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जानिए कब और क्यों तुलसी को न तो पानी देना चाहिए और न ही पौधे को छूना चाहिए। Know when and why tulsi should neither be watered nor the plant should be touched

Hinduism

सनातन धर्म में तुलसी के पौधे का बहुत महत्व है। घर-घर में तुलसी का पौधा लगाया जाता है और उसकी देखभाल के साथ-साथ पूजा भी की जाती है। घर में लगी तुलसी की प्रतिदिन पूजा करना और उसे पानी देना जरूरी होता है। हालांकि, धार्मिक मान्यताओं के कारण तुलसी के कुछ नियम हैं जिनके अनुसार कुछ दिनों में तुलसी में पानी देना और पौधे को छूने की मनाही होती है। आइए जानते हैं कब-कब और क्यों तुलसी को न तो पानी देना चाहिए और न ही पौधे को छूना ही चाहिए। * तुलसी का पौधा कब नहीं छूना चाहिए –  हर माह की एकादशी की तिथि को तुलसी के पौधे में न तो पानी देना चाहिए और न ही पौधे को स्पर्श ही करना चाहिए। मान्यता है कि एकादशी तिथि भगवान विष्णु को समर्पित है और इस दिन माता तुलसी भी भगवान विष्णु के लिए व्रत रखती हैं। इसलिए एकादशी के दिन तुलसी में जल डालने या पत्ते तोड़ने की मनाही होती है। पौधे में जल देने में माता तुलसी के व्रत के खंडित होने का डर रहता है। * रविवार और मंगलवार –  तुलसी के पौधे को हर रोज जल देने और पूजा करने का विधान है, लेकिन धार्मिक मान्यताओं के अनुसार रविवार और मंगलवार के दिन तुलसी के पौधे को जल नहीं देना चाहिए और न ही तुलसी के पौधे को छूना या पत्ते तोड़ने चाहिए। भगवान विष्णु को तुलसी बहुत ही प्रिय हैं और रविवार के दिन माता तुलसी भगवान विष्णु के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। ऐसे में अगर रविवार के दिन मां तुलसी को जल चढ़ाएंगे तो उनका व्रत खंडित हो जाता है। मंगलवार को तुलसी के पौधे में जल देने से भगवान शंकर के नाराज होने का भय रहता है। इसलिए रविवार और मंगलवार को तुलसी के पौधे में जल नहीं डालना चाहिए। (Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है।)  

February 14, 2024 / 0 Comments
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गिदोन द्वारा मिद्यानियों को पराजित करने की कहानी – Story of gideon defeating the midianites

Christianity

मिद्यानियों को हराने वाले गिदोन की कहानी बाइबिल के पुराने नियम में न्यायाधीशों की पुस्तक में पाई जाती है। यह एक कथा है जो गिदोन के विश्वास और नेतृत्व पर प्रकाश डालती है, जिसे ईश्वर ने इस्राएलियों को मिद्यानियों के उत्पीड़न से मुक्ति दिलाने के लिए चुना था। इस्राएलियों में ईश्वर के प्रति अवज्ञा का एक पैटर्न था, जिसके कारण पड़ोसी देशों द्वारा उत्पीड़न का दौर शुरू हुआ। गिदोन के समय में, मिद्यानी इस्राएलियों पर अत्याचार कर रहे थे, उनकी फसलें लूट रहे थे और बड़ी कठिनाईयाँ पैदा कर रहे थे। जब गिदोन मिद्यानियों से छिपाने के लिये अंगूर के कुण्ड में गेहूँ झाड़ रहा था, तब यहोवा का एक दूत उसे दिखाई दिया। देवदूत ने गिदोन को एक \”शक्तिशाली योद्धा\” के रूप में संबोधित किया और बताया कि भगवान ने उसे इज़राइल को बचाने के लिए चुना था। गिदोन ने अपनी क्षमता पर संदेह व्यक्त किया और पुष्टि मांगी। भगवान ने चमत्कारी संकेत प्रदान करके प्रतिक्रिया व्यक्त की, जिसमें आग के साथ भेंट को भस्म करना और जमीन को सूखा रखते हुए ऊन पर ओस को गीला करना शामिल था। मिद्यानियों का सामना करने के लिए गिदोन ने हजारों की सेना इकट्ठी की। हालाँकि, भगवान ने उसे यह प्रदर्शित करने के लिए सैनिकों की संख्या कम करने का निर्देश दिया कि जीत मानवीय ताकत के बजाय दैवीय हस्तक्षेप से हासिल की जाएगी। परमेश्वर ने गिदोन को 300 आदमियों के एक छोटे समूह के साथ मिद्यानी शिविर के विरुद्ध एक आश्चर्यजनक रात्रि आक्रमण शुरू करने का निर्देश दिया। प्रत्येक व्यक्ति के पास एक तुरही, एक घड़ा जिसके भीतर एक मशाल थी, और एक तलवार थी। गिदोन के आदमियों ने आधी रात में मिद्यानियों की छावनी को घेर लिया। गिदोन के संकेत पर, उन्होंने अपनी तुरही बजाई, अपने घड़े तोड़ दिए, मशालें निकालीं, और चिल्लाए, \”यहोवा के लिए और गिदोन के लिए एक तलवार!\” शोर और भ्रम से मिद्यानियों में घबराहट पैदा हो गई। भ्रम की स्थिति में, मिद्यानियों ने डर के मारे एक-दूसरे पर हमला कर दिया और वे भाग गए। गिदोन और उसकी छोटी सेना ने उनका पीछा किया, और इस्राएलियों ने मिद्यानियों पर निर्णायक जीत हासिल की। इस जीत से इस्राएलियों को आराम की अवधि मिली और गिदोन चालीस वर्षों तक इस्राएल का न्यायाधीश बना रहा। इस दौरान देश में शांति और समृद्धि का अनुभव हुआ। जीत के बावजूद, गिदोन ने बाद में युद्ध की लूट से एक एपोद (एक धार्मिक वस्तु) बनाया, जो इस्राएलियों के बीच मूर्तिपूजा का अवसर बन गया। मिद्यानियों को हराने वाले गिदोन की कहानी असंभावित नायकों के माध्यम से भगवान के उद्धार के विषय पर जोर देती है और विश्वास और आज्ञाकारिता के महत्व की याद दिलाती है।   गिदोन द्वारा मिद्यानियों को पराजित करने की कहानी – Story of gideon defeating the midianites

February 14, 2024 / 0 Comments
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त्सुल्ग्लाग्खांग मठ का इतिहास – History of tsulglagkhang monastery

Buddhism

त्सुग्लाग्खांग, जिसे त्सुग्लाग्खांग कॉम्प्लेक्स के नाम से भी जाना जाता है, भारत के धर्मशाला के मैकलियोड गंज में स्थित एक महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र है। यह 14वें दलाई लामा के नेतृत्व वाली निर्वासित तिब्बती सरकार के आध्यात्मिक और प्रशासनिक मुख्यालय के रूप में कार्य करता है।    त्सुगलगखांग कॉम्प्लेक्स का निर्माण 1956 में परमपावन 14वें दलाई लामा के चीनी आक्रमण के बाद तिब्बत से भाग जाने के बाद शुरू हुआ। इसे दलाई लामा और निर्वासित तिब्बती सरकार के निवास और आध्यात्मिक केंद्र के रूप में बनाया गया था। त्सुगलाग्खांग सिर्फ एक मठ नहीं है बल्कि एक बहुक्रियाशील परिसर है जिसमें दलाई लामा का निवास, मुख्य मंदिर और प्रशासनिक कार्यालय शामिल हैं। यह तिब्बत के बाहर तिब्बती बौद्ध धर्म के लिए केंद्र बिंदु के रूप में कार्य करता है और दुनिया भर में तिब्बती बौद्धों के लिए तीर्थ और पूजा का स्थान है। त्सुगलगखांग परिसर के भीतर मुख्य मंदिर को त्सुगलगखांग मंदिर के नाम से जाना जाता है। इसमें कई महत्वपूर्ण धार्मिक कलाकृतियाँ हैं, जिनमें बुद्ध, अवलोकितेश्वर (करुणा के बोधिसत्व), और पद्मसंभव (भारतीय बौद्ध गुरु जिन्होंने तिब्बत में बौद्ध धर्म की शुरुआत की थी) की मूर्तियाँ शामिल हैं। त्सुगलाग्खांग तिब्बती बौद्धों और दलाई लामा के अनुयायियों के लिए अत्यधिक सांस्कृतिक महत्व रखता है। यह वह जगह है जहां महत्वपूर्ण धार्मिक समारोह, शिक्षाएं और अनुष्ठान होते हैं, जो दुनिया भर से भक्तों और आगंतुकों को आकर्षित करते हैं। मुख्य मंदिर के अलावा, त्सुगलाग्खांग परिसर में अन्य आकर्षण भी शामिल हैं जैसे नामग्याल मठ, जो दलाई लामा का निजी मठ है, और तिब्बत संग्रहालय, जो तिब्बती इतिहास की जानकारी प्रदान करता है। संस्कृति, और तिब्बती प्रवासी। त्सुगलाग्खांग तिब्बत में चीनी शासन के खिलाफ तिब्बती लचीलेपन और प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में कार्य करता है। यह तिब्बती प्रवासियों के लिए आशा और आध्यात्मिकता की किरण के रूप में खड़ा है और तिब्बती संस्कृति, धर्म और पहचान के संरक्षण के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है। त्सुगलाग्खांग मठ तिब्बतियों के लिए गहरा आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक महत्व रखता है और तिब्बती बौद्ध धर्म और स्वतंत्रता और स्वायत्तता के लिए तिब्बती संघर्ष के प्रतीक के रूप में कार्य करता है।   त्सुल्ग्लाग्खांग मठ का इतिहास – History of tsulglagkhang monastery

February 13, 2024 / 0 Comments
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श्री कृष्णा चालीसा – Shri krishna chalisa

Hinduism

बंशी शोभित कर मधुर । नील जलद तन श्याम। अरुण अधर जनु बिम्बफल । नयन कमल अभिराम॥ पूर्ण इन्द्र, अरविन्द मुख । पीताम्बर शुभ साज। जय मनमोहन मदन छवि । कृष्णचन्द्र महाराज॥ जय यदुनंदन जय जगवंदन। जय वसुदेव देवकी नन्दन॥ जय यशुदा सुत नन्द दुलारे। जय प्रभु भक्तन के दृग तारे॥ जय नटनागर, नाग नथइया। कृष्ण कन्हइया धेनु चरइया॥ पुनि नख पर प्रभु गिरिवर धारो। आओ दीनन कष्ट निवारो॥ वंशी मधुर अधर धरि टेरौ। होवे पूर्ण विनय यह मेरौ॥ आओ हरि पुनि माखन चाखो। आज लाज भारत की राखो॥ गोल कपोल, चिबुक अरुणारे। मृदु मुस्कान मोहिनी डारे॥ राजित राजिव नयन विशाला। मोर मुकुट वैजन्तीमाला॥ कुंडल श्रवण, पीत पट आछे। कटि किंकिणी काछनी काछे॥ नील जलज सुन्दर तनु सोहे। छबि लखि, सुर नर मुनिमन मोहे॥ मस्तक तिलक, अलक घुँघराले। आओ कृष्ण बांसुरी वाले॥ करि पय पान, पूतनहि तार्यो। अका बका कागासुर मार्यो॥ मधुवन जलत अगिन जब ज्वाला। भै शीतल लखतहिं नंदलाला॥ सुरपति जब ब्रज चढ़्यो रिसाई। मूसर धार वारि वर्षाई॥ लगत लगत व्रज चहन बहायो। गोवर्धन नख धारि बचायो॥ लखि यसुदा मन भ्रम अधिकाई। मुख मंह चौदह भुवन दिखाई॥ दुष्ट कंस अति उधम मचायो । कोटि कमल जब फूल मंगायो॥ नाथि कालियहिं तब तुम लीन्हें। चरण चिह्न दै निर्भय कीन्हें॥ करि गोपिन संग रास विलासा। सबकी पूरण करी अभिलाषा॥ केतिक महा असुर संहार्यो। कंसहि केस पकड़ि दै मार्यो॥ मातपिता की बन्दि छुड़ाई ।उग्रसेन कहँ राज दिलाई॥ महि से मृतक छहों सुत लायो। मातु देवकी शोक मिटायो॥ भौमासुर मुर दैत्य संहारी। लाये षट दश सहसकुमारी॥ दै भीमहिं तृण चीर सहारा। जरासिंधु राक्षस कहँ मारा॥ असुर बकासुर आदिक मार्यो। भक्तन के तब कष्ट निवार्यो॥ दीन सुदामा के दुःख टार्यो। तंदुल तीन मूंठ मुख डार्यो॥ प्रेम के साग विदुर घर माँगे।दर्योधन के मेवा त्यागे॥ लखी प्रेम की महिमा भारी।ऐसे श्याम दीन हितकारी॥ भारत के पारथ रथ हाँके।लिये चक्र कर नहिं बल थाके॥ निज गीता के ज्ञान सुनाए।भक्तन हृदय सुधा वर्षाए॥ मीरा थी ऐसी मतवाली।विष पी गई बजाकर ताली॥ राना भेजा साँप पिटारी।शालीग्राम बने बनवारी॥ निज माया तुम विधिहिं दिखायो।उर ते संशय सकल मिटायो॥ तब शत निन्दा करि तत्काला।जीवन मुक्त भयो शिशुपाला॥ जबहिं द्रौपदी टेर लगाई।दीनानाथ लाज अब जाई॥ तुरतहि वसन बने नंदलाला।बढ़े चीर भै अरि मुँह काला॥ अस अनाथ के नाथ कन्हइया। डूबत भंवर बचावइ नइया॥ सुन्दरदास आ उर धारी।दया दृष्टि कीजै बनवारी॥ नाथ सकल मम कुमति निवारो।क्षमहु बेगि अपराध हमारो॥ खोलो पट अब दर्शन दीजै।बोलो कृष्ण कन्हइया की जै॥ ॥दोहा॥ यह चालीसा कृष्ण का, पाठ करै उर धारि। अष्ट सिद्धि नवनिधि फल, लहै पदारथ चारि॥   श्री कृष्णा चालीसा – Shri krishna chalisa

February 13, 2024 / 0 Comments
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शिवजी तेरे द्वार हम भी आयेंगे – Shivji tere dwar hum bhi ayenge

Hindu

शिवजी तेरे द्वार हम भी आयेंगे गंगाजल से आपको हम नहलायेंगे जनम जनम का प्यासा ये मन तेरे शरण में ही आयेंगे हम हम दीवाने हो गये है आपके हर साँस में तेरे गुण गायेंगे बोलो बोलो बम बम तेरे मिट जाये गम दुःख दूर रहेंगे तुझसे जनम जनम शिवजी तेरे द्वार हम भी आयेंगे गंगाजल से आपको हम नहलायेंगे   शिवजी तेरे द्वार हम भी आयेंगे – Shivji tere dwar hum bhi ayenge

February 12, 2024 / 0 Comments
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गिरिराज जी की आरती – Giriraj ji ki aarti

Hindu

ॐ जय जय जय श्री गिरिराज, जय जय श्री गिरिराज संकट में तुम रखो, निज भक्तन की लाज जय जय जय श्री गिरिराज, जय जय श्री गिरिराज इंद्रादिक सब देवा तुम्हरो ध्यान धरे। ऋषि मुनि जन यश गामें, ते भवसिंधु तरे॥ ॐ जय जय जय श्री गिरिराज सुन्दर रूप तुम्हरौ श्याम सिला सोहें। वन उपवन लखि लखिके ,भक्तन मन मोहें॥ ॐ जय जय जय श्री गिरिराज मध्य मानसी गंगा, कलि के मल हरनी। तापै दीप जलावे, उतरे बैतरनी॥ ॐ जय जय जय श्री गिरिराज नवल अप्सरा कुण्ड सुहाने, दाँये सुखकारी। बायेँ राधा -कृष्ण कुण्ड है, महापाप हारी॥ ॐ जय जय जय श्री गिरिराज तुम हो मुक्ति के दाता, कलयुग में स्वामी। दीनन के हो रक्षक , प्रभु अन्तर्यामी॥ ॐ जय जय जय श्री गिरिराज हम हैं शरण तुम्हरी, गिरवर गिरधारी। देवकीनंदन कृपा करो हे भक्तन हितकारी॥ ॐ जय जय जय श्री गिरिराज जो नर दे परिकम्मा , पूजन पाठ करें। गावें नित्य आरती , पुनि नहीं जनम धरें॥ ॐ जय जय जय श्री गिरिराज   गिरिराज जी की आरती – Giriraj ji ki aarti

February 11, 2024 / 0 Comments
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इस दिन रखा जाएगा जया एकादशी का व्रत और जानिए व्रत कथा के बारे में – Jaya ekadashi fast will be observed on this day and know about the story of the fast

Hindu

हर साल 24 एकादशी पड़ती हैं और हर एकादशी का अपना अलग महत्व होता है। माघ के महीने में शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली एकादशी को जया एकादशी कहा जाता है। माना जाता है कि इस एकादशी पर विधि-विधान से भगवान विष्णु का पूजन किया जाए तो घर में सुख-समृद्धि आती है और पापों से मुक्ति मिल जाती है। इस साल पंचांग के अनुसार, जया एकादशी की तिथि 19 फरवरी की सुबह 8 बजकर 49 मिनट से शुरू होगी और इस तिथि का समापन 20 फरवरी की सुबह 9 बजकर 55 मिनट पर हो जाएगा। उदया तिथि को ध्यान में रखते हुए जया एकादशी का व्रत 20 फरवरी को रखा जाएगा और इसी दिन पूजा भी की जाएगी। * जया एकादशी की व्रत कथा:  माना जाता है कि एक समय की बात है जब चिरकाल में स्वर्ग में स्थित नंदन वन में एक उत्सव का आयोजन किया जा रहा था। इस उत्सव में स्वर्ग के सभी देवगण, सिद्धगण और मुनि आदि उपस्थित हुए थे। इस समय नृत्य और गायन चल रहे थे जो गंधर्व और गंधर्व कन्याओं द्वारा किया जा रहा था। इसी समूह में एक नृतिका पुष्यवती की दृष्टि गंधर्व माल्यवान पर पड़ गई और वह उसके यौवन पर मोहित हो गई और अमर्यादित ढंग से नृत्य करने लगी। इस चलते माल्यवान ने बेसुरा गाना गाना शुरू कर दिया। इस घटना को देख-सुन सभी क्रोधित होने लगे। स्वर्ग नरेश इंद्र देव ने क्रोधित होकर दोनों को स्वर्गलोक से निष्कासित कर दिया। इसके साथ ही दोनों को शाप दिया कि दोनों को अधम योनि प्राप्त होगी और दोनों इसके बाद से ही हिमालय में पिशाच योनि में कष्टदारी जीवन व्यतीत करने लगे। सदियों बाद माघ मास की एकादशी अर्थात् जया एकादशी के दिन माल्यवान और पुष्यवती ने कुछ नहीं खाया और फल खाकर दिन व्यतीत किया। इसके बाद रातभर जागरण किया और श्रीहरि का स्मरण किया। इससे भगवान विष्णु प्रसन्न हुए और दोनों को प्रेत योनि से मुक्त कर दिया। इसके बाद से ही भगवान विष्णु को प्रसन्न करने और जीवन के कष्टों से मुक्ति पाने के लिए जया एकादशी का व्रत रखा जाता है। (Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है।)   इस दिन रखा जाएगा जया एकादशी का व्रत और जानिए व्रत कथा के बारे में – Jaya ekadashi fast will be observed on this day and know about the story of the fast

February 11, 2024 / 0 Comments
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योंगहे मंदिर का इतिहास – History of yonghe temple

Buddhism

योंगहे मंदिर, जिसे लामा मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, बीजिंग, चीन में स्थित एक प्रसिद्ध तिब्बती बौद्ध मंदिर है। इसका इतिहास 17वीं शताब्दी में किंग राजवंश के दौरान का है। जिस स्थान पर आज योंगहे मंदिर खड़ा है वह शुरू में मिंग राजवंश के दौरान एक शाही निवास था। हालाँकि, 1694 में इसे एक मंदिर में बदल दिया गया।   1722 में, किंग राजवंश के दौरान, योंगहे मंदिर को आधिकारिक तौर पर सम्राट योंगझेंग ने अपने चौथे बेटे, प्रिंस योंग के निवास के रूप में स्थापित किया था। राजकुमार की मृत्यु के बाद, महल को बौद्ध मठ में बदल दिया गया और इसे योंगहे मंदिर का नाम दिया गया।   1744 में, सम्राट क़ियानलोंग ने आधिकारिक तौर पर इसका नाम बदलकर योंगहे मंदिर कर दिया, जिसका अर्थ है \”सद्भाव और शांति।\” इसे तिब्बती बौद्ध भिक्षुओं के लिए एक मठ, लामासरी में बदल दिया गया था।   अपने पूरे इतिहास में, योंघे मंदिर ने बीजिंग में तिब्बती बौद्ध धर्म के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में कार्य किया है। यह तिब्बती और हान चीनी बौद्ध परंपराओं के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान का स्थल भी रहा है।   1960 और 1970 के दशक में सांस्कृतिक क्रांति के दौरान, चीन के कई अन्य धार्मिक स्थलों की तरह, मंदिर को भी महत्वपूर्ण क्षति और विनाश का सामना करना पड़ा। हालाँकि, बाद में इसे बहाल कर दिया गया और 1980 के दशक में इसे जनता के लिए फिर से खोल दिया गया।   योंगहे मंदिर न केवल पूजा स्थल है, बल्कि बीजिंग में एक लोकप्रिय पर्यटक आकर्षण भी है। पर्यटक इसकी सुंदर वास्तुकला, जटिल कलाकृति और एक चंदन के पेड़ से बनी मैत्रेय बुद्ध की प्रभावशाली 26 मीटर ऊंची मूर्ति की प्रशंसा करने आते हैं।   योंघे मंदिर चीन में एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत का प्रतिनिधित्व करता है, जो देश की राजधानी में तिब्बती बौद्ध धर्म के समृद्ध इतिहास और परंपराओं को प्रदर्शित करता है।   योंगहे मंदिर का इतिहास – History of yonghe temple

February 11, 2024 / 0 Comments
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पावापुरी जैन मंदिर का इतिहास – History of pawapuri jain temple

Judaism

भारत के बिहार के नालंदा जिले में स्थित पावापुरी जैन मंदिर, जैन धर्म में बहुत महत्व रखता है। ऐसा माना जाता है कि यह वह स्थान है जहां जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर ने लगभग 500 ईसा पूर्व निर्वाण या मोक्ष प्राप्त किया था।   मंदिर परिसर जल मंदिर के चारों ओर बनाया गया है, जो एक पवित्र तालाब है, ऐसा माना जाता है कि यहीं भगवान महावीर का अंतिम संस्कार किया गया था। दुनिया भर से श्रद्धालु इस स्थल पर श्रद्धा सुमन अर्पित करने और प्रार्थना करने आते हैं।   पावापुरी जैन मंदिर का इतिहास दो सहस्राब्दियों से भी पुराना है, सदियों से विभिन्न शासकों और भक्तों ने इसके निर्माण और रखरखाव में योगदान दिया है। मंदिर के पूरे इतिहास में नवीकरण और विस्तार हुआ है, जो जैन अनुयायियों की निरंतर श्रद्धा और भक्ति को दर्शाता है।   पावापुरी का शांत वातावरण इसे जैनियों के लिए एक महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल बनाता है, जो ध्यान करने, चिंतन करने और आध्यात्मिक शांति की तलाश में आते हैं। मंदिर परिसर में जैन धर्म के विभिन्न पहलुओं को समर्पित विभिन्न मंदिर, मंडप और संरचनाएं भी शामिल हैं, जो इसे गहरे धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व का स्थान बनाती हैं।   पावापुरी जैन मंदिर का इतिहास – History of pawapuri jain temple

February 11, 2024 / 0 Comments
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जानिए मौनी अमावस्या के शुभ मुहूर्त और पूजा विधि के बारे में – Know about the auspicious time and worship method of mauni amavasya

Hindu

हिन्दू धर्म में मौनी अमावस्या का विशेष महत्व है। इस दिन साधक मौन व्रत रखकर विष्णु भगवान की पूजा अर्चना करते हैं। इस दिन श्रद्धालु गंगा, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, सरस्वती और नर्मदा नदी जैसी पवित्र नदियों में स्नान करते हैं। ऐसी मान्यता है कि मौनी अमावस्या को स्नान-ध्यान कर भगवान विष्णु की पूजा करने से साधक को सौ यज्ञों के बराबर फल प्राप्त होता है। ऐसे में इसबार मौनी अमावस्या किस दिन मनाई जाएगी और इसकी पूजा विधि क्या है आइए जानते हैं। * मौनी अमावस्या शुभ मुहूर्त: इस साल माघ अमावस्या 09 फरवरी को सुबह 08 बजकर 02 मिनट पर शुरू होगी और अगले दिन 10 तारीख को 4 बजकर 28 मिनट पर समाप्त होगा। उदया तिथि 9 को है इसलिए मौनी अमावस्या इस दिन ही मनाई जाएगी। * शुभ योग:  मौनी अमावस्या के दिन सर्वार्थ सिद्धि योग बन रहा है इस बार। यह योग 7 बजकर 5 मिनट से शुरू हो रहा है जो देर रात 11 बजकर 29 मिनट तक रहेगा। * मौनी अमावस्या पूजा विधि:  – मौनी अमावस्या के दिन सबसे पहले भगवान विष्णु को प्रणाम करें। – इस दिन बोलने की मनाही होती है। इस दिन आप बहते जल में काला तिल प्रवाहित करें। – इस दिन पीपल के पेड़ में भी जल का अर्घ्य दें। – इस दिन विष्णु चालीसा और मंत्र का जाप करें। (Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है।)   जानिए मौनी अमावस्या के शुभ मुहूर्त और पूजा विधि के बारे में – Know about the auspicious time and worship method of mauni amavasya

February 9, 2024 / 0 Comments
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