श्री गणेश जी की आरती और चालीसा | संपूर्ण पाठ, पूजा विधि, महत्व एवं लाभ श्री गणेश जी की आरती और चालीसा भगवान श्री गणेश को प्रथम पूज्य देव माना जाता है। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत भगवान गणेश की पूजा से की जाती है। वे बुद्धि, विवेक, समृद्धि और विघ्नों को दूर करने वाले देवता हैं। जो भक्त श्रद्धा और विश्वास के साथ गणेश जी की आरती और चालीसा का पाठ करते हैं, उनके जीवन में सुख, शांति और सफलता का वास होता है। श्री गणेश जी की पूजा का महत्व सभी कार्यों में सफलता प्राप्त होती है। विघ्न और बाधाएं दूर होती हैं। बुद्धि और विवेक में वृद्धि होती है। व्यापार और नौकरी में उन्नति मिलती है। परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है। धन और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। गणेश जी की पूजा विधि प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें। भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र के सामने दीपक जलाएं। दूर्वा, लाल फूल और मोदक अर्पित करें। गणेश मंत्र का जाप करें। गणेश चालीसा का पाठ करें। अंत में गणेश जी की आरती करें। प्रसाद सभी में वितरित करें। श्री गणेश मंत्र ॐ गं गणपतये नमः॥ श्री गणेश जी की आरती जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥ एकदंत दयावंत, चार भुजा धारी।माथे सिंदूर सोहे, मूसे की सवारी॥ अंधन को आंख देत, कोढ़िन को काया।बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया॥ हार चढ़े फूल चढ़े, और चढ़े मेवा।लड्डुअन का भोग लगे, संत करें सेवा॥ दीनन की लाज राखो, शंभु सुतवारी।कामना को पूर्ण करो, जग बलिहारी॥ जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥ श्री गणेश चालीसा ॥दोहा॥ जय गणपति सद्गुण सदन, कविवर बदन कृपाल।विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥ ॥चौपाई॥ जय जय जय गणपति गणराजू।मंगल भरण करण शुभ काजू॥ जय गजबदन सदन सुखदाता।विश्व विनायक बुद्धि विधाता॥ वक्रतुंड शुचि शुंड सुहावन।तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन॥ राजित मणि मुक्तन उर माला।स्वर्ण मुकुट सिर नयन विशाला॥ पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं।मोदक भोग सुगंधित फूलं॥ सुन्दर पीताम्बर तन साजित।चरण पादुका मुनि मन राजित॥ धनि शिवसुवन षडानन भ्राता।गौरी ललन विश्व विख्याता॥ ऋद्धि सिद्धि तव चंवर सुधारे।मूषक वाहन सोहत द्वारे॥ कहौं जन्म शुभ कथा तुम्हारी।अति शुचि पावन मंगलकारी॥ (यहाँ से पूरी पारंपरिक गणेश चालीसा का पाठ जारी रखा जा सकता है।) गणेश जी की आरती और चालीसा पढ़ने के लाभ घर में सुख-समृद्धि आती है। मानसिक तनाव दूर होता है। कार्यों में आने वाली बाधाएं समाप्त होती हैं। शिक्षा और करियर में सफलता मिलती है। भगवान गणेश की विशेष कृपा प्राप्त होती है। सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। निष्कर्ष यदि आप प्रतिदिन या प्रत्येक बुधवार, चतुर्थी अथवा किसी शुभ अवसर पर श्रद्धा से भगवान श्री गणेश की आरती और चालीसा का पाठ करते हैं, तो धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जीवन में सुख, समृद्धि, बुद्धि और सफलता का मार्ग प्रशस्त होता है।
जानिए गुप्त नवरात्रि के दौरान किन बातों का ध्यान रखना चाहिए और कौन से काम नहीं करने चाहिए। Know what things should be kept in mind during gupt navratri and what are the things which should not be done
हिंदू धर्म में वैसे तो दो नवरात्रि मुख्य होती हैं एक शारदीय नवरात्रि और एक चैत्र नवरात्रि लेकिन इन सब के बीच में गुप्त नवरात्रि भी पड़ती हैं, जिनका विशेष महत्व होता है और इस दौरान अगर हम कुछ काम करते हैं तो माता रानी का आशीर्वाद हम पर बना रहता है। वहीं, गुप्त नवरात्रि के दौरान कुछ काम करना निषेध भी होता है। इस साल की पहली गुप्त नवरात्रि की शुरुआत 10 फरवरी से हो चुकी है। ऐसे में आइए हम आपको बताते हैं कि इस दौरान आपको किन बातों का ध्यान रखना चाहिए और क्या ऐसी चीज हैं जो नहीं करनी चाहिए। * गुप्त नवरात्रि में भूलकर भी ना करें ये काम: 1. अगर आप चाहते हैं कि गुप्त नवरात्रि में आपके घर में माता रानी का आशीर्वाद बना रहे, तो नवरात्रि के दौरान कभी भी बाल नहीं कटवाने चाहिए और नाखून भी नहीं काटने चाहिए। 2. गुप्त नवरात्रि के दौरान घर में प्याज-लहसुन का सेवन करना वर्जित होता है। कहते हैं कि जिस घर में गुप्त नवरात्रि के दौरान प्याज और लहसुन का सेवन होता है, वहां पर राहु और केतु का बुरा साया पड़ता है। मान्यताओं के अनुसार, जिस जगह पर राहु और केतु का खून गिरा था वहीं से लहसुन और प्याज की उत्पत्ति हुई थी, इसलिए इसे नवरात्रि में नहीं खाना चाहिए। 3. जो लोग गुप्त नवरात्रि में 9 दिन का व्रत करते हैं उन्हें दिन के समय नहीं सोना चाहिए। ऐसा कहते हैं कि दिन के समय सोने से व्रत का पूरा फल हमें नहीं मिलता है। आप रात को जल्दी सोकर सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठे और नहा धोकर माता रानी की पूजा अर्चना करें। 4. नवरात्रि के दौरान केवल पूजा पाठ करने से ही नहीं बल्कि दूसरों का दिल दुखाने से भी हमें बचाना चाहिए। कहते हैं कि महिलाओं, बुजुर्ग और पशु पक्षियों को इस दौरान बिल्कुल भी परेशान नहीं करना चाहिए। ना ही किसी को मानसिक और शारीरिक रूप से चोट पहुंचाना चाहिए, ऐसा करने से माता रानी रुष्ट हो जाती हैं। (Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है।) जानिए गुप्त नवरात्रि के दौरान किन बातों का ध्यान रखना चाहिए और कौन से काम नहीं करने चाहिए। Know what things should be kept in mind during gupt navratri and what are the things which should not be done
विंध्यगिरि पहाड़ी मंदिर का इतिहास – History of vindhyagiri hill temple
विंध्यगिरि पहाड़ी मंदिर, जिसे श्रवणबेलगोला मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, भारत के कर्नाटक के हसन जिले में स्थित एक महत्वपूर्ण जैन तीर्थ स्थल है। विंध्यगिरि पहाड़ी मंदिर की प्राचीन उत्पत्ति दो हजार साल से भी अधिक पुरानी है। ऐसा माना जाता है कि इसकी स्थापना तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व के दौरान मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य द्वारा की गई थी, जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने अपने बाद के वर्षों में अपना राज्य त्याग दिया और जैन धर्म अपना लिया था। विंध्यगिरि पहाड़ी मंदिर परिसर की सबसे प्रमुख विशेषता भगवान बाहुबली (जिसे गोमतेश्वर के नाम से भी जाना जाता है) की विशाल प्रतिमा है, जो लगभग 57 फीट (17 मीटर) की ऊंचाई पर स्थित है। यह मूर्ति ग्रेनाइट के एक ही खंड से बनाई गई है और इसे दुनिया की सबसे ऊंची अखंड मूर्तियों में से एक माना जाता है। यह त्याग, शांति और अहिंसा का प्रतीक है। विंध्यगिरि पहाड़ी मंदिर जैनियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण तीर्थ स्थलों में से एक है, विशेष रूप से दिगंबर संप्रदाय से संबंधित लोगों के लिए। तीर्थयात्री भगवान बाहुबली को श्रद्धांजलि देने और मंदिर परिसर में अनुष्ठान और प्रार्थना करने के लिए दूर-दूर से आते हैं। सदियों से, मंदिर परिसर के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को संरक्षित करने के लिए विभिन्न नवीकरण और पुनर्स्थापन हुए हैं। स्थल की पवित्रता बनाए रखने और तीर्थयात्रियों और आगंतुकों के लिए इसकी पहुंच सुनिश्चित करने के प्रयास किए गए हैं। विंध्यगिरि पहाड़ी मंदिर में आयोजित सबसे महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में से एक महामस्तकाभिषेक महोत्सव है, जो हर बारह साल में एक बार होता है। इस भव्य समारोह के दौरान, भगवान बाहुबली की विशाल प्रतिमा का दूध, पानी, केसर का लेप और चंदन पाउडर सहित विभिन्न पवित्र पदार्थों से अभिषेक किया जाता है, जिसे अभिषेक कहा जाता है। यह त्यौहार दुनिया भर से हजारों भक्तों और पर्यटकों को आकर्षित करता है। विंध्यगिरि पहाड़ी मंदिर अत्यधिक ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व रखता है, और यह जैनियों के लिए एक श्रद्धेय तीर्थस्थल और आध्यात्मिक भक्ति और ज्ञान का प्रतीक बना हुआ है। विंध्यगिरि पहाड़ी मंदिर का इतिहास – History of vindhyagiri hill temple
गिरिराज जी की आरती – Giriraj ji ki aarti
ॐ जय जय जय श्री गिरिराज, जय जय श्री गिरिराज संकट में तुम रखो, निज भक्तन की लाज जय जय जय श्री गिरिराज, जय जय श्री गिरिराज इंद्रादिक सब देवा तुम्हरो ध्यान धरे। ऋषि मुनि जन यश गामें, ते भवसिंधु तरे॥ ॐ जय जय जय श्री गिरिराज सुन्दर रूप तुम्हरौ श्याम सिला सोहें। वन उपवन लखि लखिके ,भक्तन मन मोहें॥ ॐ जय जय जय श्री गिरिराज मध्य मानसी गंगा, कलि के मल हरनी। तापै दीप जलावे, उतरे बैतरनी॥ ॐ जय जय जय श्री गिरिराज नवल अप्सरा कुण्ड सुहाने, दाँये सुखकारी। बायेँ राधा -कृष्ण कुण्ड है, महापाप हारी॥ ॐ जय जय जय श्री गिरिराज तुम हो मुक्ति के दाता, कलयुग में स्वामी। दीनन के हो रक्षक , प्रभु अन्तर्यामी॥ ॐ जय जय जय श्री गिरिराज हम हैं शरण तुम्हरी, गिरवर गिरधारी। देवकीनंदन कृपा करो हे भक्तन हितकारी॥ ॐ जय जय जय श्री गिरिराज जो नर दे परिकम्मा , पूजन पाठ करें। गावें नित्य आरती , पुनि नहीं जनम धरें॥ ॐ जय जय जय श्री गिरिराज गिरिराज जी की आरती – Giriraj ji ki aarti
इस दिन रखा जाएगा जया एकादशी का व्रत और जानिए व्रत कथा के बारे में – Jaya ekadashi fast will be observed on this day and know about the story of the fast
हर साल 24 एकादशी पड़ती हैं और हर एकादशी का अपना अलग महत्व होता है। माघ के महीने में शुक्ल पक्ष में पड़ने वाली एकादशी को जया एकादशी कहा जाता है। माना जाता है कि इस एकादशी पर विधि-विधान से भगवान विष्णु का पूजन किया जाए तो घर में सुख-समृद्धि आती है और पापों से मुक्ति मिल जाती है। इस साल पंचांग के अनुसार, जया एकादशी की तिथि 19 फरवरी की सुबह 8 बजकर 49 मिनट से शुरू होगी और इस तिथि का समापन 20 फरवरी की सुबह 9 बजकर 55 मिनट पर हो जाएगा। उदया तिथि को ध्यान में रखते हुए जया एकादशी का व्रत 20 फरवरी को रखा जाएगा और इसी दिन पूजा भी की जाएगी। * जया एकादशी की व्रत कथा: माना जाता है कि एक समय की बात है जब चिरकाल में स्वर्ग में स्थित नंदन वन में एक उत्सव का आयोजन किया जा रहा था। इस उत्सव में स्वर्ग के सभी देवगण, सिद्धगण और मुनि आदि उपस्थित हुए थे। इस समय नृत्य और गायन चल रहे थे जो गंधर्व और गंधर्व कन्याओं द्वारा किया जा रहा था। इसी समूह में एक नृतिका पुष्यवती की दृष्टि गंधर्व माल्यवान पर पड़ गई और वह उसके यौवन पर मोहित हो गई और अमर्यादित ढंग से नृत्य करने लगी। इस चलते माल्यवान ने बेसुरा गाना गाना शुरू कर दिया। इस घटना को देख-सुन सभी क्रोधित होने लगे। स्वर्ग नरेश इंद्र देव ने क्रोधित होकर दोनों को स्वर्गलोक से निष्कासित कर दिया। इसके साथ ही दोनों को शाप दिया कि दोनों को अधम योनि प्राप्त होगी और दोनों इसके बाद से ही हिमालय में पिशाच योनि में कष्टदारी जीवन व्यतीत करने लगे। सदियों बाद माघ मास की एकादशी अर्थात् जया एकादशी के दिन माल्यवान और पुष्यवती ने कुछ नहीं खाया और फल खाकर दिन व्यतीत किया। इसके बाद रातभर जागरण किया और श्रीहरि का स्मरण किया। इससे भगवान विष्णु प्रसन्न हुए और दोनों को प्रेत योनि से मुक्त कर दिया। इसके बाद से ही भगवान विष्णु को प्रसन्न करने और जीवन के कष्टों से मुक्ति पाने के लिए जया एकादशी का व्रत रखा जाता है। (Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है।) इस दिन रखा जाएगा जया एकादशी का व्रत और जानिए व्रत कथा के बारे में – Jaya ekadashi fast will be observed on this day and know about the story of the fast
द्वारकाधीश मंदिर का इतिहास – History of dwarkadhish temple
द्वारकाधीश मंदिर, पश्चिमी भारतीय राज्य गुजरात के द्वारका शहर में स्थित है, जो हिंदू पौराणिक कथाओं और इतिहास में बहुत महत्व रखता है। यह मंदिर भगवान कृष्ण को समर्पित है, जिनके बारे में माना जाता है कि उन्होंने इस क्षेत्र में अपना राज्य द्वारका स्थापित किया था। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, द्वारका भगवान कृष्ण के शासनकाल के दौरान उनकी राजधानी थी। कहा जाता है कि मूल मंदिर का निर्माण 5,000 साल पहले भगवान कृष्ण के पोते वज्रनाभ ने किया था। हालाँकि, वर्तमान संरचना 16वीं शताब्दी की है और इसे महान हिंदू दार्शनिक और संत, आदि शंकराचार्य द्वारा बनाया गया था। द्वारकाधीश मंदिर क्षेत्र के हिंदू मंदिरों की विशिष्ट स्थापत्य शैली को प्रदर्शित करता है, जो जटिल नक्काशी, शिखर (शिखर) और एक भव्य प्रवेश द्वार की विशेषता है। द्वारकाधीश मंदिर भारत के चार धाम तीर्थ स्थलों में से एक है, जो सालाना हजारों भक्तों को आकर्षित करता है। यह भगवान कृष्ण के भक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है, जो उनका आशीर्वाद लेने और उन्हें श्रद्धांजलि देने आते हैं। भक्तों का मानना है कि द्वारकाधीश मंदिर की यात्रा से मोक्ष (मुक्ति) और आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने में मदद मिलती है। मंदिर के गर्भगृह में अन्य देवताओं के साथ भगवान कृष्ण की उनके द्वारकाधीश रूप की मूर्ति है। मंदिर में विस्तृत अनुष्ठानों और समारोहों का पालन किया जाता है, जिसमें दैनिक आरती (प्रार्थना अनुष्ठान), भजन (भक्ति गीत), और प्रसाद शामिल हैं। मंदिर में विभिन्न त्योहार, विशेष रूप से जन्माष्टमी (भगवान कृष्ण का जन्मदिन) बड़े उत्साह और उत्साह के साथ मनाए जाते हैं। द्वारकाधीश मंदिर भक्ति और विश्वास के प्रतीक के रूप में खड़ा है, जो दूर-दूर से भक्तों को अपनी आध्यात्मिक आभा का अनुभव करने और भगवान कृष्ण से आशीर्वाद लेने के लिए आकर्षित करता है। द्वारकाधीश मंदिर का इतिहास – History of dwarkadhish temple
मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए पूजा में करें इन मंत्रों का जाप, मिलेगी कृपा – To please goddess lakshmi, chant these mantras in worship, you will get blessings
धार्मिक मान्यतानुसार मां लक्ष्मी को धन की देवी कहते हैं। माना जाता है कि जिनके जीवन पर मां लक्ष्मी की कृपादृष्टि बनी रहती है उन लोगों को आर्थिक दिक्कतें नहीं घेरतीं और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है सो अलग। शुक्रवार के दिन को खासतौर से मां लक्ष्मी का दिन कहते हैं। शुक्रवार के दिन वैभव लक्ष्मी की पूजा करने पर महालक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं। मान्यतानुसार शाम के समय मां लक्ष्मी की पूजा करना शुभ होता है। भक्त मां लक्ष्मी की पूजा में कुछ खास मंत्रों का जाप कर सकते हैं। इन मंत्रों का जाप शुभ और कल्याणकारी माना जाता है। * मां लक्ष्मी के मंत्र: – ॐ लक्ष्मी नम: – ॐ धनायः नम: – ॐ लक्ष्मी नमो नमः – ॐ श्रीं ल्कीं महालक्ष्मी महालक्ष्मी एह्येहि सर्व सौभाग्यं देहि मे स्वाहा।। – ॐ ह्रीं श्री क्रीं क्लीं श्री लक्ष्मी मम गृहे धन पूरये, धन पूरये, चिंताएं दूरये-दूरये स्वाहा:।। – ॐ श्रींह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्मी नम:।। – लक्ष्मी नारायण नमः – धनाय नमो नमः * श्री लक्ष्मी बीज मन्त्र: ॐ श्री ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्मयै नमः।। * श्री लक्ष्मी महामंत्र: ॐ श्रीं ल्कीं महालक्ष्मी महालक्ष्मी एह्येहि सर्व सौभाग्यं देहि मे स्वाहा।। * लक्ष्मी प्रार्थना मंत्र: नमस्ते सर्वगेवानां वरदासि हरे: प्रिया। या गतिस्त्वत्प्रपन्नानां या सा मे भूयात्वदर्चनात्।। * मां लक्ष्मी की आरती : ऊं जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।। तुमको निशदिन सेवत, हरि विष्णु विधाता। ऊं जय लक्ष्मी माता।। उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जग-माता। मैया तुम ही जग-माता।। सूर्य-चंद्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता। ऊं जय लक्ष्मी माता।। दुर्गा रूप निरंजनी, सुख सम्पत्ति दाता। मैया सुख संपत्ति दाता। जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि-सिद्धि धन पाता। ऊं जय लक्ष्मी माता।। तुम पाताल-निवासिनि,तुम ही शुभदाता। मैया तुम ही शुभदाता। कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनी,भवनिधि की त्राता। ऊं जय लक्ष्मी माता।। जिस घर में तुम रहतीं, सब सद्गुण आता। मैया सब सद्गुण आता। सब संभव हो जाता, मन नहीं घबराता। ऊं जय लक्ष्मी माता।। तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न कोई पाता। मैया वस्त्र न कोई पाता। खान-पान का वैभव,सब तुमसे आता। ऊं जय लक्ष्मी माता।। शुभ-गुण मंदिर सुंदर, क्षीरोदधि-जाता। मैया क्षीरोदधि-जाता। रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता। ऊं जय लक्ष्मी माता।। महालक्ष्मी जी की आरती,जो कोई नर गाता। मैया जो कोई नर गाता। उर आनन्द समाता, पाप उतर जाता। ऊं जय लक्ष्मी माता।। ऊं जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता। तुमको निशदिन सेवत, हरि विष्णु विधाता। ऊं जय लक्ष्मी माता।। (Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है।) मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए पूजा में करें इन मंत्रों का जाप, मिलेगी कृपा – To please goddess lakshmi, chant these mantras in worship, you will get blessings