चार आर्य सत्य बौद्ध धर्म की एक मौलिक शिक्षा है जो बुद्ध की शिक्षाओं के मूल सिद्धांतों को रेखांकित करती है। वे दुख की प्रकृति और मुक्ति के मार्ग के बारे में अंतर्दृष्टि प्रदान करते हैं। यहाँ बौद्ध धर्म के चार आर्य सत्य हैं: * दुःख (पीड़ा या असंतोष): पहला आर्य सत्य जीवन में दुःख के अस्तित्व को स्वीकार करता है। यह मानता है कि पीड़ा मानवीय स्थिति का एक अंतर्निहित हिस्सा है और इसमें शारीरिक और मानसिक दर्द, असंतोष और सभी चीजों की अस्थिरता शामिल है। जन्म, बुढ़ापा, बीमारी, मृत्यु, और किसी की इच्छा को प्राप्त करने में असमर्थता सभी दुख के उदाहरण हैं। * समुदय (दुख की उत्पत्ति): दूसरा महान सत्य दुख के कारणों और उत्पत्ति की जांच करता है। इसमें कहा गया है कि दुख का मूल कारण लालसा (तन्हा) और मोह है। लालसा का तात्पर्य आनंद, भौतिक संपत्ति और यहां तक कि अस्तित्व या गैर-अस्तित्व की अतृप्त इच्छा से है। इच्छाओं और द्वेषों के प्रति यह लगाव दुख के चक्र को कायम रखता है। * निरोध (दुख की समाप्ति): तीसरा आर्य सत्य दुख पर काबू पाने की संभावना की ओर इशारा करता है। इसमें कहा गया है कि तृष्णा और आसक्ति को समाप्त करके दुख को समाप्त करने का एक तरीका है। इस समाप्ति को निर्वाण कहा जाता है, जो मुक्ति, शांति और पीड़ा से मुक्ति की स्थिति है। आसक्ति और लालसा को त्यागकर व्यक्ति निर्वाण प्राप्त कर सकता है और सच्चे सुख और संतोष का अनुभव कर सकता है। * मग्गा (दुख की समाप्ति का मार्ग): चौथा आर्य सत्य उस मार्ग की रूपरेखा बताता है जो पीड़ा की समाप्ति की ओर ले जाता है। इसे महान आठ गुना पथ के रूप में जाना जाता है और इसमें आठ परस्पर जुड़े सिद्धांत या अभ्यास शामिल हैं: सही दृष्टिकोण, सही इरादा, सही भाषण, सही कार्रवाई, सही आजीविका, सही प्रयास, सही दिमागीपन और सही एकाग्रता। इस मार्ग का अनुसरण करके, व्यक्ति ज्ञान, नैतिक आचरण और मानसिक अनुशासन विकसित कर सकते हैं, जिससे अंततः दुख की समाप्ति हो सकती है। चार आर्य सत्य दुख की प्रकृति और उस पर काबू पाने के साधनों को समझने के लिए एक रूपरेखा प्रदान करते हैं, जो बौद्ध दर्शन और अभ्यास का एक केंद्रीय सिद्धांत बनाते हैं। बौद्ध धर्म के चार महान सत्य || Four noble truths of buddhism
मंगलवार के दिन शाम के समय हनुमान जी को ये चीजें चढ़ाएं, मिलेगा धन-संपत्ति का वरदान || Offer these things to Hanuman ji in the evening on Tuesday, you will get the boon of wealth.
धरती पर जब-जब बुरी शक्तियों का हमला होता है. तब भगवान धरती पर अवतरित होकर रक्षा करते हैं और बुरी शक्तियों का खात्मा करते हैं. मगर ज्योतिष के जानकारों की मानें तो इस धरती पर एक शक्ति अब भी हमारे आसपास मौजूद है जो उन बुरी शक्तियों का नाश करती है. वो हैं महाबली हनुमान जी. वैसे तो राम भक्त हनुमान को साधने के कई तरीके हैं. लेकिन हम यहां आपको ऐसे तरीके के बारे में बता रहे हैं जिसे ज्योतिषी सबसे आसान और कारगर मानते हैं. बजरंगबली को यदि प्रसन्न करना चाहते हैं तो उन्हें कुछ विशेष वस्तुओं का चढ़ावा चढ़ाना चाहिए. इससे उनकी विशेष कृपा प्राप्त होती है. 1. सिंदूर: सिंदूर चढ़ाने से भगवान हनुमान जी जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं और अपने भक्तों पर दिल खोलकर कृपा बरसाते हैं. ध्यान रहे कि सिंदूर नारंगी रंग का होना चाहिए. मंगलवार को सिंदूर अर्पित करने से ग्रह दोष दूर होते हैं. दुर्घटनाओं से रक्षा होती है और कर्ज से मुक्ति मिलती है. सिंदूर को पीपल या पान के पत्ते पर रखकर चढ़ाएं. ध्यान रहे कि महिलाओं को हनुमान जी को सिंदूर अर्पित नहीं करना चाहिए. महिलाएं श्री हनुमान को लाल रंग का फूल चढ़ा सकती हैं. इसे उत्तम माना जाता है. 2. चमेली का तेल: हनुमान जी को चमेली का तेल चढ़ाने की परंपरा है. गलती से भी बिना सिंदूर के चमेली का तेल ना चढ़ाएं. चमेली के तेल में एक खास सु्गंध होती है. इसका औषधि के रूप में भी इस्तेमाल होता है. हनुमान जी को चमेली का तेल चढ़ाने से मन एकाग्र होता है और आंखों की रोशनी बढ़ती है. चमेली के तेल का दीप जलाने पर शत्रु शांत हो जाते हैं. दुनिया का कोई ऐसा काम नहीं है जो हनुमान जी के लिए मुश्किल हो. क्योंकि वह अष्ट सिद्धि और नवनिधि के दाता हैं. वह अजर अमर हैं और आज भी इस धरती पर अपने भक्तों की रक्षा के लिए मौजूद हैं. 3. ध्वज: ज्योतिषी मानते हैं कि हनुमान जी के मंदिर में लाल ध्वज चढ़ाना लाभकारी होता है. ध्वज तिकोना होना चाहिए. इस पर राम लिखा होना चाहिए. मंगलवार को ध्वज चढ़ाने से संपत्ति का लाभ होता है और संपत्ति से संबंधित सारी अड़चने दूर होती हैं. इस तरह का ध्वज यदि वाहन पर लगाया जाए तो दुर्घटनाओं से बचाव होता है. 4. तुलसीदल: हनुमान जी को तुलसीदल अर्पित करने से हनुमान जी प्रसन्न होते हैं. हनुमान जी तुलसीदल से ही तृप्त होते हैं. हनुमान जी को तुलसीदल की माला अर्पित करें. हर मंगलवार को माला अर्पित करने से समृद्धि बनी रहती है. हनुमान जी को अर्पित किए गए तुलसीदल का सेवन करने से सेहत अच्छी रहती है. 5. लड्डू: हनुमान जी को आमतौर पर लड्डू का भोग लगाया जाता है. बेसन और बूंदी दोनों तरह के लड्डू हनुमान जी को चढ़ाए जाते हैं. बूंदी का लड्डू अर्पित करने से सारे ग्रह नियंत्रित होते हैं. बेसन के लड्डू अर्पित करने से कुछ ग्रह नियंत्रित होते हैं. मंगलवार शाम को हनुमान जी को तुलसीदल रखकर लड्डू अर्पित करें. खुद भी प्रसाद ग्रहण करें और दूसरों को भी खुलाएं. 6. राम का नाम: इस दुनिया में हनुमान जी को राम का नाम सबसे प्रिय है. हनुमान जी श्रीराम की पूजा से सबसे ज्यादा खुश होते हैं. चमेली के तेल में सिंदूर मिलाकर पीपल के पत्ते पर राम-राम लिखें. राम-राम लिखे इस पीपल के पत्ते को हनुमान जी को अर्पित करें. इसके बाद अपनी समस्याओं के निवारण के लिए प्रार्थना करें. जीवन की हर समस्या को खत्म करने के लिए यह उपाय कारगर है. मंगलवार के दिन शाम के समय हनुमान जी को ये चीजें चढ़ाएं, मिलेगा धन-संपत्ति का वरदान || Offer these things to Hanuman ji in the evening on Tuesday, you will get the boon of wealth.
सोमवार के व्रत में भूलकर भी न करें ये गलतियां, नहीं तो नाराज हो जाएंगे भगवान शिव। Do not commit these mistakes in Monday\’s fast, otherwise Lord Shiva will get angry.
हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सोमवार का दिन भगवान शिव शंकर को समर्पित माना जाता है। इस दिन लोग भगवान भोलेनाथ की पूजा करते हैं और व्रत भी रखते हैं। शिव जी को प्रसन्न करने और उनका आशीर्वाद पाने के लिए सोमवार का व्रत करना सबसे उत्तम माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने और विधि पूर्वक पूजा करने से भक्तों की हर मनोकामना पूरी होती है। साथ ही भोलेनाथ की कृपा से कष्ट दूर होते हैं। लेकिन सोमवार का व्रत करते समय इन बातों का ध्यान रखना जरूरी है- * सोमवार के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करके साफ वस्त्र धारण करना चाहिए। फिर घर में या आस-पास किसी शिव मंदिर में जाकर शिवलिंग का जल से अभिषेक करना चाहिए। जलाभिषेक के बाद भगवान शिव और माता पार्वती की श्रद्धा भाव से पूजा अर्चना करें और व्रत कथा अवश्य सुनें। सोमवार के व्रत में एक ही समय भोजन करना चाहिए। इसके अलावा इस व्रत में आप फलाहार भी ले सकते हैं। * भगवान शिव की पूजा में अभिषेक के समय इस बात का विशेष ध्यान रखें कि दूध से अभिषेक करने के लिए तांबे के कलश का इस्तेमाल न करें। तांबे के पात्र में दूध डालने से दूध संक्रमित होता हो जाता है और चढ़ाने योग्य नहीं रह जाता।शिव जी की पूजा के दौरान शिवलिंग पर दूध, दही, शहद या कोई भी वस्तु चढ़ाने के बाद जल जरूर चढ़ाएं। आखिर में जल चढ़ाने से ही जलाभिषेक पूर्ण माना जाता है। * मान्यताओं के अनुसार, शिवलिंग पर कभी भी रोली और सिंदूर का तिलक नहीं लगाना चाहिए। शिव जी की पूजा में चंदन के तिलक का इस्तेमाल करना चाहिए। * सोमवार व्रत के दौरान इस बात का हमेशा ध्यान रखें कि भगवान शिव के मंदिर में शिवलिंग की कभी भी पूरी परिक्रमा न करें। परिक्रमा के दौरान ध्यान दें कि जिस जगह से दूध बहता है, वहां रुक जाएं और वापस घूम जाएं। सोमवार के व्रत में भूलकर भी न करें ये गलतियां, नहीं तो नाराज हो जाएंगे भगवान शिव। Do not commit these mistakes in Monday\’s fast, otherwise Lord Shiva will get angry.
सोमवार के व्रत में भूलकर भी न करें ये गलतियां, नहीं तो नाराज हो जाएंगे भगवान शिव। Do not commit these mistakes in Monday\’s fast, otherwise Lord Shiva will get angry.
हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सोमवार का दिन भगवान शिव शंकर को समर्पित माना जाता है। इस दिन लोग भगवान भोलेनाथ की पूजा करते हैं और व्रत भी रखते हैं। शिव जी को प्रसन्न करने और उनका आशीर्वाद पाने के लिए सोमवार का व्रत करना सबसे उत्तम माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने और विधि पूर्वक पूजा करने से भक्तों की हर मनोकामना पूरी होती है। साथ ही भोलेनाथ की कृपा से कष्ट दूर होते हैं। लेकिन सोमवार का व्रत करते समय इन बातों का ध्यान रखना जरूरी है- * सोमवार के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करके साफ वस्त्र धारण करना चाहिए। फिर घर में या आस-पास किसी शिव मंदिर में जाकर शिवलिंग का जल से अभिषेक करना चाहिए। जलाभिषेक के बाद भगवान शिव और माता पार्वती की श्रद्धा भाव से पूजा अर्चना करें और व्रत कथा अवश्य सुनें। सोमवार के व्रत में एक ही समय भोजन करना चाहिए। इसके अलावा इस व्रत में आप फलाहार भी ले सकते हैं। * भगवान शिव की पूजा में अभिषेक के समय इस बात का विशेष ध्यान रखें कि दूध से अभिषेक करने के लिए तांबे के कलश का इस्तेमाल न करें। तांबे के पात्र में दूध डालने से दूध संक्रमित होता हो जाता है और चढ़ाने योग्य नहीं रह जाता।शिव जी की पूजा के दौरान शिवलिंग पर दूध, दही, शहद या कोई भी वस्तु चढ़ाने के बाद जल जरूर चढ़ाएं। आखिर में जल चढ़ाने से ही जलाभिषेक पूर्ण माना जाता है। * मान्यताओं के अनुसार, शिवलिंग पर कभी भी रोली और सिंदूर का तिलक नहीं लगाना चाहिए। शिव जी की पूजा में चंदन के तिलक का इस्तेमाल करना चाहिए। * सोमवार व्रत के दौरान इस बात का हमेशा ध्यान रखें कि भगवान शिव के मंदिर में शिवलिंग की कभी भी पूरी परिक्रमा न करें। परिक्रमा के दौरान ध्यान दें कि जिस जगह से दूध बहता है, वहां रुक जाएं और वापस घूम जाएं। सोमवार के व्रत में भूलकर भी न करें ये गलतियां, नहीं तो नाराज हो जाएंगे भगवान शिव। Do not commit these mistakes in Monday\’s fast, otherwise Lord Shiva will get angry.
सोमवार के व्रत में भूलकर भी न करें ये गलतियां, नहीं तो नाराज हो जाएंगे भगवान शिव। Do not commit these mistakes in Monday\’s fast, otherwise Lord Shiva will get angry.
हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सोमवार का दिन भगवान शिव शंकर को समर्पित माना जाता है। इस दिन लोग भगवान भोलेनाथ की पूजा करते हैं और व्रत भी रखते हैं। शिव जी को प्रसन्न करने और उनका आशीर्वाद पाने के लिए सोमवार का व्रत करना सबसे उत्तम माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने और विधि पूर्वक पूजा करने से भक्तों की हर मनोकामना पूरी होती है। साथ ही भोलेनाथ की कृपा से कष्ट दूर होते हैं। लेकिन सोमवार का व्रत करते समय इन बातों का ध्यान रखना जरूरी है- * सोमवार के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करके साफ वस्त्र धारण करना चाहिए। फिर घर में या आस-पास किसी शिव मंदिर में जाकर शिवलिंग का जल से अभिषेक करना चाहिए। जलाभिषेक के बाद भगवान शिव और माता पार्वती की श्रद्धा भाव से पूजा अर्चना करें और व्रत कथा अवश्य सुनें। सोमवार के व्रत में एक ही समय भोजन करना चाहिए। इसके अलावा इस व्रत में आप फलाहार भी ले सकते हैं। * भगवान शिव की पूजा में अभिषेक के समय इस बात का विशेष ध्यान रखें कि दूध से अभिषेक करने के लिए तांबे के कलश का इस्तेमाल न करें। तांबे के पात्र में दूध डालने से दूध संक्रमित होता हो जाता है और चढ़ाने योग्य नहीं रह जाता।शिव जी की पूजा के दौरान शिवलिंग पर दूध, दही, शहद या कोई भी वस्तु चढ़ाने के बाद जल जरूर चढ़ाएं। आखिर में जल चढ़ाने से ही जलाभिषेक पूर्ण माना जाता है। * मान्यताओं के अनुसार, शिवलिंग पर कभी भी रोली और सिंदूर का तिलक नहीं लगाना चाहिए। शिव जी की पूजा में चंदन के तिलक का इस्तेमाल करना चाहिए। * सोमवार व्रत के दौरान इस बात का हमेशा ध्यान रखें कि भगवान शिव के मंदिर में शिवलिंग की कभी भी पूरी परिक्रमा न करें। परिक्रमा के दौरान ध्यान दें कि जिस जगह से दूध बहता है, वहां रुक जाएं और वापस घूम जाएं। सोमवार के व्रत में भूलकर भी न करें ये गलतियां, नहीं तो नाराज हो जाएंगे भगवान शिव। Do not commit these mistakes in Monday\’s fast, otherwise Lord Shiva will get angry.
निज़ामुद्दीन दरगाह इतनी प्रसिद्ध क्यों है? Why nizamuddin dargah is so famous.
निज़ामुद्दीन दरगाह, जिसे हज़रत निज़ामुद्दीन दरगाह के नाम से भी जाना जाता है, भारत के दिल्ली में स्थित एक प्रसिद्ध सूफ़ी दरगाह है। यह अपने आध्यात्मिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है और दुनिया भर से भक्तों, पर्यटकों और सूफी संगीत प्रेमियों को आकर्षित करता है। यहाँ कुछ कारण दिए गए हैं कि निज़ामुद्दीन दरगाह इतनी प्रसिद्ध क्यों है: * हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया का दफ़नाना स्थान: दरगाह में 14वीं सदी के सूफी संत और आध्यात्मिक गुरु हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की कब्र है। हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया प्रेम, करुणा और भक्ति पर अपनी शिक्षाओं के लिए जाने जाते थे और उनकी कब्र उनके अनुयायियों के लिए तीर्थ स्थान बन गई। * सूफी संगीत और कव्वाली: निज़ामुद्दीन दरगाह अपने कव्वाली प्रदर्शन के लिए प्रसिद्ध है, जो भक्तिपूर्ण सूफी संगीत सत्र हैं। कव्वाली सूफी संगीत का एक रूप है जो आत्मा-उत्तेजक धुनों, लयबद्ध धड़कनों और काव्यात्मक गीतों की विशेषता है। दरगाह में कव्वाली सत्र आयोजित करने की एक लंबी परंपरा है, और इन संगीत समारोहों ने दरगाह को लोकप्रिय बनाने और आगंतुकों को आकर्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। * सांस्कृतिक विरासत: निज़ामुद्दीन दरगाह न केवल एक धार्मिक स्थल है बल्कि एक सांस्कृतिक और ऐतिहासिक स्थल भी है। यह अपने जटिल डिजाइन, संगमरमर की सजावट और भव्य प्रवेश द्वार के साथ मुगल युग की समृद्ध वास्तुकला विरासत को दर्शाता है। दरगाह परिसर में अन्य कब्रें, मस्जिदें और ऐतिहासिक संरचनाएं भी शामिल हैं, जो एक शांत और आध्यात्मिक रूप से उत्थानकारी माहौल बनाती हैं। * आध्यात्मिक महत्व: दरगाह को आध्यात्मिक शक्ति और आशीर्वाद का स्थान माना जाता है। भक्तों का मानना है कि प्रार्थना करने और हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया का आशीर्वाद मांगने से शांति, सांत्वना और संतुष्टि मिल सकती है। कई लोग आध्यात्मिक मार्गदर्शन लेने, प्रार्थना करने और सूफी संत की उपस्थिति में सांत्वना पाने के लिए दरगाह पर जाते हैं। * एकता और सद्भाव: निज़ामुद्दीन दरगाह एकता और सद्भाव के प्रतीक के रूप में खड़ी है, जो विविध पृष्ठभूमि, संस्कृतियों और धर्मों के लोगों को आकर्षित करती है। यह एक ऐसा स्थान है जहां विभिन्न धर्मों के लोग बाधाओं को पार करके एक साथ आते हैं और सांप्रदायिक सद्भाव, प्रेम और भाईचारे की भावना को बढ़ावा देते हैं। कुल मिलाकर, निज़ामुद्दीन दरगाह की प्रसिद्धि श्रद्धेय सूफी संत हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के साथ इसके जुड़ाव, इसकी संगीत विरासत, सांस्कृतिक महत्व, आध्यात्मिक माहौल और लोगों को सद्भाव और भक्ति की भावना से एक साथ लाने की क्षमता से उपजी है। निज़ामुद्दीन दरगाह इतनी प्रसिद्ध क्यों है? Why nizamuddin dargah is so famous.
यीशु मसीह को सूली पर क्यों चढ़ाया गया। why jesus christ was crucifixion?
ईसाई मान्यता और बाइबिल खातों के अनुसार, धार्मिक और राजनीतिक कारकों के संयोजन के कारण यीशु मसीह को सूली पर चढ़ाया गया था। यहां उनके सूली पर चढ़ने से जुड़ी घटनाओं का सारांश दिया गया है: * धार्मिक अधिकारियों को ख़तरा: यीशु ने अपने मंत्रालय के दौरान एक महत्वपूर्ण अनुयायी प्राप्त किया, जिसने फरीसियों और सदूकियों सहित यहूदी धार्मिक नेताओं के अधिकार और शिक्षाओं को चुनौती दी। उन्होंने उनकी प्रथाओं की आलोचना की, पाखंड को उजागर किया, और ईश्वर का पुत्र होने का दावा किया, जिसे कुछ लोगों ने ईशनिंदा के रूप में देखा। * राजनीतिक चिंताएँ: यीशु के समय में रोमन साम्राज्य ने इस क्षेत्र को नियंत्रित किया था, और राजनीतिक स्थिरता बनाए रखना महत्वपूर्ण था। कुछ यहूदी नेताओं को डर था कि यीशु की लोकप्रियता और उनके मसीहा होने के दावे से यहूदी आबादी में अशांति या विद्रोह हो सकता है। इस चिंता ने रोमन अधिकारियों का ध्यान आकर्षित किया। * जुडास इस्करियोती द्वारा विश्वासघात: यीशु के शिष्यों में से एक, जुडास इस्करियोती ने यहूदी धार्मिक नेताओं को जानकारी प्रदान करके उन्हें धोखा दिया, जिन्होंने यीशु को गिरफ्तार करने की मांग की थी। * यहूदी अधिकारियों के समक्ष मुकदमा: यीशु को गिरफ्तार कर लिया गया और यहूदी महायाजक कैफा और यहूदी परिषद महासभा के सामने लाया गया। उन्होंने यीशु से उसकी शिक्षाओं और दावों के बारे में प्रश्न किया। अंततः, उन्होंने खुद को ईश्वर का पुत्र घोषित करने के लिए उन पर ईशनिंदा का आरोप लगाया। * रोमन भागीदारी: यहूदी अधिकारियों को मृत्युदंड को अधिकृत करने के लिए रोमन गवर्नर, पोंटियस पिलाट की आवश्यकता थी। उन्होंने यीशु को विद्रोह भड़काने और राजा होने का दावा करने का आरोप लगाते हुए पीलातुस के सामने पेश किया, जिसे रोमन सत्ता के लिए सीधी चुनौती के रूप में देखा जा सकता था। * रोमन सज़ा के रूप में सूली पर चढ़ना: सूली पर चढ़ना रोमन लोगों द्वारा सार्वजनिक व्यवस्था या रोमन शासन के लिए खतरा माने जाने वाले लोगों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला निष्पादन का एक सामान्य रूप था। यीशु में कोई दोष न पाए जाने के बावजूद, पीलातुस भीड़ और धार्मिक नेताओं के दबाव के आगे झुक गया, और अंततः उसे सूली पर चढ़ाने का आदेश दिया। इस प्रकार, यीशु मसीह का क्रूस पर चढ़ना धार्मिक चिंताओं, राजनीतिक दबावों और यहूदी और रोमन अधिकारियों दोनों के कार्यों के संयोजन का परिणाम था। ईसाइयों का मानना है कि यीशु ने पापों की क्षमा और मानवता की मुक्ति के लिए स्वेच्छा से खुद को बलिदान कर दिया, और उनका सूली पर चढ़ना ईसाई धर्मशास्त्र और मुक्ति की कहानी में एक केंद्रीय भूमिका निभाता है। यीशु मसीह को सूली पर क्यों चढ़ाया गया। why jesus christ was crucifixion?
बुद्ध का प्रारंभिक जीवन ॥ Early life of buddha
बुद्ध, जिन्हें सिद्धार्थ गौतम के नाम से भी जाना जाता है, का जन्म छठी शताब्दी ईसा पूर्व के आसपास लुंबिनी (अब वर्तमान नेपाल में स्थित) में हुआ था। उनकी सटीक जन्मतिथि निश्चित नहीं है और अक्सर अनुमान लगाया जाता है कि यह लगभग 563 ईसा पूर्व की है। वह शाक्य वंश से थे, जो क्षत्रिय (योद्धा) जाति का हिस्सा था। पारंपरिक खातों के अनुसार, सिद्धार्थ के पिता, राजा शुद्धोदन, शाक्य साम्राज्य पर शासन करते थे। सिद्धार्थ की मां, रानी महामाया ने एक सपना देखा था जिसमें एक सफेद हाथी उनके गर्भ में प्रवेश कर गया था, यह दर्शाता था कि वह एक महान प्राणी को जन्म देगी। सिद्धार्थ का जन्म लुंबिनी के बगीचे में साल वृक्ष के नीचे उनकी दाहिनी ओर से हुआ था। बच्चे का नाम सिद्धार्थ रखा गया, जिसका अर्थ है \”जिसने अपने लक्ष्य प्राप्त कर लिए हैं।\” सिद्धार्थ का प्रारंभिक जीवन विलासिता और विशेषाधिकार से भरा हुआ था क्योंकि वह महल में बड़े हुए थे। उनके पिता चाहते थे कि वह एक महान राजा बनें और उन्हें दुनिया की कठोर वास्तविकताओं से बचाएं। सिद्धार्थ ने उत्कृष्ट शिक्षा प्राप्त की और कला, विज्ञान और मार्शल आर्ट सहित विभिन्न विषयों में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। हालाँकि, 29 वर्ष की आयु में, सिद्धार्थ ने महल के बाहर कदम रखा और बुढ़ापे, बीमारी और मृत्यु की पीड़ा का सामना किया। इन अनुभवों ने उन पर गहरा प्रभाव डाला और वे जीवन के उद्देश्य और अर्थ पर सवाल उठाने लगे। उत्तर खोजने के लिए दृढ़ संकल्पित होकर, उन्होंने अपने परिवार, धन और शाही जिम्मेदारियों को पीछे छोड़ते हुए, अपने राजसी जीवन का त्याग कर दिया। अगले कई वर्षों तक, सिद्धार्थ आध्यात्मिक गतिविधियों में लगे रहे और विभिन्न शिक्षकों और तपस्वी समूहों के साथ तपस्या की। हालाँकि, अंततः उन्हें एहसास हुआ कि अत्यधिक आत्म-पीड़न आत्मज्ञान का मार्ग नहीं था। उन्होंने इस रास्ते को त्याग दिया और अत्यधिक आत्म-भोग और अत्यधिक आत्म-त्याग के बीच एक मध्य मार्ग अपनाने का फैसला किया। भारत के बोधगया में बोधि वृक्ष के नीचे, सिद्धार्थ गहन ध्यान में लगे रहे और उन्होंने आत्मज्ञान प्राप्त होने तक न उठने की कसम खाई। गहन ध्यान की अवधि के बाद, 35 वर्ष की आयु में, अंततः उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ और वे जागृत बुद्ध बन गये। अपने ज्ञानोदय के बाद, बुद्ध ने अपने जीवन के शेष वर्ष दूसरों को पढ़ाने और अपनी अंतर्दृष्टि साझा करने में बिताए। उन्होंने पूरे उत्तर भारत में बड़े पैमाने पर यात्रा की, प्रवचन दिए और अनुयायियों के एक समुदाय की स्थापना की जिसे संघ के नाम से जाना जाता है। उनकी शिक्षाओं ने बौद्ध धर्म की नींव रखी, जिसमें दुख को समाप्त करने और मुक्ति प्राप्त करने के साधन के रूप में चार आर्य सत्य और अष्टांगिक मार्ग पर जोर दिया गया। बुद्ध का प्रारंभिक जीवन उनकी आध्यात्मिक यात्रा और बाद में उनके द्वारा प्रचारित शिक्षाओं को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि प्रदान करता है। बुद्ध का प्रारंभिक जीवन ॥ Early life of buddha
श्री वक्रतुंड महाकाय मंत्र॥ Shree Vakratunda Mahakaya Mantra
श्री वक्रतुण्ड महाकाय सूर्य कोटी समप्रभा। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्व-कार्येशु सर्वदा॥ Shree Vakratunda Mahakaya Suryakoti Samaprabha। Nirvighnam Kuru Me Deva Sarva-Kaaryeshu Sarvada॥ श्री वक्रतुण्ड महाकाय सूर्य कोटी समप्रभा। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्व-कार्येशु सर्वदा॥
बुद्ध का अष्टांगिक मार्ग || Buddh ka Ashtangik marg
बुद्ध का अष्टांगिक मार्ग बौद्ध धर्म में साधकों के आध्यात्मिक एवं नैतिक प्रगति के लिए एक मार्ग है। इस मार्ग को \’आठ पथ\’ या \’आठ आंग\’ भी कहा जाता है। यह मार्ग मध्यमा पाठ, ध्यान, सम्यक्त्व, देशना, विमुक्ति, समाधि, श्रद्धा और प्रज्ञा – ये आठ अंगों से मिलकर बना होता है। इन आठ अंगों का पालन करने से भिक्षु या साधक आत्मज्ञान, शान्ति, मोक्ष और निर्वाण की प्राप्ति करता है। यहां नीचे दिए गए हैं अष्टांगिक मार्ग के आठ अंग: मध्यमा पाठ (Right View): सत्य की प्राप्ति, कर्मों के कारण दुःख की पहचान करना। ध्यान (Right Intention): संयमित चित्त के साथ सचेतता और उद्देश्य की स्थापना करना। सम्यक्त्व (Right Speech): सत्य और उचित वचन बोलना, अहिंसा की पालना करना। देशना (Right Action): शुद्ध और न्यायपूर्ण कर्म करना, अहिंसा और धार्मिकता का पालन करना। विमुक्ति (Right Livelihood): सत्य और न्यायपूर्ण आजीविका चुनना, जो किसी को हानि नहीं पहुंचाए। समाधि (Right Effort): दुःख से रहित समता एवं अभियांत्रिकीकरण की प्राप्ति करना। श्रद्धा (Right Mindfulness): ध्यान और जागृत चेतना का पालन करना। प्रज्ञा (Right Concentration): एकाग्रता, अद्वैत ज्ञान और मेधावी चित्त का समर्पण करना। ये आठ अंग संतोष, आत्मसंयम, ध्यान, आत्मसाक्षात्कार और समय के साथ साधक की आध्यात्मिक प्रगति में मदद करते हैं। अष्टांगिक मार्ग बौद्ध धर्म के महात्माओं और शिक्षाओं में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। बुद्ध का अष्टांगिक मार्ग ||Buddh ka Ashtangik marg
माँ पार्वती की आरती । Aarti Maa Parvati
जय पार्वती माता जय पार्वती माता ब्रह्म सनातन देवी शुभफल की दाता । ॥ जय पार्वती माता ॥ अरिकुल पद्दं विनासनी जय सेवक त्राता, जगजीवन जगदंबा हरिहर गुणगाता । ॥ जय पार्वती माता ॥ सिंह को वाहन साजे कुण्डल है साथा, देब बंधु जस गावत नृत्य करत ता था । ॥ जय पार्वती माता ॥ सतयुग रूपशील अति सुन्दर नाम सती कहलाता, हेमांचल घर जन्मी सखियन संग राता । ॥ जय पार्वती माता ॥ शुम्भ निशुम्भ विदारे हेमाचल स्थाता, सहस्त्र भुज तनु धारिके चक्र लियो हाथा । ॥ जय पार्वती माता ॥ सृष्टिरूप तुही है जननी शिवसंग रंगराता, नन्दी भृंगी बीन लही है हाथन मदमाता । ॥ जय पार्वती माता ॥ देवन अरज करत तव चित को लाता, गावत दे दे ताली मन में रंग राता । ॥ जय पार्वती माता ॥ श्री कमल आरती मैया की जो कोई गाता , सदा सुखी नित रहता सुख सम्पति पाता । ॥ जय पार्वती माता ॥ माँ पार्वती की आरती । Aarti Maa Parvati
कार्य सिद्धि करने का मन्त्र व विधि|
कार्य सिद्धि करने का मन्त्र व विधि इस प्रकार है| ॐ रक्तकोमलधारिणी महामृत वासिनी जटो भवन्तु कत्थ्यै कथ शीघ्रं शुडुं कुरु नमः|| कार्य सिद्धि करने का मन्त्र की विधि इस प्रकार है| इस मन्त्र का एक हजार जप नवरात्रि में किया जाये फिर पंचमेवा और गुग्गल से हवन करके नौ कुँवारी कन्याओं को भोजन करायें| इससे सब कार्य का शुभाशुभ फल प्रत्यक्ष ज्ञात होता है|
शुक्रवार व्रत (जय माँ संतोषी)|
इस व्रत को करने वाला कथा कहते व सुनते समय हाथ मे गुड व भुने चने रखें| विधि: इस व्रत को करने वाला कथा कहते व सुनते समय हाथ मे गुड व भुने चने रखें| संतोषी माता की जय !संतोषी माता की जय! मुख से बोलते जायें| कथा ख़तम होते ही हाथ का गुड चना गों माता को खिलाये| कलश मे रखा गुड चना सबको प्रशाद रूप मे बाँट दे| कथा से पहला कलश को जल से भर दे| उसके ऊपर गुड चने से भरा कटोरा रखें| कथा और आरती ख़तम होने के बाद कलश के जल को घर में सब जगह छिडकें और बचा हुआ जल तुलसी की क्यारी में डाले| व्रत के उद्यापन में अडाये सेर खाजा, मोमनदार पुड़ी, खीर,चने का शाक, नैवेध रखें| घी का दीपक जला संतोषी माता की जय जयकारा बोल नारिअल फोड़े| इस दिन ना कोई खटाई खाए ना ही खाने दे| इस दिन ८ लड़को को भोजन कराये,पहल घर के लड़कों को दें| यथाशक्ति दक्षिणा भी दें| शुक्रवार संतोषीमाता की व्रतकथा: एक बुढ़िया थी और उसके सात पुत्र थे। छः कमाने वाले थे, एक निकम्मा था। बुढ़िया मां छहों पुत्रों की रसोई बनाती, भोजन कराती और पीछे से जो कुछ बचता सो सातवें को दे देती थी। परन्तु वह बड़ा भोला-भाला था, मन में कुछ विचार न करता था। एक दिन अपनी बहू से बोला – देखो, मेरी माता का मुझ पर कितना प्यार है। वह बोली – क्यों नही, सबका जूठा बचा हुआ तुमको खिलाती है। वह बोला – भला ऐसा भई कहीं हो सकता है, मैं जब तक आँखों से न देखूं, मान नहीं सकता। बहू ने हँसकर कहा – तुम देख लोगे तब तो मानोगे। कुछ दिन बाद बड़ा त्यौहार आया। घर में सात प्रकार के भोजन और चूरमा के लड़डू बने। वह जांचने को सिर-दर्द का बहाना कर पतला कपड़ा सिर पर ओढ़कर रसोई घर में सो गया और कपड़े में से सब देखता रहा। छहो भाई भोजन करने आय। उसने देखा माँ ने उनके लिये सुन्दर-सुन्दर आसन बिछाये है। सात प्रकार की रसोई परोसी है। वह आग्रह करके जिमाती है, वह देखता रहा। छहो भाई भोजन कर उठे तब माता ने उनकी जूठी थालियों में से लड़डुओं के टुकड़ों को उठाया और एक लड्डू बनाया। जूठन साफ कर बुढ़िया माँ ने पुकारा – उठो बेटा, छहों भाई भोजन कर गये अब तू ही बाकी है, उठ न, कब खायेगा। वह कहने लगा – माँ, मुझे भोजन नहीं करना। मैं परदेश जा रहा हूँ। माता ने कहा – कल जाता हो तो आज ही जा। वह बोला – हां-हां, आज ही जा रहा हूँ। यह कहकर वह घर से निकल गया। चलते समय बहू की याद आई। वह गोशाला में उपलें थाप रही थी, वहीं जाकर उससे बोला – हम जावें परदेश को आवेंगे कुछ काल । तुम रहियो संतोष से धरम आपनो पाल ।। वह बोली जाओ पिया आनन्द से हमरुं सोच हटाय । राम भरोसे हम रहें ईश्वर तुम्हें सहाय ।। देख निशानी आपकी देख धरुँ मैं धीर । सुधि हमारी मति बिसारियो रखियो मन गंभीर ।। वह बोला – मेरे पास तो कुछ नहीं, यह अंगूठी है सो ले और अपनी कुछ निशानी मुझे दे। वह बोली – मेरे पास क्या है यह गोबर से भरा हाथ है। यह कहकर उसकी पीठ में गोबर के हाथ की थाप मार दी। वह चल दिया। चलते-चलते दूर देश में पहुँचा। वहाँ पर एक साहूकार की दुकान थी, वहां जाकर कहने लगा – भाई मुझे नौकरी पर रख लो। साहूकार को जरुरत थी, बोला – रह जा। लड़के ने पूछा – तनखा क्या दोगे। साहूकार ने कहा – काम देखकर दाम मिलेंगे। साहूकार की नौकरी मिली। वह सवेरे सात बजे से रात तक नौकरी बजाने लगा। कुछ दिनों में दुकान का सारा लेने-देन, हिसाब-किताब, ग्राहकों को माल बेचना, सारा काम करने लगा। साहूकार ने 7-8 नौकर थे। वे सब चक्कर खाने लगे कि यह तो बहुत होशियार बन गया है। सेठ ने भी काम देखा और 3 महीने में उसे आधे मुनाफे का साझीदार बना लिया। वह 12 वर्ष में ही नामी सेठ बन गया और मालिक सारा कारोबार उस पर छो़ड़कर बाहर चला गया। अब बहू पर क्या बीती सो सुनो । सास-ससुर उसे दुःख देने लगे। सारी गृहस्थी का काम करके उसे लकड़ी लेने जंगल में भेजते। इस बीच घर की रोटियों के आटे से जो भूसी निकलती उसकी रोटी बनाकर रख दी जाती और फूटे नारियल के खोपरे में पानी। इस तरह दिन बीतते रहे। एक दिन वह लकड़ी लेने जा रही थी कि रास्ते में बहुत-सी स्त्रियाँ संतोषी माता का व्रत करती दिखाई दीं। वह वहाँ खड़ी हो कथा सुनकर बोली – बहिनों, यह तुम किस देवता का व्रत करती हो और इसके करने सेक्या फल ममिलता है। इस व्रत के करने की क्या विधि है। यदि तुम अपने व्रत का विधान मुझे समझाकर कहोगी तो मैं तुम्हारा अहसान मानूंगी। तब उनमें से एक स्त्री बोली – सुनो यह संतोषी माता का व्रत है, इसके करने से निर्धनता, दरिद्रता का नाश होता है और लक्ष्मी आती है। मन की चिंतायें दूर होती है। घर में सुख होने से मन को प्रसन्नता और शांति मिलती है। निःपुत्र को पुत्र मिलता है, प्रीतम बाहर गया हो तो जल्दी आवे। क्वांरी कन्या को मनपसन्द वर मिले । राजद्घार में बहुत दिनों से मुकदमा चलता हो तो खत्म हो जावे, सब तरह सुख-शान्ति हो, घर में धन जमा हो, पैसा-जायदाद का लाभ हो, वे सब इस संतोषी माता की कृपा से पूरी हो जावे। इसमें संदेह नहीं। वह पूछने लगी- यह व्रत कैसे किया जावे यह भी बताओ तो बड़ी कृपा होगी। स्त्री कहने लगी – सब रुपये का गुड़ चना लेना, इच्छा हो तो सवा पाँच रुपये का लेना या सवा ग्यारह रुपये का भी सहूलियत अनुसार लेना। बिना परेशानी, श्रद्घा, और प्रेम से जितना बन सके सवाया लेना। सवा रुपये से सवा पांच रुपये तथा इससे भी ज्यादा शक्ति और भक्ति के अनुसार लें। हर शुक्रवार को निराहार रह, कथा कहना – सुनना, इसके बीच क्रम टूटे नहीं, लगातार नियम पालन करना। सुनने वाला कोई न मिले तो घी का दीपक जला, उसके आगे जल के
आरती क्या है और कैसे करनी चाहिए?
पूजा के अन्त में आरती की जाती है| पूजन में जो त्रुटि रह जाती है, आरती से उसकी पूर्ति होती है| पूजन मन्त्रहीन और क्रियाहीन होने पर भी आरती कर लेने से उसमें सारी पूर्णता आ जाती है| आरती करने का ही नहीं, आरती देखने का भी बड़ा पुण्य होता है| जो धूप और आरती को देखता है और दोनों हाथों से आरती लेता है, वह समस्त पीदियों का उद्धार करता है और भगवान् विष्णु के परमपत को प्राप्त होता है| आरती क्या है और कैसे करनी चाहिए? इस प्रकार है: साधारणत: पाँच बत्तीयों से आरती की जाती है, इसे ‘ पंचप्रदिप’ भी कहते है| एक सात या उससे भी अधिक बत्तीयों से भी आरती की जाती है| कपूर से भी आरती होती है| कुमकुम, अगर, कपूर धुत और चन्दन, पाँच बत्तीयों अथवा दीए की ( रुई और घी की ) बत्तियाँ बनाकर शंख, घंटा आदि बजाते हुआ आरती करनी चाहिए| आरती उतारते समय सवर्प्रथम भगवान् की प्रतिमा के चरणों में उसे चार बार घुमाएँ, दो बार नाभिदेश में, एक बार मुखमण्डल पर और सात बार समस्त अंगों पर घुमाएँ| यथार्थ में आरती, पूजन के अन्त में इष्ट देवता की प्रसन्नता हेतु की जाती है| इसमें इष्टदेव को दीपक दिखाने के साथ ही उनका स्तवन तथा गुणगान किया जाता है|
इतनी शक्ति हमें देना दाता|
इतनी शक्ति हमें देना दाता मन का विश्वास कमज़ोर हो न हम चलें नेक रस्ते पे हमसे भूल कर भी कोई भूल हो न.. हर तरफ़ ज़ुल्म है, बेबसी है सहमा सहमा-सा हर आदमी है पाप का बोझ बढता ही जाये जाने कैसे ये धरती थमी है बोझ ममता का तू ये उठा ले तेरी रचना का ये अँत हो न हम चलें नेक रस्ते पे हमसे भूल कर भी कोई भूल हो न.. दूर अज्ञान के हों अँधेरे तू हमें ज्ञान की रौशनी दे हर बुराई से बचते रहें हम जितनी भी दे भली ज़िन्दग़ी दे बैर हो न, किसी का किसी से भवना मन में बदले की हो न हम चलें नेक रस्ते पे हमसे भूल कर भी कोई भूल हो न.. हम न सोचें हमें क्या मिला है हम ये सोचें किया क्या है अर्पण फूल खुशियों के बाँटें सभी को सबका जीवन ही बन जाये मधुबन अपनी करुणा का जल तू बहाकर करदे पावन हरेक मनका कोना हम चलें नेक रस्ते पे हमसे भूल कर भी कोई भूल हो न.. हम अँधेरे मे हैं रौशनी दे खो न दें खुद को ही दुश्मनी से हम सज़ा पायें अपने किये की मौत भी हो तो सह लें खुशी से कल जो गुज़रा है फिर से न गुज़रे आनेवाला वो कल ऐसा हो न हम चलें नेक रस्ते पे हमसे भूल कर भी कोई भूल हो न.. इतनी शक्ति हमें देना दाता मन का विश्वास कमज़ोर हो न…
मां सरस्वती चालीसा|
हिंदू धर्म में माता सरस्वती को ज्ञान की देवी कहा गया है। सरस्वती जी को वाग्देवी के नाम से भी जाना जाता है। सरस्वती जी को श्वेत वर्ण अत्यधिक प्रिय होता है। श्वेत वर्ण सादगी का परिचायक होता है। हिन्दू धर्म के अनुसार श्री कृष्ण जी ने सर्वप्रथम सरस्वती जी की आराधना की थी। सरस्वती जी की पूजा साधना में निम्न चालीसा का विशेष महत्त्व है। || चौपाई || जय श्रीसकल बुद्घि बलरासी । जय सर्वज्ञ अमर अविनाशी ॥ जय जय जय वीणाकर धारी । करती सदा सुहंस सवारी ॥ रुप चतुर्भुज धारी माता । सकल विश्व अन्दर विख्याता ॥ जग में पाप बुद्घि जब होती । तबहि धर्म की फीकी ज्योति ॥ तबहि मातु का निज अवतारा । पाप हीन करती महितारा ॥ बाल्मीकि जी थे हत्यारा । तव प्रसाद जानै संसारा ॥ रामचरित जो रचे बनाई । आदि कवि पदवी को पाई ॥ कालिदास जो भये विख्याता । तेरी कृपा दृष्टि से माता ॥ तुलसी सूर आदि विद्घाना । और भये जो ज्ञानी नाना ॥ तिन्ह न और रहेउ अवलम्बा । केवल कृपा आपकी अमबा ॥ करहु कृपा सोई मातु भवानी । दुखित दीन निज दासहिं जानी ॥ पुत्र करइ अपराध बहूता । तेहि न धरइ चित एकउ माता ॥ राखु लाज जननी अब मेरी । विनय करउं भांति बहुतेरी ॥ मैं अनाथ तेरी अवलंबा । कृपा करउ जय जय जगदम्बा ॥ मधुकैटभ जो अति बलवाना । बाहुयुद्घ विष्णु से ठाना ॥ समर हजार पांच में घोरा । फिर भी मुख उनसे नहीं मोरा ॥ मातु सहाय कीन्ह तेहि काला । बुद्घि विपरीत भई खलहाला ॥ तेहि ते मृत्यु भई खल केरी । पुरवहु मातु मनोरथ मेरी ॥ चण्ड मुण्ड जो थे विख्याता । क्षण महु संहारे उन माता ॥ रक्तबीज से समरथ पापी । सुर मुन हृदय धरा सब कांपी ॥ काटेउ सिर जिम कदली खम्बा । बार बार बिनवउं जगदंबा ॥ जगप्रसिद्घ जो शुंभ निशुंभा । क्षण में बांधे ताहि तूं अम्बा ॥ भरत-मातु बुद्घि फेरेउ जाई । रामचन्द्र बनवास कराई ॥ एहि विधि रावन वध तू कीन्हा । सुन नर मुनि सबको सुख दीन्हा ॥ को समरथ तव यश गुन गाना । निगम अनादि अनंत बखाना ॥ विष्णु रुद्र जस सकैं न मारी । जिनकी हो तुम रक्षाकारी ॥ रक्त दन्तिका और शताक्षी । नाम अपार है दानवभक्षी ॥ दुर्गम काज धरा पर कीन्हा । दुर्गा नाम सकल जग लीन्हा ॥ दुर्ग आदि हरनी तू माता । कृपा करहु जब जब सुखदाता ॥ नृप कोपित को मारन चाहै । कानन में घेरे मृग नाहै ॥ सागर मध्य पोत के भंगे । अति तूफान नहिं कोऊ संगे ॥ भूत प्रेत बाधा या दुःख में । हो दरिद्र अथवा संकट में ॥ नाम जपे मंगल सब होई । संशय इसमें करइ न कोई ॥ पुत्रहीन जो आतुर भाई । सबै छांड़ि पूजें एहि भाई ॥ करै पाठ नित यह चालीसा । होय पुत्र सुन्दर गुण ईसा ॥ धूपादिक नैवेघ चढ़ावै । संकट रहित अवश्य हो जावै ॥ भक्ति मातु की करै हमेशा । निकट न आवै ताहि कलेशा ॥ बंदी पाठ करै सत बारा । बंदी पाश दूर हो सारा ॥ रामसागर बांधि हेतु भवानी । कीजै कृपा दास निज जानी ॥ ॥ दोहा ॥ मातु सूर्य कान्त तव, अन्धकार मम रुप । डूबन से रक्षा करहु परुं न मैं भव कूप ॥ बलबुद्घि विघा देहु मोहि, सुनहु सरस्वती मातु । रामसागर अधम को आश्रय तू दे दातु ॥
श्री साईं जी की प्रार्थना|
साईं कृपा से व्रत कथा लिखवाई, भक्तों के हाथों में पहुंची| साईं गुरुवार व्रत करे जो कोई, उसका कल्याण तो हरदम होई| घर बार सुख शांति होवे, साईं ध्यान करे जो सोवे| भोग लगावे निसदिन बाबा को जोई उसके घर में कमी न होई| बाबा की प्रार्थना करिए, साईं मेरे दुःख को हरिए| शिरडी में बाबा की मूर्ति है प्यारी, भक्तों को लगे है न्यारी| मेरे साईं मेरे बाबा, मेरा मन्दिर मेरा काबा| राम भी तुम शाम भी तुम हो, शिवजी का अवतार भी तुम हो| हनुमान तुम ही हो साईं, तुम्ही ने थी लंका जलाई| कलियुग में तुम आए थे साईं, भक्तों का कल्याण हो जाई| भक्तिभाव से पड़े कथा जो, उसकी इच्छा पूरी हो जाती| बाबा मेरे आओ साईं हमको दर्शन दिखलाओ साईं| तुम बिन दिल नहीं लगता, आंसू का दरिया है निकलता| जब-जब देखें तेरी मूरत, तब-तब भीग जाए मेरी मूरत| अंधन को आंखे देते, दीन दुखी के दुख हर लेते| तुम सा नहीं है कोई सहाई, जपते रहें हम साईं साईं| नाम तुम्हारा मंगलकारी, भवसागर से भक्तों को तारी| बाबा मेरे अवगुण माफ कर देना, भक्ति मेरी को ही लेना| बाबा हम पर दया करना, अपने चरणों में ही रखना| चरणों में तुम्हारे शीतल छाया, बचे रहेंगे नहीं पड़ेगी मंद छाया| हमारी बुद्धि निर्मल करना, जग की भलाई हमसे करना| हमको साधन बना लो बाबा, दया कृपा क्षमा दो बाबा| अज्ञानी हम बालक मंदबुद्धि, तेरी दया से हो मन की शुद्धि| पाप ना कोई हमसे होने पाए, दुःख कोई जीव ना पाए| हरपल भला हम करते आए, गुणगान हरपल तेरे गांए| ||दोहा|| साईं हम पर कृपा करो, बालक हैं अनजान| मंदबुद्धि हम जीव हैं, हमको लो आन संभाल||१|| व्रत आपका कर रहे, दो आशीष यह आन| विध्न पड़े न इसमें कोई, कृपा करो दीनदयाल||२||
शिव भक्त मार्कंडेय|
एक बार भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए मृकंडु मुनि ने कठोर तपस्या की| उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए| मृकंडु ने उनसे विनती की – “हे प्रभु! मुझे पुत्र प्रदान करें|” शिव ने पूछा – “कैसा पुत्र चाहिए भक्त? ऐसा कि जिसकी आयु तो लंबी हो किंतु गुण कोई न हो, अथवा जो बुद्धिमान हो, गुणी हो किंतु जिसकी आयु मात्र सोलह वर्ष की हो|” मुनि ने कहा – “भगवान! मुझे गुणवान पुत्र चाहिए|” शिव ने कहा – “तथास्तु!” यह वरदान देकर शिव अंतर्धान हो गए| समय आने पर मृकंडु की पत्नी मरुद्वती ने पुत्र को जन्म दिया| अनेक ऋषि-मुनियों ने आकर प्रसन्नता जताई और बच्चे को आशीर्वाद दिया| ऋषि-मुनियों की उपस्थिति में ही मृकंडु दंपति ने बालक का नाम रखा – मार्कंडेय| बालक मार्कंडेय बहुत मेधावी निकला| सोलह वर्ष की आयु से पहले ही उसने वैदों का ज्ञान प्राप्त कर लिया| उसके आचार्यगण उसकी प्रशंसा करते न थकते| वे कहते-“मृकंडु! बहुत भाग्यशाली हो तुम, जो ऐसा होनहार बेटा मिला|” लेकिन मार्कंडेय के भाग्य को लेकर उसकी माता बहुत चिंतित रहती| मृकंडु जब उसे समझाते तो वह रोते हुए कहती – “स्वामी! मैं भूल नहीं पाती कि शीघ्र ही हमारा बेटा हमसे हमेशा के लिए दूर हो जाएगा|” एक दिन की बात है| कुमार मार्कंडेय पूजा के लिए फूल लेने वाटिका में गया हुआ था| लौटा तो उसने अपनी माता को रोते हुए देखा| समीप ही उदास भाव में उनके पिता बैठे हुए थे| माता को रोते हुए देख उसने पूछा – “मां! तुम रो क्यों रही हो?” मां कुछ न बोली, बस धीरे-धीरे सिसकियां भरती रही| इस पर मार्कंडेय ने पुन: पूछा – “मां! तुम बोलतीं क्यों नहीं| बोलो मां, बोलो| कौन-सा दुख है तुम्हें? कहीं ऐसा तो नहीं कि जो तुम चाहती हो, वह मैं नहीं कर पाऊंगा? पर देखो मां! अब मैं बालक नहीं रहा| कल पूरे सोलह वर्ष का हो जाऊंगा|” “तुम्हारी मां इसीलिए तो रो रही है, पुत्र!” पिता धीरे से बोले| मार्कंडेय ने उलझन भरे स्वर में पूछा – “क्यों? सोलह वर्ष का होने में क्या हानि है?” पिता बोले – “बताता हूं, सुनो|” तब मृकंडु ने उसके जन्म से संबंधित बातें उसे बताईं| सुनकर मार्कंडेय ने माता को धैर्य बंधाया, बोला – “रोओ मत मां! मैं नहीं मरूंगा| भगवान शिव मृत्युंजय हैं| मैं उनसे अमरत्व का वरदान प्राप्त करूंगा|” पिता ने आशीर्वाद देते हुए कहा – “मेरे बच्चे, शिव की कृपा से तुम्हें सफलता मिले|” मार्कंडेय माता-पिता से आशीर्वाद लेकर वन में चला गया| जाते समय माता ने शिव से प्रार्थना की – “हे सदाशिव, मृत्युंजय! मेरा पुत्र आपके आसरे है| हे देव! इसकी रक्षा करना|” अगले दिन प्रात:काल मार्कंडेय ने सागर तट पर जाकर गीली मिट्टी से शिवलिंग बनाया| उस पर पुष्प चढ़ाए और शिव का ध्यान लगाकर बैठ गया| रात होने पर वह प्रभु के सामने नाचने और गाने लगा| तभी अचानक यमराज वहां आ पहुंचे| बोले – “तुम्हारी आयु पूरी हुई| इस संसार से चलने के लिए तैयार हो जाओ|” मार्कंडेय बोले – “थोड़ी देर ठहरिए महाराज! जब तक मैं अपनी उपासना पूरी कर लेता हूं|” यमराज ने गुस्से से कहा – “मूर्ख! क्या तू जानता नहीं कि मृत्यु किसी का इंतजार नहीं करती| मार्कंडेय ने कहा – “कृपा कर मेरी उपासना में बाधा मत डालिए| मेरी उपासना पूरी होते ही आप मुझे अपने लोक ले चलना|” यमराज और भी क्रोधित होकर बोले – “मूर्ख! क्या तू समझता है कि शिव की शरण लेकर तू मुझसे बच जाएगा? तुझे अभी मालूम हो जाएगा कि काल के पाश से कोई नहीं बच सकता| यह कहकर जैसे ही यमराज पाश फेंकने को उद्यत हुए, तभी एक चमत्कार हुआ| एकाएक वहां शिव प्रकट हो गए| मृत्यु के स्वामी को देखकर यमराज ठिठक गए| मार्कंडेय शिव के चरणों में गिर गया| शिव ने उसके मन की इच्छा ताड़ ली और अमरत्व प्रदान कर दिया| आगे चलकर मार्कंडेय को प्रलय काल में स्वयं हरि ने दर्शन दिए और अपना मुख खोलकर उन्हें समूचे ब्रह्मांड के दर्शन कराए| कहा जाता है कि वे आज भी विद्यमान हैं और तीर्थों में आते-जाते रहते हैं नए-नए रूपों में|
गुरु पूर्णिमा के उत्सव के बारे में आने वाले भक्तों के लिए जरूरी सूचना
*जय माता दी जय माता दी जय माता दी* राजेश्वरी धाम मां देवी राज रानी वैष्णो मंदिर में गुरु पूर्णिमा के उत्सव के बारे में आने वाले भक्तों के लिए जरूरी सूचना | आप सब भक्तों को जानकर बहुत खुशी होगी कि हर साल की तरह इस साल भी गुरु पर्व मनाया जाएगा | इस शुभ अवसर पर दोपहर 12:00 से रात तक लंगर की सेवा चलती रहेगी जो भगत इस भंडारे में योगदान देना चाहते हैं वह हमारे मंदिर के मां के परम भक्त रामकृष्ण नानू जी को व दिए गए Code को स्कैन करके दे सकते हैं और दिए हुए दान की रसीद प्राप्त कर सकते हैं *मंदिर के लंगर इंचार्ज पवन नागपाल जी और रामकृष्ण नानू जी* *प्रधान : श्री कैलाश बब्बर व समूह सदस्य* संपर्क- 98142-53652, 98886-51501 राजेश्वरी धाम वैष्णो मंदिर देवी राजरानी जी बस्ती शेखर रोड जालंधर सभी भक्तों को सूचित किया जाता है कि मां देवी राज रानी जी के मंदिर में अष्टमी की चौकी 26.6.2023 सोमवार को रात 8:00 बजे शुरू होगी | जिसमें शहर की प्रसिद्ध भजन मंडलीया दीपू एंड पार्टी, पंकज ठाकुर एंड पार्टी मां के सुंदर भजनों का गुणगान करेंगे और लंगर रात 8:00 बजे आरंभ हो जाएगा | सभी भक्तों समय पर आकर मां जी का आशीर्वाद और प्रसाद ग्रहण करें *निवेदन करता : प्रधान श्री कैलाश बब्बर व समूह सदस्य*
श्री साईं जी के व्रत के लाभ|
श्री साईं बाबा व्रत के फलस्वरूप निम्नलिखित लाभ व फल प्राप्त हो सकते है: 1. पुत्र की प्राप्ति, 2. कार्य सिद्धि, 3. वर प्राप्ति, 4. वधु प्राप्ति, 5. खोया धन मिले, 6. जमीन जायदात मिले, 7. धन मिले, 8. साईं दर्शन, 9. मन की शान्ति, 10. शत्रु शांत होना, 11. व्यापार में वृद्धि, 12. बांझ को भी बच्चे की प्राप्ति हो, 13. इच्छित वास्तु की प्राप्ति, 14. पति का खोया प्रेम मिले, 15. परीक्षा में सफलता, 16. यात्रा का योग, 17. रोग निवारण, 18. कार्य सिद्धि, 19. सर्व मनोकामना पूर्ती, इत्यादि|