रविवार व्रत की कथ बहुत समय पहले एक नगर में एक बुढ़िया रहती थी। वह अत्यंत गरीब थी, लेकिन भगवान सूर्य की बहुत बड़ी भक्त थी। वह प्रत्येक रविवार को प्रातः स्नान करके अपने घर और आंगन को साफ करती, सूर्य देव को जल अर्पित करती और श्रद्धापूर्वक उनका व्रत रखती थी। उस बुढ़िया के पास एक गाय थी। वह गाय का गोबर बेचकर अपना जीवन चलाती थी। वह रविवार के दिन गाय के गोबर को घर में नहीं लगाती थी और उस दिन विशेष रूप से अपने घर को स्वच्छ रखती थी। उसी नगर में एक दूसरी स्त्री रहती थी। वह बुढ़िया को देखकर ईर्ष्या करती थी। उसने देखा कि बुढ़िया बहुत गरीब होने के बावजूद हर रविवार को बड़ी श्रद्धा से सूर्य भगवान की पूजा करती है और उसके घर में धीरे-धीरे सुख-शांति बनी रहती है। ईर्ष्या के कारण वह स्त्री बुढ़िया की गाय को अपने घर बांधने लगी, जिससे बुढ़िया के लिए रविवार के दिन घर की सफाई करना कठिन हो गया। बुढ़िया ने दुखी होकर सूर्य देव से प्रार्थना की— “हे सूर्य नारायण! मैं आपकी श्रद्धा से पूजा करती हूँ। यदि मेरी भक्ति सच्ची है तो मेरी सहायता कीजिए।” सूर्य देव उसकी सच्ची भक्ति से प्रसन्न हुए। उन्होंने उसकी गाय को ऐसा वरदान दिया कि उसके घर में समृद्धि और सुख आने लगा। बुढ़िया की गरीबी दूर होने लगी। यह देखकर वह ईर्ष्यालु स्त्री और भी परेशान हो गई। उसने बुढ़िया को नुकसान पहुँचाने का प्रयास किया, लेकिन सूर्य देव ने अपनी भक्त की रक्षा की। अंततः उस स्त्री को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने बुढ़िया से क्षमा मांगी और सूर्य देव की भक्ति करने लगी। इस कथा की मुख्य शिक्षा यह है कि सच्ची श्रद्धा, स्वच्छ मन और भगवान के प्रति विश्वास रखने वाले भक्त की रक्षा भगवान स्वयं करते हैं। रविवार के व्रत और सूर्य उपासना को परंपरा में आरोग्य, तेज, यश और समृद्धि की कामना से जोड़ा गया है। रविवार को सूर्य देव की पूजा कैसे करें? सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें। साफ कपड़े पहनें। तांबे के लोटे में जल लें। उसमें लाल फूल या अक्षत डाल सकते हैं। पूर्व दिशा की ओर मुख करके सूर्य देव को अर्घ्य दें। मन में सूर्य देव का स्मरण करें। “ॐ सूर्याय नमः” या “ॐ आदित्याय नमः” का जाप करें। रविवार की व्रत-कथा पढ़ें या सुनें। अंत में सूर्य देव की आरती करें। परंपरागत रूप से रविवार का व्रत एक समय भोजन या फलाहार के साथ किया जाता है; अलग-अलग परंपराओं में नियम कुछ भिन्न हो सकते हैं। 🌞 सूर्य देव से प्रार्थना “हे सूर्य नारायण भगवान, आप संसार को प्रकाश और जीवन देने वाले हैं। हमारे घर में सुख-शांति, आरोग्य और समृद्धि बनाए रखें। हमारे सभी कष्ट दूर करें और हमें सद्बुद्धि प्रदान करें। जय सूर्य नारायण देव!” एक विशेष बात: आज रविवार के साथ वराह जयंती भी है। भगवान विष्णु के वराह अवतार की कथा भी आज सुनना शुभ माना जाता है। अगर आप चाहें तो मैं आपको आज की वराह जयंती की पूरी कथा—भगवान विष्णु ने वराह रूप क्यों लिया, हिरण्याक्ष का वध कैसे हुआ, पृथ्वी को समुद्र से कैसे निकाला—पूरी कथा शुरू से अंत तक भी सुना सकता हूँ।आज 13 सितंबर 2026, रविवार है। रविवार का दिन मुख्य रूप से भगवान सूर्य नारायण (सूर्य देव) को समर्पित माना जाता है। आज का दिन विशेष भी है क्योंकि आज वराह जयंती भी मनाई जा रही है, जो भगवान विष्णु के वराह अवतार से संबंधित है। आपने “सारी कथा” पूछी है, इसलिए मैं आपको पहले रविवार व्रत और सूर्य देव की प्रसिद्ध लोक-परंपरागत कथा पूरी तरह सरल हिंदी में बता रहा हूँ। ☀️ रविवार व्रत की कथा बहुत समय पहले एक नगर में एक बुढ़िया रहती थी। वह अत्यंत गरीब थी, लेकिन भगवान सूर्य की बहुत बड़ी भक्त थी। वह प्रत्येक रविवार को प्रातः स्नान करके अपने घर और आंगन को साफ करती, सूर्य देव को जल अर्पित करती और श्रद्धापूर्वक उनका व्रत रखती थी। उस बुढ़िया के पास एक गाय थी। वह गाय का गोबर बेचकर अपना जीवन चलाती थी। वह रविवार के दिन गाय के गोबर को घर में नहीं लगाती थी और उस दिन विशेष रूप से अपने घर को स्वच्छ रखती थी। उसी नगर में एक दूसरी स्त्री रहती थी। वह बुढ़िया को देखकर ईर्ष्या करती थी। उसने देखा कि बुढ़िया बहुत गरीब होने के बावजूद हर रविवार को बड़ी श्रद्धा से सूर्य भगवान की पूजा करती है और उसके घर में धीरे-धीरे सुख-शांति बनी रहती है। ईर्ष्या के कारण वह स्त्री बुढ़िया की गाय को अपने घर बांधने लगी, जिससे बुढ़िया के लिए रविवार के दिन घर की सफाई करना कठिन हो गया। बुढ़िया ने दुखी होकर सूर्य देव से प्रार्थना की— “हे सूर्य नारायण! मैं आपकी श्रद्धा से पूजा करती हूँ। यदि मेरी भक्ति सच्ची है तो मेरी सहायता कीजिए।” सूर्य देव उसकी सच्ची भक्ति से प्रसन्न हुए। उन्होंने उसकी गाय को ऐसा वरदान दिया कि उसके घर में समृद्धि और सुख आने लगा। बुढ़िया की गरीबी दूर होने लगी। यह देखकर वह ईर्ष्यालु स्त्री और भी परेशान हो गई। उसने बुढ़िया को नुकसान पहुँचाने का प्रयास किया, लेकिन सूर्य देव ने अपनी भक्त की रक्षा की। अंततः उस स्त्री को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने बुढ़िया से क्षमा मांगी और सूर्य देव की भक्ति करने लगी। इस कथा की मुख्य शिक्षा यह है कि सच्ची श्रद्धा, स्वच्छ मन और भगवान के प्रति विश्वास रखने वाले भक्त की रक्षा भगवान स्वयं करते हैं। रविवार के व्रत और सूर्य उपासना को परंपरा में आरोग्य, तेज, यश और समृद्धि की कामना से जोड़ा गया है। रविवार को सूर्य देव की पूजा कैसे करें? सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें। साफ कपड़े पहनें। तांबे के लोटे में जल लें। उसमें लाल फूल या अक्षत डाल सकते हैं। पूर्व दिशा की ओर मुख करके सूर्य देव को अर्घ्य दें। मन में सूर्य देव का स्मरण करें। “ॐ सूर्याय नमः” या “ॐ आदित्याय नमः” का जाप करें। रविवार की व्रत-कथा पढ़ें या सुनें। अंत में सूर्य देव की आरती करें। परंपरागत रूप से रविवार का व्रत एक समय भोजन या फलाहार के साथ किया जाता है; अलग-अलग
शनिवार का दिन है शनिदेव को समर्पित, जानिए कौन से मंत्रों के जाप से मिलेगी शनि देव की कृपा
शनिवार का दिन है शनिदेव को समर्पित, जानिए कौन से मंत्रों के जाप से मिलेगी शनि देव की कृपा Shanivar Shani Dev Mantra: हिंदू धर्म में शनिवार का दिन भगवान शनिदेव को समर्पित माना जाता है। शनिदेव को न्याय और कर्मफल का देवता कहा जाता है। मान्यता है कि व्यक्ति को उसके कर्मों के अनुसार फल प्रदान करने वाले देवताओं में शनिदेव का विशेष स्थान है। इसलिए शनिवार के दिन श्रद्धापूर्वक शनिदेव की पूजा और मंत्र जाप किया जाता है। शनिवार को किसका वार होता है? शनिवार सप्ताह का वह दिन है जिसे भगवान शनिदेव की आराधना के लिए विशेष माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शनिदेव सूर्य देव के पुत्र हैं और उन्हें कर्मों के अनुसार फल देने वाला देवता माना जाता है। शनिवार के दिन शनिदेव का स्मरण करने, पूजा करने और मंत्रों का जाप करने की परंपरा है। शनिदेव का सरल मंत्र शनिवार को शनिदेव की पूजा करते समय इस सरल मंत्र का जाप किया जा सकता है: ॐ शं शनैश्चराय नमः। यह शनिदेव का लोकप्रिय मंत्र है। भक्त श्रद्धा के साथ इसका जाप करते हैं। शनिदेव का बीज मंत्र शनिवार के दिन शनिदेव के बीज मंत्र का जाप भी किया जाता है: ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः। कई धार्मिक परंपराओं में इस मंत्र का 108 बार जाप करने की बात कही गई है। शनिदेव का महामंत्र शनिदेव की स्तुति के लिए यह प्रसिद्ध मंत्र भी पढ़ा जाता है: ॐ नीलांजन समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्। छायामार्तण्ड सम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम्॥ इस मंत्र में शनिदेव को सूर्यपुत्र, यमराज के अग्रज और छाया से उत्पन्न शनैश्चर के रूप में नमन किया जाता है। शनि गायत्री मंत्र शनिवार को शनि गायत्री मंत्र का जाप भी किया जाता है: ॐ शं शनैश्चराय विद्महे छायात्मजाय धीमहि तन्नो मन्दः प्रचोदयात्॥ श्रद्धालु इस मंत्र का जाप मानसिक शांति और शनिदेव की कृपा की कामना के लिए करते हैं। शनिवार को शनिदेव की पूजा कैसे करें? शनिवार के दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और श्रद्धा से शनिदेव का स्मरण करें। शनिदेव के मंदिर में जाकर या घर के पूजा स्थल पर दीपक जलाकर मंत्रों का जाप किया जा सकता है। धार्मिक परंपराओं में काले तिल, तिल का तेल, काली उड़द और लोहे से जुड़े दान का भी उल्लेख मिलता है। शनिवार को हनुमान चालीसा का पाठ करने की परंपरा भी कई भक्तों में प्रचलित है। शनिवार के दिन इन बातों का रखें ध्यान शनिदेव की पूजा श्रद्धा और शांत मन से करें। किसी जरूरतमंद व्यक्ति की सहायता और दान-पुण्य करें। अपनी क्षमता के अनुसार काले तिल, उड़द या तिल के तेल का दान कर सकते हैं। शनिदेव के मंत्र का श्रद्धापूर्वक जाप करें। किसी भी धार्मिक उपाय को अंधविश्वास के बजाय अपनी आस्था और परंपरा के रूप में अपनाएं। जय शनिदेव! 🙏 डिस्क्लेमर: उपरोक्त जानकारी धार्मिक मान्यताओं और प्रचलित पूजा-पद्धतियों पर आधारित है।
लक्ष्मी माता की पूजा कैसे करनी चाहिए?
लक्ष्मी माता की पूजा कैसे करनी चाहिए माता लक्ष्मी माता की पूजा श्रद्धा, स्वच्छता और सच्चे मन से करनी चाहिए। माना जाता है कि शुक्रवार और दीपावली के दिन उनकी पूजा विशेष फल देती है। पूजा करने की सरल विधि 1. सुबह स्नान करके साफ कपड़े पहनें। 2. पूजा स्थान को साफ करें और लाल या गुलाबी कपड़ा बिछाएँ। 3. माता लक्ष्मी की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें। 4. घी का दीपक और अगरबत्ती जलाएँ। 5. कमल का फूल, खीर, मिठाई और फल अर्पित करें। 6. “ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः” मंत्र का जाप करें। 7. लक्ष्मी चालीसा या श्री सूक्त का पाठ करें। 8. अंत में आरती करके परिवार में प्रसाद बाँटें। विशेष बातें घर में साफ-सफाई और शांति बनाए रखें। शाम के समय मुख्य द्वार पर दीपक जलाना शुभ माना जाता है। शुक्रवार को सफेद या गुलाबी वस्त्र पहनना भी शुभ माना जाता है। गरीबों और जरूरतमंदों को दान करने से माता लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं। छोटा मंत्र “ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः” इस मंत्र का 108 बार जाप करना शुभ माना जाता है।
चंद्रप्रभु मंदिर का इतिहास – History of chandraprabhu temple
भारत के महाराष्ट्र के पुणे में चंद्रप्रभु मंदिर स्थित है, जो जैन धर्म के आठवें तीर्थंकर चंद्रप्रभु को समर्पित है। पुणे में चंद्रप्रभु मंदिर के निर्माण की सही तारीख व्यापक रूप से प्रलेखित नहीं है। हालाँकि, ऐसा माना जाता है कि इसे कई दशक पहले स्थानीय जैन समुदाय की सेवा के लिए बनाया गया था। चंद्रप्रभु मंदिर जैनियों के लिए एक पवित्र पूजा स्थल माना जाता है, जो चंद्रप्रभु को श्रद्धांजलि देने और आध्यात्मिक सांत्वना पाने के लिए मंदिर में आते हैं। चंद्रप्रभु को जैन धर्म में एक दिव्य व्यक्ति के रूप में सम्मानित किया जाता है, और उनकी मूर्ति मंदिर का केंद्रीय केंद्र है। मंदिर में पारंपरिक जैन वास्तुशिल्प तत्व शामिल हैं, जिनमें जटिल नक्काशी, अलंकृत सजावट और शिखर शामिल हैं। यह संरचना आम तौर पर बेहतरीन शिल्प कौशल और शिल्प कौशल को प्रदर्शित करती है जो जैन कलात्मक परंपराओं को दर्शाती है। पुणे में चंद्रप्रभु मंदिर क्षेत्र और उसके बाहर रहने वाले जैनियों के लिए एक महत्वपूर्ण तीर्थस्थल के रूप में कार्य करता है। भक्त मंदिर में प्रार्थना करने, अनुष्ठान करने और जैन पुजारियों द्वारा आयोजित धार्मिक समारोहों में भाग लेने के लिए आते हैं। मंदिर पुणे की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत में योगदान देता है, जो शहर में जैन धर्म की उपस्थिति का प्रतिनिधित्व करता है। यह जैनियों के लिए भक्ति और श्रद्धा का प्रतीक है, जो आस्था के अनुयायियों के बीच समुदाय और आध्यात्मिक संबंध की भावना को बढ़ावा देता है। पूजा स्थल के रूप में सेवा करने के अलावा, चंद्रप्रभु मंदिर अक्सर सामुदायिक कार्यक्रमों, धार्मिक प्रवचनों और धर्मार्थ गतिविधियों की मेजबानी करता है, जिसका उद्देश्य करुणा, अहिंसा और दूसरों की सेवा के जैन मूल्यों को बढ़ावा देना है। पुणे में चंद्रप्रभु मंदिर जैनियों के दिलों में एक विशेष स्थान रखता है, जो उन्हें प्रार्थना, चिंतन और आध्यात्मिक विकास के लिए एक पवित्र स्थान प्रदान करता है। यह शहर में जैन धर्म की स्थायी विरासत के प्रमाण के रूप में खड़ा है और आने वाली पीढ़ियों के लिए आस्था और भक्ति के प्रतीक के रूप में कार्य करता है। चंद्रप्रभु मंदिर का इतिहास – History of chandraprabhu temple
म्हारे सिर पे है बाबा जी रो हाथ – Mhare sir par hai babaji ro hath
म्हारे सिर पर है, बाबा जी रो हाथ, खाटु वाले रो हाथ, कोई तो म्हारो कई करसी ॥ जे कोई म्हारे श्याम धणी ने, साँचे मन से ध्यावे काल कपाल भी साँवरिये के, भगता से घबरावे, जे कोई पकड़यो है, बाबा जी रो हाँथ कोई तो बाको कई करसी, म्हारे सिर पर हैं, बाबा जी रो हाथ, कोई तो म्हारो कई करसी ॥ जो आपे बिस्वास करे वो, खूंटी ताण के सोवे, बठे प्रवेश करे ना कोई, बाल ना बांको होवे, जाके मन में नहीं है विस्वास, बाको तो बाबो कई करसी, म्हारे सिर पर हैं, बाबा जी रो हाथ, कोई तो म्हारो कई करसी ॥ कलयुग को यो देव बड़ो, दुनिया में नाम कमायो, जद जद भीड़ पड़ी भगता पर, दौड्यो दौड्यो आयो, यो तो घट घट की जाणे सारी बात, कोई तो म्हारो कई करसी, म्हारे सिर पर हैं, बाबा जी रो हाथ, कोई तो म्हारो कई करसी ॥ म्हारे सिर पर है, बाबा जी रो हाथ, खाटु वाले रो हाथ, कोई तो म्हारो कई करसी ॥ म्हारे सिर पे है बाबा जी रो हाथ – Mhare sir par hai babaji ro hath
इस साल कब किया जाएगा होलिका दहन, जानिए तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि के बारे में – When will holika dahan be done this year, know about the date, auspicious time and method of worship
पंचांग के अनुसार, हर साल फाल्गुन मास की पूर्णिमा की रात होलिका दहन किया जाता है। होलिका दहन होली से एक दिन पहले किया जाता है। होली हिंदुओं का लोकप्रिय त्योहार है और इस दिन एक-दूसरे को रंग लगाए जाते हैं। वहीं, धार्मिक परिपाटी पर होलिका दहन का विशेष महत्व है। होलिका दहन को बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में देखा जाता है। माना जाता है कि एक समय में हिरण्यकश्यप नामक राजा रहा करता था जिसका एक पुत्र था प्रह्लाद। हिरण्यकश्यप भगवान विष्णु को पसंद नहीं करता था जबकि प्रह्लाद विष्णु भक्त था। ऐसे में हिरण्यकश्यप अपने पुत्र प्रह्लाद को मार देना चाहता था। हिरण्यकश्यप की एक बहन थी जिसका नाम होलिका था। होलिका को यह वरदान था कि उसे कोई आग जला नहीं सकती है। इसीलिए हिरण्यकश्यप ने होलिका से कहा कि वह प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ जाए। होलिका ने ऐसा ही किया। लेकिन, भगवान विष्णु की कृपा से होलिका तो जलकर राख हो गई पर प्रह्लाद बच गया। इसी दिन से हर साल होलिका जलाई जाती है। जानिए इस साल होलिका दहन किस समय किया जाएगा और होलिका दहन किस तरह करते हैं। * होलिका दहन की तिथि: पंचांग के अनुसार, इस साल होलिका दहन 24 मार्च, रविवार की रात किया जाएगा। होलिका दहन का शुभ मुहूर्त रात 11 बजकर 13 मिनट से शुरू होकर रात 12 बजकर 27 मिनट तक रहेगा। इस समयावधि में विधि अनुसार होलिका दहन किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त प्रदोष काल में भी होलिका दहन किया जाता है। होलिका दहन के अगले दिन रंगों वाली होली मनाई जाएगी। इस साल रंगों से 25 मार्च के दिन खेला जाएगा। कहते हैं होली के दिन लोग सभी बैर भुलाकर एकदूसरे को गले लगा लेते हैं। * होलिका दहन की पूजा विधि: मान्यतानुसार होलिका दहन के दिन सुबह स्नान पश्चात स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं। गली के किनारे या चौक पर होलिका दहन करने के लिए कुछ दिनों पहले से ही लकड़ियां इकट्ठी करके रखी जाती हैं। होलिका दहन के दिन तैयार की गई होलिका की दिशा में मुख करके बैठा जाता है और भगवान गणेश का स्मरण किया जाता है। होलिका दहन की पूजा सामग्री में फल, फूल, नारियल, रोली, गोबर के कंडे, अनाज, कच्चा सूत, चावल, गुलाल, बताशे, हल्दी, और लोटे में जल भरकर रखा जाता है। \’असृक्पाभयसंत्रस्तै: कृता त्वं होलि बालिशै:। अतस्त्वां पूजायिष्यामि भूते भूतिप्रदा भव\’ मंत्र का जाप करते हुए होलिका की परिक्रमा की जाती है। (Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है।) इस साल कब किया जाएगा होलिका दहन, जानिए तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि के बारे में – When will holika dahan be done this year, know about the date, auspicious time and method of worship
श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं – Shri banke bihari teri aarti gaun
श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं, हे गिरिधर तेरी आरती गाऊं । आरती गाऊं प्यारे आपको रिझाऊं, श्याम सुन्दर तेरी आरती गाऊं । ॥ श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं..॥ मोर मुकुट प्यारे शीश पे सोहे, प्यारी बंसी मेरो मन मोहे । देख छवि बलिहारी मैं जाऊं । ॥ श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं..॥ चरणों से निकली गंगा प्यारी, जिसने सारी दुनिया तारी । मैं उन चरणों के दर्शन पाऊं । ॥ श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं..॥ दास अनाथ के नाथ आप हो, दुःख सुख जीवन प्यारे साथ आप हो । हरी चरणों में शीश झुकाऊं । ॥ श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं..॥ श्री हरीदास के प्यारे तुम हो । मेरे मोहन जीवन धन हो। देख युगल छवि बलि बलि जाऊं । ॥ श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं..॥ श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं, हे गिरिधर तेरी आरती गाऊं । आरती गाऊं प्यारे आपको रिझाऊं, श्याम सुन्दर तेरी आरती गाऊं । श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं – Shri banke bihari teri aarti gaunv
जानिए गुप्त नवरात्रि के दौरान किन बातों का ध्यान रखना चाहिए और कौन से काम नहीं करने चाहिए। Know what things should be kept in mind during gupt navratri and what are the things which should not be done
हिंदू धर्म में वैसे तो दो नवरात्रि मुख्य होती हैं एक शारदीय नवरात्रि और एक चैत्र नवरात्रि लेकिन इन सब के बीच में गुप्त नवरात्रि भी पड़ती हैं, जिनका विशेष महत्व होता है और इस दौरान अगर हम कुछ काम करते हैं तो माता रानी का आशीर्वाद हम पर बना रहता है। वहीं, गुप्त नवरात्रि के दौरान कुछ काम करना निषेध भी होता है। इस साल की पहली गुप्त नवरात्रि की शुरुआत 10 फरवरी से हो चुकी है। ऐसे में आइए हम आपको बताते हैं कि इस दौरान आपको किन बातों का ध्यान रखना चाहिए और क्या ऐसी चीज हैं जो नहीं करनी चाहिए। * गुप्त नवरात्रि में भूलकर भी ना करें ये काम: 1. अगर आप चाहते हैं कि गुप्त नवरात्रि में आपके घर में माता रानी का आशीर्वाद बना रहे, तो नवरात्रि के दौरान कभी भी बाल नहीं कटवाने चाहिए और नाखून भी नहीं काटने चाहिए। 2. गुप्त नवरात्रि के दौरान घर में प्याज-लहसुन का सेवन करना वर्जित होता है। कहते हैं कि जिस घर में गुप्त नवरात्रि के दौरान प्याज और लहसुन का सेवन होता है, वहां पर राहु और केतु का बुरा साया पड़ता है। मान्यताओं के अनुसार, जिस जगह पर राहु और केतु का खून गिरा था वहीं से लहसुन और प्याज की उत्पत्ति हुई थी, इसलिए इसे नवरात्रि में नहीं खाना चाहिए। 3. जो लोग गुप्त नवरात्रि में 9 दिन का व्रत करते हैं उन्हें दिन के समय नहीं सोना चाहिए। ऐसा कहते हैं कि दिन के समय सोने से व्रत का पूरा फल हमें नहीं मिलता है। आप रात को जल्दी सोकर सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठे और नहा धोकर माता रानी की पूजा अर्चना करें। 4. नवरात्रि के दौरान केवल पूजा पाठ करने से ही नहीं बल्कि दूसरों का दिल दुखाने से भी हमें बचाना चाहिए। कहते हैं कि महिलाओं, बुजुर्ग और पशु पक्षियों को इस दौरान बिल्कुल भी परेशान नहीं करना चाहिए। ना ही किसी को मानसिक और शारीरिक रूप से चोट पहुंचाना चाहिए, ऐसा करने से माता रानी रुष्ट हो जाती हैं। (Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है।) जानिए गुप्त नवरात्रि के दौरान किन बातों का ध्यान रखना चाहिए और कौन से काम नहीं करने चाहिए। Know what things should be kept in mind during gupt navratri and what are the things which should not be done
शिवजी तेरे द्वार हम भी आयेंगे – Shivji tere dwar hum bhi ayenge
शिवजी तेरे द्वार हम भी आयेंगे गंगाजल से आपको हम नहलायेंगे जनम जनम का प्यासा ये मन तेरे शरण में ही आयेंगे हम हम दीवाने हो गये है आपके हर साँस में तेरे गुण गायेंगे बोलो बोलो बम बम तेरे मिट जाये गम दुःख दूर रहेंगे तुझसे जनम जनम शिवजी तेरे द्वार हम भी आयेंगे गंगाजल से आपको हम नहलायेंगे शिवजी तेरे द्वार हम भी आयेंगे – Shivji tere dwar hum bhi ayenge
गिरिराज जी की आरती – Giriraj ji ki aarti
ॐ जय जय जय श्री गिरिराज, जय जय श्री गिरिराज संकट में तुम रखो, निज भक्तन की लाज जय जय जय श्री गिरिराज, जय जय श्री गिरिराज इंद्रादिक सब देवा तुम्हरो ध्यान धरे। ऋषि मुनि जन यश गामें, ते भवसिंधु तरे॥ ॐ जय जय जय श्री गिरिराज सुन्दर रूप तुम्हरौ श्याम सिला सोहें। वन उपवन लखि लखिके ,भक्तन मन मोहें॥ ॐ जय जय जय श्री गिरिराज मध्य मानसी गंगा, कलि के मल हरनी। तापै दीप जलावे, उतरे बैतरनी॥ ॐ जय जय जय श्री गिरिराज नवल अप्सरा कुण्ड सुहाने, दाँये सुखकारी। बायेँ राधा -कृष्ण कुण्ड है, महापाप हारी॥ ॐ जय जय जय श्री गिरिराज तुम हो मुक्ति के दाता, कलयुग में स्वामी। दीनन के हो रक्षक , प्रभु अन्तर्यामी॥ ॐ जय जय जय श्री गिरिराज हम हैं शरण तुम्हरी, गिरवर गिरधारी। देवकीनंदन कृपा करो हे भक्तन हितकारी॥ ॐ जय जय जय श्री गिरिराज जो नर दे परिकम्मा , पूजन पाठ करें। गावें नित्य आरती , पुनि नहीं जनम धरें॥ ॐ जय जय जय श्री गिरिराज गिरिराज जी की आरती – Giriraj ji ki aarti
इस दिन रखा जाएगा जया एकादशी का व्रत और जानिए व्रत कथा के बारे में – Jaya ekadashi fast will be observed on this day and know about the story of the fast
हर साल 24 एकादशी पड़ती हैं और हर एकादशी का अपना अलग महत्व होता है। माघ के महीने में शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली एकादशी को जया एकादशी कहा जाता है। माना जाता है कि इस एकादशी पर विधि-विधान से भगवान विष्णु का पूजन किया जाए तो घर में सुख-समृद्धि आती है और पापों से मुक्ति मिल जाती है। इस साल पंचांग के अनुसार, जया एकादशी की तिथि 19 फरवरी की सुबह 8 बजकर 49 मिनट से शुरू होगी और इस तिथि का समापन 20 फरवरी की सुबह 9 बजकर 55 मिनट पर हो जाएगा। उदया तिथि को ध्यान में रखते हुए जया एकादशी का व्रत 20 फरवरी को रखा जाएगा और इसी दिन पूजा भी की जाएगी। * जया एकादशी की व्रत कथा: माना जाता है कि एक समय की बात है जब चिरकाल में स्वर्ग में स्थित नंदन वन में एक उत्सव का आयोजन किया जा रहा था। इस उत्सव में स्वर्ग के सभी देवगण, सिद्धगण और मुनि आदि उपस्थित हुए थे। इस समय नृत्य और गायन चल रहे थे जो गंधर्व और गंधर्व कन्याओं द्वारा किया जा रहा था। इसी समूह में एक नृतिका पुष्यवती की दृष्टि गंधर्व माल्यवान पर पड़ गई और वह उसके यौवन पर मोहित हो गई और अमर्यादित ढंग से नृत्य करने लगी। इस चलते माल्यवान ने बेसुरा गाना गाना शुरू कर दिया। इस घटना को देख-सुन सभी क्रोधित होने लगे। स्वर्ग नरेश इंद्र देव ने क्रोधित होकर दोनों को स्वर्गलोक से निष्कासित कर दिया। इसके साथ ही दोनों को शाप दिया कि दोनों को अधम योनि प्राप्त होगी और दोनों इसके बाद से ही हिमालय में पिशाच योनि में कष्टदारी जीवन व्यतीत करने लगे। सदियों बाद माघ मास की एकादशी अर्थात् जया एकादशी के दिन माल्यवान और पुष्यवती ने कुछ नहीं खाया और फल खाकर दिन व्यतीत किया। इसके बाद रातभर जागरण किया और श्रीहरि का स्मरण किया। इससे भगवान विष्णु प्रसन्न हुए और दोनों को प्रेत योनि से मुक्त कर दिया। इसके बाद से ही भगवान विष्णु को प्रसन्न करने और जीवन के कष्टों से मुक्ति पाने के लिए जया एकादशी का व्रत रखा जाता है। (Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है।) इस दिन रखा जाएगा जया एकादशी का व्रत और जानिए व्रत कथा के बारे में – Jaya ekadashi fast will be observed on this day and know about the story of the fast
श्री बम्लेश्वरी चालीसा – Shri bamleshwari chalisa
जय जय जय विमले महारानी , तेरी माया जग नहीं जानी । मस्तक रजत मुकुट हैं राजे , बाँये अखण्ड ज्योति बिराजे । । मंगल , शनि होत अभिषेका , आरति , पूजन भांति अनेका । केहरि साक्षात् रखवाला , अति मंजुल रमणीक शिवाला । उच्चभंग तव आसन राजे , पंचवटी सम चहुं दिश साजे । चैत , क्वार में जलती ज्योति , पूरण आश भक्त की होती । श्रद्धा से जो ज्योति जलाता , नशे पाप वांछित फल पाता । दर्शन जो कर गये तुम्हारे , हुए मुदित पाये सुख सारे । कह ली तेरी कीर्ति बखानी , तू है रिद्ध सिद्ध जग जानी । । दृग से प्रेम विन्दु टपकाती , लाज भक्त की सदा बचाती । न पूजा न अर्चन आता , निश दिन नाम तुम्हारे गाता । बस एक ध्यान तुम्हारे चरणा , होउं प्रसीद अनन्ता करुणा । जो जन राठ करे इक बारा , शत अष्ट जपे इक बारा । । तू ही शारदा , चण्डी , काली , दुर्गा , अम्बे , जग रखवाली । शिवा , तुमी , पुण्या , विमला , गौरी दृक् प्रकाशिनी कमला । । भूतेशा सर्व तीर्थमयी हो , वर्ण रूपिणी शास्त्रमयी हो । जन पूजिता व शुभा भारती , गुणमध्या तव करत आरती । अशुभवा हो भूत धारणी , सूक्ष्मा कल्पा व नारायणी । कृष्या पिंगला निरालसा हो , जन प्रिया सर्व ज्ञान प्रदा हो । नित्या नंदा कमला रानी , सूक्ष्मा सर्व गता महारानी । सदा जया गुणश्रया शान्ता , कामाक्षी निर्गुणा कान्ता । दम्या सुजया वरूपिणी , शास्त्रा दृश्या विंध्यवासिनी । तुम्ही जान्हवी देवा माता , पार्वती हो जगविख्याता । भूतेशा मात्रा शुभ्रा हो , इन्द्रा जेष्ठा व रौद्रा हो । तुम्ही चण्डिका जया दुरन्ता , दया दात्री तुम्ही दिगन्ता । । दुराशया दुर्जया कराली , तुम्ही कामिनी लोक निराली । । दर युक्ता दर हरा वनीशा , दृष्टि गोचरा तुम्ही मनीशा । सर्व अभीष्ट प्रदायनी अम्बे , दशदिक्ख्याता हो जगदम्बे । तुम्ही हो माता श्रुति पूजिता , दीन वत्सला देव वन्दिता । दयाश्रया कर्मज्ञान प्रदा हो , दुष्कृति हरता तुम्ही सदा हो । सरस्वती हो दुष्ट दाहिनी , जनप्रिया हो रोग नाशिनी । असुरहरा हो तुम्ही दिगम्बा , तू ही मोह माया हो जगदम्बा । देवरता हो देवमान्या , अम्बुज वासिनी देवधान्या । भूतात्मिका तुम्ही रूद्रानी , उमा माधवी हो ब्रम्हानी । गहूं मैं शरण परम गति पाऊँ , करहुं कृतार्थ जनम गुण गाऊँ । नित उठ पाठ करै नर जोई , ताकर पूर्ण मनोरथ होई । । हर विपदा में होत सहाई , अधम जानि नहि देव भुलाई । नौव दिवस तक करे उपासा , मन में रखें धैर्य विश्वासा । नवरात्रि में ज्योति जलाये , श्रद्धा से जो पाठ कराये । । मुदित होयगी निश्चित माता , हरण करेगी तीनों तापा । । । दोहा । । दम्या दुर्लभ रूपिणी , ज्ञान रूपा तपस्विनी । । निराकारा योगगम्या , नमोऽस्तुते विलासिनी । श्री बम्लेश्वरी चालीसा – Shri bamleshwari chalisa
जानिए मौनी अमावस्या के शुभ मुहूर्त और पूजा विधि के बारे में – Know about the auspicious time and worship method of mauni amavasya
हिन्दू धर्म में मौनी अमावस्या का विशेष महत्व है। इस दिन साधक मौन व्रत रखकर विष्णु भगवान की पूजा अर्चना करते हैं। इस दिन श्रद्धालु गंगा, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, सरस्वती और नर्मदा नदी जैसी पवित्र नदियों में स्नान करते हैं। ऐसी मान्यता है कि मौनी अमावस्या को स्नान-ध्यान कर भगवान विष्णु की पूजा करने से साधक को सौ यज्ञों के बराबर फल प्राप्त होता है। ऐसे में इसबार मौनी अमावस्या किस दिन मनाई जाएगी और इसकी पूजा विधि क्या है आइए जानते हैं। * मौनी अमावस्या शुभ मुहूर्त: इस साल माघ अमावस्या 09 फरवरी को सुबह 08 बजकर 02 मिनट पर शुरू होगी और अगले दिन 10 तारीख को 4 बजकर 28 मिनट पर समाप्त होगा। उदया तिथि 9 को है इसलिए मौनी अमावस्या इस दिन ही मनाई जाएगी। * शुभ योग: मौनी अमावस्या के दिन सर्वार्थ सिद्धि योग बन रहा है इस बार। यह योग 7 बजकर 5 मिनट से शुरू हो रहा है जो देर रात 11 बजकर 29 मिनट तक रहेगा। * मौनी अमावस्या पूजा विधि: – मौनी अमावस्या के दिन सबसे पहले भगवान विष्णु को प्रणाम करें। – इस दिन बोलने की मनाही होती है। इस दिन आप बहते जल में काला तिल प्रवाहित करें। – इस दिन पीपल के पेड़ में भी जल का अर्घ्य दें। – इस दिन विष्णु चालीसा और मंत्र का जाप करें। (Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है।) जानिए मौनी अमावस्या के शुभ मुहूर्त और पूजा विधि के बारे में – Know about the auspicious time and worship method of mauni amavasya