श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं, हे गिरिधर तेरी आरती गाऊं । आरती गाऊं प्यारे आपको रिझाऊं, श्याम सुन्दर तेरी आरती गाऊं । ॥ श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं..॥ मोर मुकुट प्यारे शीश पे सोहे, प्यारी बंसी मेरो मन मोहे । देख छवि बलिहारी मैं जाऊं । ॥ श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं..॥ चरणों से निकली गंगा प्यारी, जिसने सारी दुनिया तारी । मैं उन चरणों के दर्शन पाऊं । ॥ श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं..॥ दास अनाथ के नाथ आप हो, दुःख सुख जीवन प्यारे साथ आप हो । हरी चरणों में शीश झुकाऊं । ॥ श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं..॥ श्री हरीदास के प्यारे तुम हो । मेरे मोहन जीवन धन हो। देख युगल छवि बलि बलि जाऊं । ॥ श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं..॥ श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं, हे गिरिधर तेरी आरती गाऊं । आरती गाऊं प्यारे आपको रिझाऊं, श्याम सुन्दर तेरी आरती गाऊं । श्री बांके बिहारी तेरी आरती गाऊं – Shri banke bihari teri aarti gaunv
जानिए फरवरी माह में कब रखा जाएगा दूसरा प्रदोष व्रत और कैसे की जाएगी भगवान की पूजा – Know when the second pradosh vrat will be observed in the month of february and how god will be worshipped
पंचांग के अनुसार, हर महीने कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर प्रदोष व्रत रखा जाता है। प्रदोष व्रत की विशेष धार्मिक मान्यता होती है। कहते हैं यदि प्रदोष व्रत के दिन पूरे श्रद्धाभाव से भगवान शिव का पूजन किया जाए तो भोलेनाथ प्रसन्न होकर भक्तों को आरोग्य का वरदान देते हैं। जीवन से कष्ट दूर करने के साथ ही भगवान शिव घर-परिवार को सुख, शांति और समृद्धि का वरदान देते हैं। जानिए फरवरी माह में दूसरा प्रदोष व्रत कब रखा जाएगा और किस तरह इस प्रदोष व्रत में भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए पूजा की जा सकती है। * प्रदोष व्रत की पूजा विधि: इस महीने का दूसरा प्रदोष व्रत 21 फरवरी, बुधवार के दिन रखा जाना है। बुधवार के दिन पड़ने के चलते इसे बुध प्रदोष व्रत भी कहते हैं। त्रयोदशी तिथि की शुरूआत 21 फरवरी सुबह 11 बजकर 28 मिनट पर हो रही है और इस तिथि का समापन अगले दिन 22 फरवरी, 1 बजकर 22 मिनट पर हो जाएगी। प्रदोष व्रत की पूजा का शुभ मुहूर्त 21 फरवरी की शाम 6 बजकर 21 मिनट से रात 8 बजकर 53 मिनट के बीच की जा सकती है। इसे प्रदोष काल कहते हैं। प्रदोष काल में प्रदोष व्रत की पूजा अत्यधिक लाभकारी और शुभ कही जाती है। प्रदोष व्रत की पूजा करने के लिए सुबह जल्दी उठकर स्नान किया जाता है। स्नान करने के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं इसके बाद भगवान शिव का ध्यान किया जाता है और व्रत का संकल्प लेते हैं। सुबह के समय भक्त शिव मंदिर भी जाते हैं लेकिन प्रदोष व्रत की असल पूजा रात के समय होती है। शाम के समय भगवान शिव के साथ ही मां पार्वती की पूजा की जाती है। पूजा में पंचामृत, गंगाजल, बेलपत्र, चावल, गंध, फूल, धूप, फल, दीप और लौंग आदि पूजा सामग्री में सम्मिलित किए जाते हैं। भगवान शिव को घी और शक्कर मिले जौ के सत्तू का भोग लगाना बेहद शुभ होता है। इसके बाद शिव जी की आरती होती है और शिव मंत्रों का जाप भी भक्त करते हैं। कहते हैं पूरे मनोभाव से महादेव का पूजन किया जाए तो भगवान शिव भक्तों की इच्छाएं पूरी करते हैं। (Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है।) जानिए फरवरी माह में कब रखा जाएगा दूसरा प्रदोष व्रत और कैसे की जाएगी भगवान की पूजा – Know when the second pradosh vrat will be observed in the month of february and how god will be worshipped
श्री कृष्णा चालीसा – Shri krishna chalisa
बंशी शोभित कर मधुर । नील जलद तन श्याम। अरुण अधर जनु बिम्बफल । नयन कमल अभिराम॥ पूर्ण इन्द्र, अरविन्द मुख । पीताम्बर शुभ साज। जय मनमोहन मदन छवि । कृष्णचन्द्र महाराज॥ जय यदुनंदन जय जगवंदन। जय वसुदेव देवकी नन्दन॥ जय यशुदा सुत नन्द दुलारे। जय प्रभु भक्तन के दृग तारे॥ जय नटनागर, नाग नथइया। कृष्ण कन्हइया धेनु चरइया॥ पुनि नख पर प्रभु गिरिवर धारो। आओ दीनन कष्ट निवारो॥ वंशी मधुर अधर धरि टेरौ। होवे पूर्ण विनय यह मेरौ॥ आओ हरि पुनि माखन चाखो। आज लाज भारत की राखो॥ गोल कपोल, चिबुक अरुणारे। मृदु मुस्कान मोहिनी डारे॥ राजित राजिव नयन विशाला। मोर मुकुट वैजन्तीमाला॥ कुंडल श्रवण, पीत पट आछे। कटि किंकिणी काछनी काछे॥ नील जलज सुन्दर तनु सोहे। छबि लखि, सुर नर मुनिमन मोहे॥ मस्तक तिलक, अलक घुँघराले। आओ कृष्ण बांसुरी वाले॥ करि पय पान, पूतनहि तार्यो। अका बका कागासुर मार्यो॥ मधुवन जलत अगिन जब ज्वाला। भै शीतल लखतहिं नंदलाला॥ सुरपति जब ब्रज चढ़्यो रिसाई। मूसर धार वारि वर्षाई॥ लगत लगत व्रज चहन बहायो। गोवर्धन नख धारि बचायो॥ लखि यसुदा मन भ्रम अधिकाई। मुख मंह चौदह भुवन दिखाई॥ दुष्ट कंस अति उधम मचायो । कोटि कमल जब फूल मंगायो॥ नाथि कालियहिं तब तुम लीन्हें। चरण चिह्न दै निर्भय कीन्हें॥ करि गोपिन संग रास विलासा। सबकी पूरण करी अभिलाषा॥ केतिक महा असुर संहार्यो। कंसहि केस पकड़ि दै मार्यो॥ मातपिता की बन्दि छुड़ाई ।उग्रसेन कहँ राज दिलाई॥ महि से मृतक छहों सुत लायो। मातु देवकी शोक मिटायो॥ भौमासुर मुर दैत्य संहारी। लाये षट दश सहसकुमारी॥ दै भीमहिं तृण चीर सहारा। जरासिंधु राक्षस कहँ मारा॥ असुर बकासुर आदिक मार्यो। भक्तन के तब कष्ट निवार्यो॥ दीन सुदामा के दुःख टार्यो। तंदुल तीन मूंठ मुख डार्यो॥ प्रेम के साग विदुर घर माँगे।दर्योधन के मेवा त्यागे॥ लखी प्रेम की महिमा भारी।ऐसे श्याम दीन हितकारी॥ भारत के पारथ रथ हाँके।लिये चक्र कर नहिं बल थाके॥ निज गीता के ज्ञान सुनाए।भक्तन हृदय सुधा वर्षाए॥ मीरा थी ऐसी मतवाली।विष पी गई बजाकर ताली॥ राना भेजा साँप पिटारी।शालीग्राम बने बनवारी॥ निज माया तुम विधिहिं दिखायो।उर ते संशय सकल मिटायो॥ तब शत निन्दा करि तत्काला।जीवन मुक्त भयो शिशुपाला॥ जबहिं द्रौपदी टेर लगाई।दीनानाथ लाज अब जाई॥ तुरतहि वसन बने नंदलाला।बढ़े चीर भै अरि मुँह काला॥ अस अनाथ के नाथ कन्हइया। डूबत भंवर बचावइ नइया॥ सुन्दरदास आ उर धारी।दया दृष्टि कीजै बनवारी॥ नाथ सकल मम कुमति निवारो।क्षमहु बेगि अपराध हमारो॥ खोलो पट अब दर्शन दीजै।बोलो कृष्ण कन्हइया की जै॥ ॥दोहा॥ यह चालीसा कृष्ण का, पाठ करै उर धारि। अष्ट सिद्धि नवनिधि फल, लहै पदारथ चारि॥ श्री कृष्णा चालीसा – Shri krishna chalisa
द्वारकाधीश मंदिर का इतिहास – History of dwarkadhish temple
द्वारकाधीश मंदिर, पश्चिमी भारतीय राज्य गुजरात के द्वारका शहर में स्थित है, जो हिंदू पौराणिक कथाओं और इतिहास में बहुत महत्व रखता है। यह मंदिर भगवान कृष्ण को समर्पित है, जिनके बारे में माना जाता है कि उन्होंने इस क्षेत्र में अपना राज्य द्वारका स्थापित किया था। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, द्वारका भगवान कृष्ण के शासनकाल के दौरान उनकी राजधानी थी। कहा जाता है कि मूल मंदिर का निर्माण 5,000 साल पहले भगवान कृष्ण के पोते वज्रनाभ ने किया था। हालाँकि, वर्तमान संरचना 16वीं शताब्दी की है और इसे महान हिंदू दार्शनिक और संत, आदि शंकराचार्य द्वारा बनाया गया था। द्वारकाधीश मंदिर क्षेत्र के हिंदू मंदिरों की विशिष्ट स्थापत्य शैली को प्रदर्शित करता है, जो जटिल नक्काशी, शिखर (शिखर) और एक भव्य प्रवेश द्वार की विशेषता है। द्वारकाधीश मंदिर भारत के चार धाम तीर्थ स्थलों में से एक है, जो सालाना हजारों भक्तों को आकर्षित करता है। यह भगवान कृष्ण के भक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है, जो उनका आशीर्वाद लेने और उन्हें श्रद्धांजलि देने आते हैं। भक्तों का मानना है कि द्वारकाधीश मंदिर की यात्रा से मोक्ष (मुक्ति) और आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने में मदद मिलती है। मंदिर के गर्भगृह में अन्य देवताओं के साथ भगवान कृष्ण की उनके द्वारकाधीश रूप की मूर्ति है। मंदिर में विस्तृत अनुष्ठानों और समारोहों का पालन किया जाता है, जिसमें दैनिक आरती (प्रार्थना अनुष्ठान), भजन (भक्ति गीत), और प्रसाद शामिल हैं। मंदिर में विभिन्न त्योहार, विशेष रूप से जन्माष्टमी (भगवान कृष्ण का जन्मदिन) बड़े उत्साह और उत्साह के साथ मनाए जाते हैं। द्वारकाधीश मंदिर भक्ति और विश्वास के प्रतीक के रूप में खड़ा है, जो दूर-दूर से भक्तों को अपनी आध्यात्मिक आभा का अनुभव करने और भगवान कृष्ण से आशीर्वाद लेने के लिए आकर्षित करता है। द्वारकाधीश मंदिर का इतिहास – History of dwarkadhish temple