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गणेश चतुर्थी व्रत की दूसरी कथा

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गणेश चतुर्थी व्रत की दूसरी कथा :- एक समय की बात है राजा हरिश्चंद्र के राज्य में एक कुम्हार था। वह मिट्टी के बर्तन बनाता, लेकिन वे कच्चे रह जाते थे। एक पुजारी की सलाह पर उसने इस समस्या को दूर करने के लिए एक छोटे बालक को मिट्टी के बर्तनों के साथ आंवा में डाल दिया। उस दिन संकष्टी चतुर्थी का दिन था। उस बच्चे की मां अपने बेटे के लिए परेशान थी। उसने गणेशजी से बेटे की कुशलता की प्रार्थना की। दूसरे दिन जब कुम्हार ने सुबह उठकर देखा तो आंवा में उसके बर्तन तो पक गए थे, लेकिन बच्चे का बाल बांका भी नहीं हुआ था। वह डर गया और राजा के दरबार में जाकर सारी घटना बताई। इसके बाद राजा ने उस बच्चे और उसकी मां को बुलवाया तो मां ने सभी तरह के विघ्न को दूर करने वाली संकष्टी चतुर्थी का वर्णन किया। इस घटना के बाद से महिलाएं संतान और परिवार के सौभाग्य के लिए संकट चौथ का व्रत करने लगीं।   यह भी पड़े : गणेश चतुर्थी व्रत की दूसरी कथा

November 3, 2022 / 0 Comments
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आईमा सदस्यों ने लक्ष्मी नारायण मंदिर में पूजन तथा हवन यज्ञ कर मनाया भगवान धन्वंतरि दिवस

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आईमा सदस्यों ने लक्ष्मी नारायण मंदिर में पूजन तथा हवन यज्ञ कर मनाया भगवान धन्वंतरि दिवस जालंधर : आल इंडिया नेशनल इंटीग्रेटेड मेडिकल एसोसिएशन (आईमा) द्वारा प्रधान जसजीत सिंह भोलावासिया की अध्यक्षता में भगवान धन्वंतरि दिवस पर लक्ष्मी नारायण मंदिर मॉडल हाउस जालंधर में भगवान धनवंतरी जी के पूजन का आयोजन किया गया। सर्वप्रथम आईमा सदस्यों द्वारा भगवान धन्वंतरि जी का पूजन किया गया तत्पश्चात हवन यज्ञ किया गया। इस अवसर पर डॉ भोलावासिया ने कहा कि भगवान धन्वंतरि जी की बदौलत ही आज लोग बिमारियों से मुक्ति पा रहे हैं। उन्होंने कहा कि आज जितनी भी दवाईयां मार्केट में उपलब्ध है वह सब भगवान धन्वंतरि जी की ही देन है। जिसमें डॉ पीसी चौहान, डॉ जसजीत सिंह भोलावासिया, डॉ रामेश कंबोज, डॉ जोगिंदर अरोड़ा, डॉ नरेश शर्मा, डॉ खन्ना, डॉ जसपाल कालड़ा, डॉ एच एस कालाडा, डॉ सविता कश्यप, डॉ राजवीर, डॉ दमन, डॉ सुशील अग्रवाल, डॉ पंकज डोगरा, डॉक्टर राजीव कालड़ा, डॉ सुरेंद्र शर्मा एवं आईमा के अन्य सदस्य उपस्थित हुए।

October 28, 2022 / 0 Comments
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तुलसी की पूजा करते समय कर लें ये 1छोटा सा काम, आपके ऊपर होगी मां लक्ष्मी मेहरबान

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तुलसी की पूजा करते समय कर लें ये 1छोटा सा काम, आपके ऊपर होगी मां लक्ष्मी मेहरबान हमारे देश में मां तुलसी को काफी पवित्र माना जाता है और हिंदुओं के घरों में रोजाना तुलसी के पौधे को जल दिया जाता है। ऐसा माना जाता है कि तुलसी के पौधे को जल देने से मां लक्ष्मी की अपार कृपा होती है और सुख सुविधा और संपत्ति घर में भरी रहती है। Tulsi Puja रविवार और एकादशी के दिन तुलसी में जल नहीं चढ़ाना चाहिए।तुलसी की नियमित पूजा करने से जीवन में चल रही परेशानियां दूर हो सकती हैं। देश में लगभग सभी घरों के आंगन में तुलसी का पौधा होता है। शास्त्रों के अनुसार मा तुलसी की पूजा करने से घर में धन-संपत्ति की वर्षा होती है और सुख सम्मान मिलता है। इतना ही कई देवी-देवताओं की पूजा अर्चना में भोग चढ़ाने के लिए तुलसी के पत्‍ते इस्तेमाल होते हैं। खासतौर पर इसके बिना श्री विष्णु जी की पूजा पूरी नहीं होती है। इसलिए आपको रोजाना तुलसी जी की पूजा जरूर करनी चाहिए। हालांकि तुलसी जी की पूजा के दौरान आपको कुछ चीजें जरूर करनी चाहिए। आइए जानते हैं। हालांकि तुलसी की पूजन के दौरान कुछ ऐसी चीज है जो नहीं करनी चाहिए तो आइए जानते हैं कौन है वह चीजें – Tulsi Puja तुलसी पूजा के वक्त जरूर करें ये छोटा सा काम नियमित रूप से सुबह तुलसी के पौधे की पूजा करने के बाद उसमें जल चढ़ाना चाहिए। रोजाना शाम को संध्‍यावंदन करने के बाद तुलसी के पौधे के नीचे दीपक जलाना चाहिए। ऐसा करने से घर में लक्ष्मी जी का वास होता है। हालांकि रविवार और एकादशी के दिन तुलसी में भूलकर भी जल नहीं चढ़ाना चाहिए और ना ही इस दिन इसकी पत्तियां तोड़नी चाहिए। अगर आपको इस दिन तुलसी की पत्तियों की जरूरत पड़े तो ऐसे में एक दिन पहले ही तोड़कर रख लें। मान्यताओं के अनुसार, तुलसी की नियमित पूजा करने से जीवन में चल रही परेशानियां दूर हो सकती हैं। तुलसी जी की आरती जय जय तुलसी माता, मैय्या जय तुलसी माता . सब जग की सुख दाता, सबकी वर माता.. मैय्या जय तुलसी माता.. सब योगों से ऊपर, सब रोगों से ऊपर. रज से रक्ष करके, सबकी भव त्राता. मैय्या जय तुलसी माता.. बटु पुत्री है श्यामा, सूर बल्ली है ग्राम्या. विष्णुप्रिय जो नर तुमको सेवे, सो नर तर जाता. मैय्या जय तुलसी माता.. हरि के शीश विराजत, त्रिभुवन से हो वंदित. पतित जनों की तारिणी, तुम हो विख्याता. मैय्या जय तुलसी माता.. लेकर जन्म विजन में, आई दिव्य भवन में. मानव लोक तुम्हीं से, सुख-संपति पाता. मैय्या जय तुलसी माता.. हरि को तुम अति प्यारी, श्याम वर्ण सुकुमारी. प्रेम अजब है उनका, तुमसे कैसा नाता. हमारी विपद हरो तुम, कृपा करो माता. मैय्या जय तुलसी माता..

October 23, 2022 / 0 Comments
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माँ देवी राज रानी जी का जन्म उत्सव एवम् मूर्ति स्थापना दिवस 2 अक्टूबर 2022 को

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श्री राजेश्वरी धाम माता राजरानी मंदिर बस्ती नौ जालंधर बड़े ही हर्ष के साथ सूचित किया जाता है कि माँ देवी राज रानी जी का जन्म उत्सव एवम् मूर्ति स्थापना दिवस 2 अक्टूबर 2022 को बड़ी श्रद्धा और धूमधाम से मनाया जाएगा जिसमें रात्रि जागरण का कार्यक्रम भी किया जाएगा गायक कुमार लवली एंड पार्टी ऊना हिमाचल प्रदेश एवं महंत पंकज ठाकुर एंड पार्टी को जागरण में भजन कीर्तन के लिए आमंत्रित किया गया है , बड़ा ही शुभ अवसर है कि इस बार माता का जन्म उत्सव , मूर्ति स्थापना एवम् मासिक अष्टमी एक साथ मनाया जाएगा एवं लंगर भंडारे की व्यवस्था भी की गई है, 2 अक्टूबर 2022 को जागरण कीर्तन में आकर स्वयं एवम् परिवार जनों के जीवन को धन्य एवम् कृतार्थ करें, आप सभी भक्त जनों की उपस्थिति सादर प्रार्थनीय है।। विशेष सूचना:- माँ देवी राज रानी जी का प्रथम नवरात्र दिनांक 26/09/2022 को मंदिर में दर्शन एवम् आशीर्वाद प्राप्त करें , नवरात्रि में नौ दिन कीर्तन उसके बाद रात्रि 10:00बजे आरती हुआ करेगी।। जय माता दी🙏 निवेदक :- प्रधान कैलाश बब्बर एवम् समस्त कमेटी सदस्य 98142- 53652,, 98886-51501

September 19, 2022 / 0 Comments
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मां देवी राज रानी जी का जन्म उत्सव एवं मूर्ति स्थापना दिवस 2 अक्टूबर 2022 सभी भक्तों को सादर आमंत्रण

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जय माता दी!  जय माता दी! श्री राजेश्वरी धाम, देवी राजरानी मंदिर, बस्ती शेख रोड, जालंधर  मां देवी राजरानी जी का जन्म उत्सव एवं मूर्ति स्थापना दिवस 2 अक्टूबर 2022 सभी भक्तों को सादर आमंत्रण है मां देवी राजरानी जी का जन्मदिन मूर्ति स्थापना दिवस में शामिल होकर मां का आशीर्वाद प्राप्त करें माँ का गुणगान करने पहुँच रही पार्टिया पंकज ठाकुर एंड पार्टी व् कुमार लव्ली एंड पार्टी ऊना (हिमाचल प्रदेश), झाकिया : वरुण शर्मा राजेश्वरी धाम देवी राजरानी मंदिर, बस्ती शेख रोड, जालंधर प्रधान- कैलाश बब्बर (98142-53652, 98886-51501) Facebook Page : – https://www.facebook.com/devirajrani

September 14, 2022 / 0 Comments
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गणेश चतुर्थी व्रत की पहली कथा

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गणेश चतुर्थी की पौराणिक एवं प्रचलित कथा : व्रत में सुनने से दूर होंगे सारे संकट, मिलेगा अपार सुख श्री गणेशाय नम:\’ संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत करने से घर-परिवार में आ रही विपदा दूर होती है, कई दिनों से रुके मांगलिक कार्य संपन्न होते है तथा भगवान श्री गणेश असीम सुखों की प्राप्ति कराते हैं। माह की किसी भी चतुर्थी के दिन भगवान श्री गणेश की पूजा के दौरान संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत की कथा पढ़ना अथवा सुनना जरूरी होता है। इससे संबंधित चार कथाएं प्रचलित हैं। पहली कथा :- पौराणिक एवं प्रचलित श्री गणेश कथा के अनुसार एक बार देवता कई विपदाओं में घिरे थे। तब वह मदद मांगने भगवान शिव के पास आए। उस समय शिव के साथ कार्तिकेय तथा गणेशजी भी बैठे थे। देवताओं की बात सुनकर शिव जी ने कार्तिकेय व गणेश जी से पूछा कि तुम में से कौन देवताओं के कष्टों का निवारण कर सकता है। तब कार्तिकेय व गणेश जी दोनों ने ही स्वयं को इस कार्य के लिए सक्षम बताया इस पर भगवान शिव ने दोनों की परीक्षा लेते हुए कहा कि तुम दोनों में से जो सबसे पहले पृथ्वी की परिक्रमा करके आएगा वही देवताओं की मदद करने जाएगा। भगवान शिव के मुख से यह वचन सुनते ही कार्तिकेय अपने वाहन मोर पर बैठकर पृथ्वी की परिक्रमा के लिए निकल गए, परंतु गणेश जी सोच में पड़ गए कि वह चूहे के ऊपर चढ़कर सारी पृथ्वी की परिक्रमा करेंगे तो इस कार्य में उन्हें बहुत समय लग जाएगा। तभी उन्हें एक उपाय सूझा। गणेश अपने स्थान से उठें और अपने माता-पिता की सात बार परिक्रमा करके वापस बैठ गए। परिक्रमा करके लौटने पर कार्तिकेय स्वयं को विजेता बताने लगे। तब शिव जी ने श्री गणेश से पृथ्वी की परिक्रमा ना करने का कारण पूछा। यह भी पड़े : गणेश चतुर्थी व्रत की दूसरी कथा तब गणेश ने कहा – \’माता-पिता के चरणों में ही समस्त लोक हैं।\’ यह सुनकर भगवान शिव ने गणेश जी को देवताओं के संकट दूर करने की आज्ञा दी। इस प्रकार भगवान शिव ने गणेश जी को आशीर्वाद दिया कि चतुर्थी के दिन जो तुम्हारा पूजन करेगा और रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देगा उसके तीनों ताप यानी दैहिक ताप, दैविक ताप तथा भौतिक ताप दूर होंगे। इस व्रत को करने से व्रतधारी के सभी तरह के दुख दूर होंगे और उसे जीवन के भौतिक सुखों की प्राप्ति होगी। चारों तरफ से मनुष्य की सुख-समृद्धि बढ़ेगी। पुत्र-पौत्रादि, धन-ऐश्वर्य की कमी नहीं रहेगी।      

August 31, 2022 / 0 Comments
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गरुड़ पुराण तीसरा अध्याय

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गरुड़ पुराण तीसरा अध्याय | Garud Puran Adhyay 3 सूतजी बोले, हे शौनक! गरुड़ पुराण को भगवान विष्णु ने ब्रह्मा और शिव को सुनाया था। ब्रह्मा ने मुनिश्रेष्ठ व्यास को सुनाया था और व्यास जी ने मुझे सुनाया था। में आप लोगो को वही सुना रहा हु। इस पुराण में भगवान विष्णु की लीलाओं को विस्तार पूर्वक कहा गया है। भगवान विष्णु के सर्ग वर्णन, देवार्चन, तीर्थमहात्म्य, भुवनवृत्तान्त, मन्वंतर, वर्ण धर्म, आश्रम धर्म, दानधर्म, राजधर्म, व्यवहार व्रत, वंशानुचरित, आयुर्वेद, प्रलय, धर्म, काम ,अर्थ, और उत्तम ज्ञान का वर्णन इस पुराण में किया गया है। श्री गरुड़ जी भगवान विष्णु का वरदान पाकर इस गरुड़ पुराण के उपदेष्ठा रूप में सभी प्रकार से अति सामर्थ्यवान बन गए और भगवान विष्णु के ही वाहन बने, तथा इस संसार की स्थिति और प्रलय के कारण भी हो गए। गरुड़ जी ने अपनी माता को दानवों से जीतकर मुक्त करवाया था, तथा अमृत भी प्राप्त किया था। संपूर्ण ब्रह्मांड भगवान विष्णु के उदर में विद्यमान है। श्री गरुड़ जी ने उनकी क्षुधा को भी शांत किया था। 16 घोर नरक गरुड़ पुराण के अनुसार – Narak Garud Puran यह गरुड़ पुराण को गरुड़ जी ने कश्यप ऋषि को सुनाया था। तब कश्यप ऋषि ने इस गरुड़ मंत्र के प्रभाव से जले हुए वृक्ष को भी जीवित कर दिया था। श्री हरिरूप गरुड़ जी के दर्शन मात्र से ही सर्पों का विनाश हो जाता है। हे शौनक ! में व्यास जी को प्रणाम करके इस अत्यंत पवित्र पुराण को सुनाता हु ,जिसका पवित्र पाठ करने से भी सब कुछ प्राप्त हो जाता है। कृपा करके आप सब इसे ध्यान से सुने।  

August 28, 2022 / 0 Comments
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गरुड़ पुराण दूसरा अध्याय

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गरुड़ पुराण दूसरा अध्याय – Garud Puran Adhyay 2 मृत्यु के बाद मरणासन्न व्यक्ति के कल्याण के लिए किए जाने वाले कर्म श्री कृष्ण ने गरुड़ जी से पुत्र की महिमा बताते हुए कहा था, अगर मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती है, तो उसका पुत्र उसका नरक से उद्धार कर सकता है। उसके पुत्र और पौत्र को उसे कंधा देना चाहिए और उसको विधि पूर्वक अग्निदाह देना चाहिए। इसके लिए सबसे पहले भूमि को गोबर से लिपना चाहिए। फिर उस स्थान पर तिल और कुश बिछाकर उस व्यक्तिंको कुशासन पर सुलाना चाहिए और उसके मुख में पंच रत्न डालने चाहिए। यह सब विधिपूर्वक करने से व्यक्ति अपने सारे पापो को जलाकर पापमुक्त हो जाता है। भूमि पर मंडल बनाने से इस मंडल में ब्रह्मा, विष्णु, रूद्र,अग्नि, सारे देवता विराजमान हो जाते है। इसलिए यह मंडल का निर्माण करने का बहुत महत्व माना गया है। अगर भूमि पर मंडल का निर्माण नहीं किया हो और उस पर व्यक्ति प्राण त्याग कर देता है, तो उसे दूसरी योनि प्राप्त नहीं होती। उसकी आत्मा हवा के साथ भटकती रहती है। भगवान बोले, तिल और कुश की महत्ता बहुत है। तिल को बहुत पवित्र माना गया है, क्युकी तिल की उत्पत्ति मेरे पसीने से हुई है। तिल के प्रयोग से असुर, दानव और दैत्य को भगा सकते है।   पौराणिक कथा श्री कृष्ण ने गरुड़ जी से पुत्र की महिमा बताते हुए कहा था, अगर मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती है, तो उसका पुत्र उसका नरक से उद्धार कर सकता है। उसके पुत्र और पौत्र को उसे कंधा देना चाहिए और उसको विधि पूर्वक अग्निदाह देना चाहिए। इसके लिए सबसे पहले भूमि को गोबर से लिपना चाहिए। फिर उस स्थान पर तिल और कुश बिछाकर उस व्यक्तिंको कुशासन पर सुलाना चाहिए और उसके मुख में पंच रत्न डालने चाहिए। यह सब विधिपूर्वक करने से व्यक्ति अपने सारे पापो को जलाकर पापमुक्त हो जाता है। भूमि पर मंडल बनाने से इस मंडल में ब्रह्मा, विष्णु, रूद्र,अग्नि, सारे देवता विराजमान हो जाते है। इसलिए यह मंडल का निर्माण करने का बहुत महत्व माना गया है। अगर भूमि पर मंडल का निर्माण नहीं किया हो और उस पर व्यक्ति प्राण त्याग कर देता है, तो उसे दूसरी योनि प्राप्त नहीं होती। उसकी आत्मा हवा के साथ भटकती रहती है। भगवान बोले, तिल और कुश की महत्ता बहुत है। तिल को बहुत पवित्र माना गया है, क्युकी तिल की उत्पत्ति मेरे पसीने से हुई है। तिल के प्रयोग से असुर, दानव और दैत्य को भगा सकते है। एक तिल का दान करने से स्वर्ण के बत्तीस सेर तिल के दान के बराबर माना जाता है। तिल का दान तर्पण, दान और होम में दिया जाता है, जो अक्षय होता है। कुश की उत्त्पति मेरे शरीर के रोमो से हुई है। कुश के मूल में ब्रह्मा, विष्णु और शिव है। यह तीनों देव कुश में प्रतिष्ठित है। कुश की आवश्यकता देवताओं की तृप्ति के लिए है, और तिल की आवश्यकता पितृओ की तृप्ति के लिए है। श्राद्ध की विधि के अनुसार ही मनुष्य ब्रह्मा, विष्णु और पितृजनो को संतृप्त कर सकता है। ब्राह्मण, मंत्र, कुश, अग्नि तथा तुलसी का बार-बार उपयोग करने से भी वह बासी नही होते। संसार में लोगो के मुक्ति प्रदान करने के साधनों में विष्णु एकादशी व्रत, गीता, तुलसी, ब्राह्मण और गौ का समावेश होता है। मृत्यु काल के समय मरण पामे हुए व्यक्ति के दोनो हाथो में कुश को रखा जाता है। जिसे व्यक्ति को विष्णुलोक की प्राप्ति होती है। पितृ को लवणरस अतिप्रिय होता है, और इसे स्वर्ग की प्राप्ति होती है। इसीलिए भगवान विष्णु से शरीर से उत्पन्न हुए लवणरस का भी दान करना चाहिए। किसी व्यक्ति के लिए स्वर्ग के द्वार खोलने के लिए लवण का दान करने का बहुत महत्व है। उसके पास तुलसी का वृक्ष और शालग्राम की शीला को भी लाकर रखना चाहिए। उसके बाद विधिपूर्वक सूत्रों का पाठ करने से मनुष्य की मृत्यु मुक्तिदायक होती है। तत्पश्चात मरे हुए व्यक्ति के शरीर के विभिन्न स्थानों में सोने की शालाकाओ को रचने की विधि की जाती है। जिसमे एक शलाका मुख, एक-एक शलाका नाक के दोनो छिद्रों, दो-दो शलाकाए नेत्र और कान और एक शलाका लिंग तथा एक शलाका उसके ब्रह्मांड में रखनी चाहिए। व्यक्ति के दोनो हाथ और कंठ के भाग में तुलसी को रखा जाता है। उसके बाद व्यक्ति के शव को दो वस्त्रों से अच्छादित करके कुमकुम और अक्षत से पूजन करे। उसके बाद उसपे पुष्पों की माला चढ़ाई जाती है। तदनतर उसे बंधु बांधवों और पुत्र के साथ अन्य द्वार से ले जाए। पुत्र को अपने बंधावोंके साथ मिलकर मरे हुए पिता के शव को कंधे पर रख स्वयं ले जाना चाहिए। शव को शमशान ले जाकर पहले से ना जली हुई भूमि पर पूर्वाभिमुख या उत्तरा भिमुख चिता का निर्माण कराए। चिता बनाने में चंदन, तुलसी तथा पलाश और लकड़ी का प्रयोग करना चाहिए। शव को लेजाते समय राम नाम सत्य है क्यों बोला जाता है? जब शव की इंद्रियों का समूह व्याकुल हो और शरीर उसका जड़ीभूत हो, तब शरीर से प्राण निकलकर यमराज के दूतो के साथ जाने लगते है। दुरात्मा प्राणी को यमदूत अपने पाशबंधो से जकड़कर मरते है। सुकृति मनुष्य को स्वर्ग के मार्ग में सुख पूर्वक ले जाते है। पापी लोगो को यमलोक के मार्ग में दुख जेलकर जाना पड़ता है। यमराज अपने लोक में चतुर्भुज रूप धारण करके शंख, चक्र, और गदा से साधुपुरुष का आचरण करते हैं। और पापियों के साथ दुर्व्यवहार करते हे, और उन्हे दंड देते है। यमराज प्रलय कालीन मेघ के समय गर्जना करने वाले है। वह बहुत बड़े भैंस पर सवार होते है। उनका स्वरूप अत्यंत भयंकर है, और स्वभाव से महाक्रोधी है। 16 घोर नरक गरुड़ पुराण के अनुसार – Narak Garud Puran यमराज का रूप भीमकाय है, और वह अपने हाथो में लोहे का दंड और पाश धारण करते है। पापी लोग उनके मुख तथा नेत्रों को देखने से ही डर जाते है। प्राणों से मुक्त चेष्टा हीन शरीर को देखने से मन में घृणा उत्पन्न होती है। वह तुरंत ही अस्पृश्य तथा दुर्गंधयुक्त होकर सभी प्रकार से निंदित हो जाता है। शरीर अंत में

August 27, 2022 / 0 Comments
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गरुड़ पुराण पहला अध्याय

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गरुड़ पुराण पहला अध्याय प्राचीन समय की बात है, कि नैमिषारण्य क्षेत्र में शोनक आदि ऋषियों ने अनेक महर्षियो के साथ 7000 वर्ष पर्यंत चलने वाले यज्ञ को प्रारंभ किया था, जिससे उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति हो सके। उस क्षेत्र में सूत जी पधारे तब ऋषियों ने उनका बहुत आदर सत्कार किया। क्योंकि सूत जी पौराणिक कथा कहने में सिद्धहस्त थे, और उन्होंने विभिन्न रूपों से अनुभव प्राप्त किया हुआ था। इसीलिए सारे ऋषियों ने उनसे कहा, आप हमे इस संसार, भगवान, यमलोक, तथा, दूसरे शुभ, अशुभ कर्मो के बारे में बताए, जिससे मनुष्य किस रूप को प्राप्त होता है ,इसका ज्ञान हमे देने की कृपया करे। सूतजी ने कहा, इस संसार जगत के निर्माता भगवान विष्णु है। वो जल में रहते हे, इसीलिए उनका नाम नारायण है। वह लक्ष्मी जी के पति है। भगवान विष्णु ने हर युग में भिन्न-भिन्न अवतार धारण करके पृथ्वी पर जन्म लिया है, ताकि वह अधर्म का नाश कर सके और पृथ्वी की रक्षा कर सके। भगवान विष्णु ने राम का अवतार लिया और लंका के राजा रावण का वध करके अधर्म को खत्म किया। उन्होंने नरसिंह रूप में राजा हिरण्यकश्यप का वध करके भक्त प्रहलाद एवं दूसरे प्रजा की रक्षा की। भगवान विष्णु ने वराहरूप में भी अवतार लिया ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सके और फिर मत्स्य रूप में अवतार लिया। वेदव्यास जी भगवान विष्णु के ही अंश है। वेदव्यास जी ने यह पुराणों की रचना की है। कहा जाता है की एक सर्वोत्तम वृक्ष भगवान विष्णु है, उसकी दृढ़, मूल धर्म है, उसकी शाखाएं वेद है, उस वृक्ष के फूल रूप में यज्ञ को माना गया है और फल के रूप में मोक्ष को माना गया है। वह सर्वोत्तम वृक्ष रूपी भगवान विष्णु ही सारे फल और मोक्ष को देते है। एक समय पर पार्वती जी ने भगवान शिव से पूछा था, आप खुद ही एक भगवान है,इस संसार के रचायता है, तो आप किस का ध्यान करते रहते है। यह सुनकर भगवान शिव ने कहा, में देवो और ऋषियों का ध्यान करता हुं उसमे विष्णु ही श्रेष्ठ है। इस संसार में परम ब्रह्म भगवान नारायण,विष्णु है और उन्ही का चिंतन करता हूं। भगवान विष्णु ही अनेक रूप में अवतार लेने वाले परम ब्रह्म है। भगवान विष्णु ही अनेक रूप में पृथ्वी पर अवतार लेकर अधर्म का नाश करके धर्म की स्थापना करते है। इस प्रकार भगवान शिव ने पार्वती जी को भगवान विष्णु की महिमा बताई थी। शिव पुराण पहला अध्याय || शिव पुराण अध्याय 1 तब ऋषियों को दूसरी बाते जानने की उत्सुकता हुई। ऋषियों ने सूतजी से कहा, हे प्रभु! आपने भगवान विष्णु के श्रेष्ठता के बारे में हमे जो भी ज्ञान दिया वह अत्यंत भयमुक्त करने वाला ज्ञान हे। इसके अतिरिक्त आप हमे यह बताइए की इस सृष्टि में आने के बाद भोगने वाले दुख और कष्ट को नाश कैसे किया जाता है? कृपा करके इसका उपाय हमे बताइए। आपके पास इस लोक एवं परलोक के दुखो का निवारण करने का ज्ञान है। हम यह जानना चाहते ही है, की यमराज के मार्ग तक पहुंचने में मनुष्य को किस प्रकार की मुसीबतों का सामना करना पड़ता है। वचन बद्ध पौराणिक कथा प्राचीन समय की बात है, कि नैमिषारण्य क्षेत्र में शोनक आदि ऋषियों ने अनेक महर्षियो के साथ 7000 वर्ष पर्यंत चलने वाले यज्ञ को प्रारंभ किया था, जिससे उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति हो सके। उस क्षेत्र में सूत जी पधारे तब ऋषियों ने उनका बहुत आदर सत्कार किया। क्योंकि सूत जी पौराणिक कथा कहने में सिद्धहस्त थे, और उन्होंने विभिन्न रूपों से अनुभव प्राप्त किया हुआ था। इसीलिए सारे ऋषियों ने उनसे कहा, आप हमे इस संसार, भगवान, यमलोक, तथा, दूसरे शुभ, अशुभ कर्मो के बारे में बताए, जिससे मनुष्य किस रूप को प्राप्त होता है ,इसका ज्ञान हमे देने की कृपया करे। सूतजी ने कहा, इस संसार जगत के निर्माता भगवान विष्णु है। वो जल में रहते हे, इसीलिए उनका नाम नारायण है। वह लक्ष्मी जी के पति है। भगवान विष्णु ने हर युग में भिन्न-भिन्न अवतार धारण करके पृथ्वी पर जन्म लिया है, ताकि वह अधर्म का नाश कर सके और पृथ्वी की रक्षा कर सके। भगवान विष्णु ने राम का अवतार लिया और लंका के राजा रावण का वध करके अधर्म को खत्म किया। उन्होंने नरसिंह रूप में राजा हिरण्यकश्यप का वध करके भक्त प्रहलाद एवं दूसरे प्रजा की रक्षा की। भगवान विष्णु ने वराहरूप में भी अवतार लिया ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सके और फिर मत्स्य रूप में अवतार लिया। वेदव्यास जी भगवान विष्णु के ही अंश है। वेदव्यास जी ने यह पुराणों की रचना की है। कहा जाता है की एक सर्वोत्तम वृक्ष भगवान विष्णु है, उसकी दृढ़, मूल धर्म है, उसकी शाखाएं वेद है, उस वृक्ष के फूल रूप में यज्ञ को माना गया है और फल के रूप में मोक्ष को माना गया है। वह सर्वोत्तम वृक्ष रूपी भगवान विष्णु ही सारे फल और मोक्ष को देते है। एक समय पर पार्वती जी ने भगवान शिव से पूछा था, आप खुद ही एक भगवान है,इस संसार के रचायता है, तो आप किस का ध्यान करते रहते है। यह सुनकर भगवान शिव ने कहा, में देवो और ऋषियों का ध्यान करता हुं उसमे विष्णु ही श्रेष्ठ है। इस संसार में परम ब्रह्म भगवान नारायण,विष्णु है और उन्ही का चिंतन करता हूं। भगवान विष्णु ही अनेक रूप में अवतार लेने वाले परम ब्रह्म है। भगवान विष्णु ही अनेक रूप में पृथ्वी पर अवतार लेकर अधर्म का नाश करके धर्म की स्थापना करते है। इस प्रकार भगवान शिव ने पार्वती जी को भगवान विष्णु की महिमा बताई थी। तब ऋषियों को दूसरी बाते जानने की उत्सुकता हुई। ऋषियों ने सूतजी से कहा, हे प्रभु! आपने भगवान विष्णु के श्रेष्ठता के बारे में हमे जो भी ज्ञान दिया वह अत्यंत भयमुक्त करने वाला ज्ञान हे। इसके अतिरिक्त आप हमे यह बताइए की इस सृष्टि में आने के बाद भोगने वाले दुख और कष्ट को नाश कैसे किया जाता है? कृपा करके इसका उपाय हमे बताइए। आपके पास इस लोक एवं परलोक के दुखो का निवारण करने का ज्ञान है। हम यह जानना चाहते ही है, की यमराज के मार्ग तक पहुंचने

August 25, 2022 / 0 Comments
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महा शिव पुराण कथा

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महा शिव पुराण कथा शिव पुराण\’ का सम्बन्ध शैव मत से है। इस पुराण में प्रमुख रूप से शिव-भक्ति और शिव-महिमा का प्रचार-प्रसार किया गया है। प्रायः सभी पुराणों में शिव को त्याग, तपस्या, वात्सल्य तथा करुणा की मूर्ति बताया गया है। कहा गया है कि शिव सहज ही प्रसन्न हो जाने वाले एवं मनोवांछित फल देने वाले हैं। किन्तु \’शिव पुराण\’ में शिव के जीवन चरित्र पर प्रकाश डालते हुए उनके रहन-सहन, विवाह और उनके पुत्रों की उत्पत्ति के विषय में विशेष रूप से बताया गया है। शिवपुराण’ एक प्रमुख तथा सुप्रसिद्ध पुराण है, जिसमें परात्मपर परब्रह्म परमेश्वर के ‘शिव’ (कल्याणकारी) स्वरूप का तात्त्विक विवेचन, रहस्य, महिमा एवं उपासना का सुविस्तृत वर्णन है[6]। भगवान शिवमात्र पौराणिक देवता ही नहीं, अपितु वे पंचदेवों में प्रधान, अनादि सिद्ध परमेश्वर हैं एवं निगमागम आदि सभी शास्त्रों में महिमामण्डित महादेव हैं। वेदों ने इस परमतत्त्व को अव्यक्त, अजन्मा, सबका कारण, विश्वपंच का स्रष्टा, पालक एवं संहारक कहकर उनका गुणगान किया है। श्रुतियों ने सदा शिव को स्वयम्भू, शान्त, प्रपंचातीत, परात्पर, परमतत्त्व, ईश्वरों के भी परम महेश्वर कहकर स्तुति की है। ‘शिव’ का अर्थ ही है- ‘कल्याणस्वरूप’ और ‘कल्याणप्रदाता’। परमब्रह्म के इस कल्याण रूप की उपासना उटच्च कोटि के सिद्धों, आत्मकल्याणकामी साधकों एवं सर्वसाधारण आस्तिक जनों-सभी के लिये परम मंगलमय, परम कल्याणकारी, सर्वसिद्धिदायक और सर्वश्रेयस्कर है। शास्त्रों में उल्लेख मिलता है कि देव, दनुज, ऋषि, महर्षि, योगीन्द्र, मुनीन्द्र, सिद्ध, गन्धर्व ही नहीं, अपितु ब्रह्मा-विष्णु तक इन महादेव की उपासना करते हैं। इस पुराण के अनुसार यह पुराण परम उत्तम शास्त्र है। इसे इस भूतल पर भगवान शिव का वाङ्मय स्वरूप समझना चाहिये और सब प्रकार से इसका सेवन करना चाहिये। इसका पठन और श्रवण सर्वसाधनरूप है। इससे शिव भक्ति पाकर श्रेष्ठतम स्थिति में पहुँचा हुआ मनुष्य शीघ्र ही शिवपद को प्राप्त कर लेता है। इसलिये सम्पूर्ण यत्न करके मनुष्यों ने इस पुराण को पढ़ने की इच्छा की है- अथवा इसके अध्ययन को अभीष्ट साधन माना है। इसी तरह इसका प्रेमपूर्वक श्रवण भी सम्पूर्ण मनोवंछित फलों के देनेवाला है। भगवान शिव के इस पुराण को सुनने से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है तथा इस जीवन में बड़े-बड़े उत्कृष्ट भोगों का उपभोग करके अन्त में शिवलोक को प्राप्त कर लेता है। यह शिवपुराण नामक ग्रन्थ चौबीस हजार श्लोकों से युक्त है। सात संहिताओं से युक्त यह दिव्य शिवपुराण परब्रह्म परमात्मा के समान विराजमान है और सबसे उत्कृष्ट गति प्रदान करने वाला है। रूद्र संहिता शिव पुराण हिंदू धर्म में अठारह पुराणों में सबसे अधिक पढ़ा जाने वाला पुराण है। यह हिंदू भगवान शिव और उनकी पत्नी देवी पार्वती के चारों ओर केंद्रित है। भगवान शिव हिंदू धर्म में सबसे अधिक पूजे जाने वाले भगवानों में से एक हैं लेखक वेदव्यास देश भारत भाषा हिन्दी श्रृंखला पुराण विषय शिव भक्ति प्रकार हिन्दू धार्मिक ग्रन्थ पृष्ठ २४,००० श्लोक शिव महापुराण में ७ (सात) \’संहिता\’ (छंदों का संग्रह) शामिल हैं जो भगवान शिव के जीवन के विभिन्न पहलुओं का एक ज्वलंत विवरण प्रदान करते हैं। शिवमहापुराण की दूसरी संहिता रुद्र संहिता है। रुद्र संहिता के पांच खंड यानि भाग है। प्रथम खंड में बीस अध्याय हैं। दूसरे खंड को सती खंड कहा गया है, जिसमें 43 अध्याय हैं। तीसरा खंड पार्वती खंड है, जिसमें 55 अध्याय हैं। चौथा खंड कुमार खंड के नाम से जाना जाता है, जिसमें 20 अध्याय हैं। इस संहिता का पांचवां खंड युद्ध खंड के नाम से जाना जाता है, इसमें कुल 59 अध्याय हैं। [2] इसी संहिता में \’सृष्टि खण्ड\’ के अन्तर्गत जगत् का आदि कारण शिव को माना गया हैं शिव से ही आद्या शक्ति \’माया\’ का आविर्भाव होता हैं फिर शिव से ही \’ब्रह्मा\’ और \’विष्णु\’ की उत्पत्ति बताई गई है।[3] इस पुराण में २४,००० श्लोक है तथा इसके क्रमश: ६ खण्ड है- विद्येश्वर संहिता, रुद्र संहिता, कोटिरुद्र संहिता, उमा संहिता, कैलास संहिता, वायु संहिता। रुद्र संहिता प्रथम भाग (सृष्टि खण्ड) रुद्र संहिता प्रथम भाग(सृष्टि खण्ड) में कुल २० अध्याय हैं। इस खंड में निम्न विषयों पर कथा देखी जा सकती है :- ऋषियों के प्रश्न के उत्तर में नारद-ब्रह्म-संवाद की अवतारणा करते हुए सूतजी का उन्हें नारदमोह का प्रसंग सुनाना; कामविजय के गर्व से युक्त हुए नारद का शिव, ब्रह्मा तथा विष्णु के पास जाकर अपने तप का प्रभाव बताना मायानिर्मित नगर में शीलनिधि की कन्यापर मोहित हुए नारद जी का भगवान् विष्णु से उनका रूप माँगना, भगवान् का अपने रूप के साथ उन्हें वानर का-सा मुँह देना, कन्या का भगवान् को वरण करना और कुपित हुए नारद का शिवगणों को शाप देना नारदजी का भगवान् विष्णु को क्रोधपूर्वक फटकारना और शाप देना; फिर माया के दूर हो जाने पर पश्चात्तापपूर्वक भगवान् के चरणों में गिरना और शुद्धि का उपाय पूछना तथा भगवान् विष्णु का उन्हें समझा-बुझाकर शिव का माहात्म्य जानने के लिये ब्रह्माजी के पास जाने का आदेश और शिव के भजन का उपदेश देना नारदजी का शिवतीर्थों में भ्रमण, शिवगणों को शापोद्धार की बात बताना तथा ब्रह्मलोक में जाकर ब्रह्माजी से शिवतत्त्व के विषय में प्रश्न करना महाप्रलयकाल में केवल सद्ब्रह्म की सत्ता का प्रतिपादन, उस निर्गुण-निराकार ब्रह्म से ईश्वरमूर्ति (सदाशिव) का प्राकट्य, सदाशिव द्वारा स्वरूपभूता शक्ति (अम्बिका) का प्रकटीकरण, उन दोनों के द्वारा उत्तम क्षेत्र (काशी या आनन्दवन) का प्रादुर्भाव, शिव के वामांग से परम पुरुष (विष्णु) का आविर्भाव तथा उनके सकाश से प्राकृत तत्त्वों की क्रमश: उत्पत्ति का वर्णन भगवान् विष्णु की नाभि से कमल का प्रादुर्भाव, शिवेच्छावश ब्रह्माजी का उससे प्रकट होना, कमलनाल के उद्गम का पता लगाने में असमर्थ ब्रह्मा का तप करना, श्रीहरि का उन्हें दर्शन देना, विवादग्रस्त ब्रह्मा-विष्णु के बीच में अग्नि-स्तम्भ का प्रकट होना तथा उसके ओर-छोर का पता न पाकर उन दोनों का उसे प्रणाम करना ब्रह्मा और विष्णु को भगवान् शिव के शब्दमय शरीर का दर्शन[4] उमा सहित भगवान् शिव का प्राकट्य, उनके द्वारा अपने स्वरूप का विवेचन तथा ब्रह्मा आदि तीनों देवताओं की एकता का प्रतिपादन; श्रीहरि को सृष्टि की रक्षा का भार एवं भोग-मोक्ष-दान का अधिकार दे शिव का अन्तर्धान होना शिवपूजन की विधि तथा उसका फल भगवान् शिव की श्रेष्ठता तथा उनके पूजन की अनिवार्य आवश्यकता का प्रतिपादन; शिवपूजन की सर्वोत्तम विधि का वर्णन विभिन्न पुष्पों, अन्नों तथा जलादि की धाराओं से शिवजी की पूजा का माहात्म्य; सृष्टि का वर्णन स्वायम्भुव मनु और

August 12, 2022 / 0 Comments
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भगवान महावीर की जीवनी व इतिहास

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भगवान महावीर की जीवनी व इतिहास पंचशील सिद्धान्त के प्रर्वतक एवं जैन धर्म के चौबिसवें तीर्थकंर महावीर स्वामी अहिंसा के मूर्तिमान प्रतीक थे। जिस युग में हिंसा, पशुबलि, जाति-पाँति के भेदभाव का बोलबाला था उसी युग में भगवान महावीर ने जन्म लिया। उन्होंने दुनिया को सत्य, अहिंसा जैसे खास उपदेशों के माध्यम से सही राह दिखाने की ‍कोशिश की। अपने अनेक प्रवचनों से मनुष्यों का सही मार्गदर्शन किया। नाम Lord Mahavira / भगवान् महावीर जन्म 599 BC मृत्यु 527 BC पिता सिद्धार्थ माता त्रिशाला नवीन शोध के अनुसार जैन धर्म की स्थापना वैदिक काल में हुई थी। जैन धर्म के वास्तविक संस्थापक ऋषभदेव थे। महावीर स्वामी ने जैन धर्म में अपेक्षित सुधार करके इसका व्यापक स्तर पर प्रचार किया। महावीर स्वामी का जन्म वैशाली (बिहार) के निकट कुण्डग्राम में क्षत्रिय परिवार में हुआ था। बचपन का नाम वर्धमान था। पिता सिद्धार्थ, जो कुण्डग्राम के राजा थे एवं माता त्रिशला का संबन्ध भी राजघराने से था। राजपरिवार में जन्म होने के कारण महावीर स्वामी का प्रारम्भिक जीवन सुख-सुविधाओं से परिपूर्ण बीता। पिता की मृत्यु के पश्चात 30 वर्ष की आयु में इन्होने सन्यास ग्रहण कर लिया और कठोर तप में लीन हो गये। ऋजुपालिका नदि के तट पर सालवृक्ष के नीचे उन्हे ‘कैवल्य’ ज्ञान (सर्वोच्च ज्ञान) की प्राप्ति हुई जिसके कारण उन्हे ‘केवलिन’ पुकारा गया। इन्द्रियों को वश में करने के कारण ‘जिन’ कहलाये एवं पराक्रम के कारण ‘महावीर’ के नाम से विख्यात हुए। महावीर स्वामी द्वारा बताया गया पंचशील सिद्धांत अहिंसा – कर्म, वाणी, व विचार में किसी भी तरह की अहिंसा न हो, गलती से भी किसी को चोट ना पहुंचाई जाए सत्य – सदा सत्य बोलें अपरिग्रह – किसी तरह की संपत्ति न रखें, किसी चीज से जुडें नहीं अचौर्य (अस्तेय) – कभी चोरी ना करें ब्रह्मचर्य – जैन मुनि भोग विलास से दूर रहें, गृहस्त अपने साथी के प्रति वफादार रहें जैन धर्म, महावीर स्वामी के समय में कोशल, विदेह, मगध, अंग, काशी, मिथला आदि राज्यों में लोकप्रिय हो गया था। मौर्यवंश व गुप्त वंश के शासनकाल के मध्य में जैन धर्म पूर्व में उङिसा से लेकर पश्चिम में मथुरा तक फैला था। महावीर स्वामी की मृत्यु के लगभग दो सौ वर्ष पश्चात जैन धर्म मुख्यतः दो सम्प्रदाय में बंट गया: दिगम्बर जैन और श्वेताम्बर जैन। श्वेताम्बर जैन मुनि सफेद वस्त्र धारण करते हैं जबकि दिगम्बर जैन मुनियों के लिये नग्न रहना आवश्यक है। जैन धर्म ने भारतीय सभ्यता और संस्कृति के विभिन्न पक्षों को बहुत प्रभावित किया है। दर्शन, कला, और साहित्य के क्षेत्र में जैन धर्म का महत्वपूर्ण योगदान है। जैन धर्म में वैज्ञानिक तर्कों के साथ अपने सिद्धान्तो को जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास किया गया है। अहिंसा का सिद्धान्त जैन धर्म की मुख्य देन है। महावीर स्वामी ने पशु-पक्षी तथा पेङ-पौधे तक की हत्या न करने का अनुरोध किया है। अहिंसा की शिक्षा से ही समस्त देश में दया को ही धर्म प्रधान अंग माना जाता है। जैन धर्म से प्रेरित होकर कई राजाओं ने निर्धन वर्ग के लिये औषधालयों, विश्रामालयों एवं पाठशालाओं का निर्माण करवाया। जैन धर्म के 24 तीर्थकंरों के नाम इस प्रकार हैः- 1.ऋषभदेव, 2. अजीतनाथ, 3.सम्भवनाथ, 4.अभिनन्दन, 5.सुमतिनाथ, 6.पद्मप्रभु, 7.सुपार्श्वनाथ, 8.चन्द्रप्रभु, 9.सुविधि, 10.शीतल, 11.श्रेयांश, 12.वासुपुज्य, 13.विमल, 14.अनन्त, 15.धर्म, 16.शान्ति, 17.कुन्थ, 18.अर, 19.मल्लि, 20.मुनि सुब्रत, 21.नेमिनाथ, 22.अरिष्टनेमि, 23.पार्श्वनाथ, 24.महावीर स्वामी। महावीर स्वामी ने समाज में प्रचलित वर्ण व्यवस्था का विरोध किया था। भगवान महावीर का आत्म धर्म जगत की प्रत्येक आत्मा के लिए समान था। महावीर का ‘जीयो और जीने दो’ का सिद्धांत जनकल्याण की भावना को परिलाक्षित करता है।

August 2, 2022 / 0 Comments
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गुरु गोरखनाथ जी की जीवनी एवं इतिहास

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गुरु गोरखनाथ जी की जीवनी एवं इतिहास गुरु गोरखनाथ भारत की भूमि ऋषि-मुनियो और तपस्वियों की भूमि रही है। जिन्होंने अपने बौद्धिक क्षमता के दम पर भारत ही नहीं वरन सम्पूर्ण सृष्टि के भलाई के लिए बहुत योगदान दिया है। ऋषि-मुनियो के शिक्षा से हमें जीवन में सही राह चुनने का ज्ञान होता है। साधु महात्माओ द्वारा दिए गए ज्ञान-विज्ञान 21 वी सदी में भी बहुत प्रासंगिक हैं। महापुरुषों में ऐसे कई ऋषि-मुनि हुए जो बचपन से ही दैविये गुणों के कारण या तपस्या के फलस्वरूप कई प्रकार की सिद्धियाँ व शक्तियां प्राप्त कर लेते थे, जिनका उपयोग मानव कल्याण तथा धर्म के रक्षार्थ हेतु हमेशा से किया जाता रहा है। यह सिद्धियाँ और शक्तियाँ ऋषि-मुनियों को एक चमत्कारी तथा प्रभावी व्यक्तित्व प्रदान करती हैं और ऐसे सिद्ध योगियों के लिए भौतिक सीमाए किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न नहीं कर पाती है। पर इन शक्तियों को प्राप्त करना सहज नहीं है| परमशक्तिशाली ईश्वर द्वारा इन सिद्धियों के सुपात्र को ही एक कड़ी परीक्षा के बाद प्रदान किया जाता है। आज हम ऐसे एक सुपात्र सिद्ध महापुरुष जो साक्षात् शिवरूप माने जाते हैं के बारे में बात करेंगे| इनके बारे में कहा जाता है कि आज भी वह सशरीर जीवित हैं और हमारे पुकार को सुनते हैं और हमें मुसीबतो से पार भी लगाते हैं। हम बात कर रहे हैं महादेव भोलेनाथ के परम भक्त – गोरखनाथ शब्द का अर्थ गुरु गोरखनाथ को गोरक्षनाथ के नाम से भी जाना जाता है जिसका शाब्दिक अर्थ “गाय को रखने और पालने वाला या गाय की रक्षा करने वाला” होता है। सनातन धर्म में गाय का बहुत ही धार्मिक महत्व है। मान्यता है कि गाय के शरीर में सभी 33 करोड़ देवी-देवता निवास करते है। भारतीय संस्कृति में गाय को माता के रूप में पूजा जाता है। गुरु गोरखनाथ समाधि गुरु गोरखनाथ के नाम पर उत्तरप्रदेश में गोरखपुर नगर है। गुरु गोरखनाथ ने यहीं पर अपनी समाधि ली थी। गोरखपुर में बाबा गोरखनाथ का एक भव्य और प्रसिद्ध मंदिर है। इस मंदिर पर मुग़ल काल में कई बार हमले हुए और इसे तोड़ा गया लेकिन हर बार यह मंदिर गोरखनाथ जी के आशीर्वाद से अपने पूरे गौरव के साथ खड़ा हो जाता। बाद में नाथ संप्रदाय के साधुओं द्वारा सैन्य टुकड़ी बना कर इस मंदिर की दिन रात रक्षा की गई। भारत ही नहीं नेपाल में भी गोरखा नाम से एक जिला और एक गोरखा राज्य भी है | कहा जाता है कि गुरु गोरखनाथ ने यहाँ डेरा डाला था जिस वजह से इस जगह का नाम गोरखनाथ के नाम पर पड़ गया तथा यहाँ के लोग गोरखा जाति के कहलाये| गुरु गोरखनाथ के जन्म से जुड़ी असाधारण बात गुरु गोरखनाथ का जन्म स्त्री गर्भ से नहीं हुआ था बल्कि गोरखनाथ का अवतार हुआ था। सनातन ग्रंथो के अनुसार गुरु गोरखनाथ हर युग में हुए है तथा उनको महान चिरंजीवियों में से एक गिना जाता है | गुरु गोरखनाथ की उत्पत्ति गहन शोध का विषय है कई मॉडर्न इतिहासकारो का मानना है कि भगवान राम और श्री कृष्ण की तरह ही गुरु गोरखनाथ एक काल्पनिक किरदार हैं और कई इतिहासकारों का कहना है कि गुरु गोरखनाथ का काल 9 वी शताब्दी के मध्य में था। लेकिन सनातन पंचांग जो दुनिया का एकमात्र वैज्ञानिक कैलेंडर है की माने तो गुरुगोरखनाथ सभी युगो में थे तथा भगवान् श्री राम और भगवान् श्री कृष्ण से संवाद भी स्थापित किये थे | रोट उत्सव से जुड़ी रोचक जानकारी नेपाल के गोरखा नामक जिला में एक गुफा है जिसके बारे में कहा जाता है की गुरु गोरखनाथ ने यहाँ तपस्या की थी आज भी उस गुफा में गुरु गोरखनाथ के पगचिन्ह मौजूद है साथ ही उनकी एक मूर्ति भी है। इस स्थल पर गुरु गोरखनाथ के स्मृति में प्रतिवर्ष वैशाख पूर्णिमा को एक उत्सव का योजन होता है जिसे बड़े ही हर्षोउल्लास के साथ मनाया जाता है। इस उत्सव को “रोट उत्सव” के नाम से जाना जाता है। नेपाल नरेश नरेन्द्रदेव भी गुरु गोरखनाथ के बहुत बड़े भक्त थे| वह उनसे दिक्षा प्राप्त कर उनके शिष्य बन गए थे। तेजवंत गुरु मत्स्येन्द्रनाथ और गुरु गोरखनाथ शंकर भगवान को नाथ संप्रदाय के संस्थापक कहा जाता है | जिसके आदिगुरु भगवान दत्तात्रेय थे | भगवान् दत्तात्रेय के शिष्य मत्स्येन्द्रनाथ थे | वह ध्यान धर्म और प्रभु उपासना के उपरांत भिक्षाटन कर के जीवन व्यतीत करते हैं | एक बार भिक्षाटन करते हुए एक गाँव में गए | उन्होंने एक घर के बहार आवाज़ लगाई| घर का दरवाजा खुला और एक महिला ने मत्स्येन्द्रनाथ को अन्न दान किया और प्रणाम करते हुए कहा कि मेरा पुत्र नहीं है और आशीर्वाद माँगा कि मुझे एक पुत्र चाहिए जो वृद्धावस्था में मेरा उद्धार कर सके | मत्स्येन्द्रनाथ ने उस स्त्री को चुटकी भर भभूत दिया और बोले की इसका सेवन कर लो यथासमय तुम्हे जरूर पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी जो बहुत ही धार्मिक होगा और उसकी ख्याति देश-विदेश में बढ़ेगी। ऐसा आशीर्वाद देकर मत्स्येन्द्रनाथ अपने यात्रा क्रम में भिक्षाटन करते हुए आगे बढ़ गए | लगभग बारह वर्ष पश्चात् गुरु मत्स्येन्द्रनाथ यात्रा करते हुए उसी गांव में पहुंचे| भिक्षाटन करते हुए जब मत्स्येन्द्रनाथ उस घर के समीप गए तो उन्हें वो स्त्री याद आई जिसको उन्होंने भभूत खाने के लिए दिया था | द्वार पर आवाज लगाने के बाद वही स्त्री बहार आई। गुरु मत्स्येन्द्रनाथ ने बालक के बारे में पूछा तो स्त्री सकपका गई, डर और लज़्ज़ा के मारे उसके मुख से वाणी नहीं निकल रही थी | हिम्मत करते हुए स्त्री ने बताया कि, आप जब भभूत देकर गए तो आस-पड़ोस की महिलाएँ मेरा उपहास करने लगीं कि, मैं साधु-संतो के दिए हुए भभूत पर विश्वास करती हूँ… इसलिए, मैंने उस भभूत को सेवन करने के बजाय गोबर पर फेंक दिया | तब, गुरु मत्स्येंद्रनाथ ने अपने योगबल से पूर्ण स्थिति को जान लिया | उसके बाद वह चुपचाप उस तरफ बढे जिस तरफ उस स्त्री ने भभूत फेंका था | उस जगह पहुँच कर उन्होंने आवाज लगाई और तभी एक तेज से परिपूर्ण ओजस्वी 12 वर्ष का बालक दौड़ता हुआ गुरु मत्स्येन्द्रनाथ के पास आ गया और गुरु मत्स्येन्द्रनाथ उस बालक को लेकर अपने साथ चल दिए | यही

August 1, 2022 / 0 Comments
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इंद्र देव जी की कहानी

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इंद्र देव जी की कहानी भगवान इन्द्र (या इंद्र) हिन्दू धर्म में सभी देवताओं के राजा का सबसे उच्च पद था[1] जिसकी एक अलग ही चुनाव-पद्धति थी। इस चुनाव पद्धति के विषय में स्पष्ट वर्णन उपलब्ध नहीं है। वैदिक साहित्य में भगवान इन्द्र को सर्वोच्च महत्ता प्राप्त है लेकिन पौराणिक साहित्य में इनकी महत्ता निरन्तर क्षीण होती गयी और त्रिदेवों की श्रेष्ठता स्थापित हो गयी। आदित्यों में भगवान इन्द्र सबसे पहले आदित्य हैं। ऋग्वेद के लगभग एक-चौथाई सूक्तभगवान इन्द्र से सम्बन्धित हैं। 250 सूक्तों के अतिरिक्त 50 से अधिक मन्त्रों में उसका स्तवन प्राप्त होता है।[2] वह ऋग्वेद का सर्वाधिक लोकप्रिय और महत्त्वपूर्ण देवता है। उसे आर्यों का राष्ट्रीय देवता भी कह सकते हैं।[3] मुख्य रूप से वह वर्षा का देवता है जो कि अनावृष्टि अथवा अन्धकार रूपी दैत्य से युद्ध करता है तथा अवरुद्ध जल को अथवा प्रकाश को विनिर्मुक्त बना देता है।[4] वह गौण रूप से आर्यों का युद्ध-देवता भी है, जो दैत्यों के साथ युद्ध में उन आर्यों की सहायता करता है। भगवान इन्द्र का मानवाकृतिरूपेण चित्रण दर्शनीय है। उसके विशाल शरीर, शीर्ष भुजाओं और बड़े उदर का बहुधा उल्लेख प्राप्त होता है।[5] उसके अधरों और जबड़ों का भी वर्णन मिलता है।[6] उसका वर्ण हरित् है। उसके केश और दाढ़ी भी हरित्वर्णा है।[7] वह स्वेच्छा से विविध रूप धारण कर सकता है।[8] ऋग्वेद भगवान इन्द्र के जन्म पर भी प्रकाश डालता है। पूरे दो सूक्त भगवान इन्द्र के जन्म से ही सम्बन्धित हैं।[9] ‘निष्टिग्री’ अथवा ‘शवसी’ नामक गाय को उसकी माँ बतलाया गया है।[10] उसके पिता ‘द्यौः’ या ‘त्वष्टा’ हैं।[11] एक स्थल पर उसे ‘सोम’ से उत्पन्न कहा गया है। उसके जन्म के समय द्यावा-पृथ्वी काँप उठी थी। भगवान इन्द्र के जन्म को विद्युत् के मेघ-विच्युत होने का प्रतीक माना जा सकता है।[12] भगवान इन्द्र के सगे-सम्बन्धियों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है। अग्नि और पूषन् उसके भाई हैं।[13] इसी प्रकार देवी इन्द्राणी उसकी पत्नी[14] है। संभवतः देवी \’इन्द्राणी\’ नाम परम्परित रूप से पुरुष (पति) के नाम का स्त्रीवाची बनाने से ही है[15] मूल नाम कुछ और (\’शची\’)[16] हो सकता है। मरुद्गण उसके मित्र तथा सहायक हैं। उसे वरुण, वायु, सोम, बृहस्पति, पूषन् और विष्णु के साथ युग्मरूप में भी कल्पित किया गया है तीन चार सूक्तों में वह सूर्य का प्रतिरूप है।[17] भगवान इन्द्र एक वृहदाकार देवता है। उसका शरीर पृथ्वी के विस्तार से कम से कम दस गुना है। वह सर्वाधिक शक्तिमान् है। इसीलिए वह सम्पूर्ण जगत् का एक मात्र शासक और नियन्ता है। उसके विविध विरुद शचीपति (=शक्ति का स्वामी), शतक्रतु (=सौ शक्तियों वाला) और शक्र (=शक्तिशाली), आदि उसकी विपुला शक्ति के ही प्रकाशक हैं। सोमरस भगवान इन्द्र का परम प्रिय पेय है। वह विकट रूप से सोमरस का पान करता है। उससे उसे स्फूर्ति मिलती है। वृत्र के साथ युद्धके अवसर पर पूरे तीन सरोवरों को उसने पीकर सोम-रहित कर दिया था। दशम मण्डल के 119वें सूक्त में सोम पीकर मदविह्वल बने हुए स्वगत भाषण के रूप में अपने वीर-कर्मों और शक्ति का अहम्मन्यतापूर्वक वर्णन करते हुए भगवान इन्द्र को देखा जा सकता है। सोम के प्रति विशेष आग्रह के कारण ही उसे सोम का अभिषव करने वाले अथवा उसे पकाने वाले यजमान का रक्षक बतलाया गया है। भगवान इन्द्र का प्रसिद्ध आयुध ‘वज्र’ है, जिसे कि विद्युत्-प्रहार से अभिन्न माना जा सकता है। भगवान इन्द्र के वज्र का निर्माण ‘त्वष्टा’ नामक देवता-विशेष द्वारा किया गया था।भगवान इन्द्र को कभी-कभी धनुष-बाण और अंकुश से युक्त भी बतलाया गया है। उसका रथ स्वर्णाभ है। दो हरित् वर्ण अश्वों द्वारा वाहित उस रथ का निर्माण देव-शिल्पी ऋभुओं द्वारा किया गया था। इन्द्रकृत वृत्र-वध ऋग्वेद में बहुधा और बहुशः वर्णित और उल्लिखित है। सोम की मादकता से उत्प्रेरित हो, प्रायः मरुद्गणों के साथ, वह ‘वृत्र’ अथवा ‘अहि’ नामक दैत्यों (=प्रायः अनावृष्टि और अकाल के प्रतीक) पर आक्रमण करके अपने वज्र से उनका वध कर डालता है और पर्वत को भेद कर बन्दीकृत गायों के समान अवरुद्ध जलों को विनिर्मुक्त कर देता है। उक्त दैत्यों का आवास-स्थल ‘पर्वत’ मेघों के अतिरिक्त कुछ नहीं है, जिनका भेदन वह जल-विमोचन हेतु करता है। इसी प्रकार गायों को अवरुद्ध कर रखने वाली प्रस्तर-शिलाएँ भी जल-निरोधक मेघ ही हैं।[18] मेघ ही वे प्रासाद भी हैं जिनमें पूर्वोक्त दैत्य निवास करते हैं। इन प्रासादों की संख्या कहीं 90, कहीं 99 तो कहीं 100 बतलाई गई है, जिनका विध्वंस करके भगवान इन्द्र ‘पुरभिद्’ विरुद धारण करता है। वृत्र या अहि के वधपूर्वक जल-विमोचन के साथ-साथ प्रकाश के अनवरुद्ध बना दिये जाने की बात भी बहुधा वर्णित है। उस वृत्र या अहि को मार कर इन्द्र सूर्य को सबके लिये दृष्टिगोचर बना देता है। यहाँ पर उक्त वृत्र या अहि से अभिप्राय या तो सूर्य प्रकाश के अवरोधक मेघ से है, या फिर निशाकालिक अन्धकार से। सूर्य और उषस् के साथ जिन गायों का उल्लेख मिलता है, वे प्रातः कालिक सूर्य की किरणों का ही प्रतिरूप हैं, जो कि अपने कृष्णाभ आवास-स्थल से बाहर निकलती हैं। इस प्रकार भगवान इन्द्र का गोपपतित्व भी सुप्रकट हो जाता है। वृत्र और अहि के वध के अतिरिक्त अन्य अनेक उपाख्यान भी भगवान इन्द्र के सम्बन्ध में उपलब्ध होते हैं। ‘सरमा’ की सहायता से उसने ‘पणि’ नामक दैत्यों द्वारा बन्दी बनाई गई गायों को छीन लिया था। ‘उषस्’ के रथ का विध्वंस, सूर्य के रथ के एक चक्र की चोरी, सोम-विजय आदि उपाख्यान भी प्राप्त हैं। भगवान इन्द्र ने कम्पायमान भूतल और चलायमान पर्वतों को स्थिर बनाया है। चमड़े के समान उसने द्यावापृथिवी को फैला कर रख दिया है। जिस प्रकार एक धुरी से दोनों पहिये निकाल दिये जायँ, उसी प्रकार उसने द्युलोक और पृथ्वी को पृथक् कर दिया है। भगवान इन्द्र बड़े उग्र स्वभाव का है। स्वर्ग की शान्ति को भंग करने वाले वही एकमात्र देवता है। अनेक देवताओं से उसने युद्ध किया। उषस् के रथ को उसने भंग किया, सूर्य के रथ का एक चक्र उसने चुराया, अपने अनुयायी मरुतों को उसने मार डालने की धमकी दी। अपने पिता ‘त्वष्टा’ को उसने मार ही डाला। अनेक दैत्यों को भी उसने पराजित और विनष्ट किया, जिसमें से वृत्र, अहि, शम्बर, रौहिण के अतिरिक्त उरण विश्वरूप, अर्बुद, बल, व्यंश और नमुचि प्रमुख हैं। आर्यों के शत्रुभूत दासों अथवा दस्युओं को भी उसने युद्धों में पराभूत किया। कम

July 31, 2022 / 0 Comments
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विष्णु देव जी की कहानी

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विष्णु देव जी की कहानी हिंदू धर्म के अनुसार परमेश्वर के तीन मुख्य रूपों में से एक रूप हैं। पुराणों में त्रिमूर्ति विष्णु को विश्व का पालनहार कहा गया है। त्रिमूर्ति के अन्य दो भगवान शिव और ब्रह्मा को माना गया है। जहाँ ब्रह्मा को विश्व का सृजन करने वाला माना गया है वहीं शिव को संहारक माना गया है। विष्णु की पत्नी लक्ष्मी हैं। विष्णु का निवास क्षीरसागर है। उनका शयन शेषनाग के ऊपर है। सम्पूर्ण जीवों के आश्रय होने के कारण भगवान श्री विष्णु ही नारायण कहे जाते हैं। सर्वव्यापक परमात्मा ही भगवान श्री विष्णु हैं। यह सम्पूर्ण विश्व भगवान विष्णु की शक्ति से ही संचालित है। वे निर्गुण भी हैं और सगुण भी। वे अपने चार हाथों में क्रमश: शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण करते हैं। जो किरीट और कुण्डलों से विभूषित, पीताम्बरधारी, वनमाला तथा कौस्तुभमणि को धारण करने वाले, सुन्दर कमलों के समान नेत्र वाले भगवान श्री विष्णु का ध्यान करता है वह भव-बन्धन से मुक्त हो जाता है। पौराणिक संदर्भ पद्म पुराण के उत्तरखण्ड में वर्णन है कि भगवान श्री विष्णु ही परमार्थ तत्त्व हैं। वे ही ब्रह्मा और शिव सहित समस्त सृष्टि के आदि कारण हैं। जहाँ ब्रह्मा को विश्व का सृजन करने वाला माना जाता है वहीं शिव को संहारक माना गया है। विष्णु की सहचारिणी लक्ष्मी हैं। वे ही नारायण, वासुदेव, परमात्मा, अच्युत, कृष्ण, शाश्वत, शिव, ईश्वर तथा हिरण्यगर्भ आदि अनेक नामों से पुकारे जाते हैं। नर अर्थात जीवों के समुदाय को नार कहते हैं। कल्प के प्रारम्भ में एकमात्र सर्वव्यापी भगवान नारायण ही थे। वे ही सम्पूर्ण जगत की सृष्टि करके सबका पालन करते हैं और अन्त में सबका संहार करते हैं। इसलिये भगवान श्री विष्णु का नाम हरि है। मत्स्य, कूर्म, वाराह, वामन, हयग्रीव तथा श्रीराम-कृष्ण आदि भगवान श्री विष्णु के ही अवतार हैं। भगवान श्री विष्णु अत्यन्त दयालु हैं। वे अकारण ही जीवों पर करुणा-वृष्टि करते हैं। उनकी शरण में जाने पर परम कल्याण हो जाता है। जो भक्त भगवान श्री विष्णु के नामों का कीर्तन, स्मरण, उनके अर्चाविग्रह का दर्शन, वन्दन, गुणों का श्रवण और उनका पूजन करता है, उसके सभी पाप-ताप विनष्ट हो जाते हैं। यद्यपि भगवान विष्णु के अनन्त गुण हैं, तथापि उनमें भक्त वत्सलता का गुण सर्वोपरि है। चारों प्रकार के भक्त जिस भावना से उनकी उपासना करते हैं, वे उनकी उस भावना को परिपूर्ण करते हैं। अन्य नाम शिव , हरि , चक्रधारी , वासुदेव , नारायण , अच्युत , श्रीकांत , पीतांबर , सत्यनारायण , जगदीश , जनार्धन , दामोदर , जगन्नाथ आदि देवनागरी विष्णु जी तमिल लिपि விஷ்ணு कन्नड़ लिपि ವಿಷ್ಣು संबंध हिन्दू धर्म , वैष्णव निवासस्थान क्षीरसागर , वैकुंठ मंत्र ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय, ॐ विष्णवे नम:, ॐ नमो नारायणाय, हरिः ॐ। अस्त्र शंख (पाञ्चजन्य),चक्र (सुदर्शन), गदा (कौमोदकी) और पद्म, धनुष (सारंग), तलवार नंदक और फरसा परशू प्रतीक शालिग्राम और आंवले का पेड़ दिवस बृहस्पतिवार (गुरुवार) वर्ण पीला जीवनसाथी महालक्ष्मी देवी और वृन्दा संतान कामदेव सवारी पक्षीराज गरुड़ और नागराज शेषनाग शास्त्र श्रीमद् भागवत महापुराण, विष्णु पुराण, गरुड़ पुराण, , मत्स्य पुराण, नरसिंह पुराण,वामन पुराण, रामायण और महाभारत त्यौहार अनन्त चतुर्दशी , सभी एकादशी , सभी पूर्णिमा , कृष्ण जन्माष्टमी , राम नवमी , कल्कि जयंती , नारद जयंती , मत्स्य जयंती , कूर्म जयंती , वराह द्वादशी , वामन द्वादशी , नरसिंह जयंती , हयग्रीव जयंती , वेदव्यास जयंती , परशुराम जयंती आदि त्यौहार भगवान विष्णु जी जिनको वेदों में ईश्वर कहा है चतुर्भुज विष्णु जी को सबसे निकटतम मूर्त एवं मूर्त ब्रह्म कहा गया है। विष्णु जी को सर्वाधिक भागवत एवं विष्णु पुराण में वर्णन है और सभी पुराणों में भागवत पुराण को सर्वाधिक मान्य माना गया है जिसके कारण विष्णु जी का महत्व अन्य त्रिदेवों के तुलना में अधिक हो जाता है । गीता अध्याय ११ में विश्वस्वरूप विराट स्वरूप के अतिरिक्त चतुर्भुज स्वरूप के दर्शन देना सिद्ध करता है परमेश्वर का चतुर्भुज स्वरूप सुगम है। ऋग्वेद एवं अन्य वेदों में भी अनेको सूक्त विष्णु को समर्पित है जिसको विष्णु सूक्त भी कहा गया है। ऋग्वेद में सर्वप्रथम स्वतंत्र रूप से विष्णु जी को मंडल १ के सूक्त २२ में वर्णन आया है जिसमे विष्णु जी के वामन अवतार के तीन पग से तीन लोक मापने के वर्णन है । अन्य रिग्वेदिक सूक्त १५६, मंडल ७ सूक्त १०० में विष्णु के वर्णन हैं जिसमे विष्णु जी को इंद्र का मित्र एवं वृत्त के वध हेतु इंद्र की सहायता करना वर्णन है जिससे त्रिदेव के विष्णु की महत्ता समझ आती है । हिन्दू धर्म के आधारभूत ग्रन्थों में बहुमान्य पुराणानुसार विष्णु जी परमेश्वर के तीन मुख्य रूपों में से एक रूप हैं। पुराणों में त्रिमूर्ति विष्णु जी को विश्व या जगत का पालनहार कहा गया है। त्रिमूर्ति के अन्य दो रूप ब्रह्मा और शिव जी को माना जाता है। ब्रह्मा जी को जहाँ विश्व का सृजन करने वाला माना जाता है, वहीं शिव जी को संहारक माना गया है। मूलतः विष्णु जी और शिव जी तथा ब्रह्मा जी भी एक ही हैं यह मान्यता भी बहुशः स्वीकृत रही है। न्याय को प्रश्रय अन्याय के विनाश तथा जीव (मानव) को परिस्थिति के अनुसार उचित मार्ग-ग्रहण के निर्देश हेतु विभिन्न रूपों में अवतार ग्रहण करनेवाले के रूप में विष्णु जी मान्य रहे हैं। पुराणानुसार विष्णु जी की पत्नी लक्ष्मी हैं। कामदेव विष्णु जी के पुत्र थे। विष्णु जी का निवास क्षीर सागर है। उनका शयन शेषनाग के ऊपर है। उनकी नाभि से कमल उत्पन्न होता है जिसमें ब्रह्मा जी स्थित हैं। वह अपने नीचे वाले बाएँ हाथ में पद्म (कमल), अपने नीचे वाले दाहिने हाथ में गदा (कौमोदकी) ,ऊपर वाले बाएँ हाथ में शंख (पाञ्चजन्य) और अपने ऊपर वाले दाहिने हाथ में चक्र(सुदर्शन) धारण करते हैं। विष्णु की अनुपम विशेषता उनके तीन पाद-प्रक्षेप हैं, जिनका ऋग्वेद में बारह बार उल्लेख मिलता है। सम्भवतः यह उनकी सबसे बड़ी विशेषता है। उनके तीन पद-क्रम मधु से परिपूर्ण कहे गये हैं, जो कभी भी क्षीण नहीं होते। उनके तीन पद-क्रम इतने विस्तृत हैं कि उनमें सम्पूर्ण लोक विद्यमान रहते हैं (अथवा तदाश्रित रहते हैं)। ‘त्रेधा विचक्रमाणः’ भी प्रकारान्तर से उनके तीन पाद-प्रक्षेपों को ध्वनित करता है। ‘उरुगाय’ और ‘उरुक्रम’ आदि पद भी उक्त तथ्य के परिचायक हैं। मधु से आपूरित उनके तीन

July 31, 2022 / 0 Comments
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गुरु गोबिन्द सिंह जी का इतिहास

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गुरु गोबिन्द सिंह दशम सिख गुरु, खालसा के संस्थापक (1666-1708) गुरु गोबिन्द सिंह (जन्म: पौषशुक्ल सप्तमी संवत् 1723 विक्रमी तदनुसार 22 दिसम्बर 1666- ਜਯੋਤੀ ਜੋਤ 7 अक्टूबर 1708 ) सिखों के दसवें गुरु थे। आपके पिता जी श्री गुरू तेग बहादुर जी के बलिदान के उपरान्त 11 नवम्बर सन 1675 को 10 वें गुरू बने। आप एक महान योद्धा, चिन्तक, कवि, भक्त एवं आध्यात्मिक नेता थे। सन 1699 में बैसाखी के दिन उन्होंने खालसा पंथ (पन्थ) की स्थापना की जो सिखों के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण दिन माना जाता है। जन्म गोबिन्द राय 22 दिसंबर , 1666 पटना बिहार, भारत मृत्यु 7 अक्टूबर 1708 (उम्र 42) नांदेड़, महाराष्ट्र, भारत जातीयता सिख समुदाय पदवी सिखों के दसवें गुरु प्रसिद्धि कारण दसवें सिख गुरु, सिख खालसा सेना के संस्थापक एवं प्रथम सेनापति पूर्वाधिकारी गुरु तेग बहादुर उत्तराधिकारी गुरु ग्रंथ साहिब धार्मिक मान्यता सिख जीवनसाथी माता जीतो, माता सुंदरी, माता साहिब देवां बच्चे अजीत सिंह जुझार सिंह जोरावर सिंह फतेह सिंह माता-पिता गुरु तेग बहादुर, माता गूजरी गुरु गोबिन्द सिंह ने पवित्र ग्रंथ (ग्रन्थ) गुरु ग्रंथ साहिब को पूरा किया तथा उन्हें गुरु रूप में प्रतिष्ठित किया। बचित्तर नाटक उनकी आत्मकथा है। यही उनके जीवन के विषय में जानकारी का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत है। यह दसम ग्रन्थ का एक भाग है। दसम ग्रन्थ (ग्रन्थ), गुरु गोबिन्द सिंह की कृतियों के संकलन का नाम है। उन्होने अन्याय, अत्याचार और पापों का खत्म करने के लिए और गरीबों की रक्षा के लिए मुगलों के साथ 14 युद्ध लड़े। धर्म के लिए समस्त परिवार का बलिदान उन्होंने किया, जिसके लिए उन्हें \’सरबंसदानी\’ (पूरे परिवार का दानी ) भी कहा जाता है। इसके अतिरिक्त जनसाधारण में वे कलगीधर, दशमेश, बाजांवाले, आदि कई नाम, उपनाम व उपाधियों से भी जाने जाते हैं। गुरु गोविन्द सिंह जहाँ विश्व की बलिदानी परम्परा में अद्वितीय थे, वहीं वे स्वयं एक महान लेखक, मौलिक चिन्तक तथा संस्कृत सहित कई भाषाओं के ज्ञाता भी थे। उन्होंने स्वयं कई ग्रन्थों की रचना की। वे विद्वानों के संरक्षक थे। उनके दरबार में 52 कवियों तथा लेखकों की उपस्थिति रहती थी, इसीलिए उन्हें \’संत सिपाही\’ भी कहा जाता था। वे भक्ति तथा शक्ति के अद्वितीय संगम थे उन्होंने सदा प्रेम, सदाचार और भाईचारे का सन्देश दिया। किसी ने गुरुजी का अहित करने की कोशिश भी की तो उन्होंने अपनी सहनशीलता, मधुरता, सौम्यता से उसे परास्त कर दिया। गुरुजी की मान्यता थी कि मनुष्य को किसी को डराना भी नहीं चाहिए और न किसी से डरना चाहिए। वे अपनी वाणी में उपदेश देते हैं भै काहू को देत नहि, नहि भय मानत आन। वे बाल्यकाल से ही सरल, सहज, भक्ति-भाव वाले कर्मयोगी थे। उनकी वाणी में मधुरता, सादगी, सौजन्यता एवं वैराग्य की भावना कूट-कूटकर भरी थी। उनके जीवन का प्रथम दर्शन ही था कि धर्म का मार्ग सत्य का मार्ग है और सत्य की सदैव विजय होती है। गुरु गोबिंद सिंह जी का नेतृत्व सिख समुदाय के इतिहास में बहुत कुछ नया ले कर आया। उन्होंने सन 1699 में बैसाखी के दिन खालसा जो की सिख धर्म के विधिवत् दीक्षा प्राप्त अनुयायियों का एक सामूहिक रूप है उसका निर्माण किया। सिख समुदाय के एक सभा में उन्होंने सबके सामने पुछा – \”कौन अपने सर का बलिदान देना चाहता है\”? उसी समय एक स्वयंसेवक इस बात के लिए राज़ी हो गया और गुरु गोबिंद सिंह उसे तम्बू में ले गए और कुछ देर बाद वापस लौटे एक खून लगे हुए तलवार के साथ। गुरु ने दोबारा उस भीड़ के लोगों से वही सवाल दोबारा पुछा और उसी प्रकार एक और व्यक्ति राज़ी हुआ और उनके साथ गया पर वे तम्बू से जब बहार निकले तो खून से सना तलवार उनके हाथ में था। उसी प्रकार पांचवा स्वयंसेवक जब उनके साथ तम्बू के भीतर गया, कुछ देर बाद गुरु गोबिंद सिंह सभी जीवित सेवकों के साथ वापस लौटे और उन्होंने उन्हें पंज प्यारे या पहले खालसा का नाम दिया। उसके बाद गुरु गोबिंद जी ने एक लोहे का कटोरा लिया और उसमें पानी और चीनी मिला कर दुधारी तलवार से घोल कर अमृत का नाम दिया। पहले 5 खालसा के बनाने के बाद उन्हें छठवां खालसा का नाम दिया गया जिसके बाद उनका नाम गुरु गोबिंद राय से गुरु गोबिंद सिंह रख दिया गया। उन्होंने पांच ककारों का महत्व खालसा के लिए समझाया और कहा – केश, कंघा, कड़ा, किरपान, कच्चेरा। इधर 27 दिसम्बर सन्‌ 1704 को दोनों छोटे साहिबजादे और जोरावर सिंह व फतेह सिंहजी को दीवारों में चुनवा दिया गया। जब यह हाल गुरुजी को पता चला तो उन्होंने औरंगजेब को एक जफरनामा (विजय की चिट्ठी) लिखा, जिसमें उन्होंने औरगंजेब को चेतावनी दी कि तेरा साम्राज्य नष्ट करने के लिए खालसा पंथ तैयार हो गया है। 8 मई सन्‌ 1705 में \’मुक्तसर\’ नामक स्थान पर मुगलों से भयानक युद्ध हुआ, जिसमें गुरुजी की जीत हुई। अक्टूबर सन्‌ 1706 में गुरुजी दक्षिण में गए जहाँ पर आपको औरंगजेब की मृत्यु का पता लगा। औरंगजेब ने मरते समय एक शिकायत पत्र लिखा था। हैरानी की बात है कि जो सब कुछ लुटा चुका था, (गुरुजी) वो फतहनामा लिख रहे थे व जिसके पास सब कुछ था वह शिकस्त नामा लिख रहा है। इसका कारण था सच्चाई। गुरुजी ने युद्ध सदैव अत्याचार के विरुद्ध किए थे न कि अपने निजी लाभ के लिए। औरंगजेब की मृत्यु के बाद आपने बहादुरशाह को बादशाह बनाने में मदद की। गुरुजी व बहादुरशाह के संबंध अत्यंत मधुर थे। इन संबंधों को देखकर सरहद का नवाब वजीत खाँ घबरा गया। अतः उसने दो पठान गुरुजी के पीछे लगा दिए। इन पठानों ने गुरुजी पर धोखे से घातक वार किया, जिससे 7 अक्टूबर 1708 में गुरुजी (गुरु गोबिन्द सिंह जी) नांदेड साहिब में दिव्य ज्योति में लीन हो गए। अंत समय आपने सिक्खों को गुरु ग्रंथ साहिब को अपना गुरु मानने को कहा व खुद भी माथा टेका। गुरुजी के बाद माधोदास ने, जिसे गुरुजी ने सिक्ख बनाया बंदासिंह बहादुर नाम दिया था, सरहद पर आक्रमण किया और अत्याचारियों की ईंट से ईंट बजा दी। गुरु गोविंदजी के बारे में लाला दौलतराय, जो कि कट्टर आर्य समाजी थे, लिखते हैं \’मैं चाहता तो स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानंद, परमहंस आदि के बारे में काफी कुछ लिख

July 27, 2022 / 0 Comments
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लक्ष्मी माता की कहानी / लक्ष्मी माता की कथा

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लक्ष्मी माता की कहानी / लक्ष्मी माता की कथा मां लक्ष्मी सुख, समृद्धि और धन की देवी है। जब लक्ष्मी माता का व्रत किया जाता है तो लक्ष्मी माता की कहानी सुनकर व्रत पूर्ण किया जाता है। लक्ष्मी माता के व्रत को ‘वैभव लक्ष्मी व्रत’ भी कहा जाता है। वैभव लक्ष्मी व्रत शुक्रवार के दिन रखा जाता है। इस व्रत को स्त्री या पुरुष कोई भी कर सकता है लक्ष्मी माता का व्रत रखने से सुख समृद्धि और धन की प्राप्ति होती हैं। दिवाली वाले दिन माता लक्ष्मी का व्रत किया जाता है और लक्ष्मी माता की कहानी सुनी जाती हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दिन मां लक्ष्मी पृथ्वी पर विचरण करने आती है। जो भी मां लक्ष्मी के सच्चे मन से आराधना करती है मां लक्ष्मी उस पर अपनी कृपा बरसाती हैं। दिवाली वाले दिन कई लोग व्रत रखते हैं और शाम के समय विधि विधान से व्रत खोलते हैं और लक्ष्मी माता की कहानी सुनी जाती है। तो आइए जानते हैं लक्ष्मी माता की पावन कथा – लक्ष्मी माता की कहानी – एक गांव में एक साहूकार रहता था। साहूकार के एक बेटी थी । वह हर रोज पीपल सींचने जाती थी । पीपल के वृक्ष में से लक्ष्मी जी प्रकट होती थी और चली जातीं । एक दिन लक्ष्मी जी ने साहूकार की बेटी से कहा – तू मेरी सहेली बन जा । तब लड़की ने कहा कि मैं अपने पिता से पूछकर कल आऊंगी । साहूकार की बेटी ने घर जाकर अपने पिता को सारी बात कह दी । तब उसके पिताजी बोले वह तो लक्ष्मी जी हैं । अपने को और क्या चाहिए तू लक्ष्मी जी की सहेली बन जा । दूसरे दिन वह लड़की फिर गईं । तब लक्ष्मी जी पीपल के पेड़ से निकल कर आई और कहा सहेली बन जा तो लड़की ने कहा , बन जाऊंगी और दोनों सहेली बन गई । लक्ष्मी जी ने उसको खाने का न्यौता दिया । घर आकर लड़की ने मां – बाप को कहा कि मेरी सहेली ने मुझे खाने का न्योता दिया है । तब बाप ने कहा कि सहेली के जीमने जाइयो पर घर को संभाल कर जाना । तब वह लक्ष्मी जी के यहां जीमने गई तो लक्ष्मी जी ने उसे शाल दुशाला ओढ़ने के लिए दिया , रुपये दिये , सोने की चौकी , सोने की थाली में छत्तीस प्रकार का भोजन(व्यंजन) करा दिया । जीम कर जब वह जाने लगी तो लक्ष्मी जी ने पल्ला पकड़ लिया और कहा कि में भी तेरे घर जीमने आऊंगी । तो उसने कहा आ जाइयो । वह घर जाकर चुपचाप बैठ गई । तब बाप ने पूछा कि बेटी सहेली के यहां जीमकर आ गईं ? और तू उदास क्यों बैठी है ? तो उसने कहा पिताजी मेरे को लक्ष्मी जी ने इतना दिया अनेक प्रकार के भोजन कराए परन्तु मैं कैसे जिमाऊंगी ? अपने घर में तो कुछ भी नहीं है । तब उसके पिता ने कहा कि गोबर मिट्टी से चौका लगाकर घर की सफाई कर ले । चार मुख वाला दीया जलाकर लक्ष्मीजी का नाम लेकर रसोई में बैठ जाना। लड़की सफाई करके लड्डू लेकर बैठ गई । उसी समय एक रानी नहा रही थी । उसका नौलखा हार चील उठा कर ले गई और उसके घर वह नौलखा हार डाल गई और उसका लड्डु ले गई। बाद में वह हार को तोड़कर बाजार में गई और सामान लाने लगी तो सुनार ने पूछा कि क्या चाहिए ? तब उसने कहा कि सोने की चौकी , सोने का थाल , शाल दुशाला दे दें , मोहर दें और सामग्री दें । छत्तीस प्रकार का भोजन हो जाए इतना सामान दें । सारी चीजें लेकर बहुत तैयारी करी और रसोई बनाई तब गणेश जी से कहा कि लक्ष्मी जी को बुलाओ । आगे – आगे गणेशजी और पीछे – पीछे लक्ष्मीजी आई । उसने फिर चौकी डाल दी और कहा , सहेली चौकी पर बैठ जा । जब लक्ष्मी जी ने कहा सहेली चौकी पर तो राजा रानी के भी नहीं बैठी , किसी के भी नहीं बैठी तो उसने कहा कि मेरे यहां तो बैठना पड़ेगा । फिर लक्ष्मीजी चौकी पर बैठ गई । तब उसने बहुत खातिर की । जैसे लक्ष्मी ने करी थी , वैसे ही उसने करी । लक्ष्मीजी उस पर खुश हो गईं । घर में खूब रुपया एवं लक्ष्मी हो गई । साहूकार की बेटी ने कहा , मैं अभी आ रही हूँ । तुम यहीं बैठी रहना और वह चली गई । लक्ष्मीजी गई नहीं और चौकी पर बैठी रहीं । उसको बहुत दौलत दी । हे लक्ष्मीजी जैसा तुमने साहूकार की बेटी को दिया वैसा सबको देना । कहते सुनते , हुंकारा भरते अपने सारे परिवार को दियो । पीहर में देना , ससुराल में देना । बेटे पोते को देना । है लक्ष्मी माता ! सबका कष्ट दूर करना , दरिद्रता दूर करना , सबकी मनोकामना पूर्ण करना । जय मां लक्ष्मी जी

July 25, 2022 / 0 Comments
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जैन धर्म के पंचशील सिद्धांत बताए भगवान महावीर ने – Lord Mahavir told the Panchsheel principles of Jainism

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जैन धर्म के पंचशील सिद्धांत बताए भगवान महावीर ने भगवान महावीर का जन्म तकरीबन ढाई हजार साल पहले (ईसा से 599 वर्ष पूर्व), वैशाली के गणतंत्र राज्य क्षत्रिय कुण्डलपुर में हुआ था। महावीर को \’वीर\’, \’अतिवीर\’ और \’सन्मति\’ भी कहा जाता है। तीर्थंकर महावीर स्वामी अहिंसा के मूर्तिमान प्रतीक थे। उनका जीवन त्याग और तपस्या से ओतप्रोत था। उन्होंने एक लँगोटी तक का परिग्रह नहीं रखा। हिंसा, पशुबलि, जात-पात का भेद-भाव जिस युग में बढ़ गया, उसी युग में भगवान महावीर का जन्म हुआ। उन्होंने दुनिया को सत्य, अहिंसा का पाठ पढ़ाया।   उन्होंने दुनिया को जैन धर्म के पंचशील सिद्धांत बताए, जो हैं- अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, अचौर्य (अस्तेय) और ब्रह्मचर्य। सभी जैन मुनि, आर्यिका, श्रावक, श्राविका को इन पंचशील गुणों का पालन करना अनिवार्य है। महावीर स्वामी ने अपने उपदेशों और प्रवचनों के माध्यम से दुनिया को सही राह दिखाई और मार्गदर्शन किया। यद्यपि उनकी धर्मयात्राओं का ठीक वर्णन कहीं नहीं मिलता तो भी उपलब्ध वर्णनों से यही विदित होता है कि उनका प्रभाव विशेष रूप से क्षत्रियों और व्यवसायी वर्ग पर पड़ा, जिनमें शूद्र भी बहुत बड़ी संख्या में सम्मिलित थे।   महावीर अहिंसा के दृढ़ उपासक थे, इसलिए किसी भी दिशा में विरोधी को क्षति पहुंचाने की वे कल्पना भी नहीं करते थे। वे किसी के प्रति कठोर वचन भी नहीं बोलते थे और जो उनका विरोध करता, उसको भी नम्रता और मधुरता से ही समझाते थे। इससे परिचय हो जाने के बाद लोग उनकी महत्ता समझ जाते थे और उनके आंतरिक सद्भावना के प्रभाव से उनके भक्त बन जाते थे। महावीर स्वयं क्षत्रिय और राजवंश के थे, इसलिए उनका प्रभाव कितने ही क्षत्रिय नरेशों पर विशेष रूप से पड़ा। जैन ग्रंथों के अनुसार राजगृह का राजा बिंबिसार महावीर का अनुयायी था। वहां पर इसका नाम श्रेणिक बताया गया है और महावीर स्वामी के अधिकांश उपदेश श्रेणिक के प्रश्नों के उत्तर के रूप में ही प्रकट किये गये हैं। आगे चलकर इतिहास प्रसिद्ध महाराज चंद्रगुप्त मौर्य भी जैन धर्म के अनुयायी बन गये थे और उन्होंने दक्षिण भारत में आकर जैन मुनियों का तपस्वी जीवन व्यतीत किया था।   उड़ीसा का राजा खाखेल तथा दक्षिण के कई राजा जैन थे। इसके फलस्वरूप जनता में महावीर स्वामी के सिद्धांतों का अच्छा प्रचार हो गया और उनके द्वारा प्रचारित धर्म कुछ शताब्दियों के लिए भारत का एक प्रमुख धर्म बन गया। आगे चलकर अनेक जैनाचार्यों ने जैन और हिंदू धर्म के समन्वय की भावना को भी बल दिया, जिसके फल से सिद्धांत रूप से अंतर रहने पर भी व्यवहार रूप में इन दोनों धर्मों में बहुत कुछ एकता हो गई और जैन एक संप्रदाय के रूप में ही हिंदुओं में मिल जुल गये।   महावीर स्वामी का सबसे बड़ा सिद्धांत अहिंसा का है, जिनके समस्त दर्शन, चरित्र, आचार−विचार का आधार एक इसी अहिंसा सिद्धांत पर है। वैसे उन्होंने अपने अनुयायी प्रत्येक साधु और गृहस्थ के लिए अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह के पांच व्रतों का पालन करना आवश्यक बताया है, पर इन सबमें अहिंसा की भावना सम्मिलित है। इसलिए जैन विद्वानों का प्रमुख उपदेश यही होता है− \’अहिंसा ही परम धर्म है। अहिंसा ही परम ब्रह्म है। अहिंसा ही सुख शांति देने वाली है। अहिंसा ही संसार का उद्धार करने वाली है। यही मानव का सच्चा धर्म है। यही मानव का सच्चा कर्म है। अहिंसा जैनाचार का तो प्राण ही है।\’   जैनियों के आचार−विचार, अहिंसा के विषय में चाहे जैसे रूढिवादी बन गये हों, पर इसमें संदेह नहीं कि महावीर स्वामी ने अपने समय में जिस अहिंसा के सिद्धांत का प्रचार किया, वह निर्बलता और कायरता उत्पन्न करने के बजाय राष्ट्र का निर्माण और संगठन करके उसे सब प्रकार से सशक्त और विकसित बनाने वाली थी। उसका उद्देश्य मनुष्य मात्र के बीच शांति और प्रेम का व्यवहार स्थापित करना था, जिसके बिना समाज कल्याण और प्रगति की कोई आशा नहीं रखी जा सकती। यद्यपि अहिंसा का प्रतिपादन सभी धर्मोपदेशकों ने अपने−अपने ढंग से किया है, पर जिस प्रकार महावीर और बुद्ध ने अहिंसा पर सबसे अधिक बल देकर उसी को अपने धर्म का मूलमंत्र बनाया, ऐसा किसी अन्य धर्म संस्था ने नहीं किया।

July 24, 2022 / 0 Comments
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बौद्ध दर्शन के मूल सिद्धांत

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बौद्ध दर्शन के मूल सिद्धांत बौद्ध दर्शन तीन मूल सिद्धांत पर आधारित माना गया है- 1.अनीश्वरवाद 2.अनात्मवाद 3.क्षणिकवाद। यह दर्शन पूरी तरह से यथार्थ में जीने की शिक्षा देता है। 1. अनीश्वरवा द बुद्ध ईश्वर की सत्ता नहीं मानते क्योंकि दुनिया प्रतीत्यसमुत्पाद के नियम पर चलती है। प्रतीत्यसमुत्पाद अर्थात कारण-कार्य की श्रृंखला। इस श्रृंखला के कई चक्र हैं जिन्हें बारह अंगों में बाँटा गया है। अत: इस ब्रह्मांड को कोई चलाने वाला नहीं है। न ही कोई उत्पत्तिकर्ता, क्योंकि उत्पत्ति कहने से अंत का भान होता है। तब न कोई प्रारंभ है और न अंत। 2. अनात्मवाद अनात्मवाद का यह मतलब नहीं कि सच में ही \’आत्मा\’ नहीं है। जिसे लोग आत्मा समझते हैं, वो चेतना का अविच्छिन्न प्रवाह है। यह प्रवाह कभी भी बिखरकर जड़ से बद्ध हो सकता है और कभी भी अंधकार में लीन हो सकता है। स्वयं के होने को जाने बगैर आत्मवान नहीं हुआ जा सकता। निर्वाण की अवस्था में ही स्वयं को जाना जा सकता है। मरने के बाद आत्मा महा सुसुप्ति में खो जाती है। वह अनंतकाल तक अंधकार में पड़ी रह सकती है या तक्षण ही दूसरा जन्म लेकर संसार के चक्र में फिर से शामिल हो सकती है। अत: आत्मा तब तक आत्मा नहीं जब तक कि बुद्धत्व घटित न हो। अत: जो जानकार हैं वे ही स्वयं के होने को पुख्ता करने के प्रति चिंतित हैं। 3. क्षणिकवा द इस ब्रह्मांड में सब कुछ क्षणिक और नश्वर है। कुछ भी स्थायी नहीं। सब कुछ परिवर्तनशील है। यह शरीर और ब्रह्मांड उसी तरह है जैसे कि घोड़े, पहिए और पालकी के संगठित रूप को रथ कहते हैं और इन्हें अलग करने से रथ का अस्तित्व नहीं माना जा सकता। उक्त तीन सिद्धांत पर आधारित ही बौद्ध दर्शन की रचना हुई। इन तीन सिद्धांतों पर आगे चलकर थेरवाद, वैभाषिक, सौत्रान्त्रिक, माध्यमिक (शून्यवाद), योगाचार (विज्ञानवाद) और स्वतंत्र योगाचार का दर्शन गढ़ा गया। इस तरह बौद्ध धर्म के दो प्रमुख सम्प्रदायों के कुल छह उपसम्प्रदाय बने। इन सबका केंद्रीय दर्शन रहा प्रतीत्यसमुत्पाद।

July 23, 2022 / 0 Comments
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भगवान इंद्र देव की कहानी 

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भगवान इंद्र देव की कहानी  हिन्दू धर्म में तैतीस करोड़ देवताओं की बात कही जाती है. इन सभी के स्वामी इंद्र थे. जिन्हें देवलोक का स्वामी माना गया हैं. धर्मग्रंथों में संभवतः अधिकतर कहानियों में देवराज इंद्र का उल्लेख अवश्य ही आता हैं. बहुत बार खलनायक के रूप में तो कभी लाचारी के रूप में भगवान इंद्र को पेश किया जाता हैं. एश्वर्य भोग की जिदंगी में व्यस्त इंद्र के सिंहासन पर हर समय विरोधियों की नजर रहा करती थी. चलिए आज की कहानी में आपकों देवराज इंद्र से जुड़ी कुछ रोचक जानकारी व इतिहास बताते हैं. आजकल जब हम इंद्र की बात करते है तो वह अधिकतर पौराणिक कथाओं में होता हैं. वह इंद्र जो स्वर्ग में रहता है, अप्सराओं और गन्धर्वों से घिरा रहता है. सोमपान करता है, एरावत पर बैठा है जिसके साथ में वज्र है और जिसके गुरु का नाम ब्रहस्पति हैं. एक ऐसा अय्यास राजा जो असुरो से डरता है और हमेशा ब्रह्मा से असुरों का संहार करने का कोई न कोई उपाय पूछता रहता हैं. वह ऋषियों से भी डरता हैं. और उनकी तपस्या को भंग करने के लिए अप्सराओं को भेजता है. वह उन राजाओं से भी डरता है जो यज्ञ करते है और वह उनके घोड़े चुरा लेता हैं. अर्थात हमें इंद्र की बतौर एक असुरक्षित राजा की कथा प्राप्त होती हैं. ये पौराणिक कथाएँ करीब 1500 वर्ष पुरानी हैं. जब पुराण लिखे गये थे. लेकिन इसके २२०० वर्ष पहले जब हम वेदकालीन इंद्र के बारे में सोचते है तब उनका एक अलग ही रूप दिखाई देता हैं. पौराणिक इंद्र, विष्णु, शिव और दुर्गादेवी से प्रार्थना करते है वह अपनी रक्षा के लिए, लेकिन वे ऋग्वेद के रक्षक भी है. वे वृत्र और वाला जैसे असुरों के साथ अपने व्रज से युद्ध करते हैं. और पानी व नदियों को घेरने वाली बाधाओं से मुक्त करते है अर्थात वे जल को मुक्त करने का काम करते हैं. इंद्र को लेकर रची गई कविताओं या वैदिक संहिताओं में इंद्र की प्रशंसा ही की गई हैं. यहाँ पर इंद्र एक बड़े शक्तिशाली यौद्धा हैं. वे युद्ध से नहीं डरते हैं. यहाँ पर न स्वर्ग का वर्णन है न ऐरावत का और न ही उनकी असुरक्षित भावना का. वैदिक और पौराणिक काल के बीच हमें बौद्ध, जैन और तमिल परम्पराओं के बारे में पता चलता हैं. 2000 वर्ष पूर्व हमें बौद्ध जैन एवं तमिल ग्रंथों में इंद्र का वर्णन मिलता हैं. लेकिन ये इंद्र न तो वैदिक इंद्र जैसे है न हि पौराणिक इंद्र जैसे हैं. बौद्ध ग्रंथों में इंद्र को शक्र कहा गया हैं. कहते है कि जब बुद्ध को निर्वाण प्राप्त हुआ तब वे ब्रह्मा के साथ इंद्र के सामने प्रस्तुत हुए. और उनसे एक इच्छा प्रकट की कि के अपने ज्ञान का प्रचार विश्व भर में करे. इंद्र के स्वर्ग को ३३ देवताओं का स्वर्ग माना जाता हैं. जो मेरु पर्वत के ऊपर हैं. वेदों में इंद्र की पत्नी का नाम इंद्राणी बताया जाता हैं. असुरों के साथ इंद्र के हमेशा युद्ध और मतभेद होते रहते हैं. जैन ग्रंथों में इंद्र को हमेशा तीर्थकरों की सेवा करते दिखाया गया हैं. इंद्राणी या सची के साथ. जब किसी तीर्थकर का जन्म होता है तब उस घटना स्थल पर इंद्र हमेशा प्रस्तुत होकर उनकी सेवा करते हैं. मन्दिरों में भी वे सेवक के रूप में दिखाए गये हैं. इसका अर्थ है वे देवों के राजा है लेकिन जैन तीर्थकरों के सेवक. तमिल ग्रंथों में वरुण को समुद्र का देवता माना गया हैं. मुरुगन को पहाड़ों का देवता तो इंद्र को मैदानों का देवता. मरु भूमि मरुस्थल को काली देवी के साथ जोड़ा गया हैं. और जंगलों को विष्णु के साथ. यहाँ पर इंद्र का अधिक वर्णन न होते हुए भी वे एक क्षेत्र से जुड़े हुए है न की पानी या स्वर्ग से. इस प्रकार पांच प्रकार के इन्द्रों का वर्णन मिलता हैं. वैदिक काल के इंद्र, पौराणिक काल के इंद्र, बौद्ध धर्म के इंद्र, जैन धर्म के इंद्र और तमिल परम्परा के इंद्र. कौन से इंद्र सत्य है, आजकल ऐरावत वाले इंद्र को हम ज्यादा सत्य मानते हैं. जो शिव विष्णु एवं अन्य देवों की आराधना करते हैं. इंद्र के कोई मन्दिर नहीं होते, लेकिन इंद्र की सबसे पुरानी छवि हमें पुणे के पास भाजा नामक एक बौद्ध गुफा में मिलती हैं. यह गुफा लगभग २२०० वर्ष पुरानी हैं. और यहाँ पर इंद्र ऐरावत के ऊपर बैठे दिखाई देते हैं. संभवतः यह ऐसी पहली छवि होगी, जिसमें वे ऐरावत पर बैठे हैं. इन्द्र के भाई हिमयुग के दौर में मेघ अर्थात बादल तथा जल को सबसे अधिक विनाशक माना जाता था. मेघ के अधिष्ठाता देव इंद्र जी तथा जल के देव वरुण थे. ये दोनों भाई हुआ करते थे. इंद्र भगवान के कई सारे भाई थे जिनमें विवस्वान्, अर्यमा, पूषा, त्वष्टा, सविता, भग, धाता, विधाता, वरुण, मित्र, इन्द्र और त्रिविक्रम आदि थे, ये सुर या देवताओं की श्रेणी में गिने जाते थे. भगवान इंद्र के स्तौले भाई असुर प्रवृत्ति के थे, जिनमें दो भाइयों हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष का नाम प्रमुखता से लिया जाता हैं. इनके एक बहन भी मानी गई है जिनका नाम सिंहिका था. इन्द्र के माता-पिता पत्नी और पुत्र भारत में कही भी इंद्र की पूजा नहीं होती हैं, हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार भगवान कृष्ण से पूर्व उत्तर भारत में इन्द्रोत्सव मनाया जाता था, मगर भगवान कृष्ण ने इसे बंद करवाकर गोपोत्सव, रंगपंचमी और होलीका की शुरुआत कर दी थी. कृष्ण के अनुसार ऐसे इंसान की पूजा व्यर्थ है जो ईश्वर के तुल्य न हो. अगर इंद्र के पिता की बात करे तो उनका नाम कश्यप माँ का नाम अदिति, सौतेले भाइयों की माँ का नाम दिति था. ऋषि कश्यप की 13 पत्नियाँ थी पहली रानी अदिति के पुत्र आदित्य कहलाए दिति के पुत्र दैत्य कहलाएं. इसी तरह दनु के दानव, अरिष्टा के गन्धर्व, सुरसा के राक्षस और कुद्रू के नाग कहलाएं. बात करें इनकी पत्नी की तो इन्द्र की पत्नी शचि थी जो असुरराज पुलोमा की बेटी थी, विवाह के बाद इसे इंद्राणी कहा गया. इनके पुत्रों का उल्लेख वेदों में भी देखने को मिलता हैं.

July 23, 2022 / 0 Comments
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गुरु नानक देव जी के जन्म और जीवन के बारे में 

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गुरु नानक देव जी के जन्म और जीवन के बारे में  श्री नानक देव जी का जन्म 15अप्रैल,1469 में गाँव तलवंडी आज के ननकाना साहिब में हुआ था जो वर्तमान में पाकिस्तान में स्थित है. गुरुनानक जी के जन्म दिन को नानक जयंती के रूप में देशभर में मनाया जाता है. इनकी माताजी का नाम तृप्ता तथा पिताजी का नाम कालू मेहता था. इनका नाम बड़ी बहिन नानकी के नाम पर रखा गया था. इन्होने बचपन में ही पंजाबी उर्दू तथा फ़ारसी भाषा का भी ज्ञान प्राप्त कर लिया था. इनके पिताजी गाँव के पटवारी थे, नानक जी ने बचपन में पशुचारण का कार्य लम्बे समय तक किया. इसी कार्य में उन्होंने गाँव की जनता को पहला चमत्कार दर्शाया था. एक दिन जब वे अपने मवेशियों को चरा रहे थे तो भक्ति में चित लग जाने से पशुओं द्वारा पूरे खेत को चर लिया था. एक किसान की शिकायत पर पंचायत बुलाई गई. जब लोगों ने खेत के नुकसान का जायजा लेने गये तो दंग रह गये, उस खेत में फसल यूँ ही खड़ी थी. उनका इस संसार से वैराग्य बचपन में ही हो गया था, सांसारिक सुख दुःख से कोसो दूर इनकी लग्न तो बस भगवान् में बसी थी. जब भी ये स्कूल गये शिक्षक से भगवान की सच्चाई की कोई सवाल दागते जिसका सवाल उनके पास नही था, रोज रोज की इसी बात से अध्यापक जी खिन्न हुए और नानक को घर छोड़ आए. इसके बाद इन्होने शिक्षा और सांसारिक जीवन के मोह का त्याग कर ईश्वर भक्ति जागरण सत्संग एवं यात्राओं में अपना जीवन व्यतीत करना शुरू कर दिया. बचपन में ही इन्होने कई ऐसे चमत्कार दिखाए जिससे गाँव के मुखिया एवं बड़ी बहिन की उनके प्रति श्रद्धा बढ़ गई. मात्र सोलह वर्ष की आयु में ही गुरु नानक जी का विवाह सुलक्खनी नामक कन्या के साथ सम्पन्न हो गया. जब वे ३२ साल के हुए तो इनके पहला पुत्र हुआ जिसका नाम श्रीचंद रखा गया था. इसके चार वर्ष बाद दूसरे पुत्र का जन्म हुआ जिसे लिखमिदास का नाम दिया गया. दो पुत्रों के जन्म के पश्चात गुरु नानक जी मरदाना, लहना, बाला और रामदास के साथ घर को त्याग दिया. नानक देव जी न तो पूर्ण रूप से आस्तिक थे ना ही नास्तिक. वे हिन्दू परिवार में जन्म मुस्लिम संस्कृति के बीच लम्बे समय तक रहे. दोनों संस्कृतियों धर्मों की अच्छी बातों का उन पर बड़ा प्रभाव पड़ा, उनकी जीवन शैली सूफी संतों जैसी हो गई थी. वे हमेशा अंधविश्वासों आडम्बरों तथा मूर्ति पूजा के विरोधी रहे. सर्वेश्वरवादी के रूप में इन्होने अपना जीवन जीया लोगों को अच्छी बाते अपने उपदेशों के रूप में बताई, वैचारिक परिवर्तन के समर्थक के रूप में इन्होने एक नव समाज की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो बहुदेववाद, आडम्बर से मुक्त एवं एक ईश्वर में विश्वास रखती थी. संसार से विरक्त सन्यासी जीवन जीने वाले नानक देव जी के अंतिम दिन बेहद चर्चित रहे, उनके विचारों से प्रभावित होकर लोग उन्हें अवतार का दर्जा देते थे. एक बार फिर इन्होने सन्यास का मार्ग छोड़ अपनों के बिच जीवन जीते हुए मानव धर्म के लिए कार्य किया. इन्ही समय इन्होने करतारपुर नगर बसाया इसी नगर में आश्वन कृष्ण १०, संवत् १५९७ (22 सितंबर 1539 ईस्वी) को नानकदेव जी की मृत्यु हो गई थी

July 20, 2022 / 0 Comments
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