग हैं। ये सर्वत्र प्रकाश करने वाले एवं सभी पुरुषार्थों को प्रदान करने वाले हैं। सभी रत्न अग्नि से उत्पन्न होते हैं और सभी रत्नों को यही धारण करते हैं। वेदों में सर्वप्रथम ऋग्वेद का नाम आता है और उसमें प्रथम शब्द अग्नि ही प्राप्त होता है। अत: यह कहा जा सकता है कि विश्व-साहित्य का प्रथम शब्द अग्नि ही है। ऐतरेय ब्राह्मण आदि ब्राह्मण ग्रन्थों में यह बार-बार कहा गया है कि देवताओं में प्रथम स्थान अग्नि का है। आचार्य यास्क और सायणाचार्य ऋग्वेद के प्रारम्भ में अग्नि की स्तुति का कारण यह बतलाते हैं कि अग्नि ही देवताओं में अग्रणी हैं और सबसे आगे-आगे चलते हैं। युद्ध में सेनापति का काम करते हैं इन्हीं को आगे कर युद्ध करके देवताओं ने असुरों को परास्त किया था। पुराणों के अनुसार इनकी पत्नी स्वाहा हैं। ये सब देवताओं के मुख हैं और इनमें जो आहुति दी जाती है, वह इन्हीं के द्वारा देवताओं तक पहुँचती है। केवल ऋग्वेद में अग्नि के दो सौ सूक्त प्राप्त होते हैं। इसी प्रकार यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद में भी इनकी स्तुतियाँ प्राप्त होती हैं। ऋग्वेद के प्रथम सूक्त में अग्नि की प्रार्थना करते हुए विश्वामित्र के पुत्र मधुच्छन्दा कहते हैं कि मैं सर्वप्रथम अग्निदेवता की स्तुति करता हूँ, जो सभी यज्ञों के पुरोहित कहे गये हैं। पुरोहित राजा का सर्वप्रथम आचार्य होता है और वह उसके समस्त अभीष्ट को सिद्ध करता है। उसी प्रकार अग्निदेव भी यजमान की समस्त कामनाओं को पूर्ण करते हैं। अग्निदेव की सात जिह्वाएँ बतायी गयी हैं। उन जिह्वाओं के नाम काली, कराली, मनोजवा, सुलोहिता, धूम्रवर्णी, स्फुलिंगी तथा विश्वरुचि हैं। पुराणों के अनुसार अग्निदेव की पत्नी स्वाहा के पावक, पवमान और शुचि नामक तीन पुत्र हुए। इनके पुत्र-पौत्रों की संख्या उनंचास है। भगवान कार्तिकेय को अग्निदेवता का भी पुत्र माना गया है। स्वारोचिष नामक द्वितीय स्थान पर परिगणित हैं। ये आग्नेय कोण के अधिपति हैं। अग्नि नामक प्रसिद्ध पुराण के ये ही वक्ता हैं। प्रभास क्षेत्र में सरस्वती नदी के तट पर इनका मुख्य तीर्थ है। इन्हीं के समीप भगवान कार्तिकेय, श्राद्धदेव तथा गौओं के भी तीर्थ हैं। अग्निदेव की कृपा के पुराणों में अनेक दृष्टान्त प्राप्त होते हैं। उनमें से कुछ इस प्रकार हैं। महर्षि वेद के शिष्य उत्तंक ने अपनी शिक्षा पूर्ण होने पर आचार्य दम्पति से गुरु दक्षिणा माँगने का निवेदन किया। गुरु पत्नी ने उनसे महाराज पौष्य की पत्नी का कुण्डल माँगा। उत्तंक ने महाराज के पास पहुँचकर उनकी आज्ञा से महारानी से कुण्डल प्राप्त किया। रानी ने कुण्डल देकर उन्हें सतर्क किया कि आप इन कुण्डलों को सावधानी से ले जाइयेगा, नहीं तो तक्षक नाग कुण्डल आप से छीन लेगा। मार्ग में जब उत्तंक एक जलाशय के किनारे कुण्डलों को रखकर सन्ध्या करने लगे तो तक्षक कुण्डलों को लेकर पाताल में चला गया। अग्निदेव की कृपा से ही उत्तंक दुबारा कुण्डल प्राप्त करके गुरु पत्नी को प्रदान कर पाये थे। अग्निदेव ने ही अपनी ब्रह्मचारी भक्त उपकोशल को ब्रह्मविद्या का उपदेश दिया था। अग्नि की प्रार्थना उपासना से यजमान धन, धान्य, पशु आदि समृद्धि प्राप्त करता है। उसकी शक्ति, प्रतिष्ठा एवं परिवार आदि की वृद्धि होती है। अग्निदेव का बीजमन्त्र रं तथा मुख्य मन्त्र रं वह्निचैतन्याय नम: है। ग्रंथों के मतानुसार ऋग्वेद के अनुसार अग्निदेव अपने यजमान पर वैसे ही कृपा करते हैं, जैसे राजा सर्वगुणसम्पन्न वीर पुरुष का सम्मान करता है। एक बार अग्नि अपने हाथों में अन्न धारण करके गुफा में बैठ गए।[1] अत: सब देवता बहुत भयभीत हुए।[2] अमर देवताओं ने अग्नि का महत्व ठीक से नहीं पहचाना था। वे थके पैरों से चलते हुए ध्यान में लगे हुए अग्नि के पास पहुँचे। मरुतों ने तीन वर्षों तक अग्नि की स्तुति की। अंगिरा ने मंत्रों द्वारा अग्नि की स्तुति तथा पणि नामक असुर को नाद से ही नष्ट कर डाला। देवताओं ने जांघ के बल बैठकर अग्निदेव की पूजा की। अंगिरा ने यज्ञाग्नि धारण करके अग्नि को ही साधना का लक्ष्य बनाया। तदनन्तर आकाश में ज्योतिस्वरूप सूर्य और ध्वजस्वरूप किरणों की प्राप्ति हुई। देवताओं ने अग्नि में अवस्थित इक्कीस गूढ़ पद प्राप्त कर अपनी रक्षा की।[3] अग्नि और सोम ने युद्ध में बृसय की सन्तान नष्ट कर डाली तथा पणि की गौएं हर लीं।[4] अग्नि के अश्वों का नाम रोहित तथा रथ का नाम धूमकेतु है।[5] महाभारत के अनुसार देवताओं को जब पार्वती से शाप मिला था कि वे सब सन्तानहीन रहेंगे, तब अग्निदेव वहाँ पर नहीं थे। कालान्तर में विद्रोहियों को मारने के लिए किसी देवपुत्र की आवश्यकता हुई। अत: देवताओं ने अग्नि की खोज आरम्भ की। अग्निदेव जल में छिपे हुए थे। मेढ़क ने उनका निवास स्थान देवताओं को बताया। अत: अग्निदेव ने रुष्ट होकर उसे जिह्वा न होने का शाप दिया। देवताओं ने कहा कि वह फिर भी बोल पायेगा। अग्निदेव किसी दूसरी जगह पर जाकर छिप गए। हाथी ने देवताओं से कहा-अश्वत्थ (सूर्य का एक नाम) अग्नि रूप है। अग्नि ने उसे भी उल्टी जिह्वा वाला कर दिया। इसी प्रकार तोते ने शमी में छिपे अग्नि का पता बताया तो वह भी शापवश उल्टी जिह्वा वाला हो गया। शमी में देवताओं ने अग्नि के दर्शन करके तारक के वध के निमित्त पुत्र उत्पन्न करने को कहा। अग्नि देव शिव के वीर्य का गंगा में आधान करके कार्तिकेय के जन्म के निमित्त बने।[6] भृगु पत्नी पुलोमा का पहले राक्षस पुलोमन से विवाह हुआ था। जब भृगु अनुपस्थित थे, वह पुलोमा को लेने आया तो उसने यज्ञाग्नि से कहा कि वह उसकी है या भृगु की भार्या। उसने उत्तर दिया कि यह सत्य है कि उसका प्रथम वरण उसने (राक्षस) ही किया था, लेकिन अब वह भृगु की पत्नी है। जब पुलोमन उसे बलपूर्वक ले जा रहा था, उसके गर्भ से \’च्यवन\’ गिर गए और पुलोमन भस्म हो गया। उसके अश्रुओं से ब्रह्मा ने \’वसुधारा नदी\’ का निर्माण किया। भृगु ने अग्नि को शाप दिया कि तू हर पदार्थ का भक्षण करेगी। शाप से पीड़ित अग्नि ने यज्ञ आहुतियों से अपने को विलग कर लिया, जिससे प्राणियों में हताशा व्याप्त हो गई। ब्रह्मा ने उसे आश्वासन दिया कि वह पूर्ववत् पवित्र मानी जाएगी। सिर्फ़ मांसाहारी जीवों की उदरस्थ पाचक अग्नि को छोड़कर उसकी लपटें सर्व भक्षण में समर्थ होंगी। अंगिरस ने अग्नि से

July 7, 2022 / 0 Comments
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राहु देव जी का इतिहास एवम कहानी

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राहु देव अन्य नाम सैंहिकेय कुल राक्षस पालक पिता विप्रचित्ति पालक माता सिंहिका रंग-रूप इनका काला रंग व भयंकर मुख है। सिर पर मुकुट, गले में माला तथा शरीर पर काले रंग का वस्त्र धारण करते हैं। संबंधित लेख सूर्य देवता, चन्द्रमा देवता, नक्षत्र शक्ति कल्पना शक्ति का स्वामी, पूर्वाभास तथा अदृश्य को देखने की शक्ति शांति उपाय राहु की शान्ति के लिये मृत्युंजय का जप तथा फिरोजा धारण करना श्रेयस्कर है। अन्य जानकारी राहु ने चुपके से देवताओं की पंकि में बैठकर अमृत पी लिया था। इस कृत्य की जानकारी सूर्य व चन्द्रमा ने विष्णु को दे दी और विष्णु ने सुदर्शन चक्र से राहु का सिर काट दिया। राहु पुराणानुसार नवग्रहों में से एक है। वह सिंहिका के गर्भ से उत्पन्न विप्रचित्ति के पुत्र थे। देवताओं की पंक्ति में बैठकर इन्होंने चोरी से अमृत पी लिया था। सूर्य और चन्द्रमा ने राहु के इस कृत्य की जानकारी भगवान विष्णु को दी। विष्णु ने चक्र से उसका सिर काट लिया। क्योंकि राहु अमृत पी चुके थे, इसीलिए वह अमर हो गये। उनका मस्तक \’राहु\’ और धड़ \’केतु\’ हो गया। तब से राहु सूर्य और चन्द्रमा से बैर रखते हैं। वह समय-समय पर सूर्य और चन्द्रमा को केतु और राहु के रूप में ग्रसते हैं, जिसे \’ग्रहण\’ कहते हैं।[1] परिचय राहु का मुख भयंकर है। ये सिर पर मुकुट, गले में माला तथा शरीर पर काले रंग का वस्त्र धारण करते हैं। इनके हाथों में क्रमश:- तलवार, ढाल, त्रिशूल और वरमुद्रा है तथा ये सिंह के आसन पर आसीन हैं। ध्यान में ऐसे ही राहु प्रशस्त माने गये हैं। राहु की माता का नाम सिंहिका था, जो विप्रचित्ति की पत्नी तथा हिरण्यकशिपु की पुत्री थी। माता के नाम से राहु को \’सैंहिकेय\’ भी कहा जाता है। राहु के सौ और भाई थे, जिनमें राहु सबसे बढ़ा-चढ़ा था।[2] अमरता की प्राप्ति जिस समय समुद्र मंथन के बाद भगवान विष्णु मोहिनी रूप में देवताओं को अमृत पिला रहे थे, उसी समय राहु देवताओं का वेष बनाकर उनके बीच में आ बैठा और देवताओं के साथ उसने भी अमृत पी लिया। परन्तु तत्क्षण चन्द्रमा और सूर्य ने उसे पहचान लिया और उसकी पोल खोल दी। अमृत पिलाते-पिलाते ही भगवान विष्णु ने अपने तीखी धार वाले सुदर्शन चक्र से उसका सिर काट डाला। किंतु अमृत का संसर्ग होने से राहु अमर हो गया और ब्रह्मा ने उसे ग्रह बना दिया।[3] पौराणिक तथ्य महाभारत, भीष्मपर्व[4] के अनुसार राहु ग्रह मण्डलाकार होता है। ग्रहों के साथ राहु भी ब्रह्मा की सभा में बैठता है। मत्स्यपुराण [5] के अनुसार पृथ्वी की छाया मण्डलाकार होती है। राहु इसी छाया का भ्रमण करता है। यह छाया का अधिष्ठात देवता है। ऋग्वेद[6] के अनुसार \’असूया\’ (सिंहिका) पुत्र राहु जब सूर्य और चन्द्रमा को तम से आच्छन्न कर लेता है, तब इतना अधेरा छा जाता है कि लोग अपने स्थान को भी नहीं पहचान पाते। ग्रह बनने के बाद भी राहु बैर-भाव से पूर्णिमा को चन्द्रमा और अमावस्या को सूर्य पर आक्रमण करता है। इसे ग्रहण या \’राहु पराग\’ कहते हैं। मत्स्य पुराण के अनुसार राहु का रथ अन्धकार रूप है। इसे कवच आदि से सजाये हुए काले रंग के आठ घोड़े खींचते हैं। राहु के अधिदेवता काल तथा प्रत्यधि देवता सूर्य हैं। नवग्रह मण्डल में इसका प्रतीक पायव्य कोण में काला ध्वज है। राहु की महादशा 18 वर्ष की होती है। अपवाद स्परूप कुछ परिस्थितियों को छोड़कर यह क्लेशकारी ही सिद्ध होता है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार यदि कुण्डली में राहु की स्थिति प्रतिकूल या अशुभ है तो यह अनेक प्रकार की शारीरिक व्याधियाँ उत्पन्न करता है। कार्य सिद्धि में बाधा उत्पन्न करने वाला तथा दुर्घटनाओं का यह जनक माना जाता है। बारह भावों में राहु का फल कुण्डली के बारह भावों में राहु का फल निम्न प्रकार होता है[7]- राहु – एक नज़र में देवता सरस्वती पेशा सेवा रंग काला नक्षत्र आर्द्रा प्रकृति चालबाज, मक्कार, नीच, जालिम गुण सोचने की ताकत, डर, शत्रुता शक्ति कल्पना शक्ति का स्वामी, पूर्वाभास तथा अदृश्य को देखने की शक्ति शरीर का भाग ठोड़ी, सिर पोशाक पायजामा, पतलून पशु हाथी, काँटेदार जंगली चूहा वृक्ष नारियल, कुत्ता, घास वस्तु नीलम, सिक्का, गोमेद राशि मित्र- बु., श., के.; शत्रु- सू., म., च.; सम- बृ., बु., श. लग्न में राहु हो तो जातक दुष्ट, मस्तिष्क रोगी, स्वार्थी, राजद्वेषी, कामी एवं अल्पसंतति वाला होता है। दूसरे भाव में राहु हो तो परदेशगामी, अल्पसंतति, अल्प धनवान होता है। तीसरे भाव में राहु हो तो बलिष्ठ, विवेकयुक्त, प्रवासी, विद्वान् एवं व्यवसायी होता है। चौथे भाव में हो तो असंतोषी, दुखी, मातृ क्लेशयुक्त, क्रूर, कपटी एवं व्यवसायी होता है। पांचवें भाव में हो तो उदर रोगी, मतिमंद, धनहीन, भाग्यवान एवं शास्त्र प्रिय होता है। छठे भाव में विधर्मियों द्वारा लाभ, निरोग, शत्रुहंता, कमर दर्द पीड़ित, अरिष्ट निवारक एवं पराक्रमी होता है। सातवें भाव में हो तो स्त्री नाशक, व्यापार में हानिदायक, भ्रमणशील, वातरोग जनक, लोभी एवं दुराचारी होता है। आठवें भाव में राहु हो तो पुष्टदेही, क्रोधी, व्यर्थ भाषी, उदर रोगी एवं कामी होता है। नौवें भाव में राहु हो तो प्रवासी, वात रोगी, व्यर्थ परिश्रमी, तीर्थाटनशील, भाग्यहीन एवं दुष्ट बुद्धि होता है। दसवें भाव में राहु हो तो आलसी, वाचाल, मितव्ययी, संततिक्लेशी तथा चंद्रमा से युत हो तो राजयोग कारक होता है। ग्यारहवें भाव में राहु हो तो मंदमति, लाभहीन, परिश्रमी, अल्प संततियुक्त, अरिष्ट नाशक एवं सफल कार्य करने वाला होता है। बारहवें भाव में राहु हो तो विवेकहीन, मतिमंद, मूर्ख, परिश्रमी, सेवक, व्ययी, चिंतनशील एवं कामी होता है। शान्ति के उपाय राहु की शान्ति के लिये मृत्युंजय, जप तथा फिरोजा धारण करना श्रेयस्कर है। इसके लिये अभ्रक, लोहा, तिल, नील वस्त्र, ताम्रपात्र, सप्तधान्य, उड़द, गोमेद, तेल, कम्बल, घोड़ा तथा खड्ग का दान करना चाहिये। वैदिक मन्त्र इसके जप का वैदिक मन्त्र-\’ॐ कया नश्चित्र आ भुवदूती सदावृध: सखा। कया शचिष्ठया वृता॥\’ पौराणिक मन्त्र पौराणिक मन्त्र- \’अर्धकायं महावीर्यं चन्द्रादित्यविमर्दनम्। सिंहिकागर्भसम्भूतं तं राहुं प्रणमाम्यहम्॥\’, बीज मन्त्र बीज मन्त्र- \’ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं स: राहवे नम:\’ तथा सामान्य मन्त्र सामान्य मन्त्र- \’ॐ रां राहवे नम:\’ है। इसमें से किसी एक का निश्चित संख्या में नित्य जप करना चाहिये। जप का समय रात्रि तथा कुल संख्या 18000 है।

July 6, 2022 / 0 Comments
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सृष्टि रचना भगवान विश्वकर्मा जी की कहानी

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सृष्टि रचना भगवान विश्वकर्मा जी विश्वकर्मा को हिन्दू धार्मिक मान्यताओं और ग्रंथों के अनुसार निर्माण एवं सृजन का देवता माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि सोने की लंका का निर्माण इन्होंने ही किया था। भारतीय संस्कृति और पुराणों में भगवान विश्वकर्मा को यंत्रों का अधिष्ठाता और देवता माना गया है। उन्हें हिन्दू संस्कृति में यंत्रों का देव माना जाता है। विश्वकर्मा ने मानव को सुख-सुविधाएँ प्रदान करने के लिए अनेक यंत्रों व शक्ति संपन्न भौतिक साधनों का निर्माण किया। इनके द्वारा मानव समाज भौतिक चरमोत्कर्ष को प्राप्त करता रहा है। प्राचीन शास्त्रों में वैमानकीय विद्या, नवविद्या, यंत्र निर्माण विद्या आदि का भगवान विश्वकर्मा ने उपदेश दिया है। माना जाता है कि प्राचीन समय में स्वर्ग लोक, लंका, द्वारिका और हस्तिनापुर जैसे नगरों के निर्माणकर्ता भी विश्वकर्मा ही थे। जन्म कथा एक कथा के अनुसार यह मान्यता है कि सृष्टि के प्रारंभ में सर्वप्रथम नारायण अर्थात \’साक्षात विष्णु भगवान\’ क्षीर सागर में शेषशैय्या पर आविर्भूत हुए। उनके नाभि-कमल से चर्तुमुख ब्रह्मा दृष्टिगोचर हो रहे थे। ब्रह्मा के पुत्र \’धर्म\’ तथा धर्म के पुत्र \’वास्तुदेव\’ हुए। कहा जाता है कि धर्म की \’वस्तु\’ नामक स्त्री[1] से उत्पन्न \’वास्तु\’ सातवें पुत्र थे, जो शिल्पशास्त्र के आदि प्रवर्तक थे। उन्हीं वास्तुदेव की \’अंगिरसी\’ नामक पत्नी से विश्वकर्मा उत्पन्न हुए थे। अपने पिता की भांति ही विश्वकर्मा भी आगे चलकर वास्तुकला के अद्वितीय आचार्य बने। रूप भगवान विश्वकर्मा के अनेक रूप बताए जाते हैं। उन्हें कहीं पर दो बाहु, कहीं चार, कहीं पर दस बाहुओं तथा एक मुख, और कहीं पर चार मुख व पंचमुखों के साथ भी दिखाया गया है। उनके पाँच पुत्र- मनु, मय, त्वष्टा, शिल्पी एवं दैवज्ञ हैं। यह भी मान्यता है कि ये पाँचों वास्तुशिल्प की अलग-अलग विधाओं में पारंगत थे और उन्होंने कई वस्तुओं का आविष्कार भी वैदिक काल में किया। इस प्रसंग में मनु को लोहे से, तो मय को लकड़ी, त्वष्टा को कांसे एवं तांबे, शिल्पी ईंट और दैवज्ञ को सोने-चाँदी से जोड़ा जाता है। निर्माण कार्य आदि काल से ही विश्वकर्मा अपने विशिष्ट ज्ञान एवं विज्ञान के कारण ही न देवल मानवों अपितु देवगणों द्वारा भी पूजित और वंदनीय हैं। भगवान विश्वकर्मा के आविष्कार एवं निर्माण कार्यों के सन्दर्भ में इन्द्रपुरी, यमपुरी, वरुणपुरी, कुबेरपुरी, पाण्डवपुरी, सुदामापुरी और शिवमण्डलपुरी का उल्लेख है। पुष्पक विमान का निर्माण तथा सभी देवों के भवन और उनके दैनिक उपयोग में आने वाली वस्तुएँ भी इनके द्वारा ही निर्मित हैं। कर्ण का \’कुण्डल\’, विष्णु भगवान का सुदर्शन चक्र, शंकर भगवान का त्रिशूल और यमराज का कालदण्ड इत्यादि वस्तुओं का निर्माण भी भगवान विश्वकर्मा ने ही किया है। देवों की उत्पत्ति विश्वकर्मा ने ब्रह्मा की उत्पत्ति करके उन्हें प्राणि मात्र का सृजन करने का वरदान दिया और उनके द्वारा 84 लाख योनियों को उत्पन्न किया। विष्णु भगवान की उत्पत्ति कर उन्हें जगत में उत्पन्न सभी प्राणियों की रक्षा और भरण-पोषण का कार्य सौप दिया। प्रजा का ठीक, सुचारु रुप से पालन और हुकुमत करने के लिये एक अत्यंत शक्तिशाली तिव्रगामी सुदर्शन चक्र प्रदान किया। बाद में संसार के प्रलय के लिये एक अत्यंत दयालु बाबा \’भोलेनाथ\’ शंकर भगवान की उत्पत्ति की। उन्हें डमरु, कमण्डल, त्रिशुल आदि प्रदान कर उनके ललाट पर प्रलयकारी तीसरा नेत्र भी प्रदान कर उन्हे प्रलय की शक्ति देकर शक्तिशाली बनाया। यथानुसार इनके साथ इनकी देवियाँ, ख़ज़ाने की अधिपति माँ लक्ष्मी, राग-रागिनी वाली वीणा वादिनी माँ सरस्वती और माँ गौरी को देकर देंवों को सुशोभित किया। अवतार हिन्दू धर्मशास्त्रों और ग्रथों में विश्वकर्मा के पाँच स्वरूपों और अवतारों का वर्णन मिलता है- विराट विश्वकर्मा – सृष्टि के रचयिता धर्मवंशी विश्वकर्मा – महान् शिल्प विज्ञान विधाता और प्रभात पुत्र अंगिरावंशी विश्वकर्मा – आदि विज्ञान विधाता वसु पुत्र सुधन्वा विश्वकर्म – महान् शिल्पाचार्य विज्ञान जन्मदाता अथवी ऋषि के पौत्र भृंगुवंशी विश्वकर्मा – उत्कृष्ट शिल्प विज्ञानाचार्य (शुक्राचार्य के पौत्र)

July 6, 2022 / 0 Comments
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अष्टलक्ष्मी क्या है?

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माता लक्ष्मी पुराणों में माता लक्ष्मी की उत्पत्ति के बारे में विरोधाभास पाया जाता है। एक कथा के अनुसार माता लक्ष्मी की उत्पत्ति समुद्र मंथन के दौरान निकले रत्नों के साथ हुई थी, लेकिन दूसरी कथा के अनुसार वे भृगु ऋषि की बेटी हैं। दरअसल, पुराणों की कथा में छुपे रहस्य को जानना थोड़ा मुश्किल होता है, इसे समझना जरूरी है। आपको शायद पता ही होगा कि शिवपुराण के अनुसार ब्रह्मा, विष्णु और महेश के माता-पिता का नाम सदाशिव और दुर्गा बताया गया है। उसी तरह तीनों देवियों के भी माता-पिता रहे हैं। समुद्र मंथन से जिस लक्ष्मी की उत्पत्ति हुई थी, दरअसल वह स्वर्ण के पाए जाने के ही संकेत रहा हो। जन्म समय : शास्त्रों के अनुसार देवी लक्ष्मी का जन्म शरद पूर्णिमा के दिन हुआ था। कार्तिकेय का जन्म भी शरद पूर्णिमा के दिन हुआ था। कार्तिक कृष्ण अमावस्या को उनकी पूजा की जाती है। नाम : देवी लक्ष्मी। नाम का अर्थ : लक्ष्मी\’ शब्द दो शब्दों के मेल से बना है- एक \’लक्ष्य\’ तथा दूसरा \’मी\’ अर्थात लक्ष्य तक ले जाने वाली देवी लक्ष्मी। अन्य नाम : श्रीदेवी, कमला, धन्या, हरिवल्लभी, विष्णुप्रिया, दीपा, दीप्ता, पद्मप्रिया, पद्मसुन्दरी, पद्मावती, पद्मनाभप्रिया, पद्मिनी, चन्द्र सहोदरी, पुष्टि, वसुंधरा आदि नाम प्रमुख हैं। माता-पिता : ख्याति और भृगु। भाई : धाता और विधाता बहन : अलक्ष्मी पति : भगवान विष्णु। पुत्र : 18 पुत्रों में से प्रमुख 4 पुत्रों के नाम हैं- आनंद, कर्दम, श्रीद, चिक्लीत। निवास : क्षीरसागर में भगवान विष्णु के साथ कमल पर वास करती हैं। पर्व : दिवाली। दिन : ज्योतिषशास्त्र एवं धर्मग्रंथों में शुक्रवार की देवी मां लक्ष्मी को माना गया है। वाहन : उल्लू और हाथी। एक मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु की पत्नी देवी लक्ष्मी का वाहन उल्लू है और धन की देवी महालक्ष्मी का वाहन हाथी है। कुछ के अनुसार उल्लू उनकी बहन अलक्ष्मी का प्रतीक है, जो सदा उनके साथ रहती है। देवी लक्ष्मी अपने वाहन उल्लू पर बैठकर भगवान विष्णु के साथ पृथ्वी भ्रमण करने आती हैं। दो रूप : लक्ष्मीजी की अभिव्यक्ति को दो रूपों में देखा जाता है- 1. श्रीरूप और 2. लक्ष्मी रूप। श्रीरूप में वे कमल पर विराजमान हैं और लक्ष्मी रूप में वे भगवान विष्णु के साथ हैं। महाभारत में लक्ष्मी के \’विष्णुपत्नी लक्ष्मी\’ एवं \’राज्यलक्ष्मी\’ दो प्रकार बताए गए हैं। एक अन्य मान्यता के अनुसार लक्ष्मी के दो रूप हैं- भूदेवी और श्रीदेवी। भूदेवी धरती की देवी हैं और श्रीदेवी स्वर्ग की देवी। पहली उर्वरा से जुड़ी हैं, दूसरी महिमा और शक्ति से। भूदेवी सरल और सहयोगी पत्नी हैं जबकि श्रीदेवी चंचल हैं। विष्णु को हमेशा उन्हें खुश रखने के लिए प्रयास करना पड़ता है। बीज मंत्र : ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्मीभ्यो नम:।। व्रत-पूजा : लक्ष्मी चालीसा, लक्ष्मीजी की आरती, लक्ष्मी की महिमा, लक्ष्मी व्रत, लक्ष्मी पूजन आदि। दीपावली पर लक्ष्मीजी की पूजा गणेशजी के साथ की जाती है। देवी लक्ष्मी की पूजा भगवान विष्णु के साथ ही होती है। जहां ऐसा नहीं होता वहां लक्ष्मी की बड़ी बहन अलक्ष्मी निवास करती है। अष्टलक्ष्मी क्या है? अष्टलक्ष्मी माता लक्ष्मी के 8 विशेष रूपों को कहा गया है। माता लक्ष्मी के 8 रूप ये हैं- आदिलक्ष्मी, धनलक्ष्मी, धान्यलक्ष्मी, गजलक्ष्मी, संतानलक्ष्मी, वीरलक्ष्मी, विजयलक्ष्मी, विद्यालक्ष्मी। माता लक्ष्मी के प्रिय भोग : मखाना, सिंघाड़ा, बताशे, ईख, हलुआ, खीर, अनार, पान, सफेद और पीले रंग के मिष्ठान्न, केसर-भात आदि। माता लक्ष्मी के प्रमुख मंदिर : पद्मावती मंदिर तिरुचुरा, लक्ष्मीनारायण मंदिर वेल्लूर, महालक्ष्मी मंदिर मुंबई, लक्ष्मीनारायण मंदिर दिल्ली, लक्ष्मी मंदिर कोल्हापुर, अष्टलक्ष्मी मंदिर चेन्नई, अष्टलक्ष्मी मंदिर हैदराबाद, लक्ष्मी-कुबेर मंदिर वडलूर (चेन्नई), लक्ष्मीनारायण मंदिर जयपुर, महालक्ष्मी मंदिर इंदौर, श्रीपुरम् का स्वर्ण मंदिर तमिलनाडु, पचमठा मंदिर जबलपुर आदि। धन की देवी : देवी लक्ष्मी का घनिष्ठ संबंध देवराज इन्द्र तथा कुबेर से है। इन्द्र देवताओं तथा स्वर्ग के राजा हैं तथा कुबेर देवताओं के खजाने के रक्षक के पद पर आसीन हैं। देवी लक्ष्मी ही इन्द्र तथा कुबेर को इस प्रकार का वैभव, राजसी सत्ता प्रदान करती हैं। समुद्र मंथन की लक्ष्मी : समुद्र मंथन की लक्ष्मी को धन की देवी माना जाता है। उनके हाथ में स्वर्ण से भरा कलश है। इस कलश द्वारा लक्ष्मीजी धन की वर्षा करती रहती हैं। उनके वाहन को सफेद हाथी माना गया है। दरअसल, महालक्ष्मीजी के 4 हाथ बताए गए हैं। वे 1 लक्ष्य और 4 प्रकृतियों (दूरदर्शिता, दृढ़ संकल्प, श्रमशीलता एवं व्यवस्था शक्ति) के प्रतीक हैं और मां महालक्ष्मीजी सभी हाथों से अपने भक्तों पर आशीर्वाद की वर्षा करती हैं। विष्णुप्रिया लक्ष्मी : ऋषि भृगु की पुत्री माता लक्ष्मी थीं। उनकी माता का नाम ख्याति था। (समुद्र मंथन के बाद क्षीरसागर से जो लक्ष्मी उत्पन्न हुई थीं, उसका इनसे कोई संबंध नहीं।) म‍हर्षि भृगु विष्णु के श्वसुर और शिव के साढू थे। महर्षि भृगु को भी सप्तर्षियों में स्थान मिला है। राजा दक्ष के भाई भृगु ऋषि थे। इसका मतलब वे राजा द‍क्ष की भतीजी थीं। माता लक्ष्मी के दो भाई दाता और विधाता थे। भगवान शिव की पहली पत्नी माता सती उनकी (लक्ष्मीजी की) सौतेली बहन थीं। सती राजा दक्ष की पुत्री थी। विवाह कथा : एक बार लक्ष्मीजी के लिए स्वयंवर का आयोजन हुआ। माता लक्ष्मी पहले ही मन ही मन विष्णुजी को पति रूप में स्वीकार कर चुकी थीं लेकिन नारद मुनि भी लक्ष्मीजी से विवाह करना चाहते थे। नारदजी ने सोचा कि यह राजकुमारी हरि रूप पाकर ही उनका वरण करेगी। तब नारदजी विष्णु भगवान के पास हरि के समान सुन्दर रूप मांगने पहुंच गए। विष्णु भगवान ने नारद की इच्छा के अनुसार उन्हें हरि रूप दे दिया। हरि रूप लेकर जब नारद राजकुमारी के स्वयंवर में पहुंचे तो उन्हें विश्वास था कि राजकुमारी उन्हें ही वरमाला पहनाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। राजकुमारी ने नारद को छोड़कर भगवान विष्णु के गले में वरमाला डाल दी। नारदजी वहां से उदास होकर लौट रहे थे तो रास्ते में एक जलाशय में उन्होंने अपना चेहरा देखा। अपने चेहरे को देखकर नारद हैरान रह गए, क्योंकि उनका चेहरा बंदर जैसा लग रहा था। \’हरि\’ का एक अर्थ विष्णु होता है और एक वानर होता है। भगवान विष्णु ने नारद को वानर रूप दे दिया था। नारद समझ गए कि भगवान विष्णु ने उनके साथ छल किया। उनको भगवान पर बड़ा क्रोध आया। नारद सीधे बैकुंठ

July 4, 2022 / 0 Comments
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ਸ਼੍ਰੀ ਅਕਾਲ ਤਖ਼ਤ ਸਾਹਿਬ  – ਇਤਿਹਾਸ

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ਸ਼੍ਰੀ ਅਕਾਲ ਤਖ਼ਤ ਸਾਹਿਬ  ਅਕਾਲ ਤਖ਼ਤ ਸਿੱਖਾਂ ਦੇ ਧਾਰਮਿਕ ਅਖਤਿਆਰਾਂ ਦੀ ਮੁੱਢਲੀ ਗੱਦੀ ਤੇ ਰਾਜਨੀਤਕ ਸਰਬੱਤ ਖ਼ਾਲਸਾ ਦੀਵਾਨਾਂ ਦੀ ਮੰਜੀ ਹੈ। ਇਸ ਦੇ ਸ਼ਾਬਦਿਕ ਅਰਥ ਹਨ ‘ਕਾਲ ਤੋਂ ਰਹਿਤ ਪਰਮਾਤਮਾ ਦਾ ਸਿੰਘਾਸਨ’।[1] ਮੀਰੀ-ਪੀਰੀ ਅਰਥਾਤ ਸਿੱਖਾਂ ਦੇ ਰਾਜਨੀਤਿਕ ਅਤੇ ਰੂਹਾਨੀ ਵਿਚਾਰਧਾਰਾ ਦੇ ਪ੍ਰਤੀਕ ਵਜੋਂ ਸ੍ਰੀ ਹਰਿਮੰਦਰ ਸਾਹਿਬ ਦੇ ਸਾਹਮਣੇ ਸਥਿਤ ਹੈ, ਜੋ ਸਿੱਖ ਰਾਜਨੀਤਕ ਪ੍ਰਭਸੱਤਾ ਨੂੰ ਪੇਸ਼ ਕਰ ਰਿਹਾ ਹੈ। 15 ਜੂਨ 1606 ਨੂੰ ਸਿੱਖਾਂ ਦੇ ਛੇਵੇਂ ਗੁਰੂ ਸ੍ਰੀ ਗੁਰੂ ਹਰਗੋਬਿੰਦ ਸਾਹਿਬ ਨੇ ਇੱਥੇ ਤਖ਼ਤ ਦਾ ਇੱਕ ਢਾਂਚਾ ਆਪਣੇ ਹੱਥੀਂ ਨੀਂਹ ਰੱਖ ਕੇ ਬਾਬਾ ਬੁੱਢਾ ਜੀ ਰਾਹੀਂ ਮੁਕੰਮਲ ਕਰਵਾਇਆ ਤੇ ਇਥੋਂ ਸੰਗਤਾਂ ਦੇ ਨਾਂ ਪਹਿਲਾ ਹੁਕਮਨਾਮਾ ਜਾਰੀ ਕੀਤਾ ਜਿਸ ਵਿੱਚ ਹੋਰ ਵਸਤਾਂ ਭੇਂਟ ਵਿੱਚ ਲਿਆਣ ਤੋਂ ਇਲਾਵਾ ਸ਼ਸਤਰ ਤੇ ਘੋੜੇ ਆਦਿ ਭੇਂਟ ਕਰਨ ਦੀ ਆਗਿਆ ਕੀਤੀ ਗਈ। ਇਸ ਤਖ਼ਤ ਉੱਪਰ ਜੋ ਬਿਲਡਿੰਗ ਦਾ ਨਿਰਮਾਣ ਕਰਵਾਇਆ ਗਿਆ ਉਸ ਦਾ ਨਾਂ ਅਕਾਲ ਬੁੰਗਾ ਰੱਖਿਆ ਗਿਆ। ਸਿੱਖਾਂ ਵਾਸਤੇ ਇਸ ਤਰਾਂ ਦੇ ਚਾਰ ਤਖ਼ਤ ਹੋਰ ਹਨ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਨਾਂ ਹਨ:- ਸ਼੍ਰੀ ਪਟਨਾ ਸਾਹਿਬ (ਬਿਹਾਰ) ਸ਼੍ਰੀ ਕੇਸਗੜ੍ਹ ਸਾਹਿਬ (ਅਨੰਦਪੁਰ ਸਾਹਿਬ) ਸ਼੍ਰੀ ਹਜ਼ੂਰ ਸਾਹਿਬ (ਨੰਦੇੜ, ਮਹਾ‍ਰਾਸਟਰ) ਸ਼੍ਰੀ ਦਮਦਮਾ ਸਾਹਿਬ (ਤਲਵੰਡੀ ਸਾਬੋ) ਇਤਿਹਾਸ : ਸ੍ਰੀ ਗੁਰੁ ਹਰਗੋਬਿੰਦ ਸਾਹਿਬ ਜੀ ਨੇ ਭਗਤੀ ਤੇ ਸ਼ਕਤੀ ਦੇ ਪ੍ਰਤੀਕ ਸ੍ਰੀ ਅਕਾਲ ਤਖ਼ਤ ਸਾਹਿਬ ਦੀ ਸਥਾਪਨਾ ਸ੍ਰੀ ਦਰਬਾਰ ਸਾਹਿਬ ਅੰਮਿ੍ਤਸਰ ਦੇ ਠੀਕ ਸਾਹਮਣੇ 1609 ਨੂੰ ਕੀਤੀ, ਜਿਸ ਨਾਲ ਸਿੱਖ ਇਤਹਾਸ ਚ ਇੱਕ ਨਵਾਂ ਮੋੜ ਆਇਆ ਤੇ ਸਿੱਖਾਂ ਨੇ ਸ਼ਸਤਰ ਧਾਰਨੇ ਵੀ ਸ਼ੁਰੂ ਕਰ ਦਿੱਤੇ। 17ਵੀਂ ਅਤੇ 18ਵੀਂ ਸਦੀ ਦੇ ਸ਼ਾਸਕਾਂ ਦੇ ਜ਼ੁਲਮ ਅਤੇ ਬੇਰਹਿਮੀ ਦੇ ਖਿਲਾਫ ਰਾਜਨੀਤਕ ਅਤੇ ਸੈਨਿਕ ਪ੍ਰਤੀਰੋਧ ਦੇ ਪ੍ਰਤੀਕ ਵਜੋਂ ਇਹ ਖਾ ਰਿਹਾ। 18ਵੀਂ ਸਦੀ ਵਿੱਚ, ਅਹਮਦ ਸ਼ਾਹ ਅਬਦਾਲੀ ਅਤੇ ਮੱਸੇ ਰੰਘੜ ਨੇ ਅਕਾਲ ਤਖ਼ਤ ਉੱਤੇ ਹਮਲਿਆਂ ਦੀ ਇੱਕ ਲੜੀ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਕੀਤੀ ਸੀ।[1]ਗੁਰੂ ਹਰਗੋਬਿੰਦ ਸਾਹਿਬ ਦੇ 1635 ਵਿੱਚ ਸ੍ਰੀ ਕੀਰਤਪੁਰ ਸਾਹਿਬ ਪ੍ਰਸਥਾਨ ਕਰ ਜਾਣ ਉਪਰੰਤ ਅੰਮਿਤਸਰ ਸਾਹਿਬ ਦੇ ਪਵਿਤਰ ਅਸਥਾਨ ਤੇ ਸ੍ਰੀ ਅਕਾਲ ਤਖ਼ਤ ਸਾਹਿਬ ਦਾ ਪ੍ਰਬੰਧ ਪ੍ਰਿਥੀ ਚੰਦ ਦੇ ਵਾਰਸਾਂ ਦੇ ਹੱਥ ਵਿੱਚ ਚਲਾ ਗਿਆ। ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਪੋਤੇ ਹਰ ਜੀ 1696 ਤਕ 55 ਸਾਲ ਲਈ ਤਖ਼ਤ ਦੇ ਸੰਚਾਲਕ ਰਹੇ। 1699 ਵਿੱਚ ਖਾਲਸਾ ਪੰਥ ਦੀ ਸਿਰਜਨਾ ਉਪਰੰਤ ਗੁਰੂ ਗੋਬਿੰਦ ਸਿੰਘ ਜੀ ਨੇ ਭਾਈ ਮਨੀ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਹਰਿਮੰਦਰ ਸਾਹਿਬ ਤੇ ਅਕਾਲ ਤਖ਼ਤ ਸਾਹਿਬ ਦੇ ਪ੍ਰਬੰਧ ਲਈ ਭੇਜਿਆ। 1716 ਵਿੱਚ ਬੰਦਾ ਸਿੰਘ ਬਹਾਦਰ ਦੀ ਸ਼ਹਾਦਤ ਤੋਂ ਬਾਦ ਹਰਿਮੰਦਰ ਸਾਹਿਬ ਦਾ ਸਰੋਵਰ ਤੇ ਅਕਾਲ ਤਖਤ ਸਿਖਾਂ ਲਈ ਪ੍ਰੋਤਸਾਹਨ ਤੇ ਰੂਹਾਨੀ ਆਨੰਦ ਦੇ ਮੁੱਖ ਸਰੋਤ ਰਹੇ ਹਨ। ਦਿਵਾਲੀ ਤੇ ਵਿਸਾਖੀ ਨੂੰ ਇਥੇ ਸਰਬੱਤ ਖਾਲਸਾ ਦੀਵਾਨ ਸਜਦੇ ਤੇ ਗੁਰਮਤੇ ਰਾਹੀਂ ਗੰਭੀਰ ਪੰਥਕ ਮਸਲਿਆਂ ਤੇ ਫੈਸਲੈ ਲਏ ਜਾਂਦੇ। ਉਦਾਹਰਣ ਦੇ ਤੌਰ ਤੇ 4 ਅਕਤੂਬਰ 1745 ਨੂੰ ਗੁਰਮਤਾ ਕਰਕੇ ਖਾਲਸੇ ਦੀ 25 ਜੱਥਿਆਂ ਵਿੱਚ ਵੰਡ ਕੀਤੀ ਗਈ। 19 ਮਾਰਚ 1748 ਦੀ ਵਿਸਾਖੀ ਵਾਲੇ ਦਿਨ 11 ਮਿਸਲਾਂ ਬਣਾਉਣ ਦਾ ਗੁਰਮਤਾ ਕੀਤਾ ਗਿਆ। 10 ਅਪ੍ਰੇਲ 1673 ਨੂੰ ਗੁਰਮਤਾ ਕਰਕੇ ਇੱਕ ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਦੀ ਉਸ ਦੀ ਅਗਵਾ ਕਰ ਲਈ ਗਈ ਪਤਨੀ ਦੀ ਮਦਦ ਕਰਨ ਦਾ ਫੈਸਲਾ ਕੀਤਾ ਗਿਆ। ਦਸੰਬਰ 1674 ਭਾਈ ਗੁਰਬਖ਼ਸ਼ ਸਿੰਘ 30 ਸਿਖਾਂ ਦੀ ਅਗਵਾਈ ਵਿੱਚ ਵਿੱਚ ਅਹਿਮਦ ਸ਼ਾਹ ਦੁਰਾਨੀ ਤੌਂ ਅਕਾਲ ਬੁੰਗੇ ਦੀ ਰੱਖਿਆ ਕਰਦੇ ਹੋਏ ਸ਼ਹੀਦ ਹੋ ਗਏ। ਬੁਰਜੀ ਤੇ ਇਮਾਰਤ ਪੂਰੀ ਤਰਾਂ ਢਾਹ ਦਿਤੀ ਗਈ। 10 ਅਪ੍ਰੈਲ 1765 ਨੂੰ ਗੁਰਮਤੇ ਵਿੱਚ ਮੁੜ ਉਸਾਰੀ ਦਾ ਫੈਸਲਾ ਲੈ ਕੇ 1774 ਤਕ ਜ਼ਮੀਨੀ ਤਲ ਤਕ ਅਕਾਲ ਬੁੰਗਾ ਮੁੜ ਉਸਾਰ ਲਿਆ ਗਿਆ। ਬਾਕੀ ਦੀ ਪੰਜ ਮੰਜ਼ਿਲਾ ਇਮਾਰਤ ਮਹਾਰਾਜਾ ਰਣਜੀਤ ਸਿੰਘ ਦੇ ਸਮੇਂ ਵਿੱਚ ਮੁਕੰਮਲ ਹੋਈ। ਤੀਸਰੀ ਮੰਜ਼ਿਲ ਤੇ ਬਣੇ ਹਾਲ ਕਮਰੇ ਦਾ ਤੇਜਾ ਸਿੰਘ ਸਮੁੰਦਰੀ ਹਾਲ ਬਣਨ ਤਕ ਸ਼੍ਰੋਮਣੀ ਗੁਰਦਵਾਰਾ ਪ੍ਰਬੰਧਕ ਕਮੇਟੀ ਦੀਆਂ ਇਕੱਤਰਤਾਵਾਂ ਲਈ ਇਸਤੇਮਾਲ ਕੀਤਾ ਜਾਂਦਾ ਰਿਹਾ ਹੈ। ਜੂਨ 1984 ਵਿੱਚ ਅਕਾਲ ਬੁੰਗੇ ਦਾ ਮੱਥਾ ਇੱਕ ਵਾਰ ਫਿਰ ਬਲਿਊਸਟਾਰ ਆਪ੍ਰੇਸ਼ਨ ਦੌਰਾਨ ਹਿੰਦੁਸਤਾਨੀ ਫੌਜ ਦੁਆਰਾ ਬਰਬਾਦ ਕੀਤਾ ਗਿਆ। ਭਾਵੇਂ ਭਾਰਤ ਸਰਕਾਰ ਨੇ ਮੁੜ ਉਸਾਰੀ ਕਰਵਾਈ ਪਰ ਸਿੱਖਾਂ ਨੂੰ ਇਹ ਪ੍ਰਵਾਨ ਨਹੀਂ ਸੀ। 1986 ਵਿੱਚ ਇਮਾਰਤ ਨੂੰ ਢਾਹ ਕੇ ਕਾਰ ਸੇਵਾ ਰਾਹੀਂ ਅਕਾਲ ਬੁੰਗੇ ਦੀ ਮੁੜ ਉਸਾਰੀ ਕੀਤੀ ਗਈ ਹੈ ਜੋ ਕਿ ਅਜੋਕੀ ਇਮਾਰਤ ਹੈ।

July 4, 2022 / 0 Comments
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हिन्दू देवता \’भैरवनाथ\’

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हिन्दू देवता \’भैरवनाथ\’ हिन्दू धर्म के दो मार्ग दक्षिण और वाम मार्ग में भैरव की उपासना वाममार्गी करते हैं। भैरव का अर्थ होता है जिसका रव अर्थात् शब्द भीषण हो और जो जो देखने में भयंकर हो। इसके अलावा घोर विनाश करने वाला उग्रदेव। भैरव का एक दूसरा अर्थ है जो भय से मुक्त करे वह भैरव। जगदम्बा अम्बा के दो अनुचर है पहले हनुमानजी और दूसरा काल भैरव। भैरव का अर्थ होता है भय का हरण कर जगत का भरण करने वाला। ऐसा भी कहा जाता है कि भैरव शब्द के तीन अक्षरों में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों की शक्ति समाहित है। भैरव शिव के गण और पार्वती के अनुचर माने जाते हैं। हिंदू देवताओं में भैरव का बहुत ही महत्व है। भैरव एक पदवी है। भैरव को भगवान् शिव के अन्य अनुचर, जैसे भूत-प्रेत, पिशाच आदि का अधिपति माना गया है। इनकी उत्पत्ति भगवती महामाया की कृपा से हुई है। भैरव को मानने वाले दो संप्रदाय में विभक्त हैं। पहला काल भैरव और दूसरा बटुक भैरव। भैरव काशी और उज्जैन के द्वारपाल हैं। उज्जैन में काल भैरव की जाग्रत प्रतीमा है जो मदीरापान करती है। इनके अतिरिक्त कुमाऊ मंडल में नैनीताल के निकट घोड़ाखाल में बटुक भैरव का मंदिर है जिन्हें गोलू देवता के नाम से जाना जाता हैं। मुख्य रूप से आठ भैरव माने गए हैं- 1.असितांग भैरव, 2. रुद्र भैरव, 3. चंद्र भैरव, 4. क्रोध भैरव, 5. उन्मत्त भैरव, 6. कपाली भैरव, 7. भीषण भैरव और 8. संहार भैरव। हिन्दू धर्म में भैरव को विशाल आकार के काले शारीरक वर्ण वाले, हाथ में भयानक दंड धारण किए हुए और साथ में काले कुत्ते की सवारी करते हुए वर्णन किया गया है। दक्षिण भारत में ये \’शास्ता\’ के नाम से तथा माहाराष्ट्र राज्य में ये \’खंडोबा\’ के नाम से जाने जाते हैं। तामसिक स्वाभाव वाले, ये सभी भैरव तथा भैरवी, मृत्यु या विनाश के कारक हैं, काल के प्रतिक स्वरुप, रोग-व्याधि इत्यादि के रूप में ये ही प्रकट हो, विनाश या मृत्यु की ओर ले जाते हैं। भैरव की उत्पत्ति : पुराणों में उल्लेख है कि शिव के रूधिर से भैरव की उत्पत्ति हुई। बाद में उक्त रूधिर के दो भाग हो गए- पहला बटुक भैरव और दूसरा काल भैरव। भगवान भैरव को असितांग, रुद्र, चंड, क्रोध, उन्मत्त, कपाली, भीषण और संहार नाम से भी जाना जाता है। भगवान शिव के पाँचवें अवतार भैरव को भैरवनाथ भी कहा जाता है। नाथ सम्प्रदाय में इनकी पूजा का विशेष महत्व है। काल भैरव : काल भैरव का आविर्भाव मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी को प्रदोषकाल में हुआ था। शिव पुराण के अनुसार, अंधकासुर नामक दैत्य के संहार के कारण भगवान् शिव के रुधिर से भैरव की उत्पत्ति हुई थी। अन्य एक कथा के अनुसार एक बार जगत के सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी ने शिव तथा उन के गाणों की रूपसज्जा को देख कर अपमान जनक वचन कहे। परन्तु भगवान् शिव ने उस वाचन पर कोई ध्यान नहीं दिया, परन्तु शिव के शारीर से एक प्रचंड काया का प्राकट्य हुआ तथा वो ब्रह्मा जी को मरने हेतु उद्धत हो आगे बड़ा, जिसके परिणामस्वरूप ब्रह्मा जी अत्यंत भयभीत हो गए। अंततः शिव जी द्वारा मध्यस्थता करने के कारण वो क्रोधित तथा विकराल रूप वाला गण शांत हुआ। तदनंतर, भगवान् शिव ने उस गण को अपने आराधना स्थल काशी का द्वारपाल नियुक्त कर दिया। बटुक भैरव : \’बटुकाख्यस्य देवस्य भैरवस्य महात्मन:। ब्रह्मा विष्णु, महेशाधैर्वन्दित दयानिधे।।\’- अर्थात् ब्रह्मा, विष्णु, महेशादि देवों द्वारा वंदित बटुक नाम से प्रसिद्ध इन भैरव देव की उपासना कल्पवृक्ष के समान फलदायी है। बटुक भैरव भगवान का बाल रूप है। इन्हें आनंद भैरव भी कहते हैं। उक्त सौम्य स्वरूप की आराधना शीघ्र फलदायी है। यह कार्य में सफलता के लिए महत्वपूर्ण है। उक्त आराधना के लिए मंत्र है- ।।ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाचतु य कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं ॐ।। भैरव आराधना : एकमात्र भैरव की आराधना से ही शनि का प्रकोप शांत होता है। आराधना का दिन रविवार और मंगलवार नियुक्त है। पुराणों के अनुसार भाद्रपद माह को भैरव पूजा के लिए अति उत्तम माना गया है। उक्त माह के रविवार को बड़ा रविवार मानते हुए व्रत रखते हैं। आराधना से पूर्व जान लें कि कुत्ते को कभी दुत्कारे नहीं बल्कि उसे भरपेट भोजन कराएँ। जुआ, सट्टा, शराब, ब्याजखोरी, अनैतिक कृत्य आदि आदतों से दूर रहें। दाँत और आँत साफ रखें। पवित्र होकर ही सात्विक आराधना करें। अपवि‍त्रता वर्जित है। भैरव तंत्र : योग में जिसे समाधि पद कहा गया है, भैरव तंत्र में भैरव पद या भैरवी पद प्राप्त करने के लिए भगवान शिव ने देवी के समक्ष 112 विधियों का उल्लेख किया है जिनके माध्यम से उक्त अवस्था को प्राप्त हुआ जा सकता है। लोक देवता : लोक जीवन में भगवान भैरव को भैरू महाराज, भैरू बाबा, मामा भैरव, नाना भैरव आदि नामों से जाना जाता है। कई समाज के ये कुल देवता हैं और इन्हें पूजने का प्रचलन भी भिन्न-भिन्न है, जो कि विधिवत न होकर स्थानीय परम्परा का हिस्सा है। यह भी उल्लेखनीय है कि भगवान भैरव किसी के शरीर में नहीं आते। पालिया महाराज : सड़क के किनारे भैरू महाराज के नाम से ज्यादातर जो ओटले या स्थान बना रखे हैं दरअसल वे उन मृत आत्माओं के स्थान हैं जिनकी मृत्यु उक्त स्थान पर दुर्घटना या अन्य कारणों से हो गई है। ऐसे किसी स्थान का भगवान भैरव से कोई संबंध नहीं। उक्त स्थान पर मत्था टेकना मान्य नहीं है। भैरव चरित्र : भैरव के चरित्र का भयावह चित्रण कर तथा घिनौनी तांत्रिक क्रियाएं कर लोगों में उनके प्रति एक डर और उपेक्षा का भाव भरने वाले तांत्रिकों और अन्य पूजकों को भगवान भैरव माफ करें। दरअसल भैरव वैसे नहीं है जैसा कि उनका चित्रण किया गया है। वे मांस और मदिरा से दूर रहने वाले शिव और दुर्गा के भक्त हैं। उनका चरित्र बहुत ही सौम्य, सात्विक और साहसिक है। उनका कार्य है शिव की नगरी काशी की सुरक्षा करना और समाज के अपराधियों को पकड़कर दंड के लिए प्रस्तुत करना। जैसे एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी, जिसके पास जासूसी ‍कुत्ता होता है। उक्त अधिकारी का जो कार्य होता है वही भगवान भैरव का कार्य है। भैरव मंदिर : काशी का काल भैरव मंदिर सर्वश्रेष्ठ माना

July 2, 2022 / 0 Comments
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हिन्दू देवता \’भैरवनाथ\’

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हिन्दू देवता \’भैरवनाथ\’ हिन्दू धर्म के दो मार्ग दक्षिण और वाम मार्ग में भैरव की उपासना वाममार्गी करते हैं। भैरव का अर्थ होता है जिसका रव अर्थात् शब्द भीषण हो और जो जो देखने में भयंकर हो। इसके अलावा घोर विनाश करने वाला उग्रदेव। भैरव का एक दूसरा अर्थ है जो भय से मुक्त करे वह भैरव। जगदम्बा अम्बा के दो अनुचर है पहले हनुमानजी और दूसरा काल भैरव। भैरव का अर्थ होता है भय का हरण कर जगत का भरण करने वाला। ऐसा भी कहा जाता है कि भैरव शब्द के तीन अक्षरों में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों की शक्ति समाहित है। भैरव शिव के गण और पार्वती के अनुचर माने जाते हैं। हिंदू देवताओं में भैरव का बहुत ही महत्व है। भैरव एक पदवी है। भैरव को भगवान् शिव के अन्य अनुचर, जैसे भूत-प्रेत, पिशाच आदि का अधिपति माना गया है। इनकी उत्पत्ति भगवती महामाया की कृपा से हुई है। भैरव को मानने वाले दो संप्रदाय में विभक्त हैं। पहला काल भैरव और दूसरा बटुक भैरव। भैरव काशी और उज्जैन के द्वारपाल हैं। उज्जैन में काल भैरव की जाग्रत प्रतीमा है जो मदीरापान करती है। इनके अतिरिक्त कुमाऊ मंडल में नैनीताल के निकट घोड़ाखाल में बटुक भैरव का मंदिर है जिन्हें गोलू देवता के नाम से जाना जाता हैं। मुख्य रूप से आठ भैरव माने गए हैं- 1.असितांग भैरव, 2. रुद्र भैरव, 3. चंद्र भैरव, 4. क्रोध भैरव, 5. उन्मत्त भैरव, 6. कपाली भैरव, 7. भीषण भैरव और 8. संहार भैरव। हिन्दू धर्म में भैरव को विशाल आकार के काले शारीरक वर्ण वाले, हाथ में भयानक दंड धारण किए हुए और साथ में काले कुत्ते की सवारी करते हुए वर्णन किया गया है। दक्षिण भारत में ये \’शास्ता\’ के नाम से तथा माहाराष्ट्र राज्य में ये \’खंडोबा\’ के नाम से जाने जाते हैं। तामसिक स्वाभाव वाले, ये सभी भैरव तथा भैरवी, मृत्यु या विनाश के कारक हैं, काल के प्रतिक स्वरुप, रोग-व्याधि इत्यादि के रूप में ये ही प्रकट हो, विनाश या मृत्यु की ओर ले जाते हैं। भैरव की उत्पत्ति : पुराणों में उल्लेख है कि शिव के रूधिर से भैरव की उत्पत्ति हुई। बाद में उक्त रूधिर के दो भाग हो गए- पहला बटुक भैरव और दूसरा काल भैरव। भगवान भैरव को असितांग, रुद्र, चंड, क्रोध, उन्मत्त, कपाली, भीषण और संहार नाम से भी जाना जाता है। भगवान शिव के पाँचवें अवतार भैरव को भैरवनाथ भी कहा जाता है। नाथ सम्प्रदाय में इनकी पूजा का विशेष महत्व है। काल भैरव : काल भैरव का आविर्भाव मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी को प्रदोषकाल में हुआ था। शिव पुराण के अनुसार, अंधकासुर नामक दैत्य के संहार के कारण भगवान् शिव के रुधिर से भैरव की उत्पत्ति हुई थी। अन्य एक कथा के अनुसार एक बार जगत के सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी ने शिव तथा उन के गाणों की रूपसज्जा को देख कर अपमान जनक वचन कहे। परन्तु भगवान् शिव ने उस वाचन पर कोई ध्यान नहीं दिया, परन्तु शिव के शारीर से एक प्रचंड काया का प्राकट्य हुआ तथा वो ब्रह्मा जी को मरने हेतु उद्धत हो आगे बड़ा, जिसके परिणामस्वरूप ब्रह्मा जी अत्यंत भयभीत हो गए। अंततः शिव जी द्वारा मध्यस्थता करने के कारण वो क्रोधित तथा विकराल रूप वाला गण शांत हुआ। तदनंतर, भगवान् शिव ने उस गण को अपने आराधना स्थल काशी का द्वारपाल नियुक्त कर दिया। बटुक भैरव : \’बटुकाख्यस्य देवस्य भैरवस्य महात्मन:। ब्रह्मा विष्णु, महेशाधैर्वन्दित दयानिधे।।\’- अर्थात् ब्रह्मा, विष्णु, महेशादि देवों द्वारा वंदित बटुक नाम से प्रसिद्ध इन भैरव देव की उपासना कल्पवृक्ष के समान फलदायी है। बटुक भैरव भगवान का बाल रूप है। इन्हें आनंद भैरव भी कहते हैं। उक्त सौम्य स्वरूप की आराधना शीघ्र फलदायी है। यह कार्य में सफलता के लिए महत्वपूर्ण है। उक्त आराधना के लिए मंत्र है- ।।ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाचतु य कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं ॐ।। भैरव आराधना : एकमात्र भैरव की आराधना से ही शनि का प्रकोप शांत होता है। आराधना का दिन रविवार और मंगलवार नियुक्त है। पुराणों के अनुसार भाद्रपद माह को भैरव पूजा के लिए अति उत्तम माना गया है। उक्त माह के रविवार को बड़ा रविवार मानते हुए व्रत रखते हैं। आराधना से पूर्व जान लें कि कुत्ते को कभी दुत्कारे नहीं बल्कि उसे भरपेट भोजन कराएँ। जुआ, सट्टा, शराब, ब्याजखोरी, अनैतिक कृत्य आदि आदतों से दूर रहें। दाँत और आँत साफ रखें। पवित्र होकर ही सात्विक आराधना करें। अपवि‍त्रता वर्जित है। भैरव तंत्र : योग में जिसे समाधि पद कहा गया है, भैरव तंत्र में भैरव पद या भैरवी पद प्राप्त करने के लिए भगवान शिव ने देवी के समक्ष 112 विधियों का उल्लेख किया है जिनके माध्यम से उक्त अवस्था को प्राप्त हुआ जा सकता है। लोक देवता : लोक जीवन में भगवान भैरव को भैरू महाराज, भैरू बाबा, मामा भैरव, नाना भैरव आदि नामों से जाना जाता है। कई समाज के ये कुल देवता हैं और इन्हें पूजने का प्रचलन भी भिन्न-भिन्न है, जो कि विधिवत न होकर स्थानीय परम्परा का हिस्सा है। यह भी उल्लेखनीय है कि भगवान भैरव किसी के शरीर में नहीं आते। पालिया महाराज : सड़क के किनारे भैरू महाराज के नाम से ज्यादातर जो ओटले या स्थान बना रखे हैं दरअसल वे उन मृत आत्माओं के स्थान हैं जिनकी मृत्यु उक्त स्थान पर दुर्घटना या अन्य कारणों से हो गई है। ऐसे किसी स्थान का भगवान भैरव से कोई संबंध नहीं। उक्त स्थान पर मत्था टेकना मान्य नहीं है। भैरव चरित्र : भैरव के चरित्र का भयावह चित्रण कर तथा घिनौनी तांत्रिक क्रियाएं कर लोगों में उनके प्रति एक डर और उपेक्षा का भाव भरने वाले तांत्रिकों और अन्य पूजकों को भगवान भैरव माफ करें। दरअसल भैरव वैसे नहीं है जैसा कि उनका चित्रण किया गया है। वे मांस और मदिरा से दूर रहने वाले शिव और दुर्गा के भक्त हैं। उनका चरित्र बहुत ही सौम्य, सात्विक और साहसिक है। उनका कार्य है शिव की नगरी काशी की सुरक्षा करना और समाज के अपराधियों को पकड़कर दंड के लिए प्रस्तुत करना। जैसे एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी, जिसके पास जासूसी ‍कुत्ता होता है। उक्त अधिकारी का जो कार्य होता है वही भगवान भैरव का कार्य है। भैरव मंदिर : काशी का काल भैरव मंदिर सर्वश्रेष्ठ माना

July 2, 2022 / 0 Comments
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हिन्दू देवता \’भैरवनाथ\’

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हिन्दू देवता \’भैरवनाथ\’ हिन्दू धर्म के दो मार्ग दक्षिण और वाम मार्ग में भैरव की उपासना वाममार्गी करते हैं। भैरव का अर्थ होता है जिसका रव अर्थात् शब्द भीषण हो और जो जो देखने में भयंकर हो। इसके अलावा घोर विनाश करने वाला उग्रदेव। भैरव का एक दूसरा अर्थ है जो भय से मुक्त करे वह भैरव। जगदम्बा अम्बा के दो अनुचर है पहले हनुमानजी और दूसरा काल भैरव। भैरव का अर्थ होता है भय का हरण कर जगत का भरण करने वाला। ऐसा भी कहा जाता है कि भैरव शब्द के तीन अक्षरों में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों की शक्ति समाहित है। भैरव शिव के गण और पार्वती के अनुचर माने जाते हैं। हिंदू देवताओं में भैरव का बहुत ही महत्व है। भैरव एक पदवी है। भैरव को भगवान् शिव के अन्य अनुचर, जैसे भूत-प्रेत, पिशाच आदि का अधिपति माना गया है। इनकी उत्पत्ति भगवती महामाया की कृपा से हुई है। भैरव को मानने वाले दो संप्रदाय में विभक्त हैं। पहला काल भैरव और दूसरा बटुक भैरव। भैरव काशी और उज्जैन के द्वारपाल हैं। उज्जैन में काल भैरव की जाग्रत प्रतीमा है जो मदीरापान करती है। इनके अतिरिक्त कुमाऊ मंडल में नैनीताल के निकट घोड़ाखाल में बटुक भैरव का मंदिर है जिन्हें गोलू देवता के नाम से जाना जाता हैं। मुख्य रूप से आठ भैरव माने गए हैं- 1.असितांग भैरव, 2. रुद्र भैरव, 3. चंद्र भैरव, 4. क्रोध भैरव, 5. उन्मत्त भैरव, 6. कपाली भैरव, 7. भीषण भैरव और 8. संहार भैरव। हिन्दू धर्म में भैरव को विशाल आकार के काले शारीरक वर्ण वाले, हाथ में भयानक दंड धारण किए हुए और साथ में काले कुत्ते की सवारी करते हुए वर्णन किया गया है। दक्षिण भारत में ये \’शास्ता\’ के नाम से तथा माहाराष्ट्र राज्य में ये \’खंडोबा\’ के नाम से जाने जाते हैं। तामसिक स्वाभाव वाले, ये सभी भैरव तथा भैरवी, मृत्यु या विनाश के कारक हैं, काल के प्रतिक स्वरुप, रोग-व्याधि इत्यादि के रूप में ये ही प्रकट हो, विनाश या मृत्यु की ओर ले जाते हैं। भैरव की उत्पत्ति : पुराणों में उल्लेख है कि शिव के रूधिर से भैरव की उत्पत्ति हुई। बाद में उक्त रूधिर के दो भाग हो गए- पहला बटुक भैरव और दूसरा काल भैरव। भगवान भैरव को असितांग, रुद्र, चंड, क्रोध, उन्मत्त, कपाली, भीषण और संहार नाम से भी जाना जाता है। भगवान शिव के पाँचवें अवतार भैरव को भैरवनाथ भी कहा जाता है। नाथ सम्प्रदाय में इनकी पूजा का विशेष महत्व है। काल भैरव : काल भैरव का आविर्भाव मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी को प्रदोषकाल में हुआ था। शिव पुराण के अनुसार, अंधकासुर नामक दैत्य के संहार के कारण भगवान् शिव के रुधिर से भैरव की उत्पत्ति हुई थी। अन्य एक कथा के अनुसार एक बार जगत के सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी ने शिव तथा उन के गाणों की रूपसज्जा को देख कर अपमान जनक वचन कहे। परन्तु भगवान् शिव ने उस वाचन पर कोई ध्यान नहीं दिया, परन्तु शिव के शारीर से एक प्रचंड काया का प्राकट्य हुआ तथा वो ब्रह्मा जी को मरने हेतु उद्धत हो आगे बड़ा, जिसके परिणामस्वरूप ब्रह्मा जी अत्यंत भयभीत हो गए। अंततः शिव जी द्वारा मध्यस्थता करने के कारण वो क्रोधित तथा विकराल रूप वाला गण शांत हुआ। तदनंतर, भगवान् शिव ने उस गण को अपने आराधना स्थल काशी का द्वारपाल नियुक्त कर दिया। बटुक भैरव : \’बटुकाख्यस्य देवस्य भैरवस्य महात्मन:। ब्रह्मा विष्णु, महेशाधैर्वन्दित दयानिधे।।\’- अर्थात् ब्रह्मा, विष्णु, महेशादि देवों द्वारा वंदित बटुक नाम से प्रसिद्ध इन भैरव देव की उपासना कल्पवृक्ष के समान फलदायी है। बटुक भैरव भगवान का बाल रूप है। इन्हें आनंद भैरव भी कहते हैं। उक्त सौम्य स्वरूप की आराधना शीघ्र फलदायी है। यह कार्य में सफलता के लिए महत्वपूर्ण है। उक्त आराधना के लिए मंत्र है- ।।ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाचतु य कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं ॐ।। भैरव आराधना : एकमात्र भैरव की आराधना से ही शनि का प्रकोप शांत होता है। आराधना का दिन रविवार और मंगलवार नियुक्त है। पुराणों के अनुसार भाद्रपद माह को भैरव पूजा के लिए अति उत्तम माना गया है। उक्त माह के रविवार को बड़ा रविवार मानते हुए व्रत रखते हैं। आराधना से पूर्व जान लें कि कुत्ते को कभी दुत्कारे नहीं बल्कि उसे भरपेट भोजन कराएँ। जुआ, सट्टा, शराब, ब्याजखोरी, अनैतिक कृत्य आदि आदतों से दूर रहें। दाँत और आँत साफ रखें। पवित्र होकर ही सात्विक आराधना करें। अपवि‍त्रता वर्जित है। भैरव तंत्र : योग में जिसे समाधि पद कहा गया है, भैरव तंत्र में भैरव पद या भैरवी पद प्राप्त करने के लिए भगवान शिव ने देवी के समक्ष 112 विधियों का उल्लेख किया है जिनके माध्यम से उक्त अवस्था को प्राप्त हुआ जा सकता है। लोक देवता : लोक जीवन में भगवान भैरव को भैरू महाराज, भैरू बाबा, मामा भैरव, नाना भैरव आदि नामों से जाना जाता है। कई समाज के ये कुल देवता हैं और इन्हें पूजने का प्रचलन भी भिन्न-भिन्न है, जो कि विधिवत न होकर स्थानीय परम्परा का हिस्सा है। यह भी उल्लेखनीय है कि भगवान भैरव किसी के शरीर में नहीं आते। पालिया महाराज : सड़क के किनारे भैरू महाराज के नाम से ज्यादातर जो ओटले या स्थान बना रखे हैं दरअसल वे उन मृत आत्माओं के स्थान हैं जिनकी मृत्यु उक्त स्थान पर दुर्घटना या अन्य कारणों से हो गई है। ऐसे किसी स्थान का भगवान भैरव से कोई संबंध नहीं। उक्त स्थान पर मत्था टेकना मान्य नहीं है। भैरव चरित्र : भैरव के चरित्र का भयावह चित्रण कर तथा घिनौनी तांत्रिक क्रियाएं कर लोगों में उनके प्रति एक डर और उपेक्षा का भाव भरने वाले तांत्रिकों और अन्य पूजकों को भगवान भैरव माफ करें। दरअसल भैरव वैसे नहीं है जैसा कि उनका चित्रण किया गया है। वे मांस और मदिरा से दूर रहने वाले शिव और दुर्गा के भक्त हैं। उनका चरित्र बहुत ही सौम्य, सात्विक और साहसिक है। उनका कार्य है शिव की नगरी काशी की सुरक्षा करना और समाज के अपराधियों को पकड़कर दंड के लिए प्रस्तुत करना। जैसे एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी, जिसके पास जासूसी ‍कुत्ता होता है। उक्त अधिकारी का जो कार्य होता है वही भगवान भैरव का कार्य है। भैरव मंदिर : काशी का काल 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July 2, 2022 / 0 Comments
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वसंत पंचमी की कथा

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देवी सरस्वती वसंत पंचमी का त्योहार हिंदू धर्म में एक विशेष महत्व रखता है। इस दिन विद्या की देवी सरस्वती की पूजा की जाती है। यह पूजा पूर्वी भारत में बड़े उल्लास से की जाती है। इस दिन स्त्रियाँ पीले वस्त्र धारण कर पूजा-अर्चना करती हैं। पूरे साल को जिन छः मौसमों में बाँटा गया है, उनमें वसंत लोगों का मनचाहा मौसम है । जब फूलों पर बहार आ जाती है, खेतों में सरसों का सोना चमकने लगता है, जौ और गेहूँ की बालियाँ खिलने लगती हैं, आमों के पेड़ों पर बौर आ जाती है और हर तरफ तितलियाँ मँडराने लगती हैं, तब वसंत पंचमी का त्योहार आता है। इसे कुछ लोग ऋषि पंचमी भी कहते हैं। वसंत पंचमी की कथा : सृष्टि के प्रारंभिक काल में भगवान विष्णु की आज्ञा से ब्रह्माजी ने मनुष्य योनि की रचना की, परंतु वह अपनी सर्जना से संतुष्ट नहीं थे, तब उन्होंने विष्णु जी से आज्ञा लेकर अपने कमंडल से जल को पृथ्वी पर छिड़क दिया, जिससे पृथ्वी पर कंपन होने लगा और एक अद्भुत शक्ति के रूप में चतुर्भुजी सुंदर स्त्री प्रकट हुई। जिनके एक हाथ में वीणा एवं दूसरा हाथ वर मुद्रा में था। वहीं अन्य दोनों हाथों में पुस्तक एवं माला थी। जब इस देवी ने वीणा का मधुर नाद किया तो संसार के समस्त जीव-जंतुओं को वाणी प्राप्त हो गई, तब ब्रह्माजी ने उस देवी को वाणी की देवी सरस्वती कहा। सरस्वती को बागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है। संगीत की उत्पत्ति करने के कारण वह संगीत की देवी भी हैं। वसंत पंचमी के दिन को इनके जन्मोत्सव के रूप में भी मनाते हैं। पुराणों के अनुसार श्रीकृष्ण ने सरस्वती से खुश होकर उन्हें वरदान दिया था कि वसंत पं चमी के दिन तुम्हारी भी आराधना की जाएगी। इस कारण हिंदू धर्म में वसंत पंचमी के दिन विद्या की देवी सरस्वती की पूजा की जाती है। पर्व का महत्व : वसंत ऋतु में मानव तो क्या पशु-पक्षी तक उल्लास भरने लगते हैं। यूँ तो माघ का पूरा मास ही उत्साह देने वाला होता है, पर वसंत पंचमी का पर्व हमारे लिए कुछ खास महत्व रखता है। प्राचीनकाल से इसे ज्ञान और कला की देवी माँ सरस्वती का जन्मदिवस माना जाता है, इसलिए इस दिन मा ँ शारदे की पूजा कर उनसे ज्ञानवान, विद्यावान होने की कामना की जाती है। वहीं कलाकारों में इस दिन का विशेष महत्व है। कवि, लेखक, गायक, वादक, नाटककार, नृत्यकार अपने उपकरणों की पूजा के साथ माँ सरस्वती की वंदना करते हैं। पूजन की विधि : वसंत पंचमी में प्रातः उठकर बेसनयुक्त तेल का शरीर पर उबटन करके स्नान करना चाहिए। इसके बाद स्वच्छ पीले वस्त्र धारणकर माँ शारदा की पूजा करना चाहिए। साथ ही केशरयुक्त मीठे चावल अवश्य घर में बनाकर उनका सेवन करना चाहिए।

June 30, 2022 / 0 Comments
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भगवान सूर्य की पौराणिक कथा और महिमा

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भगवान सूर्य की पौराणिक कथा और महिमा सूर्य और चंद्र इस पृथ्वी के सबसे साक्षात देवता हैं जो हमें प्रत्यक्ष उनके सर्वोच्च दिव्य स्वरूप में दिखाई देते हैं। वेदों में सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया है। समस्त चराचर जगत की आत्मा सूर्य ही है। सूर्य से ही इस पृथ्वी पर जीवन है। वैदिक काल से ही भारत में सूर्योपासना का प्रचलन रहा है। वेदों की ऋचाओं में अनेक स्थानों पर सूर्य देव की स्तुति की गई है। पुराणों में सूर्य की उत्पत्ति,प्रभाव,स्तुति, मन्त्र इत्यादि विस्तार से मिलते हैं। ज्योतिष शास्त्र में नवग्रहों में सूर्य को राजा का पद प्राप्त है। सूर्य देव की उत्पत्ति मार्कंडेय पुराण के अनुसार पहले यह सम्पूर्ण जगत प्रकाश रहित था। उस समय कमलयोनि ब्रह्मा जी प्रकट हुए। उनके मुख से प्रथम शब्द ॐ निकला जो सूर्य का तेज रुपी सूक्ष्म रूप था। तत्पश्चात ब्रह्मा जी के चार मुखों से चार वेद प्रकट हुए जो ॐ के तेज में एकाकार हो गए। यह वैदिक तेज ही आदित्य है जो विश्व का अविनाशी कारण है। ये वेद स्वरूप सूर्य ही सृष्टि की उत्पत्ति,पालन व संहार के कारण हैं। ब्रह्मा जी की प्रार्थना पर सूर्य ने अपने महातेज को समेट कर स्वल्प तेज को ही धारण किया। सृष्टि रचना के समय ब्रह्मा जी के पुत्र मरीचि हुए जिनके पुत्र ऋषि कश्यप का विवाह अदिति से हुआ। अदिति ने घोर तप द्वारा भगवान् सूर्य को प्रसन्न किया जिन्होंने उसकी इच्छा पूर्ति के लिए सुषुम्ना नाम की किरण से उसके गर्भ में प्रवेश किया। गर्भावस्था में भी अदिति चान्द्रायण जैसे कठिन व्रतों का पालन करती थी। ऋषि राज कश्यप ने क्रोधित हो कर अदिति से कहा-\’तुम इस तरह उपवास रख कर गर्भस्थ शिशु को क्यों मरना चाहती हो” यह सुन कर देवी अदिति ने गर्भ के बालक को उदर से बाहर कर दिया जो अपने अत्यंत दिव्य तेज से प्रज्वल्लित हो रहा था। भगवान् सूर्य शिशु रूप में उस गर्भ से प्रगट हुए। अदिति को मारिचम- अन्डम कहा जाने के कारण यह बालक मार्तंड नाम से प्रसिद्ध हुआ। ब्रह्मपुराण में अदिति के गर्भ से जन्मे सूर्य के अंश को विवस्वान कहा गया है। ॐ नमो सूर्या देवाय नमो नमः

June 29, 2022 / 0 Comments
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श्री शनि देव जी की कथा

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शनि देव की कथा शनि, भगवान सूर्य तथा छाया के पुत्र हैं। इनकी दृष्टि में जो क्रूरता है, वह इनकी पत्नी के शाप के कारण है। ब्रह्मपुराण के अनुसार, बचपन से ही शनिदेव भगवान श्रीकृष्ण के भक्त थे। बड़े होने पर इनका विवाह चित्ररथ की कन्या से किया गया। इनकी पत्नि सती-साध्वी और परम तेजस्विनी थीं। एक बार पुत्र-प्राप्ति की इच्छा से वे इनके पास पहुचीं पर ये श्रीकृष्ण के ध्यान में मग्न थे। इन्हें बाह्य जगत की कोई सुधि ही नहीं थी। पत्नि प्रतिक्षा कर थक गयीं तब क्रोधित हो उसने इन्हें शाप दे दिया कि आज से तुम जिसे देखोगे वह नष्ट हो जाएगा। ध्यान टूटने पर जब शनिदेव ने उसे मनाया और समझाया तो पत्नि को अपनी भूल पर पश्चाताप हुआ, किन्तु शाप के प्रतिकार की शक्ति उसमें ना थी। तभी से शनिदेव अपना सिर नीचा करके रहने लगे। क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि उनके द्वारा किसीका अनिष्ट हो। शनि के अधिदेवता प्रजापति ब्रह्मा और प्रत्यधिदेवता यम हैं। इनका वर्ण इन्द्रनीलमणी के समान है। वाहन गीध तथा रथ लोहे का बना हुआ है। ये अपने हाथों में धनुष, बाण, त्रिशूल तथा वरमुद्रा धारण करते हैं। यह एक-एक राशि में तीस-तीस महीने रहते हैं। यह मकर व कुम्भ राशि के स्वामी हैं तथा इनकी महादशा 19 वर्ष की होती है। इनका सामान्य मंत्र है – \”ऊँ शं शनैश्चराय नम:\” इसका श्रद्धानुसार रोज एक निश्चित संख्या में जाप करना चाहिए। शनिवार का व्रत यूं तो आप वर्ष के किसी भी शनिवार के दिन शुरू कर सकते हैं परंतु श्रावण मास में शनिवार का व्रत प्रारम्भ करना अति मंगलकारी है । इस व्रत का पालन करने वाले को शनिवार के दिन प्रात: ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करके शनिदेव की प्रतिमा की विधि सहित पूजन करनी चाहिए। शनि भक्तों को इस दिन शनि मंदिर में जाकर शनि देव को नीले लाजवन्ती का फूल, तिल, तेल, गुड़ अर्पण करना चाहिए। शनि देव के नाम से दीपोत्सर्ग करना चाहिए। शनिवार के दिन शनिदेव की पूजा के पश्चात उनसे अपने अपराधों एवं जाने अनजाने जो भी आपसे पाप कर्म हुआ हो उसके लिए क्षमा याचना करनी चाहिए। शनि महाराज की पूजा के पश्चात राहु और केतु की पूजा भी करनी चाहिए। इस दिन शनि भक्तों को पीपल में जल देना चाहिए और पीपल में सूत्र बांधकर सात बार परिक्रमा करनी चाहिए। शनिवार के दिन भक्तों को शनि महाराज के नाम से व्रत रखना चाहिए। शनि की अत्यन्त सूक्ष्म दृष्टि है । शनि अच्छे कर्मो के फलदाता भी है। शनि बुर कर्मो का दंड भी देते है। जय जय श्री शनि देव जी महाराज

June 29, 2022 / 0 Comments
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गणेश जी के जन्म की कहानी

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एक दिन पार्वती माता स्नान करने के लिए जा रही थी लेकिन वहां पर उनके लिए कोई भी रक्षक उपस्थित नहीं था| इसलिए उन्होंने चंदन के पेस्ट से एक लड़के को अवतार दिया और उसका नाम गणेश रखा. माता पार्वती नें गणेश को आदेश देते हुए कहा की उनकी अनुमति के बिना वो किसी को भी घर के अंदर ना आने दें| उस समय माता पार्वती के पति प्रभु शिव जी किसी काम से कही बाहर गए हुए थे. जब शिवजी वापस लौटे तो उन्होंने देखा की द्वार पर एक बालक खड़ा है, उन्होंने सोचा शायद खेलते-खेलते वहाँ युही आ गया हो| जब वे अन्दर जाने लगे तो उस बालक नें उन्हें रोक लिया और नहीं जाने दियायह देख शिवजी क्रोधित हुए और अपने सवारी बैल नंदी को उस बालक से युद्ध करने को कहाँ पर युद्ध में उस छोटे बालक नें नंदी को हरा दिया. अक्सर कहानियों मे आपने सुना ही होगा की शिव जी को जल्दी क्रोध आ जाता था और गणेश को जीतता हुआ देख कर भगवान शिवजी को फिर से क्रोध आ गया और उन्होंने उस बाल गणेश के सर धड़ से अलग कर काट दिया. इतने में माता पार्वती वापस लौटी तो वो बच्चे का सिर अलग हुआ देख बहुत दुखी हुई और ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी| शिवजी को जब पता चला की वह उनका स्वयं का पुत्र था तो उन्हें भी अपनी गलती का एहसास हुआ. शिवजी नें पार्वती को बहुत समझाने की कोशिश की पर वह नहीं मानी और गणेश का नाम लेते लेते और दुखित होने लगी| पत्नी को दुखी देख शिवजी भी दुखी हो गए. अंत में माता पार्वती नें क्रोधित होकर शिवजी को अपनी शक्ति से गणेश को दोबारा जीवित करने के लिए कहा| शिवजी बोले – “हे पार्वती में गणेश को जीवित तो कर सकता हूँ पर किसी भी अन्य जीवित प्राणी के सीर को जोड़ने पर ही|” माता पार्वती रोते-रोते बोल उठी की मुझे अपना पुत्र किसी भी हाल में जीवित चाहिए| अब भला पत्नी की बात का वो मान कैसे नहीं रखे और तभी उन्होंने नंदी को आदेश दिया – जाओ नंदी इस संसार में जिस किसी भी जीवित प्राणी का सीर तुमको मिले काट लाना| जब नंदी सीर खोज रहा था तो सबसे पहले उससे एक हाथी दिखा तो वो उसका सीर काट कर ले आया. भगवान शिव नें उस सीर को गणेश के शरीर से जोड़ दिया और गणेश को जीवन दान दे दिया. शिवजी नें इसीलिए गणेश जी का नाम गणपति रखा और बाकि सभी देवताओं नें उन्हें वरदान दिया की इस दुनिया में जो भी कुछ नया कार्य करेगा पहले ! जय श्री गणेश

June 23, 2022 / 0 Comments
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जैन धर्म का इतिहास

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जैन धर्म का इतिहास जैन मत भारत की श्रमण परम्परा से निकला प्राचीन मत और दर्शन है। जैन अर्थात् कर्मों का नाश करनेवाले \’जिन भगवान\’ के अनुयायी। सिन्धु घाटी से मिले जैन अवशेष जैन मत को सबसे प्राचीन मत का दर्जा देते है। उदयगिरि की रानी गुम्फा सम्मेदशिखर, राजगिर, पावापुरी, गिरनार, शत्रुंजय, श्रवणबेलगोला आदि जैनों के प्रसिद्ध तीर्थ हैं। पर्यूषण पर्व या दशलक्षण, दीपावली, श्रुत पंचमीऔर रक्षाबंधन इनके मुख्य त्यौहार हैं। अहमदाबाद, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और बंगाल आदि के अनेक जैन आजकल भारत के अग्रगण्य उद्योगपति और व्यापारियों में गिने जाते हैं। जैन धर्म का उद्भव की स्थिति अस्पष्ट है। जैन ग्रंथो के अनुसार धर्म वस्तु का स्वाभाव समझाता है, इसलिए जब से सृष्टि है तब से धर्म है, और जब तक सृष्टि है, तब तक धर्म रहेगा, अर्थात् जैन धर्म सदा से अस्तित्व में था और सदा रहेगा। इतिहासकारो द्वारा जैन धर्म का मूल भी सिंधु घाटी सभ्यता से जोड़ा जाता है जो हिन्द आर्य प्रवास से पूर्व की देशी आध्यात्मिकता को दर्शाता है। सिन्धु घाटी से मिले जैन शिलालेख भी जैन धर्म के सबसे प्राचीन धर्म होने की पुष्टि करते है। अन्य शोधार्थियों के अनुसार श्रमण परम्परा ऐतिहासिक वैदिक धर्म के हिन्द-आर्य प्रथाओं के साथ समकालीन और पृथक हुआ। जैन ग्रंथो (आगम्) के अनुसार वर्तमान में प्रचलित जैन धर्म भगवान आदिनाथ के समय से प्रचलन में आया। यहीं से जो तीर्थंकर परम्परा प्रारम्भ हुयी वह भगवान महावीर या वर्धमान तक चलती रही जिन्होंने ईसा से ५२७ वर्ष पूर्व निर्वाण प्राप्त किया था। भगवान महावीर के समय से पीछे कुछ लोग विशेषकर यूरोपियन विद्वान् जैन धर्म का प्रचलित होना मानते हैं। उनके अनुसार यह धर्म बौद्ध धर्म के पीछे उसी के कुछ तत्वों को लेकर और उनमें कुछ ब्राह्मण धर्म की शैली मिलाकर खडा़ किया गया। जिस प्रकार बौद्धों में २४ बुद्ध है उसी प्रकार जैनों में भी २४ तीर्थंकर है। जैन शब्द जिन शब्द से बना है। जिन बना है \’जि\’ धातु से जिसका अर्थ है जीतना। \’\’जिन अर्थात जीतने वाला\’\’ जिसने स्वयं को जीत लिया उसे जितेंद्रिय कहते हैं।

June 22, 2022 / 0 Comments
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जन्म के समय लखदाता जी का नाम क्या रखा गया था…

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जन्म के समय लखदाता जी का नाम सय्यद अहमद सुलतान रखा गया, आप के सभी नामों में से सखी सरवर नाम ज्यादा प्रचलित है क्योंकि आप इतने जयादा दरिया दिल थे जो भी आप के पास आता कैसी भी मुराद ले के आता, चाहे वो धर्म के प्रति होती चाहे दुनियादारी की मुश्किल होती आप सभी मुश्किलों का हल एक ही पल में कर देते थे । लखदाता जी का एक किस्सा बहुत मशहूर है, जब लखदाता जी की शादी हुई और आप को जो भी दहेज़ में मिला वो सब आपने गरीबों और जरुरतमंदो में बाँट दिया आप बहुत ऊँचे खयालों और गरीबों का धयान रखने वाले पीर थे यां यूँ कहो की दानशीलता और रूहानियत आप में कूट – कूट कर भरी हुई थी । जो भी जरूरतमंद आप के पास आता आप उस की आस मुराद जरुर पूरी करते । इसी लिए आप का नाम सखी सरवर पड़ा । यह बात उस समय से लेकर आज तक अट्टल है कोई भी सवाली, चाहे किसी भी मजहब का हो अगर सच्चे दिल से कोई भी मुराद लेकर आप के दरबार में आता है तो उस की आस-मुराद जरुर पूरी होती है । लखदाता जी ने अपने जीवन का काफी समय धौंकल में गुजारा और बाद में आप शाहकोट आ गए और यहीं पर आपने सय्यद अब्दुल रज़ाक जी की बेटी से शादी की और आप के एक बेटा भी हुआ जिस का नाम सय्यद सिराजुदीन रखा था । उसके बाद आपने दूसरी शादी मुल्तान के राजा घणो पठान जी की बेटी से की । लखदाता जी कई साल अपने पिता जी सय्यद जैनुल आबिदीन, माता आइशा जी और भाईओं के साथ शाहकोट में ही रहे और दीन-दुखियों की सेवा करते रहे । यहीं पर आप के पिता जी, माता जी और भाई अल्ला को प्यारे हो गए और उनके मजार शाहकोट में ही स्थित हैं । एक के बाद एक करके आप के सभी रिश्तेदार अल्ला को प्यारे हो गए तो आप ने शाहकोट को छोड़ने का मन बना लिया और एक दिन आप ने शाहकोट छोड़ दिया और गॉव निगाहा की तरफ रवाना हो गए, जो मुल्तान से लगभग 60 (साठ) कोह की दुरी पर है । जब आप निगाहे की तरफ रवाना हुए तो उस वक़्त आपके साथ आप की पत्नी बीबी बाई जी, आप का बेटा सय्यद सिराजुदीन जो सय्यद राज के नाम से भी प्रसिद्ध है वो और आप के छोटे भाई खान ढोढा जी भी आप के साथ थे । इनके इलावा आप के साथ आप के चार साथी भी थे, वही चार साथी जो चार यार – मियां नूर जी, मियां मुहमद इसहाक जी, मियां उस्मान जी और मियां अली जी – वो भी आप के साथ निगाहा चल दिए । लखदाता जी ने जब शाहकोट छोड़ा तो उन्होंने अपना सब कुछ वही छोड़ दिया था यहाँ तक की सारे खेत खलियान सब ऐसे ही छोड़ कर निगाहा आ गए थे । लखदाता जी ने गॉव निगाहा में आकर डेरा जमा लिया और यहीं पर एक झोंपड़ी बना कर बाकी की सारी जिंदगी खुदा की इबादत करते हुए गरीबों, मजलूमों और जरूरतमंदों की सेवा करते हुए अपना जीवन नौछावर कर दिया । एक बार लखदाता जी ने कुछ राहगीरों को अपने मुखारबिंद से वचन किया था की चाहे कोई फ़क़ीर हो यां चोर , राजा हो यां रंक एक दिन सब को यह दुनिया छोड़ कर जाना है बस फर्क सिर्फ इतना होता है की इंसान का जीना और मरना होता है पर जो पूर्ण पीर फ़क़ीर, संत, गुरु होते है उनका आना जाना होता है वो अपनी मर्ज़ी से आते है और अपनी मर्ज़ी से जाते है उन्हें कोई मार नहीं सकता वो अमर होते है । सखी सरवर जी, लखदाता जी, लालां वाली सरकार अपने मुरीदों में खैरातें बांटते हुए इस नाशवान दुनिया को अलविदा कह कर सचखंड में जा विराजे । लखदाता जी ने अपने मुरीदों से वचन किया की हमारे इस दुनिया छोड़ देने के बाद भी सब की मुरादें पूरी होंगी, अगर कोई भी इंसान, किसी भी मजहब का हो अगर उन्हें सच्चे दिल से याद करेगा तो लखदाता जी उसकी आस – मुराद जरुर पूरी करेंगे । समय के हुकुमरानों ने देश का बंटवारा तो कर दिया लेकिन वो लखदाता जी के मुरीदों की श्रद्धा का बंटवारा नहीं कर सके । इसी लिए आज भी दोनों देशो (हिंदुस्तान और पाकिस्तान ) में लखदाता जी के नाम के मेले लगते है और चिराग रोशन होते है

June 20, 2022 / 0 Comments
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चिड़िया के बच्चे..जब महाभारत का युद्ध प्रारम्भ हो रहा था……

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चिड़िया के बच्चे.. जब महाभारत का युद्ध प्रारम्भ हो रहा था, इधर से पांड़वो की सेना तैयार थी उधर से कौरवों की सेना तैयार थी। दोनों सेनाएं आपस में टकराने के लिए बिल्कुल तैयार थी तो उस समय युद्ध क्षेत्र बीच में एक चिड़िया के अंडे पड़े हुए थे। उस चिड़िया ने अभी-अभी वो अंडे दिए थे और उसकी आँखों में आँसू थे, वो रो रही थी कि दोनों तरफ से सेनाएं आपस मे टकराएंगी और मेरे ये बच्चे तो संसार में आने से पहले ही खत्म हो जाएंगे। उस चिडिया ने इस दु:ख की घडी मे भगवान से विनती की \”हे प्रभु ! जिसकी कोई नहीं सुनता उसकी तो आप सुनते हो।\” उस छोटी सी चिड़िया ने भगवान से प्रार्थना की प्रभु अब तो आप ही कुछ कर सकते है और उसी समय युद्ध प्रारम्भ हुआ। दोनों सेनाएं परस्पर टकराई, महा भयंकर युद्ध हुआ। बडे-बडे महारथी युद्ध मे मारे गये। चारों तरफ सैनिकों के लाशों के ढ़ेर थे। महाभारत युद्ध के उपरांत अर्जुन के रथ को लेकर श्रीकृष्ण कुरुक्षेत्र की भूमि से निकलकर जा रहे है, पांडव युद्ध जीत चुके है। भगवान अर्जुन के रथ को लेकर जा रहे है तो नीचे भूमि पर एक रथ का घंटा पड़ा हुआ है। भगवान के हाथ में घोड़ो को हांकने वाला चाबुक है। भगवान ने उस पड़े हुए घंटे पे‌ जोर से चाबुक को मारा तो वो घंटा पलट गया और जैसे ही वो घंटा पलटा तो उसके अंदर से चिड़िया के नन्हे बच्चे फुदकते हुए बाहर निकले और उड़कर वहाँ से चले गए। ये देखकर अर्जुन को बड़ा आश्चर्य हुआ और अर्जुन भगवान से बोले \”केशव ! ये मैं क्या देख रहा हूँ ? इतना भीषण युद्ध जो ना पहले कभी हुआ और ना आगे शायद होगा। ऐसा ये भीषण महाभारत युद्ध जिसमे भीष्म पितामह, कर्ण और गुरु द्रौण, जैसे योद्धा नहीं बचे। जिस युद्ध में दुर्योधन जैसे बलशाली नहीं बचे। ऐसे भीषण संग्राम में इन चिड़िया के बच्चों की रक्षा किसने की ?\” भगवान मुस्कुराने लगे और बोले \”अर्जुन ! अभी भी नहीं समझा ? अरे पगले जिसने तुझे बचाया है, उसने ही तो इनको बचाया है

June 19, 2022 / 0 Comments
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जीवनगाथा पीर सखी सरवर – लखदाता जी

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जीवनगाथा पीर सखी सरवर – लखदाता जी अरब देश के बग़दाद शहर में बहुत ही करनी वाले फ़क़ीर हुऐ हैं, उनमें से एक फ़क़ीर हुऐ हैं, सय्यद उमरशाह जी । जिन्होंने 40 साल तक \”रसूले करीम सल्लाह अल्ला वस्सलहम\” जी के रोज़ा मुबारक पर सेवा की । उनके 4 बेटे थे – स य्यद जैनुल आबिदीन, सय्यद हस्सन, सय्यद अली और सय्यद जफ़र । एक दिन सय्यद उमरशाह जी अकाल चलाना कर गए, उन के बाद उनकी गद्दी पर उनके बड़े बेटे सय्यद जैनुल आबिदीन जी को बैठाया गया । सय्यद जैनुल आबिदीन जी ने बग़दाद शरीफ में गरीबो, मजबूरों और जरुरत मंदो की 22 साल तक सेवा की, और इसी दौरान उनकी शादी बग़दाद शरीफ की बीबी अमीना जी (जिन्हे लोग बीबी फातिमा जी के नाम से भी याद करते हैं) से हुई । इनके 3 बेटे हुए सय्यद दाऊद, सय्यद महमूद और सय्यद सहरा । 22 साल की सेवा निभाने के बाद एक दिन सय्यद जैनुल आबिदीन जी अपने रूहानी गुरु जी के हुकम से बग़दाद शरीफ छोड़ कर मुल्तान (अब पाकिस्तान) के पास पड़ते गॉव शाहकोट (अब पाकिस्तान) में परिवार समेत आकर अपना डेरा जमाया । यहाँ आये अभी थोड़ा समय ही बीता था की बीबी अमीना (फातिमा) जी स्वर्ग सिधार गईं । उनकी मौत के बाद वहाँ के नम्बरदार पीर अरहान ने अपनी बेटी आइशा जी की शादी सय्यद जैनुल आबिदीन जी से करदी । इस शादी से आप के 2 बेटे पैदा हुए बड़े बेटे का नाम सय्यद अहमद सुलतान (लखदाता जी) और छोटे बेटे का नाम सय्यद अब्दुल गनी खान ढोढा रखा गया । जब लखदाता जी का जन्म होने वाला था तो दाई नूरां को बुलाया गया जो कई सालों से आँखों से अंधी थी । जब लखदाता जी का जन्म हुआ उस वक़्त एक बहुत अजीबो गरीब करिश्मा हुआ जैसे ही दाई नूरां ने आप को छुआ आप की छो प्राप्त होते ही अंधी दाई नूरां की आंखों की रोशनी आ गई और उसे सब दिखाई देने लग पड़ा और उसकी अँधेरी जिंदगी फिर से रोशन हो गई । दाई नूरां ने सय्यद जैनुल आबिदीन जी से कहा हज़ूर आप के घर खुद अल्ला ने जन्म लिया है । माता आईशा जी के कहने पर सय्यद जैनुल आबिदीन जी ने दाई नूरां को जुवार का भरा घड़ा बधाई के रूप में दिया । घड़ा सिर पर उठा दाई नूरां ख़ुशी – ख़ुशी घर की तरफ चल पड़ी, रास्ते में ख्याल आया क्यूँ ना जुवार बेच कर घर का राशन ले लूं । यही सोच कर दाई नूरां बनियें की दूकान पर गई और जैसे ही उसने घड़ा सिर से उतार कर जमीन पर रखा तो दाई नूरां और बनियां हैरानी से घड़े की तरफ देखते ही रह गए जो घड़ा जुवार से भरा हुआ था उस में से सतरंगी रौशनी निकल रही है और उनकी रोशनी से सारी दूकान जगमगा उठी यानि जुवार के दाने लाल (हीरे – ज्वाहरात) बन गए और उसी दिन से आपका नाम लालां वाला पीर पड़ गया । रूहानियत की शिक्षा आपने अपने पिता जी से हासिल की और आगे की शिक्षा आपने लाहौर के सय्यद मोहम्मद इसहाक जी से प्राप्त की । लखदाता जी ने फैज़ (रेहमत) की शिक्षा तस्वूफ की दुनिया के तीन बड़े सिलसिलों से यानि कादरीयों, चिश्तीयों और सुहरवर्दीयों से हासिल की ।

June 19, 2022 / 0 Comments
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बाबा बालकनाथ जी की कहानी

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बाबा बालकनाथ जी की कहानी बाबा बालकनाथ अमर कथा में पढ़ी जा सकती है, ऐसी मान्यता है, कि बाबाजी का जन्म सभी युगों में हुआ जैसे कि सत्य युग,त्रेता युग,द्वापर युग और वर्तमान में कल युग और हर एक युग में उनको अलग-अलग नाम से जाना गया जैसे “सत युग” में “ स्कन्द ”, “ त्रेता युग” में “ कौल” और “ द्वापर युग” में “महाकौल” के नाम से जाने गये। अपने हर अवतार में उन्होंने गरीबों एवं निस्सहायों की सहायता करके उनके दुख दर्द और तकलीफों का नाश किया। हर एक जन्म में यह शिव के बड़े भक्त कहलाए। द्वापर युग में, ”महाकौल” जिस समय “कैलाश पर्वत” जा रहे थे, जाते हुए रास्ते में उनकी मुलाकात एक वृद्ध स्त्री से हुई, उसने बाबा जी से गन्तव्य में जाने का अभिप्राय पूछा, वृद्ध स्त्री को जब बाबा जी की इच्छा का पता चला कि वह भगवान शिव से मिलने जा रहे हैं तो उसने उन्हें मानसरोवर नदी के किनारे तपस्या करने की सलाह दी और माता पार्वती, (जो कि मानसरोवर नदी में अक्सर स्नान के लिए आया करती थीं) से उन तक पहुँचने का उपाय पूछने के लिए कहा। बाबाजी ने बिलकुल वैसा ही किया और अपने उद्देश्य, भगवान शिव से मिलने में सफल हुए। बालयोगी महाकौल को देखकर शिवजी बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने बाबाजी को कलयुग तक भक्तों के बीच सिद्ध प्रतीक के तौर से पूजे जाने का आशिर्वाद प्रदान किया और चिर आयु तक उनकी छवि को बालक की छवि के तौर पर बने रहने का भी आशिर्वाद दिया। कलयुग में बाबा बालकनाथ जी ने गुजरात, काठियाबाद में “देव” के नाम से जन्म लिया। उनकी माता का नाम लक्ष्मी और पिता का नाम वैष्णो वैश था, बचपन से ही बाबाजी ‘आध्यात्म’ में लीन रहते थे। यह देखकर उनके माता पिता ने उनका विवाह करने का निश्चय किया, परन्तु बाबाजी उनके प्रस्ताव को अस्विकार करके और घर परिवार को छोड़ कर ‘ परम सिद्धी ’ की राह पर निकल पड़े। और एक दिन जूनागढ़ की गिरनार पहाडी में उनका सामना “स्वामी दत्तात्रेय” से हुआ और यहीं पर बाबाजी ने स्वामी दत्तात्रेय से “ सिद्ध” की बुनियादी शिक्षा ग्रहण करी और “सिद्ध” बने। तभी से उन्हें “ बाबा बालकनाथ जी” कहा जाने लगा। बाबाजी के दो पृथ्क साक्ष्य अभी भी उप्लब्ध हैं जो कि उनकी उपस्थिति के अभी भी प्रमाण हैं जिन में से एक है “ गरुन का पेड़” यह पेड़ अभी भी शाहतलाई में मौजूद है, इसी पेड़ के नीचे बाबाजी तपस्या किया करते थे। दूसरा प्रमाण एक पुराना पोलिस स्टेशन है, जो कि “बड़सर” में स्थित है जहाँ पर उन गायों को रखा गया था जिन्होंने सभी खेतों की फसल खराब कर दी थी, जिसकी कहानी इस तरह से है कि, एक महिला जिसका नाम ’ रत्नो ’ था, ने बाबाजी को अपनी गायों की रखवाली के लिए रखा था जिसके बदले में रत्नो बाबाजी को रोटी और लस्सी खाने को देती थी, ऐसी मान्यता है कि बाबाजी अपनी तपस्या में इतने लीन रहते थे कि रत्नो द्वारा दी गयी रोटी और लस्सी खाना याद ही नहीं रहता था। एक बार जब रत्नो बाबाजी की आलोचना कर रही थी कि वह गायों का ठीक से ख्याल नहीं रखते जबकि रत्नो बाबाजी के खाने पीने का खूब ध्यान रखतीं हैं। रत्नो का इतना ही कहना था कि बाबाजी ने पेड़ के तने से रोटी और ज़मीन से लस्सी को उत्त्पन्न कर दिया। बाबाजी ने सारी उम्र ब्रह्मचर्य का पालन किया और इसी बात को ध्यान में रखते हुए उनकी महिला भक्त ‘गर्भगुफा’ में प्रवेश नहीं करती जो कि प्राकृतिक गुफा में स्थित है जहाँ पर बाबाजी तपस्या करते हुए अंतर्ध्यान हो गए थे।

June 19, 2022 / 0 Comments
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नानक झिरा साहिब का इतिहास || History of nanak jhira sahib

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गुरूद्वारा नानक झिरा साहिब कर्नाटक राज्य के बीदर जिले में स्थित है। यह सिक्खों का पवित्र और ऐतिहासिक तीर्थ स्थान है। यह उस पठार के किनारे से थोडी दूरी पर है, जहां बीदर स्थित है। गुरूद्वारा की रोड़ से नीचे उतरने पर मैदान के व्यापक दृश्य दिखते है। प्रति वर्ष लगभग 4-5 लाख यात्री और पर्यटक लोग गुरूद्वारा नानक झिरा साहिब के दर्शन करने आते है। यहां प्रमुख आयोजनों और त्यौहारों के मेलों, के अलावा मार्च में होली, अक्टूबर में दशहरा और नवंबर में गुरू नानक जी की प्रकाश दिवस बडी धूमधाम से मनाया जाता है। इन अवसरों पर झिरा साहिब में यात्रियों की संख्या और अधिक बढ़ जाती है। अपनी दक्षिण भारत की दूसरी धर्म प्रचार यात्रा के दौरान सिक्खों के प्रथम गुरू , गुरू नानक देव जी ने नागपुर और खंडवा के अपने पड़ाव के बाद नर्मदा नदी पर प्राचीन हिन्दू मंदिर ओंकारेश्वर के दर्शन किए और नादेड़ पहुंचे। नांदेड़ से वह हैदराबाद और गोलकोंडा की ओर बढ़ गए, जहां वे मुस्लिम संतो से मिले और फिर जलालुद्दीन तथा याकूब अली से मिलने बीदर आए। गुरू साहिब अपने साथ भाई मरदाना के साथ बीदर के बाहरी इलाके में रूके जहां अब नानक झिरा गुरूद्वारा स्थित है, पास ही में मुस्लिम फकीरों की झोपडियां थी जो गुरू देव से शिक्षा और उपदेश लेने के लिए अति उत्सुक थे। शीघ्र ही यह खबर पूरे बीदर तथा उसके आसपास के क्षेत्रों में फैल गई और उत्तर के पवित्र संत तथा लोग भारी संख्या में गुरू देव के पास आने लगे। बीदर के क्षेत्र में पीने के पानी की भारी कमी थी। लोगों ने पानी के लिए अनेक कुएँ खोदे लेकिन उनके सारे प्रयास विफल हो चुके थे। कुएँ से पानी निकलता भी था तो वह भी पीने लायक नहीं होता था। लोगों की इस दयनीय स्थिति ने गुरू नानक देव जी को द्रवित कर दिया। होठों पर दैवीय नाम और ह्रदय में दया से गुरू नानक देव जी ने अपने पैर से पहाड़ी को छुआ और उस स्थान से पत्थर को हटाया। पत्थर के हटाते ही सारे लोग आश्चर्य चकित हो गये। उस पत्थर के हटते ही उस स्थान से ठंडे और मिठे पानी की धारा निकलने लगी। शीघ्र ही उस स्थान को नानक झिरा कहा जाने लगा। उस धारा के किनारे एक सुंदर गुरूद्वारा बनवा दिया गया। अब उस धारा का पानी सफेद संगमरमर से बने एक छोटे अमृत कुंड में एकत्रित होता है। यहां एक रसोईघर जहाँ गुरू का लंगर तैयार होता है। जहां दिन रात चौबीस घंटे यात्रियों को मुफ्त भोजन दिया जाता है। गुरू नानक देव जी का जन्म दिवस और होली के उत्सव पर पूरे भारत से भारी संख्या में भक्त यहां आते है। वह स्थान जहां पर धारा निकलती है, वहां पर प्रबंधन ने भक्तों के योगदान से अमृत कुंड बनवा दिया है। धारा के जल से भरे पवित्र सरोवर मे भक्त डुबकी लगाते है। कहते है की झीरा साहिब सरोवर में स्नान करने से अधिकांश बिमारियों से मुक्ति मिलती है। श्री नानक झिरा साहिब का प्रबंधन अब यहा मुफ्त अस्पताल, इंजीनियरिंग कॉलेज, पालीटेक्निक और स्कूल भी संचालित करता है।

June 12, 2022 / 0 Comments
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