मंगलवार के दिन किस भगवान की पूजा की जाती है? जानें भगवान हनुमान और मंगल देव की पूजा का महत्व, पूजा विधि, व्रत के नियम, मंत्र, आरती और धार्मिक लाभ। मंगलवार के दिन किस भगवान की पूजा होती है? मंगलवार का दिन हिंदू धर्म में अत्यंत शुभ माना जाता है। यह दिन मुख्य रूप से भगवान हनुमान जी और मंगल ग्रह के देवता (मंगल देव) को समर्पित होता है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और भक्ति से पूजा करने पर जीवन की बाधाएं दूर होती हैं, साहस बढ़ता है, शत्रुओं पर विजय मिलती है और मंगल दोष का प्रभाव कम होता है। मंगलवार को किस भगवान की पूजा की जाती है? 1. भगवान हनुमान जी हनुमान जी को शक्ति, साहस, भक्ति और संकटमोचन का प्रतीक माना जाता है। मंगलवार के दिन हनुमान जी की पूजा करने से भय, नकारात्मक ऊर्जा और कष्ट दूर होते हैं। 2. मंगल देव जिन लोगों की कुंडली में मंगल दोष होता है, वे मंगलवार को मंगल देव की पूजा और व्रत करके शुभ फल प्राप्त कर सकते हैं। मंगलवार की पूजा विधि सुबह स्नान करके साफ और लाल रंग के वस्त्र धारण करें। हनुमान मंदिर जाकर दर्शन करें। सिंदूर, चमेली का तेल, लाल फूल और गुड़-चना अर्पित करें। हनुमान चालीसा, बजरंग बाण या सुंदरकांड का पाठ करें। “ॐ हनुमते नमः” मंत्र का कम से कम 108 बार जाप करें। दिनभर सात्विक भोजन करें और जरूरतमंदों की सहायता करें। मंगलवार के व्रत के नियम ब्रह्मचर्य का पालन करें। तामसिक भोजन, मांस और शराब से दूर रहें। नमक रहित या केवल एक समय भोजन करें (परंपरा अनुसार)। झूठ, क्रोध और विवाद से बचें। हनुमान जी का स्मरण करते रहें। मंगलवार को पूजा करने के लाभ जीवन की बाधाएं दूर होती हैं। शत्रुओं से रक्षा मिलती है। आत्मविश्वास और साहस बढ़ता है। मंगल दोष के प्रभाव कम होते हैं। नौकरी और व्यापार में सफलता मिलती है। परिवार में सुख-शांति बनी रहती है। मंगलवार का मंत्र ॐ हनुमते नमः। या ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः। निष्कर्ष यदि आप प्रत्येक मंगलवार श्रद्धा से भगवान हनुमान जी की पूजा करते हैं, हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं और सात्विक जीवन अपनाते हैं, तो धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जीवन में सकारात्मक ऊर्जा, साहस और सफलता प्राप्त होती है।
गणेश जी की आरती और चालीसा | संपूर्ण पाठ, महत्व और लाभ
श्री गणेश जी की आरती और चालीसा | संपूर्ण पाठ, पूजा विधि, महत्व एवं लाभ श्री गणेश जी की आरती और चालीसा भगवान श्री गणेश को प्रथम पूज्य देव माना जाता है। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत भगवान गणेश की पूजा से की जाती है। वे बुद्धि, विवेक, समृद्धि और विघ्नों को दूर करने वाले देवता हैं। जो भक्त श्रद्धा और विश्वास के साथ गणेश जी की आरती और चालीसा का पाठ करते हैं, उनके जीवन में सुख, शांति और सफलता का वास होता है। श्री गणेश जी की पूजा का महत्व सभी कार्यों में सफलता प्राप्त होती है। विघ्न और बाधाएं दूर होती हैं। बुद्धि और विवेक में वृद्धि होती है। व्यापार और नौकरी में उन्नति मिलती है। परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है। धन और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। गणेश जी की पूजा विधि प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें। भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र के सामने दीपक जलाएं। दूर्वा, लाल फूल और मोदक अर्पित करें। गणेश मंत्र का जाप करें। गणेश चालीसा का पाठ करें। अंत में गणेश जी की आरती करें। प्रसाद सभी में वितरित करें। श्री गणेश मंत्र ॐ गं गणपतये नमः॥ श्री गणेश जी की आरती जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥ एकदंत दयावंत, चार भुजा धारी।माथे सिंदूर सोहे, मूसे की सवारी॥ अंधन को आंख देत, कोढ़िन को काया।बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया॥ हार चढ़े फूल चढ़े, और चढ़े मेवा।लड्डुअन का भोग लगे, संत करें सेवा॥ दीनन की लाज राखो, शंभु सुतवारी।कामना को पूर्ण करो, जग बलिहारी॥ जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥ श्री गणेश चालीसा ॥दोहा॥ जय गणपति सद्गुण सदन, कविवर बदन कृपाल।विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥ ॥चौपाई॥ जय जय जय गणपति गणराजू।मंगल भरण करण शुभ काजू॥ जय गजबदन सदन सुखदाता।विश्व विनायक बुद्धि विधाता॥ वक्रतुंड शुचि शुंड सुहावन।तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन॥ राजित मणि मुक्तन उर माला।स्वर्ण मुकुट सिर नयन विशाला॥ पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं।मोदक भोग सुगंधित फूलं॥ सुन्दर पीताम्बर तन साजित।चरण पादुका मुनि मन राजित॥ धनि शिवसुवन षडानन भ्राता।गौरी ललन विश्व विख्याता॥ ऋद्धि सिद्धि तव चंवर सुधारे।मूषक वाहन सोहत द्वारे॥ कहौं जन्म शुभ कथा तुम्हारी।अति शुचि पावन मंगलकारी॥ (यहाँ से पूरी पारंपरिक गणेश चालीसा का पाठ जारी रखा जा सकता है।) गणेश जी की आरती और चालीसा पढ़ने के लाभ घर में सुख-समृद्धि आती है। मानसिक तनाव दूर होता है। कार्यों में आने वाली बाधाएं समाप्त होती हैं। शिक्षा और करियर में सफलता मिलती है। भगवान गणेश की विशेष कृपा प्राप्त होती है। सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। निष्कर्ष यदि आप प्रतिदिन या प्रत्येक बुधवार, चतुर्थी अथवा किसी शुभ अवसर पर श्रद्धा से भगवान श्री गणेश की आरती और चालीसा का पाठ करते हैं, तो धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जीवन में सुख, समृद्धि, बुद्धि और सफलता का मार्ग प्रशस्त होता है।
जानिए रुद्राक्ष का रुद्र से क्या संबंध है, इसे यह नाम क्यों मिला और इससे जुड़ी कहानी क्या है। Know the relation of rudraksha with rudra, why it got this name and the story related to it
शिव भक्त भगवान शंकर को अत्यंत प्रिय रुद्राक्ष जरूर धारण करते है। मान्यता है कि भगवान शिव की शक्तियां रुद्राक्ष में समाहित होती हैं। रुद्राक्ष का संबंध भगवान शंकर से माना जाता है। आइए जानते हैं रुद्राक्ष की उत्पत्ति और इसके नामकरण की कथा कैसे पड़ा रुद्राक्ष नाम। * क्या है रुद्राक्ष का अर्थ: रुद्राक्ष में दो शब्द हैं रुद्र और अक्ष। इसमें रुद्र भगवान शंकर का नाम है और और अक्ष का अर्थ है नेत्र। रुद्राक्ष का अर्थ भगवान शंकर के नेत्र। * रुद्राक्ष की उत्पत्ति कथा: रुद्राक्ष के उत्पन्न होने की कहानी भगवान शिव से जुड़ी है। मान्यता है कि भगवान शंकर के नेत्रों से निकलने वाले आंसुओं से रुद्राक्ष उत्पन्न हुआ है, इसीलिए इसका नाम रुद्राक्ष पड़ा है। पौरणिक कथा के अनुसार त्रिपुरासुर नामक राक्षस के पास कई दैवीय शक्ति थी जिसका उसे बहुत घंमड था। वह ऋषि मुनियों से लेकर देवताओं को तंग करता था। परेशान होकर सभी देव ब्रह्मा, विष्णु के साथ भगवान शिव के पास पहुंचे, और उनसे त्रिपुरासुर से रक्षा करने की प्रार्थना करने लगे। यह सुनकर भगवान शंकर ध्यान में चले गए। जब उन्होंने अपनी आंखें खोली तो उनके नेत्रों में आंसू थे, ये आंसू जहां-जहां गिरे वहां रुद्राक्ष के पेड़ उग आए। * एक तरह का फल: रुद्राक्ष एक तरह का सूखा फल होता है। इसे इसमें पाए जाने वाले मुख के अनुसार अलग-अलग श्रेणियों में रखा जाता है। जाप के लिए 108 मुखी रुद्राक्ष का उपयोग कया जाता है। * तीनों देव की कृपा: रुद्राक्ष धारण करने वालों को ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देव की कृपा प्राप्त होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार रुद्राक्ष को शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा, अमावस्या या एकादशी की तिथि को धारण करना चाहिए। (Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है।) जानिए रुद्राक्ष का रुद्र से क्या संबंध है, इसे यह नाम क्यों मिला और इससे जुड़ी कहानी क्या है। Know the relation of rudraksha with rudra, why it got this name and the story related to it
महाशिवरात्रि पर भगवान शिव को उनके पसंदीदा फूल चढ़ाएं, प्रसन्न होंगे महादेव – Offer your favorite flowers to lord shiva on mahashivratri, Mahadev will be happy
ब्रह्मांड के प्रथम तत्व कहे जाने वाले भगवान शिव कण कण में व्याप्त हैं। शिव अमर हैं और अविनाशी भी हैं। देवों के देव कहलाने वाले भगवान शिव ही सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति एवं संहार के अधिपति माने गए हैं। फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है और शास्त्रों में कहा गया है कि इस दिन शिव और मां पार्वती का गठबंधन हुआ था। इस दिन लोग सच्चे मन से भोलेनाथ और मां पार्वती की पूजा करते हैं। भगवान शिव भोले भंडारी हैं, वो भक्तों से बहुत जल्दी प्रसन्न होते हैं। इस बार महाशिवरात्रि पर भगवान शिव की पूजा करते समय आप भोलेनाथ के प्रिय फूलों को अर्पित करेंगे तो भोलेनाथ जल्दी प्रसन्न होकर आपको आशीर्वाद जरूर देंगे। चलिए जानते हैं कि भगवान शंकर को कौन कौन से फूल पसंद हैं। * भगवान शिव को पसंद हैं ये फूल, पूजा में करें इस्तेमाल: – भगवान शिव को पांच तरह के फूल पसंद हैं और इनको पंच पुष्प कहा गया है। ऐसे में इस महाशिवरात्रि पर शिवलिंग की पूजा करते समय लोटे में जल लेकर और दूसरे हाथ में उनके पसंदीदा फूल लेकर पूजा करेंगे तो भोलेनाथ आपके घर परिवार पर कृपा बरसाएंगे। भगवान शिव को कनेर का फूल पसंद है। कनेर का फूल तीन रंगों में आता है। लाल, पीला और सफेद. भक्त सोमवार के व्रत, सावन के व्रत और प्रदोष व्रत में इस फूल को भगवान शंकर की पूजा में इस्तेमाल करते हैं। – धतूरे का फूल भगवान शिव को बेहद प्रिय है। कहा जाता है कि समुद्र मंथन के समय इस फूल की उत्पत्ति भगवान शिव की छाती से हुई थी जब वो विषपान कर रहे थे। इसलिए कहा जाता है कि शिवलिंग पर धतूरे के फूल को अर्पित करने से मन में विष रूपी ईर्ष्या और द्वेष समाप्त हो जाते हैं। – भोलेनाथ को मदार का फूल बहुत प्यारा है। ये फूल नीले और सफेद रंग में खिलता है। इसे आंकड़े का फूल और आक का फूल भी कहते हैं। शिव की पूजा के समय सफेद मदार के फूल का प्रयोग किया जाता है। कहते हैं कि पूजा के समय इस फूल को चढ़ाया जाए तो भगवान शिव मोक्ष का वरदान देते हैं। – शमी का फूल भी भोले भंडारी को बहुत पसंद है। ये फूल पीले और गुलाबी रंग में आता है। अक्सर लोगों को शिव की पूजा के लिए घर में ही शमी का पेड़ लगाते हुए देखा जाता है। इस फूल को अर्पित करने से महादेव जल्दी प्रसन्न होते हैं। – भगवान शिव को सुगंधित पारिजात के फूल भी काफी प्रिय हैं। इसे हरसिंगार के फूल के नाम से भी जाना जाता है और ये दिखने में बहुत ही खूबसूरत हैं। कहते हैं कि धरती पर पहले ये पेड़ नहीं था और भगवान कृष्ण इसे स्वर्ग से धरती पर लाए थे। महाशिवरात्रि पर भगवान शिव को उनके पसंदीदा फूल चढ़ाएं, प्रसन्न होंगे महादेव – Offer your favorite flowers to lord shiva on mahashivratri, Mahadev will be happy
परशुराम जी की आरती – Parshuram ji ki aarti
शौर्य तेज बल-बुद्धि धाम की॥ रेणुकासुत जमदग्नि के नंदन। कौशलेश पूजित भृगु चंदन॥ अज अनंत प्रभु पूर्णकाम की। आरती कीजे श्री परशुराम की॥ नारायण अवतार सुहावन। प्रगट भए महि भार उतारन॥ क्रोध कुंज भव भय विराम की। आरती कीजे श्री परशुराम की॥ परशु चाप शर कर में राजे। ब्रह्मसूत्र गल माल विराजे॥ मंगलमय शुभ छबि ललाम की। आरती कीजे श्री परशुराम की॥ जननी प्रिय पितृ आज्ञाकारी। दुष्ट दलन संतन हितकारी॥ ज्ञान पुंज जग कृत प्रणाम की। आरती कीजे श्री परशुराम की॥ परशुराम वल्लभ यश गावे। श्रद्घायुत प्रभु पद शिर नावे॥ छहहिं चरण रति अष्ट याम की। आरती कीजे श्री परशुराम की॥ परशुराम जी की आरती – Parshuram ji ki aarti
जानिए महाशिवरात्रि की पूजा के दौरान शिवलिंग पर क्या चढ़ाना चाहिए। Know what should be offered to shivalinga during the worship of mahashivratri
हिंदू धर्म में भगवान शिव की पूजा का विशेष महत्व है। शिव भक्त फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को महाशिवरात्रि का व्रत रखकर भगवान शंकर और माता पार्वती की विधि-विधान से पूजा करते है। मान्यता है महाशिवरात्रि के दिन व्रत रखकर भगवान शिव और माता पार्वती की सच्चे मन से पूजा करने से हर मनोकामना पूरी हो जाती है। जीवन में कोई कष्ट नही रहता है। इस व्रत को करने से मनचाहे जीवनसाथी की प्राप्ति होती है। महाशिवरात्रि के दिन कुछ विशेष चीजें चढ़ाने से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है। * दूध से अभिषेक: महाशिवरात्रि की पूजा के समय शिवलिंग का दूध से अभिषेक करना अत्यंत फलदायी माना गया है। शिवलिंग का दूध से रुद्राभिषेक करने से भक्तों की हर मनोकामना पूरी हो जाती है। * जल चढ़ाना: महाशिवरात्रि की पूजा के समय शिवलिंग को जल चढ़ाना भी अत्यंत शुभ होता है। ऊं नम: शिवाय: का जाप करते हुए शिवलिंग को जल चढ़ाने से मन को शांति मिलती है और मानसिक परेशानियां दूर हो जाती है। * बेलपत्र: भगवान शंकर को तीन पत्तियों वाला बेलपत्र अत्यंत प्रिय है। शिवरात्रि के दिन पूजा के समय शिवलिंग पर तीन पत्तियों वाले बेलपत्र चढ़ाने चाहिए। इन्हें 11, 21 की तरह शुभ अंकों में चढ़ाने से लाभ होगा। * लाल केसर: महाशिवरात्रि की पूजा के समय शिवलिंग को लाल केसर से तिलक लगाएं। इससे जीवन में सौम्यता आती है और मांगलिक दोष दूर हो जाते हैं। * शहद: महाशिवरात्रि की पूजा के समय शिवलिंग पर शहद का लेप करने से वाणि को मधुरता मिलती है। इससे जीवन में राग और द्वेष कम होते हैं। (Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है।) जानिए महाशिवरात्रि की पूजा के दौरान शिवलिंग पर क्या चढ़ाना चाहिए। Know what should be offered to shivling during the worship of mahashivratri
दक्षिणेश्वर काली मंदिर का इतिहास – History of dakshineswar kali temple
दक्षिणेश्वर काली मंदिर, भारत के पश्चिम बंगाल में कोलकाता (कलकत्ता) के पास दक्षिणेश्वर में स्थित, देवी काली को समर्पित एक प्रतिष्ठित हिंदू मंदिर है। दक्षिणेश्वर काली मंदिर की स्थापना 19वीं सदी के मध्य में एक परोपकारी और देवी काली की भक्त रानी रशमोनी ने की थी। रानी रश्मोनी एक धनी विधवा थीं और कोलकाता के सामाजिक-धार्मिक परिदृश्य में एक प्रमुख व्यक्ति थीं। किंवदंती के अनुसार, रानी रशमोनी को एक दिव्य दृष्टि मिली थी जिसमें देवी काली ने उन्हें हुगली नदी के पूर्वी तट पर उनके लिए समर्पित एक मंदिर बनाने का निर्देश दिया था। दर्शन के आज्ञापालन में, उन्होंने दक्षिणेश्वर में भूमि का अधिग्रहण किया और मंदिर परिसर का निर्माण शुरू किया। दक्षिणेश्वर काली मंदिर परिसर को मंदिर वास्तुकला की पारंपरिक बंगाली नवरत्न शैली में डिजाइन किया गया है, जिसमें मुख्य मंदिर संरचना के ऊपर नौ शिखर हैं। मंदिर एक विशाल प्रांगण से घिरा हुआ है और इसमें विभिन्न हिंदू देवताओं को समर्पित कई मंदिर हैं। दक्षिणेश्वर काली मंदिर का केंद्रीय मंदिर देवी काली को समर्पित है, जिन्हें आत्माओं की मुक्तिदाता भवतारिणी के रूप में उनके उग्र रूप में दर्शाया गया है। देवता को महाकाल के रूप में भगवान शिव के झुके हुए शरीर के ऊपर खड़ा चित्रित किया गया है। दक्षिणेश्वर काली मंदिर के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक प्रसिद्ध रहस्यवादी संत, श्री रामकृष्ण परमहंस के साथ इसका संबंध है। श्री रामकृष्ण ने कई वर्षों तक मंदिर के मुख्य पुजारी के रूप में कार्य किया और इसके परिसर में आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त किया। दक्षिणेश्वर में श्री रामकृष्ण की शिक्षाओं और आध्यात्मिक प्रथाओं ने स्वामी विवेकानंद सहित कई शिष्यों को आकर्षित किया, जिन्होंने बाद में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की और श्री रामकृष्ण के सार्वभौमिकता और आध्यात्मिक सद्भाव के संदेश को दुनिया भर में फैलाया। दक्षिणेश्वर काली मंदिर देवी काली के भक्तों और श्री रामकृष्ण के अनुयायियों के लिए एक लोकप्रिय तीर्थस्थल है। यह हर दिन हजारों आगंतुकों और भक्तों को आकर्षित करता है, खासकर काली पूजा और दुर्गा पूजा जैसे शुभ अवसरों और त्योहारों के दौरान। दक्षिणेश्वर काली मंदिर न केवल एक धार्मिक केंद्र है, बल्कि एक सांस्कृतिक मील का पत्थर भी है, जो बंगाल की समृद्ध आध्यात्मिक और कलात्मक विरासत को दर्शाता है। इसने कला, साहित्य और संगीत के कई कार्यों को प्रेरित किया है, जिससे भारत के सांस्कृतिक परिदृश्य में इसका महत्व बढ़ गया है। दक्षिणेश्वर काली मंदिर भक्ति, आध्यात्मिकता और सांस्कृतिक विरासत के प्रतीक के रूप में खड़ा है, जो दुनिया भर के भक्तों और आगंतुकों को प्रेरित और उत्थान करता रहता है। दक्षिणेश्वर काली मंदिर का इतिहास – History of dakshineswar kali temple
जानिए तुलसी की माला से जाप करने और इस माला को धारण करने से मिलने वाले लाभ और नियमों के बारे में। Know about the benefits and rules of chanting with tulsi rosary and wearing this rosary
हिंदू धर्म में मालाएं धारण करना बेहद शुभ माना जाता है। कहते हैं मालाएं धारण करना या फिर माला से जाप करने पर आराध्य सभी मनोकामनाएं सुनते हैं। वहीं, माला से जाप करने पर ध्यानकेंद्रित करने में मदद मिलती है और मन शांत भी महसूस करता है। मालाएं कई अलग-अलग तरह की होती हैं और इन्हीं में से एक है तुलसी की माला। तुलसी की माला धारण करना अत्यधिक शुभ माना जाता है। कहते हैं तुलसी की माला में स्वयं मां लक्ष्मी का वास होता है और तुलसी की माला से जाप करने पर भगवान विष्णु भी प्रसन्न होते हैं। ऐसे में मन को तो शांति मिलती ही है, साथ ही आत्मा पवित्र भी हो जाती है। * तुलसी की माला को धारण करने के लाभ: – माना जाता है कि तुलसी में मां लक्ष्मी का वास होता है। ऐसे में तुलसी की माला से जाप करने या फिर तुलसी की माला धारण करने से मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है और घर में सुख-समृद्धि आती है। – तुलसी को धार्मिक मान्यतानुसार भगवान विष्णु की प्रिय कहा जाता है। ऐसे में तुलसी की माला पर भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप किया जा सकता है। – तुलसी की माला धारण करने पर भगवान विष्णु की कृपा भी प्राप्त होती है और भगवान विष्णु जातक के घर-परिवार में खुशहाली लाते हैं। – मान्यतानुसार तुलसी की माला धारण करने पर बुध और शुक्र ग्रह मजबूत रहते हैं। इससे मन शांत भी रहता है। * तुलसी की माला धारण करने के नियम: – तुलसी की माला धारण करने से पहले इस माला को गंगाजल से शुद्ध किया जाता है। इसके बाद तुलसी माता के मंत्रों का जाप किया जाता है और फिर माला धारण करते हैं। – जो व्यक्ति तुलसी की माला धारण करता है उसे सात्विक भोजन करना पड़ता है। इसके अतिरिक्त, माला धारण करने वाला व्यक्ति मदिरा का सेवन या तामसिक भोजन भी नहीं कर सकता है। – तुलसी की माला पहनने वालों को रुद्राक्ष पहनने की मनाही होती है। दोनों तरह की मालाएं एक साथ पहनना अच्छा नहीं माना जाता है। – रोजाना तुलसी की माला की पूजा की जाती है और कहते हैं इस माला को धारण करने के बाद उतारना नहीं चाहिए। नित्य कर्म से पहले माला उतारी जाती है और स्नान के पश्चात इसे फिर पहन सकते हैं। – माना जाता है कि जो लोग तुलसी की माला को गले में धारण नहीं कर सकते हैं वे इसे दाएं हाथ पर बांध सकते हैं। (Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है।) जानिए तुलसी की माला से जाप करने और इस माला को धारण करने से मिलने वाले लाभ और नियमों के बारे में। Know about the benefits and rules of chanting with tulsi rosary and wearing this rosary
जानिए महाशिवरात्रि की पूजा का मुहूर्त और महादेव के पूजन की विधि के बारे में – Know about the time of worship of mahashivratri and the method of worshiping mahadev
हिंदू धर्म में महाशिवरात्रि का विशेष महत्व होता है। भगवान शिव और मां पार्वती को समर्पित यह त्योहार फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाता है। इस दिन भगवान भोलेनाथ और माता पार्वती का विधि पूर्वक विवाह करवाया जाता है। इसके अलावा भगवान शिव की पूजा अर्चना करने के साथ ही उनका अभिषेक, रुद्राभिषेक करने का भी विधान होता है। ऐसे में महाशिवरात्रि पर भगवान शिव की पूजा करने का शुभ समय क्या है, जानें यहां। * महाशिवरात्रि 2024 पर बन रहे चार प्रहर मुहूर्त: हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि यानी कि 8 मार्च को संध्याकाल 9:57 पर महाशिवरात्रि शुरू होगी और इसका समापन 9 मार्च को शाम 6:17 पर होगा। भगवान शिव की पूजा प्रदोष काल में की जाती है, इसलिए उदया तिथि देखना जरूरी नहीं होता है। इस साल महाशिवरात्रि का व्रत 8 मार्च 2024 को रखा जाएगा, भगवान शिव की पूजा के लिए चार प्रहर मुहूर्त शुभ है- – पहला रात्रि प्रहार मुहूर्त शाम 6:25 से लेकर रात 9:28 तक रहेगा। – दूसरा प्रहर पूजन का समय रात 9:28 से लेकर 12:31 तक रहेगा। – तीसरा प्रहर पूजन देर रात 12:31 से लेकर सुबह 3:34 तक है। – चौथा और आखिरी प्रहर पूजन का समय सुबह 3:34 से लेकर सुबह 6:37 तक रहेगा। * ऐसे करें महाशिवरात्रि का पूजन: महाशिवरात्रि का पूजन करने के लिए ब्रह्म मुहूर्त का समय सुबह 5:15 से लेकर 6:06 मिनट तक है, इस समय उठकर आप स्नान आदि कर भगवान भोलेनाथ का स्मरण करें, व्रत का संकल्प लें। इसके बाद अभिजित मुहूर्त दोपहर 12:13 से लेकर दोपहर 12:58 तक रहेगा। इस दौरान आप भगवान भोलेनाथ का अभिषेक कर सकते हैं। कहते हैं इस दिन भगवान भोलेनाथ को पंचामृत से स्नान करना चाहिए, इसके साथ ही केसर के आठ लोटे जल उन्हें चढ़ाना चाहिए। पूरी रात भगवान शिव के समक्ष दीपक जलाना चाहिए और चंदन का तिलक लगाकर बेलपत्र, भांग, धतूरा, यह सारी चीज भगवान भोलेनाथ को चढ़ानी चाहिए। शिवरात्रि के मौके पर भगवान भोलेनाथ को केसर की खीर का भोग लगाया जाता है। (Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है।) जानिए महाशिवरात्रि की पूजा का मुहूर्त और महादेव के पूजन की विधि के बारे में – Know about the time of worship of mahashivratri and the method of worshiping mahadev
शीतला चालीसा – Sheetala chalisa
॥ दोहा॥ जय जय माता शीतला , तुमहिं धरै जो ध्यान । होय विमल शीतल हृदय, विकसै बुद्धी बल ज्ञान ॥ घट-घट वासी शीतला, शीतल प्रभा तुम्हार । शीतल छइयां में झुलई, मइयां पलना डार ॥ ॥ चौपाई ॥ जय-जय-जय श्री शीतला भवानी । जय जग जननि सकल गुणधानी ॥ गृह-गृह शक्ति तुम्हारी राजित । पूरण शरदचंद्र समसाजित ॥ विस्फोटक से जलत शरीरा । शीतल करत हरत सब पीड़ा ॥ मात शीतला तव शुभनामा । सबके गाढे आवहिं कामा ॥4॥ शोक हरी शंकरी भवानी । बाल-प्राणक्षरी सुख दानी ॥ शुचि मार्जनी कलश करराजै । मस्तक तेज सूर्य सम साजै ॥ चौसठ योगिन संग में गावैं । वीणा ताल मृदंग बजावै ॥ नृत्य नाथ भैरौं दिखलावैं । सहज शेष शिव पार ना पावैं ॥8॥ धन्य धन्य धात्री महारानी । सुरनर मुनि तब सुयश बखानी ॥ ज्वाला रूप महा बलकारी । दैत्य एक विस्फोटक भारी ॥ घर घर प्रविशत कोई न रक्षत । रोग रूप धरी बालक भक्षत ॥ हाहाकार मच्यो जगभारी । सक्यो न जब संकट टारी ॥12॥ तब मैंय्या धरि अद्भुत रूपा । कर में लिये मार्जनी सूपा ॥ विस्फोटकहिं पकड़ि कर लीन्हो । मूसल प्रमाण बहुविधि कीन्हो ॥ बहुत प्रकार वह विनती कीन्हा । मैय्या नहीं भल मैं कछु कीन्हा ॥ अबनहिं मातु काहुगृह जइहौं । जहँ अपवित्र वही घर रहि हो ॥16॥ अब भगतन शीतल भय जइहौं । विस्फोटक भय घोर नसइहौं ॥ श्री शीतलहिं भजे कल्याना । वचन सत्य भाषे भगवाना ॥ पूजन पाठ मातु जब करी है । भय आनंद सकल दुःख हरी है ॥ विस्फोटक भय जिहि गृह भाई । भजै देवि कहँ यही उपाई ॥20॥ कलश शीतलाका सजवावै । द्विज से विधीवत पाठ करावै ॥ तुम्हीं शीतला, जगकी माता । तुम्हीं पिता जग की सुखदाता ॥ तुम्हीं जगद्धात्री सुखसेवी । नमो नमामी शीतले देवी ॥ नमो सुखकरनी दु:खहरणी । नमो- नमो जगतारणि धरणी ॥24॥ नमो नमो त्रलोक्य वंदिनी । दुखदारिद्रक निकंदिनी ॥ श्री शीतला , शेढ़ला, महला । रुणलीहृणनी मातृ मंदला ॥ हो तुम दिगम्बर तनुधारी । शोभित पंचनाम असवारी ॥ रासभ, खर , बैसाख सुनंदन । गर्दभ दुर्वाकंद निकंदन ॥28॥ सुमिरत संग शीतला माई, जाही सकल सुख दूर पराई ॥ गलका, गलगन्डादि जुहोई । ताकर मंत्र न औषधि कोई ॥ एक मातु जी का आराधन । और नहिं कोई है साधन ॥ निश्चय मातु शरण जो आवै । निर्भय मन इच्छित फल पावै ॥32॥ कोढी, निर्मल काया धारै । अंधा, दृग निज दृष्टि निहारै ॥ बंध्या नारी पुत्र को पावै । जन्म दरिद्र धनी होइ जावै ॥ मातु शीतला के गुण गावत । लखा मूक को छंद बनावत ॥ यामे कोई करै जनि शंका । जग मे मैया का ही डंका ॥36॥ भगत ‘कमल’ प्रभुदासा । तट प्रयाग से पूरब पासा ॥ ग्राम तिवारी पूर मम बासा । ककरा गंगा तट दुर्वासा ॥ अब विलंब मैं तोहि पुकारत । मातृ कृपा कौ बाट निहारत ॥ पड़ा द्वार सब आस लगाई । अब सुधि लेत शीतला माई ॥40॥ ॥ दोहा ॥ यह चालीसा शीतला, पाठ करे जो कोय । सपनें दुख व्यापे नही, नित सब मंगल होय ॥ बुझे सहस्र विक्रमी शुक्ल, भाल भल किंतू । जग जननी का ये चरित, रचित भक्ति रस बिंतू ॥ ॥ इति श्री शीतला चालीसा ॥ शीतला चालीसा – Sheetala chalisa
जानिए विजया एकादशी की तिथि, महत्व और पूजा विधि के बारे में – Know about the date, importance and worship method of vijaya ekadashi
एकादशी के व्रत का बहुत महत्व है। हर माह की एकादशी की तिथि को भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा की जाती है। फाल्गुन मास में कृष्ण पक्ष की एकादशी की तिथि को रखे जाने वाले व्रत को विजया एकादशी कहते हैं। मान्यता है कि एकादशी के दिन भगवान विष्णु की अराधना से सभी कष्ट मिट जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है। आइए जानते हैं कब है विजया एकादशी, महत्व और पूजा की विधि। * कब है विजया एकादशी: फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी विजया एकादशी होती है। पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी की तिथि 6 मार्च को सुबह 6 बजकर 31 मिनट से शुरू होकर 7 मार्च को 4 बजकर 14 मिनट तक रहेगी। 6 मार्च को एकादशी का व्रत रखा लाएगा। * विजया एकादशी का महत्व: धार्मिक मान्यता है कि विजया एकादशी का व्रत रखने से विजय की प्राप्ति होती है। भगवान राम ने लंका अधिपति रावण पर विजय प्राप्त करने के लिए ऋषि बकदाल्भ्य के कहने पर विजया एकादशी का व्रत रखा था। एकादशी का व्रत के प्रभाव के कारण भगवान राम को रावण पर विजय प्राप्त करने में मदद मिली थी। * विजया एकादशी की पूजा: विजया एकादशी की पूजा की तैयार एक दिन पहले शुरू करना चाहिए। पूजा के लिए स्थान को शुद्ध कर वहां सप्त अनाज रख देना चाहिए। व्रत के दिन प्रात: स्नान आदि करके मंदिर व पूजा स्थल को शुद्ध कर लें। पूजा स्थल पर सप्त अनाज के ऊपर तांबे या मिट्टी का कलश स्थापित करें। उसके बाद भगवान विष्णु के चित्र की स्थानपा करें और धूप, दीप, चंदन, फल-फूल और तुलसी चढ़ाएं। पूजा के बाद विजया एकादशी की कथा का पाठ करें। रात को श्री हरि नाम का जाप करें। (Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है।) जानिए विजया एकादशी की तिथि, महत्व और पूजा विधि के बारे में – Know about the date, importance and worship method of vijaya ekadashi
मोरी मैया को दईयो सन्देश भजन – Mori maiya ko daiyo sandesh bhajan
मोरी मैया को दईयो सन्देश हो मोरी मैया को दईयो सन्देश मोरी सोंन चिरैया तो उडी उडी जाये मैहर नगरिया में मैया रहत है मैया रहत है मैया रहत है… ऊँची पहाड़ी माँ को धाम. मोरी सोंन चिरैया तो उडी उडी जाये मंदिर में मैया शारदा विराजे शारदा विराजे माँ शारदा विराजे करियो तू माँ को प्रणाम.. मोरी सोंन चिरैया तो उडी उडी जाये अगले बरस मै आउंगी कहना आउंगी कहना माँ से आउंगी कहना लाऊ चुनरिया सांथ .. मोरी सोंन चिरैया तो उडी उडी जाये मोरी मैया को दईयो सन्देश हो मोरी मैया को दईयो सन्देश मोरी सोंन चिरैया तो उडी उडी जाये मोरी मैया को दईयो सन्देश भजन – Mori maiya ko daiyo sandesh bhajan
फरवरी में कब मनाई जाएगी दुर्गाष्टमी, जानिए तिथि और पूजा समय के बारे में – When durga ashtami will be celebrated in february, Know about the date and puja time
हिन्दू धर्म में दुर्गाष्टमी का विशेष महत्व है । यह दिन देवी दुर्गा की पूजा के लिए समर्पित है। दुर्गाष्टमी हर महीने शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को होती है। इस शुभ दिन पर लोग मां दुर्गा की पूजा करते हैं और व्रत रखते हैं। चैत्र और अश्विन माह में दो मुख्य नवरात्रि पड़ती हैं। जिसे बहुत श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। * दुर्गाष्टमी कब है: – इस बार मासिक दुर्गाष्टमी 17 फरवरी दिन शनिवार को मनाई जाएगी। * मासिक दुर्गाष्टमी की पूजा विधि: – मासिक दुर्गाष्टमी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें। – जिस स्थान पर आपको पूजा करनी है उस जगह पर गंगा जल से धो लीजिए। – पूजा के दौरान मां दुर्गा का गंगा जल से अभिषेक करें। – घर के मंदिर में दीपक जलाएं। – मां को अक्षत, सिन्दूर और लाल फूल चढ़ाएं। – भोग के रूप में फल और मिठाइयां चढ़ाएं। – इस दिन दुर्गा चालीसा का पाठ करें और फिर मां की आरती। * मासिक दुर्गाष्टमी का महत्व: ऐसी मान्यता है कि इस दिन देवी दुर्गा का व्रत करने से सारी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। घर में सुख-शांति बनी रहती है। इससे जगदंबा की कृपा सदैव आप पर बनी रहेगी। (Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है।) फरवरी में कब मनाई जाएगी दुर्गाष्टमी, जानिए तिथि और पूजा समय के बारे में – When durga ashtami will be celebrated in february, Know about the date and puja time
इस साल कब किया जाएगा होलिका दहन, जानिए तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि के बारे में – When will holika dahan be done this year, know about the date, auspicious time and method of worship
पंचांग के अनुसार, हर साल फाल्गुन मास की पूर्णिमा की रात होलिका दहन किया जाता है। होलिका दहन होली से एक दिन पहले किया जाता है। होली हिंदुओं का लोकप्रिय त्योहार है और इस दिन एक-दूसरे को रंग लगाए जाते हैं। वहीं, धार्मिक परिपाटी पर होलिका दहन का विशेष महत्व है। होलिका दहन को बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में देखा जाता है। माना जाता है कि एक समय में हिरण्यकश्यप नामक राजा रहा करता था जिसका एक पुत्र था प्रह्लाद। हिरण्यकश्यप भगवान विष्णु को पसंद नहीं करता था जबकि प्रह्लाद विष्णु भक्त था। ऐसे में हिरण्यकश्यप अपने पुत्र प्रह्लाद को मार देना चाहता था। हिरण्यकश्यप की एक बहन थी जिसका नाम होलिका था। होलिका को यह वरदान था कि उसे कोई आग जला नहीं सकती है। इसीलिए हिरण्यकश्यप ने होलिका से कहा कि वह प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ जाए। होलिका ने ऐसा ही किया। लेकिन, भगवान विष्णु की कृपा से होलिका तो जलकर राख हो गई पर प्रह्लाद बच गया। इसी दिन से हर साल होलिका जलाई जाती है। जानिए इस साल होलिका दहन किस समय किया जाएगा और होलिका दहन किस तरह करते हैं। * होलिका दहन की तिथि: पंचांग के अनुसार, इस साल होलिका दहन 24 मार्च, रविवार की रात किया जाएगा। होलिका दहन का शुभ मुहूर्त रात 11 बजकर 13 मिनट से शुरू होकर रात 12 बजकर 27 मिनट तक रहेगा। इस समयावधि में विधि अनुसार होलिका दहन किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त प्रदोष काल में भी होलिका दहन किया जाता है। होलिका दहन के अगले दिन रंगों वाली होली मनाई जाएगी। इस साल रंगों से 25 मार्च के दिन खेला जाएगा। कहते हैं होली के दिन लोग सभी बैर भुलाकर एकदूसरे को गले लगा लेते हैं। * होलिका दहन की पूजा विधि: मान्यतानुसार होलिका दहन के दिन सुबह स्नान पश्चात स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं। गली के किनारे या चौक पर होलिका दहन करने के लिए कुछ दिनों पहले से ही लकड़ियां इकट्ठी करके रखी जाती हैं। होलिका दहन के दिन तैयार की गई होलिका की दिशा में मुख करके बैठा जाता है और भगवान गणेश का स्मरण किया जाता है। होलिका दहन की पूजा सामग्री में फल, फूल, नारियल, रोली, गोबर के कंडे, अनाज, कच्चा सूत, चावल, गुलाल, बताशे, हल्दी, और लोटे में जल भरकर रखा जाता है। \’असृक्पाभयसंत्रस्तै: कृता त्वं होलि बालिशै:। अतस्त्वां पूजायिष्यामि भूते भूतिप्रदा भव\’ मंत्र का जाप करते हुए होलिका की परिक्रमा की जाती है। (Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है।) इस साल कब किया जाएगा होलिका दहन, जानिए तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि के बारे में – When will holika dahan be done this year, know about the date, auspicious time and method of worship
प्रदोष व्रत के दिन शिवलिंग पर ये चीजें चढ़ाने से आपको महादेव की कृपा प्राप्त होगी। By offering these things on shivling on the day of pradosh fast, you will get the blessings of mahadev
हिंदू पंचांग के अनुसार हर माह की त्रयोदशी तिथि भगवान शंकर की पूजा के लिए समर्पित है। इस दिन प्रदोष का व्रत रखकर प्रदोष काल में भगवान शंकर की पूजा की जाती है। इस दिन व्रत रखने और विधि-विधान से भगवान शंकर और माता पार्वती की पूजा करने से सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं और जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। प्रदोष व्रत के दिन शिवलिंग पर भगवान शंकर की प्रिय चीजें चढ़ाने से भगवान जल्दी प्रसन्न होते हैं। आइए जानते हैं भगवान शंकर की कृपा प्राप्त करने के लिए प्रदोष के दिन शिवलिंग पर क्या चढ़ाना चाहिए। # शिवलिंग पर क्या चढ़ाएं: * बेलपत्र: भगवान शंकर की पूजा बेलपत्र के बिना अधूरी मानी जाती है। प्रदोष के व्रत के दिन भगवान शंकर को बेलपत्र जरूर चढ़ाना चाहिए। प्रदोष व्रत की पूजा शाम को की जाती है। शाम के समय शिव भगवान की पूजा में बेलपत्र के साथ-साथ मदार के फूले, धूप-दीप अर्पित करने चाहिए। * अर्पित करें ये चीजें: प्रदोष व्रत के दिन शिवलिंग पर आक के फूल, धूप दीप, घी, शहद, दूध, दही और गंगाजल अर्पित करना अत्यंत शुभ फल वाला होता है। इस व्रत के दिन भगवान शिव को घी शक्कर और गेहूं के आटे से बना भोग अर्पित करने से भक्तों को आरोग्य का वरदान प्राप्त होता है। * भूल कर भी ये न चढ़ाएं: भगवान शिव की पूजा के लिए शिवलिंग पर भूलकर भी सिंदूर, हल्दी और तुलसी के पत्ते नहीं चढ़ाने चाहिए। ये चीजें भगवान शंकर की पूजा में वर्जित मानी जाती हैं। * माता पार्वती की पूजा: प्रदोष व्रत के दिन भगवान शंकर के साथ माता पार्वती की भी पूजा करनी चाहिए। इससे दांपत्य जीवन सुखमय होती है। (Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है।) प्रदोष व्रत के दिन शिवलिंग पर ये चीजें चढ़ाने से आपको महादेव की कृपा प्राप्त होगी। By offering these things on shivling on the day of pradosh fast, you will get the blessings of mahadev
श्री जगन्नाथ मंदिर का इतिहास – History of shri jagannath temple
श्री जगन्नाथ मंदिर, जिसे जगन्नाथ मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, भारत के ओडिशा के पुरी में स्थित भगवान विष्णु के एक रूप भगवान जगन्नाथ को समर्पित एक प्रसिद्ध हिंदू मंदिर है। जगन्नाथ मंदिर की सटीक उत्पत्ति किंवदंतियों और पौराणिक कथाओं में छिपी हुई है। परंपरा के अनुसार, मंदिर का निर्माण मूल रूप से 12वीं शताब्दी ईसा पूर्व के दौरान मालवा राजवंश के एक प्रसिद्ध राजा, राजा इंद्रद्युम्न द्वारा किया गया था। हालाँकि, ऐतिहासिक अभिलेखों से पता चलता है कि वर्तमान मंदिर संरचना का निर्माण बहुत बाद में, 12वीं शताब्दी ईस्वी के आसपास, गंगा राजवंश के शासनकाल के दौरान किया गया था। क्षेत्र में गंगा राजवंश के शासन के दौरान जगन्नाथ मंदिर स्थापत्य और सांस्कृतिक महत्व के चरम पर पहुंच गया। राजवंश के शासक मंदिर के महान संरक्षक थे और उन्होंने इसके निर्माण और रखरखाव में महत्वपूर्ण योगदान दिया। यह मंदिर अपनी अनूठी कलिंग शैली की वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है, जिसकी विशेषता इसका पिरामिड आकार का शिखर (शिखर) और विभिन्न पौराणिक दृश्यों और आकृतियों को दर्शाती जटिल नक्काशी है। मंदिर परिसर ऊंची दीवारों से घिरा हुआ है और इसमें मुख्य मंदिर (गर्भगृह), सभा कक्ष (मंडप) और आसपास के मंडप सहित कई संरचनाएं शामिल हैं। यह मंदिर भगवान जगन्नाथ, उनके भाई-बहनों, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा को समर्पित है। मंदिर के प्रमुख देवताओं को लकड़ी से तराश कर बनाया गया है और हर बारह साल में एक भव्य अनुष्ठान के तहत उनकी जगह नई छवियां लगाई जाती हैं, जिसे नबाकलेबारा के नाम से जाना जाता है। जगन्नाथ मंदिर अपने विस्तृत अनुष्ठानों और त्यौहारों के लिए प्रसिद्ध है, जिसमें रथ यात्रा या रथ महोत्सव भी शामिल है, जिसके दौरान देवताओं को विस्तृत रूप से सजाए गए रथों पर जुलूस निकाला जाता है। मंदिर साल भर में कई अन्य त्यौहार भी मनाता है, जो पूरे भारत और दुनिया भर से लाखों भक्तों और पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। जगन्नाथ मंदिर हिंदुओं, विशेषकर भगवान जगन्नाथ के भक्तों के लिए अत्यधिक आध्यात्मिक महत्व रखता है। इसे बद्रीनाथ, द्वारका और रामेश्वरम के साथ चार धाम तीर्थ स्थलों में से एक माना जाता है, और हिंदू धर्म में पूजा के सबसे पवित्र स्थानों में से एक माना जाता है। पुरी में जगन्नाथ मंदिर न केवल एक वास्तुशिल्प चमत्कार है, बल्कि धार्मिक भक्ति, सांस्कृतिक विरासत और आध्यात्मिक तीर्थयात्रा का केंद्र भी है, जो हर साल लाखों आगंतुकों और भक्तों को आकर्षित करता है। श्री जगन्नाथ मंदिर का इतिहास – History of shri jagannath temple
जानिए फरवरी माह में कब रखा जाएगा दूसरा प्रदोष व्रत और कैसे की जाएगी भगवान की पूजा – Know when the second pradosh vrat will be observed in the month of february and how god will be worshipped
पंचांग के अनुसार, हर महीने कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर प्रदोष व्रत रखा जाता है। प्रदोष व्रत की विशेष धार्मिक मान्यता होती है। कहते हैं यदि प्रदोष व्रत के दिन पूरे श्रद्धाभाव से भगवान शिव का पूजन किया जाए तो भोलेनाथ प्रसन्न होकर भक्तों को आरोग्य का वरदान देते हैं। जीवन से कष्ट दूर करने के साथ ही भगवान शिव घर-परिवार को सुख, शांति और समृद्धि का वरदान देते हैं। जानिए फरवरी माह में दूसरा प्रदोष व्रत कब रखा जाएगा और किस तरह इस प्रदोष व्रत में भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए पूजा की जा सकती है। * प्रदोष व्रत की पूजा विधि: इस महीने का दूसरा प्रदोष व्रत 21 फरवरी, बुधवार के दिन रखा जाना है। बुधवार के दिन पड़ने के चलते इसे बुध प्रदोष व्रत भी कहते हैं। त्रयोदशी तिथि की शुरूआत 21 फरवरी सुबह 11 बजकर 28 मिनट पर हो रही है और इस तिथि का समापन अगले दिन 22 फरवरी, 1 बजकर 22 मिनट पर हो जाएगी। प्रदोष व्रत की पूजा का शुभ मुहूर्त 21 फरवरी की शाम 6 बजकर 21 मिनट से रात 8 बजकर 53 मिनट के बीच की जा सकती है। इसे प्रदोष काल कहते हैं। प्रदोष काल में प्रदोष व्रत की पूजा अत्यधिक लाभकारी और शुभ कही जाती है। प्रदोष व्रत की पूजा करने के लिए सुबह जल्दी उठकर स्नान किया जाता है। स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं इसके बाद भगवान शिव का ध्यान किया जाता है और व्रत का संकल्प लेते हैं। सुबह के समय भक्त शिव मंदिर भी जाते हैं लेकिन प्रदोष व्रत की असल पूजा रात के समय होती है। शाम के समय भगवान शिव के साथ ही मां पार्वती की पूजा की जाती है। पूजा में पंचामृत, गंगाजल, बेलपत्र, चावल, गंध, फूल, धूप, फल, दीप और लौंग आदि पूजा सामग्री में सम्मिलित किए जाते हैं। भगवान शिव को घी और शक्कर मिले जौ के सत्तू का भोग लगाना बेहद शुभ होता है। इसके बाद शिव जी की आरती होती है और शिव मंत्रों का जाप भी भक्त करते हैं। कहते हैं पूरे मनोभाव से महादेव का पूजन किया जाए तो भगवान शिव भक्तों की इच्छाएं पूरी करते हैं। (Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है।) जानिए फरवरी माह में कब रखा जाएगा दूसरा प्रदोष व्रत और कैसे की जाएगी भगवान की पूजा – Know when the second pradosh vrat will be observed in the month of february and how god will be worshipped
जानिए कब और क्यों तुलसी को न तो पानी देना चाहिए और न ही पौधे को छूना चाहिए। Know when and why tulsi should neither be watered nor the plant should be touched
सनातन धर्म में तुलसी के पौधे का बहुत महत्व है। घर-घर में तुलसी का पौधा लगाया जाता है और उसकी देखभाल के साथ-साथ पूजा भी की जाती है। घर में लगी तुलसी की प्रतिदिन पूजा करना और उसे पानी देना जरूरी होता है। हालांकि, धार्मिक मान्यताओं के कारण तुलसी के कुछ नियम हैं जिनके अनुसार कुछ दिनों में तुलसी में पानी देना और पौधे को छूने की मनाही होती है। आइए जानते हैं कब-कब और क्यों तुलसी को न तो पानी देना चाहिए और न ही पौधे को छूना ही चाहिए। * तुलसी का पौधा कब नहीं छूना चाहिए – हर माह की एकादशी की तिथि को तुलसी के पौधे में न तो पानी देना चाहिए और न ही पौधे को स्पर्श ही करना चाहिए। मान्यता है कि एकादशी तिथि भगवान विष्णु को समर्पित है और इस दिन माता तुलसी भी भगवान विष्णु के लिए व्रत रखती हैं। इसलिए एकादशी के दिन तुलसी में जल डालने या पत्ते तोड़ने की मनाही होती है। पौधे में जल देने में माता तुलसी के व्रत के खंडित होने का डर रहता है। * रविवार और मंगलवार – तुलसी के पौधे को हर रोज जल देने और पूजा करने का विधान है, लेकिन धार्मिक मान्यताओं के अनुसार रविवार और मंगलवार के दिन तुलसी के पौधे को जल नहीं देना चाहिए और न ही तुलसी के पौधे को छूना या पत्ते तोड़ने चाहिए। भगवान विष्णु को तुलसी बहुत ही प्रिय हैं और रविवार के दिन माता तुलसी भगवान विष्णु के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। ऐसे में अगर रविवार के दिन मां तुलसी को जल चढ़ाएंगे तो उनका व्रत खंडित हो जाता है। मंगलवार को तुलसी के पौधे में जल देने से भगवान शंकर के नाराज होने का भय रहता है। इसलिए रविवार और मंगलवार को तुलसी के पौधे में जल नहीं डालना चाहिए। (Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है।)
श्री कृष्णा चालीसा – Shri krishna chalisa
बंशी शोभित कर मधुर । नील जलद तन श्याम। अरुण अधर जनु बिम्बफल । नयन कमल अभिराम॥ पूर्ण इन्द्र, अरविन्द मुख । पीताम्बर शुभ साज। जय मनमोहन मदन छवि । कृष्णचन्द्र महाराज॥ जय यदुनंदन जय जगवंदन। जय वसुदेव देवकी नन्दन॥ जय यशुदा सुत नन्द दुलारे। जय प्रभु भक्तन के दृग तारे॥ जय नटनागर, नाग नथइया। कृष्ण कन्हइया धेनु चरइया॥ पुनि नख पर प्रभु गिरिवर धारो। आओ दीनन कष्ट निवारो॥ वंशी मधुर अधर धरि टेरौ। होवे पूर्ण विनय यह मेरौ॥ आओ हरि पुनि माखन चाखो। आज लाज भारत की राखो॥ गोल कपोल, चिबुक अरुणारे। मृदु मुस्कान मोहिनी डारे॥ राजित राजिव नयन विशाला। मोर मुकुट वैजन्तीमाला॥ कुंडल श्रवण, पीत पट आछे। कटि किंकिणी काछनी काछे॥ नील जलज सुन्दर तनु सोहे। छबि लखि, सुर नर मुनिमन मोहे॥ मस्तक तिलक, अलक घुँघराले। आओ कृष्ण बांसुरी वाले॥ करि पय पान, पूतनहि तार्यो। अका बका कागासुर मार्यो॥ मधुवन जलत अगिन जब ज्वाला। भै शीतल लखतहिं नंदलाला॥ सुरपति जब ब्रज चढ़्यो रिसाई। मूसर धार वारि वर्षाई॥ लगत लगत व्रज चहन बहायो। गोवर्धन नख धारि बचायो॥ लखि यसुदा मन भ्रम अधिकाई। मुख मंह चौदह भुवन दिखाई॥ दुष्ट कंस अति उधम मचायो । कोटि कमल जब फूल मंगायो॥ नाथि कालियहिं तब तुम लीन्हें। चरण चिह्न दै निर्भय कीन्हें॥ करि गोपिन संग रास विलासा। सबकी पूरण करी अभिलाषा॥ केतिक महा असुर संहार्यो। कंसहि केस पकड़ि दै मार्यो॥ मातपिता की बन्दि छुड़ाई ।उग्रसेन कहँ राज दिलाई॥ महि से मृतक छहों सुत लायो। मातु देवकी शोक मिटायो॥ भौमासुर मुर दैत्य संहारी। लाये षट दश सहसकुमारी॥ दै भीमहिं तृण चीर सहारा। जरासिंधु राक्षस कहँ मारा॥ असुर बकासुर आदिक मार्यो। भक्तन के तब कष्ट निवार्यो॥ दीन सुदामा के दुःख टार्यो। तंदुल तीन मूंठ मुख डार्यो॥ प्रेम के साग विदुर घर माँगे।दर्योधन के मेवा त्यागे॥ लखी प्रेम की महिमा भारी।ऐसे श्याम दीन हितकारी॥ भारत के पारथ रथ हाँके।लिये चक्र कर नहिं बल थाके॥ निज गीता के ज्ञान सुनाए।भक्तन हृदय सुधा वर्षाए॥ मीरा थी ऐसी मतवाली।विष पी गई बजाकर ताली॥ राना भेजा साँप पिटारी।शालीग्राम बने बनवारी॥ निज माया तुम विधिहिं दिखायो।उर ते संशय सकल मिटायो॥ तब शत निन्दा करि तत्काला।जीवन मुक्त भयो शिशुपाला॥ जबहिं द्रौपदी टेर लगाई।दीनानाथ लाज अब जाई॥ तुरतहि वसन बने नंदलाला।बढ़े चीर भै अरि मुँह काला॥ अस अनाथ के नाथ कन्हइया। डूबत भंवर बचावइ नइया॥ सुन्दरदास आ उर धारी।दया दृष्टि कीजै बनवारी॥ नाथ सकल मम कुमति निवारो।क्षमहु बेगि अपराध हमारो॥ खोलो पट अब दर्शन दीजै।बोलो कृष्ण कन्हइया की जै॥ ॥दोहा॥ यह चालीसा कृष्ण का, पाठ करै उर धारि। अष्ट सिद्धि नवनिधि फल, लहै पदारथ चारि॥ श्री कृष्णा चालीसा – Shri krishna chalisa
विंध्यगिरि पहाड़ी मंदिर का इतिहास – History of vindhyagiri hill temple
विंध्यगिरि पहाड़ी मंदिर, जिसे श्रवणबेलगोला मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, भारत के कर्नाटक के हसन जिले में स्थित एक महत्वपूर्ण जैन तीर्थ स्थल है। विंध्यगिरि पहाड़ी मंदिर की प्राचीन उत्पत्ति दो हजार साल से भी अधिक पुरानी है। ऐसा माना जाता है कि इसकी स्थापना तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व के दौरान मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य द्वारा की गई थी, जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने अपने बाद के वर्षों में अपना राज्य त्याग दिया और जैन धर्म अपना लिया था। विंध्यगिरि पहाड़ी मंदिर परिसर की सबसे प्रमुख विशेषता भगवान बाहुबली (जिसे गोमतेश्वर के नाम से भी जाना जाता है) की विशाल प्रतिमा है, जो लगभग 57 फीट (17 मीटर) की ऊंचाई पर स्थित है। यह मूर्ति ग्रेनाइट के एक ही खंड से बनाई गई है और इसे दुनिया की सबसे ऊंची अखंड मूर्तियों में से एक माना जाता है। यह त्याग, शांति और अहिंसा का प्रतीक है। विंध्यगिरि पहाड़ी मंदिर जैनियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण तीर्थ स्थलों में से एक है, विशेष रूप से दिगंबर संप्रदाय से संबंधित लोगों के लिए। तीर्थयात्री भगवान बाहुबली को श्रद्धांजलि देने और मंदिर परिसर में अनुष्ठान और प्रार्थना करने के लिए दूर-दूर से आते हैं। सदियों से, मंदिर परिसर के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को संरक्षित करने के लिए विभिन्न नवीकरण और पुनर्स्थापन हुए हैं। स्थल की पवित्रता बनाए रखने और तीर्थयात्रियों और आगंतुकों के लिए इसकी पहुंच सुनिश्चित करने के प्रयास किए गए हैं। विंध्यगिरि पहाड़ी मंदिर में आयोजित सबसे महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में से एक महामस्तकाभिषेक महोत्सव है, जो हर बारह साल में एक बार होता है। इस भव्य समारोह के दौरान, भगवान बाहुबली की विशाल प्रतिमा का दूध, पानी, केसर का लेप और चंदन पाउडर सहित विभिन्न पवित्र पदार्थों से अभिषेक किया जाता है, जिसे अभिषेक कहा जाता है। यह त्यौहार दुनिया भर से हजारों भक्तों और पर्यटकों को आकर्षित करता है। विंध्यगिरि पहाड़ी मंदिर अत्यधिक ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व रखता है, और यह जैनियों के लिए एक श्रद्धेय तीर्थस्थल और आध्यात्मिक भक्ति और ज्ञान का प्रतीक बना हुआ है। विंध्यगिरि पहाड़ी मंदिर का इतिहास – History of vindhyagiri hill temple