रविवार व्रत की कथ बहुत समय पहले एक नगर में एक बुढ़िया रहती थी। वह अत्यंत गरीब थी, लेकिन भगवान सूर्य की बहुत बड़ी भक्त थी। वह प्रत्येक रविवार को प्रातः स्नान करके अपने घर और आंगन को साफ करती, सूर्य देव को जल अर्पित करती और श्रद्धापूर्वक उनका व्रत रखती थी। उस बुढ़िया के पास एक गाय थी। वह गाय का गोबर बेचकर अपना जीवन चलाती थी। वह रविवार के दिन गाय के गोबर को घर में नहीं लगाती थी और उस दिन विशेष रूप से अपने घर को स्वच्छ रखती थी। उसी नगर में एक दूसरी स्त्री रहती थी। वह बुढ़िया को देखकर ईर्ष्या करती थी। उसने देखा कि बुढ़िया बहुत गरीब होने के बावजूद हर रविवार को बड़ी श्रद्धा से सूर्य भगवान की पूजा करती है और उसके घर में धीरे-धीरे सुख-शांति बनी रहती है। ईर्ष्या के कारण वह स्त्री बुढ़िया की गाय को अपने घर बांधने लगी, जिससे बुढ़िया के लिए रविवार के दिन घर की सफाई करना कठिन हो गया। बुढ़िया ने दुखी होकर सूर्य देव से प्रार्थना की— “हे सूर्य नारायण! मैं आपकी श्रद्धा से पूजा करती हूँ। यदि मेरी भक्ति सच्ची है तो मेरी सहायता कीजिए।” सूर्य देव उसकी सच्ची भक्ति से प्रसन्न हुए। उन्होंने उसकी गाय को ऐसा वरदान दिया कि उसके घर में समृद्धि और सुख आने लगा। बुढ़िया की गरीबी दूर होने लगी। यह देखकर वह ईर्ष्यालु स्त्री और भी परेशान हो गई। उसने बुढ़िया को नुकसान पहुँचाने का प्रयास किया, लेकिन सूर्य देव ने अपनी भक्त की रक्षा की। अंततः उस स्त्री को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने बुढ़िया से क्षमा मांगी और सूर्य देव की भक्ति करने लगी। इस कथा की मुख्य शिक्षा यह है कि सच्ची श्रद्धा, स्वच्छ मन और भगवान के प्रति विश्वास रखने वाले भक्त की रक्षा भगवान स्वयं करते हैं। रविवार के व्रत और सूर्य उपासना को परंपरा में आरोग्य, तेज, यश और समृद्धि की कामना से जोड़ा गया है। रविवार को सूर्य देव की पूजा कैसे करें? सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें। साफ कपड़े पहनें। तांबे के लोटे में जल लें। उसमें लाल फूल या अक्षत डाल सकते हैं। पूर्व दिशा की ओर मुख करके सूर्य देव को अर्घ्य दें। मन में सूर्य देव का स्मरण करें। “ॐ सूर्याय नमः” या “ॐ आदित्याय नमः” का जाप करें। रविवार की व्रत-कथा पढ़ें या सुनें। अंत में सूर्य देव की आरती करें। परंपरागत रूप से रविवार का व्रत एक समय भोजन या फलाहार के साथ किया जाता है; अलग-अलग परंपराओं में नियम कुछ भिन्न हो सकते हैं। 🌞 सूर्य देव से प्रार्थना “हे सूर्य नारायण भगवान, आप संसार को प्रकाश और जीवन देने वाले हैं। हमारे घर में सुख-शांति, आरोग्य और समृद्धि बनाए रखें। हमारे सभी कष्ट दूर करें और हमें सद्बुद्धि प्रदान करें। जय सूर्य नारायण देव!” एक विशेष बात: आज रविवार के साथ वराह जयंती भी है। भगवान विष्णु के वराह अवतार की कथा भी आज सुनना शुभ माना जाता है। अगर आप चाहें तो मैं आपको आज की वराह जयंती की पूरी कथा—भगवान विष्णु ने वराह रूप क्यों लिया, हिरण्याक्ष का वध कैसे हुआ, पृथ्वी को समुद्र से कैसे निकाला—पूरी कथा शुरू से अंत तक भी सुना सकता हूँ।आज 13 सितंबर 2026, रविवार है। रविवार का दिन मुख्य रूप से भगवान सूर्य नारायण (सूर्य देव) को समर्पित माना जाता है। आज का दिन विशेष भी है क्योंकि आज वराह जयंती भी मनाई जा रही है, जो भगवान विष्णु के वराह अवतार से संबंधित है। आपने “सारी कथा” पूछी है, इसलिए मैं आपको पहले रविवार व्रत और सूर्य देव की प्रसिद्ध लोक-परंपरागत कथा पूरी तरह सरल हिंदी में बता रहा हूँ। ☀️ रविवार व्रत की कथा बहुत समय पहले एक नगर में एक बुढ़िया रहती थी। वह अत्यंत गरीब थी, लेकिन भगवान सूर्य की बहुत बड़ी भक्त थी। वह प्रत्येक रविवार को प्रातः स्नान करके अपने घर और आंगन को साफ करती, सूर्य देव को जल अर्पित करती और श्रद्धापूर्वक उनका व्रत रखती थी। उस बुढ़िया के पास एक गाय थी। वह गाय का गोबर बेचकर अपना जीवन चलाती थी। वह रविवार के दिन गाय के गोबर को घर में नहीं लगाती थी और उस दिन विशेष रूप से अपने घर को स्वच्छ रखती थी। उसी नगर में एक दूसरी स्त्री रहती थी। वह बुढ़िया को देखकर ईर्ष्या करती थी। उसने देखा कि बुढ़िया बहुत गरीब होने के बावजूद हर रविवार को बड़ी श्रद्धा से सूर्य भगवान की पूजा करती है और उसके घर में धीरे-धीरे सुख-शांति बनी रहती है। ईर्ष्या के कारण वह स्त्री बुढ़िया की गाय को अपने घर बांधने लगी, जिससे बुढ़िया के लिए रविवार के दिन घर की सफाई करना कठिन हो गया। बुढ़िया ने दुखी होकर सूर्य देव से प्रार्थना की— “हे सूर्य नारायण! मैं आपकी श्रद्धा से पूजा करती हूँ। यदि मेरी भक्ति सच्ची है तो मेरी सहायता कीजिए।” सूर्य देव उसकी सच्ची भक्ति से प्रसन्न हुए। उन्होंने उसकी गाय को ऐसा वरदान दिया कि उसके घर में समृद्धि और सुख आने लगा। बुढ़िया की गरीबी दूर होने लगी। यह देखकर वह ईर्ष्यालु स्त्री और भी परेशान हो गई। उसने बुढ़िया को नुकसान पहुँचाने का प्रयास किया, लेकिन सूर्य देव ने अपनी भक्त की रक्षा की। अंततः उस स्त्री को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने बुढ़िया से क्षमा मांगी और सूर्य देव की भक्ति करने लगी। इस कथा की मुख्य शिक्षा यह है कि सच्ची श्रद्धा, स्वच्छ मन और भगवान के प्रति विश्वास रखने वाले भक्त की रक्षा भगवान स्वयं करते हैं। रविवार के व्रत और सूर्य उपासना को परंपरा में आरोग्य, तेज, यश और समृद्धि की कामना से जोड़ा गया है। रविवार को सूर्य देव की पूजा कैसे करें? सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें। साफ कपड़े पहनें। तांबे के लोटे में जल लें। उसमें लाल फूल या अक्षत डाल सकते हैं। पूर्व दिशा की ओर मुख करके सूर्य देव को अर्घ्य दें। मन में सूर्य देव का स्मरण करें। “ॐ सूर्याय नमः” या “ॐ आदित्याय नमः” का जाप करें। रविवार की व्रत-कथा पढ़ें या सुनें। अंत में सूर्य देव की आरती करें। परंपरागत रूप से रविवार का व्रत एक समय भोजन या फलाहार के साथ किया जाता है; अलग-अलग
भगवान विष्णु जी — पालनहार, करुणा और धर्म के रक्षक
🪷 भगवान विष्णु जी — पालनहार, करुणा और धर्म के रक्षक 🙏🕉️ सनातन धर्म में भगवान विष्णु जी को सृष्टि के पालनकर्ता के रूप में पूजा जाता है। भगवान विष्णु जी का स्वरूप शांति, करुणा, धर्म और सत्य का प्रतीक माना जाता है। उनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म सुशोभित होते हैं, जो धर्म और सत्य की शक्ति का संदेश देते हैं। 🪷✨ मान्यता है कि जब-जब संसार में अधर्म बढ़ता है और धर्म की हानि होती है, तब भगवान विष्णु विभिन्न अवतारों के माध्यम से धर्म की स्थापना और भक्तों की रक्षा करते हैं। श्री राम और श्री कृष्ण उनके प्रमुख अवतारों में माने जाते हैं। 🙏 🌸 भगवान विष्णु जी से प्रार्थना: हे नारायण, अपने भक्तों पर अपनी कृपा बनाए रखें। हमारे जीवन से सभी चिंताएं और नकारात्मकता दूर करें। हमारे परिवार में सुख, शांति और समृद्धि प्रदान करें तथा हमें सत्य, धर्म और सदाचार के मार्ग पर चलने की शक्ति दें। 🪷 जो व्यक्ति श्रद्धा और विश्वास के साथ भगवान विष्णु जी का स्मरण करता है, उसके मन को शांति और जीवन को सकारात्मक दिशा मिलती है। 🙏 ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🪷 जय श्री हरि विष्णु 🚩 जय श्री राम 🙏 जय श्री कृष्ण भगवान विष्णु जी की कृपा आप और आपके परिवार पर सदैव बनी रहे। 🌸🪷 #VishnuJi #LordVishnu #BhagwanVishnu #Narayan #ShriHari #VishnuBhakti #OmNamoBhagavateVasudevaya #SanatanDharma #HinduDharma #ShriRam #ShriKrishna #Bhakti #VishnuBlessings
म्हारे सिर पे है बाबा जी रो हाथ – Mhare sir par hai babaji ro hath
म्हारे सिर पर है, बाबा जी रो हाथ, खाटु वाले रो हाथ, कोई तो म्हारो कई करसी ॥ जे कोई म्हारे श्याम धणी ने, साँचे मन से ध्यावे काल कपाल भी साँवरिये के, भगता से घबरावे, जे कोई पकड़यो है, बाबा जी रो हाँथ कोई तो बाको कई करसी, म्हारे सिर पर हैं, बाबा जी रो हाथ, कोई तो म्हारो कई करसी ॥ जो आपे बिस्वास करे वो, खूंटी ताण के सोवे, बठे प्रवेश करे ना कोई, बाल ना बांको होवे, जाके मन में नहीं है विस्वास, बाको तो बाबो कई करसी, म्हारे सिर पर हैं, बाबा जी रो हाथ, कोई तो म्हारो कई करसी ॥ कलयुग को यो देव बड़ो, दुनिया में नाम कमायो, जद जद भीड़ पड़ी भगता पर, दौड्यो दौड्यो आयो, यो तो घट घट की जाणे सारी बात, कोई तो म्हारो कई करसी, म्हारे सिर पर हैं, बाबा जी रो हाथ, कोई तो म्हारो कई करसी ॥ म्हारे सिर पर है, बाबा जी रो हाथ, खाटु वाले रो हाथ, कोई तो म्हारो कई करसी ॥ म्हारे सिर पे है बाबा जी रो हाथ – Mhare sir par hai babaji ro hath
जानिए रुद्राक्ष का रुद्र से क्या संबंध है, इसे यह नाम क्यों मिला और इससे जुड़ी कहानी क्या है। Know the relation of rudraksha with rudra, why it got this name and the story related to it
शिव भक्त भगवान शंकर को अत्यंत प्रिय रुद्राक्ष जरूर धारण करते है। मान्यता है कि भगवान शिव की शक्तियां रुद्राक्ष में समाहित होती हैं। रुद्राक्ष का संबंध भगवान शंकर से माना जाता है। आइए जानते हैं रुद्राक्ष की उत्पत्ति और इसके नामकरण की कथा कैसे पड़ा रुद्राक्ष नाम। * क्या है रुद्राक्ष का अर्थ: रुद्राक्ष में दो शब्द हैं रुद्र और अक्ष। इसमें रुद्र भगवान शंकर का नाम है और और अक्ष का अर्थ है नेत्र। रुद्राक्ष का अर्थ भगवान शंकर के नेत्र। * रुद्राक्ष की उत्पत्ति कथा: रुद्राक्ष के उत्पन्न होने की कहानी भगवान शिव से जुड़ी है। मान्यता है कि भगवान शंकर के नेत्रों से निकलने वाले आंसुओं से रुद्राक्ष उत्पन्न हुआ है, इसीलिए इसका नाम रुद्राक्ष पड़ा है। पौरणिक कथा के अनुसार त्रिपुरासुर नामक राक्षस के पास कई दैवीय शक्ति थी जिसका उसे बहुत घंमड था। वह ऋषि मुनियों से लेकर देवताओं को तंग करता था। परेशान होकर सभी देव ब्रह्मा, विष्णु के साथ भगवान शिव के पास पहुंचे, और उनसे त्रिपुरासुर से रक्षा करने की प्रार्थना करने लगे। यह सुनकर भगवान शंकर ध्यान में चले गए। जब उन्होंने अपनी आंखें खोली तो उनके नेत्रों में आंसू थे, ये आंसू जहां-जहां गिरे वहां रुद्राक्ष के पेड़ उग आए। * एक तरह का फल: रुद्राक्ष एक तरह का सूखा फल होता है। इसे इसमें पाए जाने वाले मुख के अनुसार अलग-अलग श्रेणियों में रखा जाता है। जाप के लिए 108 मुखी रुद्राक्ष का उपयोग कया जाता है। * तीनों देव की कृपा: रुद्राक्ष धारण करने वालों को ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देव की कृपा प्राप्त होती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार रुद्राक्ष को शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा, अमावस्या या एकादशी की तिथि को धारण करना चाहिए। (Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है।) जानिए रुद्राक्ष का रुद्र से क्या संबंध है, इसे यह नाम क्यों मिला और इससे जुड़ी कहानी क्या है। Know the relation of rudraksha with rudra, why it got this name and the story related to it
महाशिवरात्रि पर भगवान शिव को उनके पसंदीदा फूल चढ़ाएं, प्रसन्न होंगे महादेव – Offer your favorite flowers to lord shiva on mahashivratri, Mahadev will be happy
ब्रह्मांड के प्रथम तत्व कहे जाने वाले भगवान शिव कण कण में व्याप्त हैं। शिव अमर हैं और अविनाशी भी हैं। देवों के देव कहलाने वाले भगवान शिव ही सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति एवं संहार के अधिपति माने गए हैं। फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है और शास्त्रों में कहा गया है कि इस दिन शिव और मां पार्वती का गठबंधन हुआ था। इस दिन लोग सच्चे मन से भोलेनाथ और मां पार्वती की पूजा करते हैं। भगवान शिव भोले भंडारी हैं, वो भक्तों से बहुत जल्दी प्रसन्न होते हैं। इस बार महाशिवरात्रि पर भगवान शिव की पूजा करते समय आप भोलेनाथ के प्रिय फूलों को अर्पित करेंगे तो भोलेनाथ जल्दी प्रसन्न होकर आपको आशीर्वाद जरूर देंगे। चलिए जानते हैं कि भगवान शंकर को कौन कौन से फूल पसंद हैं। * भगवान शिव को पसंद हैं ये फूल, पूजा में करें इस्तेमाल: – भगवान शिव को पांच तरह के फूल पसंद हैं और इनको पंच पुष्प कहा गया है। ऐसे में इस महाशिवरात्रि पर शिवलिंग की पूजा करते समय लोटे में जल लेकर और दूसरे हाथ में उनके पसंदीदा फूल लेकर पूजा करेंगे तो भोलेनाथ आपके घर परिवार पर कृपा बरसाएंगे। भगवान शिव को कनेर का फूल पसंद है। कनेर का फूल तीन रंगों में आता है। लाल, पीला और सफेद. भक्त सोमवार के व्रत, सावन के व्रत और प्रदोष व्रत में इस फूल को भगवान शंकर की पूजा में इस्तेमाल करते हैं। – धतूरे का फूल भगवान शिव को बेहद प्रिय है। कहा जाता है कि समुद्र मंथन के समय इस फूल की उत्पत्ति भगवान शिव की छाती से हुई थी जब वो विषपान कर रहे थे। इसलिए कहा जाता है कि शिवलिंग पर धतूरे के फूल को अर्पित करने से मन में विष रूपी ईर्ष्या और द्वेष समाप्त हो जाते हैं। – भोलेनाथ को मदार का फूल बहुत प्यारा है। ये फूल नीले और सफेद रंग में खिलता है। इसे आंकड़े का फूल और आक का फूल भी कहते हैं। शिव की पूजा के समय सफेद मदार के फूल का प्रयोग किया जाता है। कहते हैं कि पूजा के समय इस फूल को चढ़ाया जाए तो भगवान शिव मोक्ष का वरदान देते हैं। – शमी का फूल भी भोले भंडारी को बहुत पसंद है। ये फूल पीले और गुलाबी रंग में आता है। अक्सर लोगों को शिव की पूजा के लिए घर में ही शमी का पेड़ लगाते हुए देखा जाता है। इस फूल को अर्पित करने से महादेव जल्दी प्रसन्न होते हैं। – भगवान शिव को सुगंधित पारिजात के फूल भी काफी प्रिय हैं। इसे हरसिंगार के फूल के नाम से भी जाना जाता है और ये दिखने में बहुत ही खूबसूरत हैं। कहते हैं कि धरती पर पहले ये पेड़ नहीं था और भगवान कृष्ण इसे स्वर्ग से धरती पर लाए थे। महाशिवरात्रि पर भगवान शिव को उनके पसंदीदा फूल चढ़ाएं, प्रसन्न होंगे महादेव – Offer your favorite flowers to lord shiva on mahashivratri, Mahadev will be happy
उड़ाऊ पुत्र के दृष्टान्त की कहानी – Story of parable of the prodigal son
उड़ाऊ पुत्र का दृष्टांत यीशु द्वारा बताए गए सबसे प्रसिद्ध और मार्मिक दृष्टांतों में से एक है, जो ल्यूक के सुसमाचार (अध्याय 15, छंद 11-32) में दर्ज है। यह एक ऐसी कहानी है जो पश्चाताप, बिना शर्त प्यार और क्षमा के विषयों को दर्शाती है। कहानी शुरू होती है एक ऐसे आदमी से जिसके दो बेटे हैं। छोटा बेटा अपने पिता से संपत्ति में अपना हिस्सा मांगता है, जिसे पिता दे देता है। पिता के जीवित रहते हुए उनकी विरासत मांगने का यह कृत्य अपमानजनक और असामान्य दोनों है, क्योंकि विरासत आमतौर पर माता-पिता की मृत्यु के बाद दी जाती थी। अपना हिस्सा प्राप्त करने के बाद, छोटा बेटा एक दूर देश की यात्रा करता है, जहाँ वह लापरवाह जीवन में अपनी संपत्ति बर्बाद कर देता है। उनके जीवन का यह चरण परिवार और जिम्मेदार जीवन से विमुख होने का प्रतिनिधित्व करता है। आख़िरकार, देश में भयंकर अकाल पड़ता है, और बेटा खुद को सख्त ज़रूरत में पाता है। वह सूअरों को खाना खिलाने का काम करता है, जो यहूदी दर्शकों के लिए अत्यधिक अस्वच्छता और हताशा की स्थिति का प्रतीक है। इस निराशाजनक स्थिति में, वह होश में आता है और याद करता है कि कैसे उसके पिता के नौकरों के पास भी अतिरिक्त भोजन था। छोटा बेटा अपने पिता के पास लौटने का फैसला करता है, माफी मांगने की योजना बनाता है और अपने साथ बेटे की तरह नहीं बल्कि किराए के नौकर की तरह व्यवहार करने की योजना बनाता है। उनकी वापसी पश्चाताप और विनम्रता का कार्य है, अपनी गलतियों को स्वीकार करना है। जैसे ही वह अपने घर के पास आता है, उसके पिता उसे दूर से देखते हैं। करुणा से भरकर, पिता दौड़कर अपने बेटे के पास जाता है, उसे गले लगाता है और चूमता है। बेटा अपने पापों और बेटा कहलाने की अयोग्यता को स्वीकार करता है। क्रोध या अस्वीकृति के बजाय, पिता अपने सेवकों को अपने बेटे के लिए सबसे अच्छे वस्त्र, एक अंगूठी और सैंडल लाने और उसकी वापसी का जश्न मनाने के लिए एक दावत तैयार करने का आदेश देता है। यह प्रतिक्रिया बिना शर्त प्यार और क्षमा का प्रतीक है। इस बीच, खेतों में काम कर रहे बड़े बेटे को जब अपने छोटे भाई की दावत के बारे में पता चला तो वह क्रोधित हो गया। उसने उत्सव में शामिल होने से इंकार कर दिया, यह महसूस करते हुए कि यह अनुचित है कि उसकी वफादार सेवा को मान्यता नहीं दी गई जबकि उसके भाई की लापरवाही का जश्न मनाया गया। पिता समझाते हैं कि उनके पास जो कुछ भी है वह बड़े बेटे का है, लेकिन उन्हें जश्न मनाना चाहिए और खुश होना चाहिए क्योंकि छोटा भाई खो गया था और अब मिल गया है। उड़ाऊ पुत्र का दृष्टांत अपने संदेश में समृद्ध है और इसकी विभिन्न तरीकों से व्याख्या की गई है। इसे अक्सर पश्चाताप करने वाले पापियों के प्रति ईश्वर की क्षमा को दर्शाने के रूप में देखा जाता है। पिता का बिना शर्त प्यार और माफ करने की तत्परता भगवान की कृपा और दया को दर्शाती है। बड़े भाई का रवैया ईर्ष्या और करुणा की कमी के प्रति मानवीय प्रवृत्ति को दर्शाता है। कुल मिलाकर, कहानी पश्चाताप की प्रकृति और प्रेमपूर्ण और क्षमाशील भावना के महत्व के बारे में सिखाती है। उड़ाऊ पुत्र के दृष्टान्त की कहानी – Story of parable of the prodigal son
इब्राहीम और सारा की कहानी – The story of abraham and sarah
इब्राहीम और सारा की कहानी यहूदी, ईसाई और इस्लामी परंपराओं में एक मूलभूत कथा है। यह मुख्य रूप से हिब्रू बाइबिल में उत्पत्ति की पुस्तक और ईसाई बाइबिल के पुराने नियम में पाया जाता है। इब्राहीम, मूल रूप से अब्राम, और उसकी पत्नी सारै (बाद में सारा) मेसोपोटामिया में कसदियों के उर से थे। परमेश्वर ने अब्राम को अपनी मातृभूमि छोड़ने और उस देश में जाने के लिए बुलाया जो परमेश्वर उसे दिखाएगा, और उसे एक महान राष्ट्र बनाने, उसे आशीर्वाद देने और उसका नाम महान बनाने का वादा करेगा (उत्पत्ति 12:1-3)। अब्राम, सारै और उनका भतीजा लूत परमेश्वर के निर्देशानुसार कनान चले गए। उनकी अधिक उम्र और सारै के बंजर होने के बावजूद, परमेश्वर ने उन्हें एक बच्चा देने का वादा किया जिसके माध्यम से वह अपनी वाचा स्थापित करेगा। उनके संदेह और अधीरता के कारण, सारै ने अपनी मिस्र की दासी हाजिरा को अब्राम को दे दिया, और उससे एक पुत्र इश्माएल उत्पन्न हुआ (उत्पत्ति 16)। परमेश्वर ने अब्राम के साथ एक वाचा स्थापित की, और इसे खतना के संस्कार के साथ दर्शाया। परमेश्वर ने अब्राम का नाम बदलकर इब्राहीम रख दिया, जिसका अर्थ है \”कई राष्ट्रों का पिता,\” और सारै का नाम बदलकर सारा रख दिया, जिसका अर्थ है \”राजकुमारी\” (उत्पत्ति 17)। परमेश्वर ने इब्राहीम और सारा से विशेष रूप से सारा के माध्यम से एक पुत्र के अपने वादे की पुष्टि की। तीन आगंतुक (स्वर्गदूत) इब्राहीम के पास आए और भविष्यवाणी की कि सारा एक वर्ष के भीतर एक पुत्र को जन्म देगी (उत्पत्ति 18)। सारा अपनी वृद्धावस्था के कारण इस भविष्यवाणी पर हँसी। इसहाक, जिसके नाम का अर्थ है \”वह हंसता है,\” भगवान के वादे के अनुसार इब्राहीम और सारा से पैदा हुआ था (उत्पत्ति 21)। विश्वास की एक गहन परीक्षा में, परमेश्वर ने इब्राहीम को इसहाक का बलिदान देने की आज्ञा दी। इब्राहीम आज्ञाकारी रूप से परमेश्वर की आज्ञा को पूरा करने के लिए गया, लेकिन अंतिम क्षण में एक स्वर्गदूत ने उसे रोक दिया, और स्थानापन्न बलिदान के रूप में एक मेढ़ा प्रदान किया गया (उत्पत्ति 22)। सारा की मृत्यु 127 वर्ष की आयु में हेब्रोन में हुई (उत्पत्ति 23)। इब्राहीम धर्म में सारा को कुलमाता के रूप में मनाया जाता है। उनकी कहानी विश्वास, धैर्य और दिव्य वादों की पूर्ति में से एक है। अब्राहम और सारा की कहानी को अक्सर ईश्वर के प्रति विश्वास और आज्ञाकारिता के उदाहरण के रूप में उद्धृत किया जाता है। उनकी कहानी यहूदी धर्म और ईसाई धर्म में भगवान की वाचा की समझ के लिए केंद्रीय है और इस्लामी परंपराओं में महत्वपूर्ण निहितार्थ है। अब्राहम और सारा की कहानी विश्वास, ईश्वरीय वादे और विश्वास की शक्ति की कहानी है। उनका जीवन यहूदी लोगों की उत्पत्ति की कथा का एक अभिन्न अंग है और सभी इब्राहीम धर्मों में महत्वपूर्ण आध्यात्मिक शिक्षा प्रदान करता है। इब्राहीम और सारा की कहानी – The story of abraham and sarah
नूर-अस्ताना मस्जिद का इतिहास – History of nur-astana mosque
नूर-अस्ताना मस्जिद, जिसे हज़रत सुल्तान मस्जिद के नाम से भी जाना जाता है, कजाकिस्तान की राजधानी नूर-सुल्तान (जिसे पहले अस्ताना के नाम से जाना जाता था) में स्थित एक प्रमुख इस्लामी स्थल है। नूर-अस्ताना मस्जिद का निर्माण कजाकिस्तान के राष्ट्रपति नूरसुल्तान नज़रबायेव की पहल पर किया गया था, ताकि राजधानी में मुस्लिम समुदाय के लिए एक महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र के रूप में काम किया जा सके। निर्माण 2009 में शुरू हुआ, और मस्जिद का आधिकारिक तौर पर उद्घाटन किया गया और 6 जुलाई 2012 को जनता के लिए खोल दिया गया। मस्जिद अपने आकर्षक वास्तुशिल्प डिजाइन के लिए प्रसिद्ध है, जिसमें पारंपरिक इस्लामी वास्तुशिल्प तत्वों को आधुनिक सुविधाओं के साथ मिश्रित किया गया है। मस्जिद का मुख्य गुंबद जटिल ज्यामितीय पैटर्न और सुलेख से सजाया गया है, जबकि बाहरी हिस्से में सफेद संगमरमर और नीली मोज़ेक टाइलों का संयोजन है, जो कज़ाख ध्वज के रंगों का प्रतीक है। नूर-अस्ताना मस्जिद मध्य एशिया की सबसे बड़ी मस्जिदों में से एक है, जो एक समय में 10,000 उपासकों को समायोजित करने में सक्षम है। मुख्य प्रार्थना कक्ष के अलावा, मस्जिद परिसर में एक पुस्तकालय, इस्लामी शैक्षिक केंद्र, सम्मेलन कक्ष और प्रशासनिक कार्यालय जैसी सुविधाएं शामिल हैं। नूर-अस्ताना मस्जिद का निर्माण धार्मिक सहिष्णुता, सांस्कृतिक विविधता और इस्लामी विरासत को बढ़ावा देने के लिए कजाकिस्तान की प्रतिबद्धता का प्रतीक है। यह देश की मुस्लिम आबादी के बीच एकता और एकजुटता के प्रतीक के रूप में कार्य करता है और इस्लामी परंपराओं और मूल्यों के संरक्षण और प्रचार में योगदान देता है। अपने उद्घाटन के बाद से, नूर-अस्ताना मस्जिद ने स्थानीय मुस्लिम समुदाय के धार्मिक और आध्यात्मिक जीवन में एक केंद्रीय भूमिका निभाई है। यह पूजा, प्रार्थना और धार्मिक शिक्षा के स्थान के रूप में कार्य करता है, दैनिक प्रार्थनाओं, शुक्रवार के उपदेशों, कुरान की कक्षाओं और विभिन्न धार्मिक समारोहों और कार्यक्रमों की मेजबानी करता है। अपने धार्मिक महत्व के अलावा, नूर-अस्ताना मस्जिद नूर-सुल्तान में एक लोकप्रिय पर्यटक आकर्षण बन गई है, जो कजाकिस्तान और विदेशों दोनों से पर्यटकों को आकर्षित करती है। पर्यटक मस्जिद की स्थापत्य सुंदरता, सांस्कृतिक विरासत और इस्लामी परंपराओं और रीति-रिवाजों के बारे में जानने के अवसर से आकर्षित होते हैं। नूर-अस्ताना मस्जिद कजाकिस्तान की समृद्ध इस्लामी विरासत, वास्तुशिल्प नवाचार और धार्मिक स्वतंत्रता और सहिष्णुता के प्रति प्रतिबद्धता के प्रतीक के रूप में खड़ी है। यह स्थानीय समुदाय के लिए गौरव का स्रोत और देश की सांस्कृतिक पहचान और एकता का प्रतीक है। नूर-अस्ताना मस्जिद का इतिहास – History of nur-astana mosque
जानिए महाशिवरात्रि की पूजा के दौरान शिवलिंग पर क्या चढ़ाना चाहिए। Know what should be offered to shivalinga during the worship of mahashivratri
हिंदू धर्म में भगवान शिव की पूजा का विशेष महत्व है। शिव भक्त फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को महाशिवरात्रि का व्रत रखकर भगवान शंकर और माता पार्वती की विधि-विधान से पूजा करते है। मान्यता है महाशिवरात्रि के दिन व्रत रखकर भगवान शिव और माता पार्वती की सच्चे मन से पूजा करने से हर मनोकामना पूरी हो जाती है। जीवन में कोई कष्ट नही रहता है। इस व्रत को करने से मनचाहे जीवनसाथी की प्राप्ति होती है। महाशिवरात्रि के दिन कुछ विशेष चीजें चढ़ाने से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है। * दूध से अभिषेक: महाशिवरात्रि की पूजा के समय शिवलिंग का दूध से अभिषेक करना अत्यंत फलदायी माना गया है। शिवलिंग का दूध से रुद्राभिषेक करने से भक्तों की हर मनोकामना पूरी हो जाती है। * जल चढ़ाना: महाशिवरात्रि की पूजा के समय शिवलिंग को जल चढ़ाना भी अत्यंत शुभ होता है। ऊं नम: शिवाय: का जाप करते हुए शिवलिंग को जल चढ़ाने से मन को शांति मिलती है और मानसिक परेशानियां दूर हो जाती है। * बेलपत्र: भगवान शंकर को तीन पत्तियों वाला बेलपत्र अत्यंत प्रिय है। शिवरात्रि के दिन पूजा के समय शिवलिंग पर तीन पत्तियों वाले बेलपत्र चढ़ाने चाहिए। इन्हें 11, 21 की तरह शुभ अंकों में चढ़ाने से लाभ होगा। * लाल केसर: महाशिवरात्रि की पूजा के समय शिवलिंग को लाल केसर से तिलक लगाएं। इससे जीवन में सौम्यता आती है और मांगलिक दोष दूर हो जाते हैं। * शहद: महाशिवरात्रि की पूजा के समय शिवलिंग पर शहद का लेप करने से वाणि को मधुरता मिलती है। इससे जीवन में राग और द्वेष कम होते हैं। (Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है।) जानिए महाशिवरात्रि की पूजा के दौरान शिवलिंग पर क्या चढ़ाना चाहिए। Know what should be offered to shivling during the worship of mahashivratri
पॉल की अद्भुत यात्राओं की कहानी – The story of paul amazing travels
पॉल की अद्भुत यात्राओं की कहानी, जिसे अक्सर उनकी मिशनरी यात्राएँ कहा जाता है, नए नियम का एक केंद्रीय हिस्सा है, विशेष रूप से प्रेरितों के कार्य। पॉल, जिसे मूल रूप से टारसस के शाऊल के नाम से जाना जाता था, एक जोशीला यहूदी था जिसने शुरू में ईसाइयों पर अत्याचार किया लेकिन नाटकीय रूप से ईसाई धर्म में परिवर्तित हो गया। अपने रूपांतरण के बाद, पॉल ईसाई धर्म के सबसे प्रभावशाली और समर्पित प्रेरितों में से एक बन गए, जिन्होंने यीशु मसीह के संदेश को फैलाने के लिए रोमन साम्राज्य में कई मिशनरी यात्राएँ कीं। बरनबास और जॉन मार्क के साथ, पॉल सीरिया के अन्ताकिया से निकले और साइप्रस, फिर दक्षिणी एशिया माइनर (वर्तमान तुर्की) की यात्रा की। उन्होंने सलामिस, पाफोस, पिसिडियन एंटिओक, इकोनियम, लिस्ट्रा और डर्बे जैसे शहरों का दौरा किया। इस यात्रा के दौरान, पॉल और उसके साथियों को यहूदी विरोध और मूर्तिपूजक शत्रुता का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने कई लोगों का धर्म परिवर्तन भी कराया। पॉल, इस बार सिलास के साथ, अन्ताकिया से दूसरी यात्रा पर निकला। उन्होंने एशिया माइनर के चर्चों का दोबारा दौरा किया और फिर पॉल की मदद के लिए गुहार लगाने वाले एक व्यक्ति के दर्शन (\”मैसेडोनियन कॉल\”) के जवाब में मैसेडोनिया की यात्रा की। यह यात्रा पॉल को फिलिप्पी ले गई, जहां उसे और सीलास को कैद कर लिया गया और चमत्कारिक ढंग से रिहा कर दिया गया, थिस्सलुनीके, बेरिया, एथेंस और कोरिंथ। इसी यात्रा के दौरान पॉल ने अपने कुछ पत्र भी लिखे। पॉल फिर से अन्ताकिया से चला गया और एशिया माइनर और मैसेडोनिया के चर्चों में फिर से गया। उन्होंने इफिसस में काफी समय बिताया, जहां उनके उपदेश के कारण चांदी के कारीगरों ने दंगा भड़का दिया, जिनकी आजीविका उनके संदेश से खतरे में पड़ गई थी। इस यात्रा में ग्रीस की यात्रा और कोरिंथ में एक विस्तारित प्रवास भी शामिल था। इस काल में और भी पत्रियाँ लिखी गईं। यरूशलेम में गिरफ्तार होने और कैसरिया में दो साल तक कैद रहने के बाद, पॉल ने अपील की कि उसका मामला रोम में सम्राट नीरो द्वारा सुना जाए, जैसा कि एक रोमन नागरिक के रूप में उसका अधिकार था। रोम की यात्रा कठिनाइयों से भरी थी, जिसमें माल्टा द्वीप पर जहाज़ की दुर्घटना भी शामिल थी। पॉल अंततः रोम पहुँचे, जहाँ उन्हें घर में नज़रबंद कर दिया गया। रोम में रहते हुए, पॉल ने प्रचार करना और लिखना जारी रखा। पॉल की यात्राएँ कठिनाइयों से भरी थीं, जिनमें पिटाई, कारावास, जहाज़ की तबाही और लगातार विरोध शामिल था। फिर भी, उनका मिशनरी कार्य पूरे रोमन साम्राज्य में ईसाई धर्म के प्रसार में अविश्वसनीय रूप से प्रभावशाली था। प्रारंभिक ईसाई समुदायों के लिए उनके पत्र (पत्र) नए नियम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और ईसाई धर्मशास्त्र और शिक्षाओं के केंद्र में बने हुए हैं। पॉल की यात्राएँ उनकी प्रतिबद्धता, लचीलेपन और उनके संदेश की परिवर्तनकारी शक्ति को दर्शाती हैं। पॉल की अद्भुत यात्राओं की कहानी – The story of paul amazing travels
अलची मठ का इतिहास – History of alchi monastery
अलची मठ, जिसे अलची गोम्पा के नाम से भी जाना जाता है, भारत के लद्दाख में लेह जिले के अलची गांव में स्थित एक बौद्ध मठ है। अलची मठ लद्दाख के सबसे पुराने और सबसे महत्वपूर्ण मठ परिसरों में से एक है। ऐसा माना जाता है कि इसकी स्थापना 10वीं शताब्दी में महान तिब्बती बौद्ध विद्वान और अनुवादक रिनचेन ज़ंगपो ने की थी, जिन्हें लोत्सावा रिनचेन ज़ंगपो के नाम से भी जाना जाता है। रिनचेन ज़ंगपो ने क्षेत्र में बौद्ध धर्म के प्रसार और कई मठों की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। अलची मठ अपने उत्कृष्ट भित्तिचित्रों, मूर्तियों और भित्तिचित्रों के लिए प्रसिद्ध है, जो इसकी दीवारों और आंतरिक सज्जा को सुशोभित करते हैं। ये कलाकृतियाँ भारतीय और तिब्बती कलात्मक शैलियों का एक अनूठा मिश्रण दर्शाती हैं और विभिन्न बौद्ध देवताओं, मंडलों और धार्मिक कथाओं को दर्शाती हैं। मठ की कला को मध्ययुगीन काल से भारत-तिब्बती बौद्ध कला के बेहतरीन जीवित उदाहरणों में से एक माना जाता है। अलची मठ में कई मंदिर भवन शामिल हैं, जिनमें से सबसे प्रमुख चोस्कोर मंदिर परिसर है। इस परिसर में चार मुख्य मंदिर शामिल हैं: अलची चोस्कोर (असेंबली हॉल), सुमत्सेग, मंजुश्री मंदिर, और लोत्सावा ल्हा-खांग (अनुवादक का मंदिर)। प्रत्येक मंदिर विभिन्न बौद्ध देवताओं को समर्पित है और इसमें विस्तृत कलाकृति और वास्तुशिल्प विवरण हैं। अपने पूरे इतिहास में, अलची मठ ने लद्दाख में बौद्ध अनुयायियों के लिए एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक और धार्मिक केंद्र के रूप में कार्य किया है। यह पूजा, ध्यान और शिक्षा का स्थान रहा है, जो दूर-दूर से भिक्षुओं, विद्वानों और तीर्थयात्रियों को आकर्षित करता है। सदियों से, अलची मठ में गिरावट और बहाली का दौर आया है। हाल के वर्षों में इसकी प्राचीन संरचनाओं और कलाकृतियों को संरक्षित और संरक्षित करने के प्रयास किए गए हैं। मठ अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के तहत एक संरक्षित विरासत स्थल है और बौद्ध कला और संस्कृति में रुचि रखने वाले पर्यटकों और विद्वानों द्वारा इसका दौरा किया जाता है। अलची मठ न केवल एक धार्मिक स्थल है बल्कि लद्दाख का सांस्कृतिक खजाना भी है। यह क्षेत्र की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रतिनिधित्व करता है और हिमालयी क्षेत्र में बौद्ध धर्म की स्थायी विरासत के प्रतीक के रूप में कार्य करता है। अलची मठ लद्दाख में प्राचीन बौद्ध सभ्यता की कलात्मक और आध्यात्मिक उपलब्धियों के प्रमाण के रूप में खड़ा है और आगंतुकों और भक्तों के बीच समान रूप से विस्मय और श्रद्धा को प्रेरित करता है। अलची मठ का इतिहास – History of alchi monastery
शीतला चालीसा – Sheetala chalisa
॥ दोहा॥ जय जय माता शीतला , तुमहिं धरै जो ध्यान । होय विमल शीतल हृदय, विकसै बुद्धी बल ज्ञान ॥ घट-घट वासी शीतला, शीतल प्रभा तुम्हार । शीतल छइयां में झुलई, मइयां पलना डार ॥ ॥ चौपाई ॥ जय-जय-जय श्री शीतला भवानी । जय जग जननि सकल गुणधानी ॥ गृह-गृह शक्ति तुम्हारी राजित । पूरण शरदचंद्र समसाजित ॥ विस्फोटक से जलत शरीरा । शीतल करत हरत सब पीड़ा ॥ मात शीतला तव शुभनामा । सबके गाढे आवहिं कामा ॥4॥ शोक हरी शंकरी भवानी । बाल-प्राणक्षरी सुख दानी ॥ शुचि मार्जनी कलश करराजै । मस्तक तेज सूर्य सम साजै ॥ चौसठ योगिन संग में गावैं । वीणा ताल मृदंग बजावै ॥ नृत्य नाथ भैरौं दिखलावैं । सहज शेष शिव पार ना पावैं ॥8॥ धन्य धन्य धात्री महारानी । सुरनर मुनि तब सुयश बखानी ॥ ज्वाला रूप महा बलकारी । दैत्य एक विस्फोटक भारी ॥ घर घर प्रविशत कोई न रक्षत । रोग रूप धरी बालक भक्षत ॥ हाहाकार मच्यो जगभारी । सक्यो न जब संकट टारी ॥12॥ तब मैंय्या धरि अद्भुत रूपा । कर में लिये मार्जनी सूपा ॥ विस्फोटकहिं पकड़ि कर लीन्हो । मूसल प्रमाण बहुविधि कीन्हो ॥ बहुत प्रकार वह विनती कीन्हा । मैय्या नहीं भल मैं कछु कीन्हा ॥ अबनहिं मातु काहुगृह जइहौं । जहँ अपवित्र वही घर रहि हो ॥16॥ अब भगतन शीतल भय जइहौं । विस्फोटक भय घोर नसइहौं ॥ श्री शीतलहिं भजे कल्याना । वचन सत्य भाषे भगवाना ॥ पूजन पाठ मातु जब करी है । भय आनंद सकल दुःख हरी है ॥ विस्फोटक भय जिहि गृह भाई । भजै देवि कहँ यही उपाई ॥20॥ कलश शीतलाका सजवावै । द्विज से विधीवत पाठ करावै ॥ तुम्हीं शीतला, जगकी माता । तुम्हीं पिता जग की सुखदाता ॥ तुम्हीं जगद्धात्री सुखसेवी । नमो नमामी शीतले देवी ॥ नमो सुखकरनी दु:खहरणी । नमो- नमो जगतारणि धरणी ॥24॥ नमो नमो त्रलोक्य वंदिनी । दुखदारिद्रक निकंदिनी ॥ श्री शीतला , शेढ़ला, महला । रुणलीहृणनी मातृ मंदला ॥ हो तुम दिगम्बर तनुधारी । शोभित पंचनाम असवारी ॥ रासभ, खर , बैसाख सुनंदन । गर्दभ दुर्वाकंद निकंदन ॥28॥ सुमिरत संग शीतला माई, जाही सकल सुख दूर पराई ॥ गलका, गलगन्डादि जुहोई । ताकर मंत्र न औषधि कोई ॥ एक मातु जी का आराधन । और नहिं कोई है साधन ॥ निश्चय मातु शरण जो आवै । निर्भय मन इच्छित फल पावै ॥32॥ कोढी, निर्मल काया धारै । अंधा, दृग निज दृष्टि निहारै ॥ बंध्या नारी पुत्र को पावै । जन्म दरिद्र धनी होइ जावै ॥ मातु शीतला के गुण गावत । लखा मूक को छंद बनावत ॥ यामे कोई करै जनि शंका । जग मे मैया का ही डंका ॥36॥ भगत ‘कमल’ प्रभुदासा । तट प्रयाग से पूरब पासा ॥ ग्राम तिवारी पूर मम बासा । ककरा गंगा तट दुर्वासा ॥ अब विलंब मैं तोहि पुकारत । मातृ कृपा कौ बाट निहारत ॥ पड़ा द्वार सब आस लगाई । अब सुधि लेत शीतला माई ॥40॥ ॥ दोहा ॥ यह चालीसा शीतला, पाठ करे जो कोय । सपनें दुख व्यापे नही, नित सब मंगल होय ॥ बुझे सहस्र विक्रमी शुक्ल, भाल भल किंतू । जग जननी का ये चरित, रचित भक्ति रस बिंतू ॥ ॥ इति श्री शीतला चालीसा ॥ शीतला चालीसा – Sheetala chalisa
एनची मठ का इतिहास – History of enchey monastery
एनची मठ, जिसे एनची गोम्पा के नाम से भी जाना जाता है, भारत के सिक्किम की राजधानी गंगटोक के पास स्थित एक प्रसिद्ध बौद्ध मठ है। एनची मठ मूल रूप से 19वीं शताब्दी में, लगभग 1840 में स्थापित किया गया था। यह एक ऐसी जगह पर बनाया गया था, जिसके बारे में माना जाता है कि इसे लामा द्रुप्टोब कार्पो का आशीर्वाद प्राप्त था, जो एक श्रद्धेय बौद्ध संत थे, जो अपनी चमत्कारी शक्तियों के लिए जाने जाते थे। पिछले कुछ वर्षों में, एन्ची मठ प्रमुखता से विकसित हुआ और इस क्षेत्र में वज्रयान बौद्ध धर्म का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया। यह तिब्बती बौद्ध धर्म के सबसे पुराने विद्यालयों में से एक, बौद्ध भिक्षुओं और निंगमा संप्रदाय के अनुयायियों के लिए पूजा, ध्यान और सीखने के स्थान के रूप में कार्य करता था। मठ में पारंपरिक तिब्बती वास्तुशिल्प तत्व शामिल हैं, जिनमें रंगीन भित्ति चित्र, जटिल लकड़ी की नक्काशी और अलंकृत सजावट शामिल हैं। मुख्य प्रार्थना कक्ष, जिसे लाखांग के नाम से जाना जाता है, में विभिन्न धार्मिक कलाकृतियाँ, मूर्तियाँ और ग्रंथ हैं, जिनमें सिक्किम के संरक्षक संत गुरु रिनपोछे (पद्मसंभव) की एक बड़ी मूर्ति भी शामिल है। एन्ची मठ पूरे वर्ष विभिन्न धार्मिक त्यौहारों और समारोहों की मेजबानी के लिए जाना जाता है। मठ में मनाया जाने वाला सबसे महत्वपूर्ण त्योहार चाम नृत्य है, जो तिब्बती नव वर्ष लोसर के शुभ अवसर पर होता है। चाम नृत्य के दौरान, भिक्षु बुरी आत्माओं को दूर रखने और शांति और समृद्धि को बढ़ावा देने के लिए अनुष्ठानिक मुखौटा नृत्य करते हैं। एन्ची मठ न केवल एक धार्मिक संस्थान है बल्कि सिक्किम का एक सांस्कृतिक विरासत स्थल भी है। यह बौद्ध कला, संस्कृति और आध्यात्मिकता की खोज में रुचि रखने वाले पर्यटकों, तीर्थयात्रियों और विद्वानों को आकर्षित करता है। आगंतुक प्रार्थना सत्र में भाग ले सकते हैं, निवासी भिक्षुओं से आशीर्वाद प्राप्त कर सकते हैं और तिब्बती बौद्ध धर्म के समृद्ध इतिहास और परंपराओं के बारे में जान सकते हैं। एन्चेई मठ सिक्किम में आस्था, भक्ति और सांस्कृतिक विरासत के प्रतीक के रूप में खड़ा है। यह विभिन्न पृष्ठभूमि के लोगों को बौद्ध धर्म की शिक्षाओं और आंतरिक शांति और करुणा के महत्व के बारे में प्रेरित और शिक्षित करना जारी रखता है। एनची मठ का इतिहास – History of enchey monastery
मोरी मैया को दईयो सन्देश भजन – Mori maiya ko daiyo sandesh bhajan
मोरी मैया को दईयो सन्देश हो मोरी मैया को दईयो सन्देश मोरी सोंन चिरैया तो उडी उडी जाये मैहर नगरिया में मैया रहत है मैया रहत है मैया रहत है… ऊँची पहाड़ी माँ को धाम. मोरी सोंन चिरैया तो उडी उडी जाये मंदिर में मैया शारदा विराजे शारदा विराजे माँ शारदा विराजे करियो तू माँ को प्रणाम.. मोरी सोंन चिरैया तो उडी उडी जाये अगले बरस मै आउंगी कहना आउंगी कहना माँ से आउंगी कहना लाऊ चुनरिया सांथ .. मोरी सोंन चिरैया तो उडी उडी जाये मोरी मैया को दईयो सन्देश हो मोरी मैया को दईयो सन्देश मोरी सोंन चिरैया तो उडी उडी जाये मोरी मैया को दईयो सन्देश भजन – Mori maiya ko daiyo sandesh bhajan
डैनियल और रहस्यमय सपने की कहानी – Story of daniel and the mystery dream
डैनियल की कहानी और रहस्यमय सपने की व्याख्या हिब्रू बाइबिल या ईसाई बाइबिल के पुराने नियम में डैनियल की पुस्तक में पाई जाती है। यह कथा न केवल अपने नाटकीय तत्वों के लिए बल्कि डैनियल की बुद्धिमत्ता और ईश्वर में उसके अटूट विश्वास के चित्रण के लिए भी महत्वपूर्ण है। बेबीलोन के राजा नबूकदनेस्सर ने एक परेशान करने वाला सपना देखा, लेकिन उसे उसका विवरण याद नहीं आया। स्वप्न के अर्थ से परेशान होकर, उसने इसकी व्याख्या करने के लिए अपने जादूगरों, जादूगरों, जादूगरों और ज्योतिषियों को बुलाया। हालाँकि, उन्होंने मांग की कि वे अपनी व्याख्याओं की प्रामाणिकता साबित करने के लिए पहले उन्हें स्वप्न बताएं। सपने को याद न कर पाने के कारण बुद्धिमान लोगों ने राजा को समझाया कि उसने जो पूछा है वह किसी भी इंसान की क्षमता से परे है। नबूकदनेस्सर ने निराश होकर बेबीलोन के सभी बुद्धिमान लोगों को मार डालने का आदेश दिया, जिनमें डैनियल और उसके दोस्त हनन्याह, मिशाएल और अजर्याह (जिन्हें शद्रक, मेशक और अबेदनगो के नाम से भी जाना जाता है) शामिल थे। डैनियल, फाँसी का सामना करने वाले बुद्धिमान व्यक्तियों में से एक होने के नाते, भगवान से व्याख्या मांगने के लिए समय का अनुरोध किया। राजा ने उसे समय दे दिया। प्रार्थना में, डैनियल ने भगवान की दया मांगी और सपने और उसकी व्याख्या दोनों का रहस्योद्घाटन प्राप्त किया। सपने में, नबूकदनेस्सर ने विभिन्न सामग्रियों – सोना, चांदी, कांस्य, लोहा और मिट्टी से बनी एक बड़ी और प्रभावशाली मूर्ति देखी। प्रत्येक सामग्री एक राज्य का प्रतिनिधित्व करती है, अंतिम एक विभाजित राज्य है जो मिट्टी के साथ मिश्रित लोहे का प्रतीक है। दानिय्येल राजा के पास गया और स्वप्न और उसका अर्थ ठीक-ठीक बता दिया। विभिन्न सामग्रियां क्रमिक राज्यों का प्रतीक थीं, जिसमें नबूकदनेस्सर का बेबीलोन स्वर्णिम सिर था। विभाजित साम्राज्य मजबूत और कमजोर तत्वों के मिश्रण का प्रतिनिधित्व करता था। अंततः, मानव हाथों के बिना काटे गए एक पत्थर ने मूर्ति के पैरों पर प्रहार किया, जिससे वह टुकड़े-टुकड़े हो गई, और वह पत्थर स्वयं एक महान पर्वत बन गया, जिससे पूरी पृथ्वी भर गई। व्याख्या ने भगवान के शाश्वत राज्य की अंतिम स्थापना के साथ, राज्यों के उत्थान और पतन के लिए भगवान की योजना बताई। नबूकदनेस्सर दानिय्येल की योग्यता से प्रभावित हुआ और दानिय्येल के परमेश्वर को देवताओं का परमेश्वर और राजाओं का प्रभु मानकर उसके सामने झुक गया। उसने दानिय्येल को एक ऊँचे पद पर पदोन्नत किया और उसे तथा उसके मित्रों को भेंटें दीं। यह कहानी ज्ञान के लिए डैनियल की ईश्वर पर निर्भरता और ईश्वरीय रहस्योद्घाटन पर प्रकाश डालती है जो ईश्वर उन लोगों को प्रदान करता है जो उसे खोजते हैं। स्वप्न और उसकी व्याख्या में भविष्यसूचक तत्व शामिल हैं, जो साम्राज्यों के उत्थान और पतन और भगवान के शाश्वत राज्य की अंतिम स्थापना का पूर्वाभास देते हैं। डैनियल और उसके दोस्तों का ईश्वर में विश्वास, उनके जीवन को खतरे में डालने वाले शाही आदेश के बावजूद भी दृढ़ बना हुआ है। ईश्वर के मार्गदर्शन और हस्तक्षेप में उनका भरोसा एक केंद्रीय विषय है। कथा इस विचार को रेखांकित करती है कि ईश्वर राष्ट्रों के मामलों और इतिहास के प्रकटीकरण पर संप्रभु है। डैनियल और रहस्यमय सपने की कहानी विश्वास, ज्ञान और दैवीय हस्तक्षेप का एक सम्मोहक विवरण है, जो दर्शाता है कि कैसे भगवान का उद्देश्य मानवीय समझ से परे है और अपने सही समय पर प्रकट होता है। डैनियल और रहस्यमय सपने की कहानी – Story of daniel and the mystery dream
इस साल कब किया जाएगा होलिका दहन, जानिए तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि के बारे में – When will holika dahan be done this year, know about the date, auspicious time and method of worship
पंचांग के अनुसार, हर साल फाल्गुन मास की पूर्णिमा की रात होलिका दहन किया जाता है। होलिका दहन होली से एक दिन पहले किया जाता है। होली हिंदुओं का लोकप्रिय त्योहार है और इस दिन एक-दूसरे को रंग लगाए जाते हैं। वहीं, धार्मिक परिपाटी पर होलिका दहन का विशेष महत्व है। होलिका दहन को बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में देखा जाता है। माना जाता है कि एक समय में हिरण्यकश्यप नामक राजा रहा करता था जिसका एक पुत्र था प्रह्लाद। हिरण्यकश्यप भगवान विष्णु को पसंद नहीं करता था जबकि प्रह्लाद विष्णु भक्त था। ऐसे में हिरण्यकश्यप अपने पुत्र प्रह्लाद को मार देना चाहता था। हिरण्यकश्यप की एक बहन थी जिसका नाम होलिका था। होलिका को यह वरदान था कि उसे कोई आग जला नहीं सकती है। इसीलिए हिरण्यकश्यप ने होलिका से कहा कि वह प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ जाए। होलिका ने ऐसा ही किया। लेकिन, भगवान विष्णु की कृपा से होलिका तो जलकर राख हो गई पर प्रह्लाद बच गया। इसी दिन से हर साल होलिका जलाई जाती है। जानिए इस साल होलिका दहन किस समय किया जाएगा और होलिका दहन किस तरह करते हैं। * होलिका दहन की तिथि: पंचांग के अनुसार, इस साल होलिका दहन 24 मार्च, रविवार की रात किया जाएगा। होलिका दहन का शुभ मुहूर्त रात 11 बजकर 13 मिनट से शुरू होकर रात 12 बजकर 27 मिनट तक रहेगा। इस समयावधि में विधि अनुसार होलिका दहन किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त प्रदोष काल में भी होलिका दहन किया जाता है। होलिका दहन के अगले दिन रंगों वाली होली मनाई जाएगी। इस साल रंगों से 25 मार्च के दिन खेला जाएगा। कहते हैं होली के दिन लोग सभी बैर भुलाकर एकदूसरे को गले लगा लेते हैं। * होलिका दहन की पूजा विधि: मान्यतानुसार होलिका दहन के दिन सुबह स्नान पश्चात स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं। गली के किनारे या चौक पर होलिका दहन करने के लिए कुछ दिनों पहले से ही लकड़ियां इकट्ठी करके रखी जाती हैं। होलिका दहन के दिन तैयार की गई होलिका की दिशा में मुख करके बैठा जाता है और भगवान गणेश का स्मरण किया जाता है। होलिका दहन की पूजा सामग्री में फल, फूल, नारियल, रोली, गोबर के कंडे, अनाज, कच्चा सूत, चावल, गुलाल, बताशे, हल्दी, और लोटे में जल भरकर रखा जाता है। \’असृक्पाभयसंत्रस्तै: कृता त्वं होलि बालिशै:। अतस्त्वां पूजायिष्यामि भूते भूतिप्रदा भव\’ मंत्र का जाप करते हुए होलिका की परिक्रमा की जाती है। (Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है।) इस साल कब किया जाएगा होलिका दहन, जानिए तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि के बारे में – When will holika dahan be done this year, know about the date, auspicious time and method of worship
प्रदोष व्रत के दिन शिवलिंग पर ये चीजें चढ़ाने से आपको महादेव की कृपा प्राप्त होगी। By offering these things on shivling on the day of pradosh fast, you will get the blessings of mahadev
हिंदू पंचांग के अनुसार हर माह की त्रयोदशी तिथि भगवान शंकर की पूजा के लिए समर्पित है। इस दिन प्रदोष का व्रत रखकर प्रदोष काल में भगवान शंकर की पूजा की जाती है। इस दिन व्रत रखने और विधि-विधान से भगवान शंकर और माता पार्वती की पूजा करने से सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं और जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। प्रदोष व्रत के दिन शिवलिंग पर भगवान शंकर की प्रिय चीजें चढ़ाने से भगवान जल्दी प्रसन्न होते हैं। आइए जानते हैं भगवान शंकर की कृपा प्राप्त करने के लिए प्रदोष के दिन शिवलिंग पर क्या चढ़ाना चाहिए। # शिवलिंग पर क्या चढ़ाएं: * बेलपत्र: भगवान शंकर की पूजा बेलपत्र के बिना अधूरी मानी जाती है। प्रदोष के व्रत के दिन भगवान शंकर को बेलपत्र जरूर चढ़ाना चाहिए। प्रदोष व्रत की पूजा शाम को की जाती है। शाम के समय शिव भगवान की पूजा में बेलपत्र के साथ-साथ मदार के फूले, धूप-दीप अर्पित करने चाहिए। * अर्पित करें ये चीजें: प्रदोष व्रत के दिन शिवलिंग पर आक के फूल, धूप दीप, घी, शहद, दूध, दही और गंगाजल अर्पित करना अत्यंत शुभ फल वाला होता है। इस व्रत के दिन भगवान शिव को घी शक्कर और गेहूं के आटे से बना भोग अर्पित करने से भक्तों को आरोग्य का वरदान प्राप्त होता है। * भूल कर भी ये न चढ़ाएं: भगवान शिव की पूजा के लिए शिवलिंग पर भूलकर भी सिंदूर, हल्दी और तुलसी के पत्ते नहीं चढ़ाने चाहिए। ये चीजें भगवान शंकर की पूजा में वर्जित मानी जाती हैं। * माता पार्वती की पूजा: प्रदोष व्रत के दिन भगवान शंकर के साथ माता पार्वती की भी पूजा करनी चाहिए। इससे दांपत्य जीवन सुखमय होती है। (Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है।) प्रदोष व्रत के दिन शिवलिंग पर ये चीजें चढ़ाने से आपको महादेव की कृपा प्राप्त होगी। By offering these things on shivling on the day of pradosh fast, you will get the blessings of mahadev
श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं – Shri banke bihari teri aarti gaun
श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं, हे गिरिधर तेरी आरती गाऊं । आरती गाऊं प्यारे आपको रिझाऊं, श्याम सुन्दर तेरी आरती गाऊं । ॥ श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं..॥ मोर मुकुट प्यारे शीश पे सोहे, प्यारी बंसी मेरो मन मोहे । देख छवि बलिहारी मैं जाऊं । ॥ श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं..॥ चरणों से निकली गंगा प्यारी, जिसने सारी दुनिया तारी । मैं उन चरणों के दर्शन पाऊं । ॥ श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं..॥ दास अनाथ के नाथ आप हो, दुःख सुख जीवन प्यारे साथ आप हो । हरी चरणों में शीश झुकाऊं । ॥ श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं..॥ श्री हरीदास के प्यारे तुम हो । मेरे मोहन जीवन धन हो। देख युगल छवि बलि बलि जाऊं । ॥ श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं..॥ श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं, हे गिरिधर तेरी आरती गाऊं । आरती गाऊं प्यारे आपको रिझाऊं, श्याम सुन्दर तेरी आरती गाऊं । श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं – Shri banke bihari teri aarti gaunv
जानिए फरवरी माह में कब रखा जाएगा दूसरा प्रदोष व्रत और कैसे की जाएगी भगवान की पूजा – Know when the second pradosh vrat will be observed in the month of february and how god will be worshipped
पंचांग के अनुसार, हर महीने कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर प्रदोष व्रत रखा जाता है। प्रदोष व्रत की विशेष धार्मिक मान्यता होती है। कहते हैं यदि प्रदोष व्रत के दिन पूरे श्रद्धाभाव से भगवान शिव का पूजन किया जाए तो भोलेनाथ प्रसन्न होकर भक्तों को आरोग्य का वरदान देते हैं। जीवन से कष्ट दूर करने के साथ ही भगवान शिव घर-परिवार को सुख, शांति और समृद्धि का वरदान देते हैं। जानिए फरवरी माह में दूसरा प्रदोष व्रत कब रखा जाएगा और किस तरह इस प्रदोष व्रत में भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए पूजा की जा सकती है। * प्रदोष व्रत की पूजा विधि: इस महीने का दूसरा प्रदोष व्रत 21 फरवरी, बुधवार के दिन रखा जाना है। बुधवार के दिन पड़ने के चलते इसे बुध प्रदोष व्रत भी कहते हैं। त्रयोदशी तिथि की शुरूआत 21 फरवरी सुबह 11 बजकर 28 मिनट पर हो रही है और इस तिथि का समापन अगले दिन 22 फरवरी, 1 बजकर 22 मिनट पर हो जाएगी। प्रदोष व्रत की पूजा का शुभ मुहूर्त 21 फरवरी की शाम 6 बजकर 21 मिनट से रात 8 बजकर 53 मिनट के बीच की जा सकती है। इसे प्रदोष काल कहते हैं। प्रदोष काल में प्रदोष व्रत की पूजा अत्यधिक लाभकारी और शुभ कही जाती है। प्रदोष व्रत की पूजा करने के लिए सुबह जल्दी उठकर स्नान किया जाता है। स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं इसके बाद भगवान शिव का ध्यान किया जाता है और व्रत का संकल्प लेते हैं। सुबह के समय भक्त शिव मंदिर भी जाते हैं लेकिन प्रदोष व्रत की असल पूजा रात के समय होती है। शाम के समय भगवान शिव के साथ ही मां पार्वती की पूजा की जाती है। पूजा में पंचामृत, गंगाजल, बेलपत्र, चावल, गंध, फूल, धूप, फल, दीप और लौंग आदि पूजा सामग्री में सम्मिलित किए जाते हैं। भगवान शिव को घी और शक्कर मिले जौ के सत्तू का भोग लगाना बेहद शुभ होता है। इसके बाद शिव जी की आरती होती है और शिव मंत्रों का जाप भी भक्त करते हैं। कहते हैं पूरे मनोभाव से महादेव का पूजन किया जाए तो भगवान शिव भक्तों की इच्छाएं पूरी करते हैं। (Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है।) जानिए फरवरी माह में कब रखा जाएगा दूसरा प्रदोष व्रत और कैसे की जाएगी भगवान की पूजा – Know when the second pradosh vrat will be observed in the month of february and how god will be worshipped
सियोल सेंट्रल मस्जिद का इतिहास – History of seoul central mosque
सियोल सेंट्रल मस्जिद, दक्षिण कोरिया के सियोल के इटावन में स्थित, देश की सबसे बड़ी और सबसे प्रमुख मस्जिदों में से एक है। कोरिया में मुसलमानों का इतिहास सदियों पुराना है, अभिलेखों से पता चलता है कि इस क्षेत्र में मुस्लिम व्यापारियों और यात्रियों की उपस्थिति 9वीं शताब्दी की शुरुआत में थी। हालाँकि, विभिन्न देशों से मुस्लिम आप्रवासियों, छात्रों और श्रमिकों के आगमन के साथ, 20वीं सदी के अंत तक कोरिया में एक महत्वपूर्ण मुस्लिम समुदाय उभर कर सामने नहीं आया। सियोल सेंट्रल मस्जिद की स्थापना सियोल में बढ़ते मुस्लिम समुदाय की सेवा करने और पूजा स्थल, सामुदायिक सभा और धार्मिक शिक्षा प्रदान करने के लिए की गई थी। मुस्लिम समुदाय द्वारा कई वर्षों की योजना और धन जुटाने के बाद इसे आधिकारिक तौर पर 1976 में खोला गया था। मस्जिद की स्थापत्य शैली पारंपरिक इस्लामी डिजाइन तत्वों और कोरियाई प्रभावों के मिश्रण को दर्शाती है। मुख्य प्रार्थना कक्ष में एक विशिष्ट गुंबद और मीनार है, जबकि आंतरिक भाग जटिल ज्यामितीय पैटर्न और सुलेख से सजाया गया है। मस्जिद के डिज़ाइन में कोरियाई पारंपरिक वास्तुशिल्प तत्व भी शामिल हैं, जैसे घुमावदार छत और लकड़ी की जालीदार खिड़कियों का उपयोग। पिछले कुछ वर्षों में, बढ़ती मुस्लिम आबादी को समायोजित करने और अपनी सुविधाओं को बढ़ाने के लिए सियोल सेंट्रल मस्जिद में कई विस्तार और नवीनीकरण हुए हैं। समुदाय की जरूरतों को पूरा करने के लिए परिसर में अतिरिक्त प्रार्थना कक्ष, कक्षाएँ और सामुदायिक स्थान जोड़े गए हैं। पूजा स्थल के रूप में सेवा करने के अलावा, सियोल सेंट्रल मस्जिद धार्मिक शिक्षा, सामाजिक समारोहों और आउटरीच गतिविधियों सहित विभिन्न सामुदायिक सेवाएं और कार्यक्रम प्रदान करती है। यह कोरिया में मुसलमानों के बीच एकता और एकजुटता को बढ़ावा देने और व्यापक कोरियाई समाज के साथ अंतर-धार्मिक संवाद और समझ को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सियोल सेंट्रल मस्जिद सियोल में एक सांस्कृतिक मील का पत्थर और पर्यटक आकर्षण बन गया है, जो दुनिया भर से उन आगंतुकों को आकर्षित करता है जो इस्लाम के बारे में सीखने और कोरियाई मुस्लिम संस्कृति का अनुभव करने में रुचि रखते हैं। यह अंतर-सांस्कृतिक आदान-प्रदान और आपसी समझ को बढ़ावा देने के लिए निर्देशित पर्यटन, सांस्कृतिक कार्यक्रम और आउटरीच कार्यक्रम आयोजित करता है। सियोल सेंट्रल मस्जिद दक्षिण कोरिया में धार्मिक विविधता और सहिष्णुता का प्रतीक है और सियोल में मुस्लिम समुदाय के लिए एक जीवंत केंद्र के रूप में कार्य करता है। सियोल सेंट्रल मस्जिद का इतिहास – History of seoul central mosque