नई दिल्ली में स्थित लक्ष्मीनारायण मंदिर का निर्माण 1933 में शुरू हुआ था। इस मंदिर का निर्माण उद्योगपति और समाजसेवी बलदेव दास बिड़ला और बिड़ला परिवार के सदस्य उनके बेटे जुगल किशोर बिड़ला द्वारा किया गया था। इसी कारण इस मंदिर को बिरला मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर की आधारशिला जाट महाराज उदयभानु सिंह ने रखी थी। मंदिर के निर्माण कार्य पंडित विश्वनाथ शास्त्री जी के दिशा निर्देश में हुआ। इस मंदिर का उद्घाटन सन 1939 ईस्वी महात्मा गांधी जी द्वारा किया गया था। उद्घाटन करते समय महात्मा गांधी जी ने एक शर्त रखी थी कि यह मंदिर उच्च जाति के हिंदुओं तक ही सीमित नहीं होगा इस मंदिर के अंदर सभी जतियों के लोग जा सकते है। यह मंदिर बिरलाओं द्वारा बनाया गया पहला मंदिर है। जिसे बिरला मंदिर भी कहा जाता ह लक्ष्मीनारायण मंदिर की वास्तुकला को हिंदू मंदिर वास्तुकला की नागर शैली के अनुसार बनाया गया है। मंदिर के प्रमुख वास्तुकार श्री चंद्र चटर्जी थे। जो आधुनिक भारतीय वास्तुकला आंदोलन के भी एक प्रमुख प्रस्तावक थे। लक्ष्मीनारायण मंदिर परिसर 7 एकड़ से अधिक भूमि में फैला हुआ है। इस मंदिर में 3 मंजिलें हैं और मंदिर का सबसे ऊंचा शिखर लगभग 160 फीट ऊंचा है। मंदिर के ऊपर का चक्र सुंदर दृश्यों को दर्शाती हुई नक्काशीओं से सुशोभित है। यह मंदिर स्वदेशी आंदोलन से प्रभावित था। इस मंदिर को बनाने के लिए आचार्य विश्वनाथ शास्त्री के नेतृत्व में सौ से अधिक कारीगरों ने बनाया था। बिड़ला मंदिर के मुख्य भगवान लक्ष्मी नारायण की मूर्तियों का निर्माण उच्च गुणवत्ता वाले संगमरमर से किया गया है, जो जयपुर से लाई गई थी। आगरा, कोटा और मकराना से लाये गए पत्थरों से इस मंदिर का निर्माण किया गया है। बिरला मंदिर के परिसर में अन्य भगवानों के मंदिर भी हैं। मंदिर परिसर में एक बहुत विशाल गीता भवन भी स्थित है, जिसका उपयोग व्याख्यान कक्ष के रूप में किया जाता है। इस परिसर में सुंदर उद्यान और झरने भी विराजमान हैं, जो इस मंदिर के आकर्षण को बढ़ाते हैं।
स्वर्ण मंदिर का इतिहास || History of golden temple
अमृतसर में स्थित विश्वप्रसिद्ध इस स्वर्ण मंदिर का इतिहास 400 से भी ज्यादा सालों से पुराना है। इस मंदिर के निर्माण के लिए चौथे सिख गुर रामदास साहिब जी ने कुछ जमीन दान दी थी, जबकि प्रथम सिख गुरु नानक और पांचवे सिख गुरु अर्जुन साहिब ने गोल्डन टेम्पल की अनूठी वास्तुकला की डिजाइन तैयार की थी। जिसके बाद 1577 ईसवी में इस मंदिर का निर्माण काम शुरु किया गया था। इसके बाद अर्जुन देव जी ने बाद में इसके अमृत सरोवर को पक्का करवाने का काम करवाया। आपको बता दें कि इस प्रसिद्ध स्वर्ण मंदिर का निर्माण पवित्र टंकी के बीचों-बीच यानि की तालाब के बीच किया गया है, जिसमें बाद में सिख धर्म के पवित्र ग्रंथ आदि ग्रंथ को भी स्थापित किया गया है। सिख धर्म के इस पवित्र तीर्थस्थल के अंदर ही एक अकाल तख्त भी स्थित है, जिसे सिख धर्म के छठवें गुरु हरगोविंद जी का घर माना जाता है। आपको बता दें कि 1604 ईसवी में इस मंदिर का निर्माण काम पूरा कर लिया गया था, हालांकि इस मंदिर पर कई बार आक्रमण किए गए, जिससे इस मंदिर की इमारत को काफी नुकसान पहुंचा। लेकिन बाद में फिर सरदार जस्सा सिंह आहलूवालिया ने इस मंदिर का फिर से निर्माण करवाया और इसे वर्तमान स्वरूप देने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। आपको बता दें आहूवालिया खालसा दल के कमांडर और मिसल के प्रमुख सरदार थे।
बंगला साहिब गुरुद्वारा का इतिहास || History of bangla sahib gurdwara
गुरुद्वारा बंगला साहिब असल में एक बंगला है, जो 17 वी शताब्दी के भारतीय शासक, राजा जय सिंह का था और जयसिंह पुर में, जयसिंहपुर पैलेस के नाम से जाना जाता था। इसके बाद कनौट पैलेस बनाने के लिये शासको ने अपने पडोसी राज्यों को ध्वस्त किया था। आठवे सिक्ख गुरु, गुरु हर कृष्ण 1664 में दिल्ली में रहते समय यहाँ रुके थे। इस समय, चेचक और हैजा की बीमारी से लोग पीड़ित थे और गुरु हर कृष्ण ने बीमारी से पीड़ित लोगो की सहायता उनका इलाज कर और उन्हें शुद्ध पानी पिलाकर की थी। जल्द ही उन्हें भी बीमारियों ने घेर लिया था और अचानक 30 मार्च 1664 को उनकी मृत्यु हो गयी। इस घटना के बाद राजा जय सिंह ने एक छोटे पानी के टैंक का निर्माण जरुर करवाया था। यह गुरुद्वारा और यहाँ का सरोवर सिक्खों के लिए एक श्रद्धा का स्थल है और हर साल गुरु हर कृष्ण की जयंती पर यहाँ विशेष मण्डली का आयोजन किया जाता है। इस भूमि पर गुरूद्वारे के साथ-साथ एक रसोईघर, बड़ा तालाबं एक स्कूल और एक आर्ट गैलरी भी है। और बाकी सभी दुसरे सिक्ख गुरुद्वारों की तरह यहाँ भी लंगर है, और सभी धर्म के लोग लंगर भवन में खाना खाते है। लंगर (खाने को) गुरसिख द्वारा बनाया जाता है, जो वहाँ काम करते है और साथ ही उनके साथ कुछ स्वयंसेवक भी होते है, जो उनकी सहायता करते है। गुरुद्वारा में दर्शनार्थियों को अपने सिर के बालो को ढँक देने के लिए और जूते ना पहनकर आने के लिए कहा जाता है। विदेशियों और दर्शनार्थीयो की सहायता के लिए गाइड भी होते है, जो बिना कोई पैसे लिए लोगो की सहायता करते है। गुरुद्वारा के बाहर सिर का स्कार्फ हमेशा रखा होता है, लोग उसका उपयोग अपने सिर को ढकने के लिए भी कर सकते है। स्वयंसेवक दिन-रात दर्शनार्थीयो की सेवा करते रहते है और गुरूद्वारे को स्वच्छ रखते है। वर्तमान में गुरूद्वारे और लंगर हॉल में एयर कंडीशनर भी लगाये गये है। और नये “यात्री निवास” और मल्टी-लेवल पार्किंग जगह का निर्माण भी किया गया है। वर्तमान में टॉयलेट की सुविधा भी उपलब्ध है। गुरूद्वारे के पिछले भाग को भी ढक दिया गया है, ताकि सामने से गुरुद्वारा काफी अच्छा दिखे।
हनुमान जी की आरती || Hanuman ji ki aarti
आरती कीजै हनुमान लला की । दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ॥ जाके बल से गिरवर काँपे । रोग-दोष जाके निकट न झाँके ॥ अंजनि पुत्र महा बलदाई । संतन के प्रभु सदा सहाई ॥ आरती कीजै हनुमान लला की ॥ दे वीरा रघुनाथ पठाए । लंका जारि सिया सुधि लाये ॥ लंका सो कोट समुद्र सी खाई । जात पवनसुत बार न लाई ॥ आरती कीजै हनुमान लला की ॥ लंका जारि असुर संहारे । सियाराम जी के काज सँवारे ॥ लक्ष्मण मुर्छित पड़े सकारे । लाये संजिवन प्राण उबारे ॥ आरती कीजै हनुमान लला की ॥ पैठि पताल तोरि जमकारे । अहिरावण की भुजा उखारे ॥ बाईं भुजा असुर दल मारे । दाहिने भुजा संतजन तारे ॥ आरती कीजै हनुमान लला की ॥ सुर-नर-मुनि जन आरती उतरें । जय जय जय हनुमान उचारें ॥ कंचन थार कपूर लौ छाई । आरती करत अंजना माई ॥ आरती कीजै हनुमान लला की ॥ जो हनुमानजी की आरती गावे । बसहिं बैकुंठ परम पद पावे ॥ लंक विध्वंस किये रघुराई । तुलसीदास स्वामी कीर्ति गाई ॥ आरती कीजै हनुमान लला की । दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ॥
श्री रामचंद्र जी की आरती || Sri ramchandra ji ki aarti
श्री रामचन्द्र कृपालु भजुमन हरण भवभय दारुणं । नव कंज लोचन कंज मुख कर कंज पद कंजारुणं ॥१॥ कन्दर्प अगणित अमित छवि नव नील नीरद सुन्दरं । पटपीत मानहुँ तडित रुचि शुचि नोमि जनक सुतावरं ॥२॥ भजु दीनबन्धु दिनेश दानव दैत्य वंश निकन्दनं । रघुनन्द आनन्द कन्द कोशल चन्द दशरथ नन्दनं ॥३॥ शिर मुकुट कुंडल तिलक चारु उदारु अङ्ग विभूषणं । आजानु भुज शर चाप धर संग्राम जित खरदूषणं ॥४॥ इति वदति तुलसीदास शंकर शेष मुनि मन रंजनं । मम् हृदय कंज निवास कुरु कामादि खलदल गंजनं ॥५॥ मन जाहि राच्यो मिलहि सो वर सहज सुन्दर सांवरो । करुणा निधान सुजान शील स्नेह जानत रावरो ॥६॥ एहि भांति गौरी असीस सुन सिय सहित हिय हरषित अली। तुलसी भवानिहि पूजी पुनि-पुनि मुदित मन मन्दिर चली ॥७॥ जानी गौरी अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि । मंजुल मंगल मूल वाम अङ्ग फरकन लगे। रचयिता: गोस्वामी तुलसीदास
कमल मंदिर का इतिहास || History of lotus temple
भारत की राजधानी दिल्ली में स्थित लोटस टेम्पल अपनी अद्भुत वास्तुकला और अद्धितीय शिल्पकारी के लिए यहां के प्रमुख आर्कषण केन्द्रों में से एक है। आपको बता दें कि कमल के फूल के आकार की तरह बने इस लोटस टेम्पल का निर्माण नवंबर, 1986 में पूरा हुआ था, जिसका उद्घाटन 24 दिसंबर, 1986 को किया गया था, जबकि आम पब्लिक के लिए इस मंदिर को नए साल पर 1 जनवरी 1987 को खोला गया है। इस मंदिर को भारतीय उपमहाद्धीप का मदर टेम्पल भी कहा जाता है। वहीं यह भारत के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से भी एक है। कमल के फूल के आकार में बना यह लोटस टेम्पल अपनी खूबसूरती के लिए बहुत सारे आर्किटेक्चरल अवॉर्ड से भी नवाजा जा चुका है। कमल मंदिर एक बहाई उपासना मंदिर है, जहां न कोई भगवान की प्रतिमा रखी गई है, और ना ही इधर किसी तरह की पूजा-अर्चना होती है, यहां लोग सिर्फ अपनी मन की शांति के लिए आते हैं और घंटों बैठकर यहां की खूबसूरती का आनंद लेते हैं। आपको बता दें कि लोटस टेम्पल को विश्व के 7 बहाई मंदिरों में से आखिरी मंदिर माना जाता है। लोटस टेम्पल के निर्माण में करीब 10 साल का लंबा समय लग गया था। इसके अलावा बहाई धर्म के अन्य मंदिर कम्पाला, सिडनी, इल्लिनॉइस, फ्रैंकपर्ट, विलमेट, पनामा, अपिया में हैं। लोटस टेम्पल अपने अद्धितीय वास्तुशिल्प और अनूठी डिजाइन के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध है। इस मंदिर को कनाडा में रहने वाले एक मशहूर पर्शियन वास्तुकार फरीबर्ज सहबा ने तैयार किया था। यह मंदिर भारत की सर्वधर्म समभाव की अनूठी संस्कृति को दर्शाता है, यह हर धर्म से जुड़े लोगों के लिए खुला हुआ है। यह भारत की आधुनिक वास्तुकला का एक नायाब नमूना है। आधे खिले कमल के आकार में संगमरमर की करीब 27 बेहद सुंदर पंखुड़ियों से बने इस भव्य कमल मंदिर के निर्माण में करीब 1 करोड़ डॉलर की लागत आई थी। वहीं करीब 26 एकड़ जमीन में बना यह मंदिर की आर्कषक डिजाइन को देखने दुनिया के कोने-कोने से लोग यहां आते हैं।
तिरुपति बालाजी मंदिर का इतिहास || History of tirupati balaji temple
तिरुपतिबालाजी मंदिर पृथ्वी पर सबसे लोकप्रिय मंदिर है. । प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में दर्शनार्थी यहां आते हैं। दैनिक आधार पर उनके द्वारा सबसे अधिक दान की राशि दान में दी जाती है। इस प्रकार लाखों श्रद्धालु अपने दान पुण्य करते हैं। पौराणिक कथाओं के आधार पर इस मंदिर की भी एक कहानी है। कहा जाता है की कलि युग के दौरान भक्तों को आशीर्वाद देने के लिए भगवान पृथ्वी पर प्रकट हुए थे। एक बार, ऋषि भृगु यह मूल्यांकन करना चाहता थे कि पवित्र तीन देवताओं में कौन सबसे बड़ा है। कथा के अनुसार एक बार महर्षि भृगु बैकुंठ पधारे और आते ही शेष शैय्या पर योगनिद्रा में लेटे भगवान विष्णु की छाती पर एक लात मारी। भगवान विष्णु ने तुरंत भृगु के चरण पकड़ लिए और पूछने लगे कि ऋषिवर पैर में चोट तो नहीं लगी। लेकिन देवी लक्ष्मी को भृगु ऋषि का यह व्यवहार पसंद नहीं आया और वह विष्णु जी से नाराज हो गई। नाराजगी इस बात से थी कि भगवान ने भृगु ऋषि को दंड क्यों नहीं दिया। नाराजगी में देवी लक्ष्मी बैकुंठ छोड़कर चली गई। भगवान विष्णु ने देवी लक्ष्मी को ढूंढना शुरु किया तो पता चला कि देवी ने पृथ्वी पर पद्मावती नाम की कन्या के रुप में जन्म लिया है। भगवान विष्णु ने भी तब अपना रुप बदला और पहुंच गए पद्मावती के पास। भगवान ने पद्मावती के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा जिसे देवी ने स्वीकार कर लिया। शादी के बाद भगवान तिरुमाला की पहाड़ियों पर रहने लगे, कुबेर से कर्ज लेते समय भगवान ने वचन दिया था कि कलियुग के अंत तक वह अपना सारा कर्ज चुका देंगे।भगवान के कर्ज में डूबे होने की इस मान्यता के कारण बड़ी मात्रा में भक्त धन-दौलत भेंट करते हैं ताकि भगवान कर्ज मुक्त हो जाएं।
सिद्धिविनायक मंदिर का इतिहास || History of siddhivinayak temple
सिद्धिविनायक मंदिर का निर्माण वर्ष 1801 ईस्वी में लक्ष्मण विथु नाम के व्यक्ति ने किया था। इस मंदिर के निर्माण के लिए देउबाई पाटिल नाम की एक अमीर, निःसंतान महिला ने इस विश्वास के साथ धन दिया था, कि भगवान गणेश उन अन्य महिलाओं की इच्छाओं को पूरा करेंगे, जिनके अभी तक कोई बच्चा नहीं हुआ है। प्राचीन मंदिर एक छोटी सी संरचना थी। जिसमें श्री सिद्धिविनायक की काले पत्थर की मूर्ति थी, जो ढाई फीट चौड़ी थी। श्री सिद्धिविनायक भगवान की सबसे बड़ी विशेषता सूंड का दाहिनी ओर झुकना है। इस मूर्ति के चार हाथ (चतुर्भुज) हैं, जिसमें ऊपरी दाएं कमल, ऊपरी बाएं में एक छोटी कुल्हाड़ी, निचले दाएं में पवित्र मोती और मोदक से भरा कटोरा (एक स्वादिष्ट व्यंजन जो श्री सिद्धिविनायक के साथ बारहमासी पसंदीदा है)। दोनों तरफ देवता को झुकाते हुए रिद्धि और सिद्धि हैं, देवी पवित्रता, पूर्ति, समृद्धि और धन का प्रतीक हैं। देवता के माथे पर उकेरी गई एक आंख है, जो भगवान शिव के तीसरे नेत्र के समान है।
खाटू श्याम मंदिर का इतिहास || History of khatu shyam temple
भारत में कृष्ण भगवान को समर्पित खाटू श्याम जी का मंदिर सबसे ज्यादा प्रचलित है। कलयुग के इस दौर में खाटू श्याम जी को सबसे अधिक महत्वपूर्ण बताया गया है। यह मंदिर राजस्थान में सीकर जिले के पास खाटू गांव में स्थित है। जो की हिंदू भक्तों के लिए बहुत मान्यता रखता है। कहते है की खाटू श्याम जी से जो भी मांगो वो लाखो बार देते है। इसीलिए इनको लखदातार के नाम से भी पुकारा जाता है। हिंदू धर्म के अनुसार खाटू शम जी को कृष्ण अवतार का रूप माना गया है। कृष्ण भगवान ने खाटू श्याम जी को वरदान दिया था की कलयुग में उन्हें खाटू श्याम जी के नाम से पूजा जायेगा। यही वजह है कि आज लाखो भक्त खाटू श्यामजी को पूजते है। पुराणों के अनुसार अगर हम खाटू श्याम जी के इतिहास के बारे में बात करे तो, उनके मंदिर का निर्माण संन 1027 में खाटू नगर के राजा रूपसिंह और उनकी पत्नी नर्मदा द्वारा कराया गया था। क्योंकि खाटू नगर के राजा रूपसिंह चौहान को एक बार स्वप्न में खाटू श्याम जी का सिर कटा हुआ दिखाई दिया जिसने उनसे मंदिर बनवाने के लिए कहा। जिस जगह से कटा हुआ सिर निकला था वहा पर अब खाटू श्याम जी का कुंड बना हुआ जिसमे लाखो श्रद्धालु स्नान करते है। और फिर खाटू श्याम मंदिर में जाकर उनके दर्शन करते है। संन 1720 में इस मंदिर के पुनः निर्माण दीवान अभयसिंह ने करवाया था।
काली माता की आरती || kali mata ki aarti
अम्बे तू है जगदम्बे काली, जय दुर्गे खप्पर वाली | माँ काली आरती तेरे ही गुण गायें भारती, ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती || तेरे भक्त जनों पे माता, भीर पड़ी है भारी | दानव दल पर टूट पडो माँ, करके सिंह सवारी || सौ सौ सिंहों से तु बलशाली, दस भुजाओं वाली | दुखिंयों के दुखडें निवारती, ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती || माँ बेटे का है इस जग में, बड़ा ही निर्मल नाता | पूत कपूत सूने हैं पर, माता ना सुनी कुमाता || सब पर करुणा दरसाने वाली, अमृत बरसाने वाली | दुखियों के दुखडे निवारती, ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती || नहीं मांगते धन और दौलत, न चाँदी न सोना | हम तो मांगे माँ तेरे मन में, इक छोटा सा कोना || सबकी बिगडी बनाने वाली, लाज बचाने वाली | सतियों के सत को संवारती, ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती || अम्बे तू है जगदम्बे काली, जय दुर्गे खप्पर वाली | तेरे ही गुण गायें भारती, ओ मैया हम सब उतारें तेरी आरती ||
केदारनाथ मंदिर का इतिहास || History of kedarnath temple
यह मंदिर भगवान शिव शंकर जी का मंदिर हैं, जोकि कई साल पुराना है. यह भारत के उत्तराखंड केदारनाथ में मंदाकिनी नदी के पास गढ़वाल हिमालयी सीमा पर स्थित है. यह ऋषिकेश से 221 किलोमीटर की दूरी पर है. यह भगवान शिव की 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक हैं. मौसम अच्छा नहीं होने के कारण मंदिर केवल अप्रैल के अंत से नवंबर के बीच तक खुलता है. इस अवधि में भगवान शिव के दर्शन करने एवं उनसे आशीर्वाद लेने के लिए दूर – दराज के लोग यहाँ आते हैं. इस मंदिर के पास में बहने वाली मंदाकिनी नदी एवं बर्फ की चादर ओढ़े हुए पहाड़ों के रूप में यहाँ का दृश्य बहुत ही शानदार है. केदारनाथ के इस शांत वातावरण एवं अदभुत दृश्य को देखकर लोग इसकी ओर आकर्षित हो जाते है. मानो किसी ने उन्हें मंत्रमुग्ध कर दिया हो. सर्दियों के दौरान, केदारनाथ मंदिर से देवताओं को उखीमठ लाया जाता है और वहां 6 महीने तक पूजा की जाती है. केदारनाथ मंदिर में भगवान शिव की पूजा ‘केदार खंड के भगवान’ के रूप में की जाती है. यह एक ऐतिहासिक नाम है, जोकि सदियों से चला आ रहा है. यह मंदिर विशेष रूप से हिन्दुओं के लिए सबसे प्रमुख तीर्थस्थानों में से एक है.
सत्यनारायण भगवान जी की आरती || Satyanarayan bhagwan ji ki aarti
जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा । सत्यनारायण स्वामी, जन पातक हरणा ॥ ॐ जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा । रतन जड़ित सिंहासन, अदभुत छवि राजे । नारद करत नीराजन, घंटा वन बाजे ॥ ॐ जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा । प्रकट भए कलिकारण, द्विज को दरस दियो । बूढ़ो ब्राह्मण बनकर, कंचन महल कियो ॥ ॐ जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा । दुर्बल भील कठोरो, जिन पर कृपा करी । चंद्रचूड़ एक राजा, तिनकी विपत्ति हरि ॥ ॐ जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा । वैश्य मनोरथ पायो, श्रद्धा तज दीन्ही । सो फल भाग्यो प्रभुजी, फिर स्तुति किन्ही ॥ ॐ जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा । भव भक्ति के कारण, छिन-छिन रूप धरयो । श्रद्धा धारण किन्ही, तिनको काज सरो ॥ ॐ जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा । ग्वाल-बाल संग राजा, बन में भक्ति करी । मनवांछित फल दीन्हो, दीन दयालु हरि ॥ ॐ जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा । चढत प्रसाद सवायो, कदली फल मेवा । धूप-दीप-तुलसी से, राजी सत्यदेवा ॥ ॐ जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा । सत्यनारायणजी की आरती, जो कोई नर गावे । ऋद्धि-सिद्ध सुख-संपत्ति, सहज रूप पावे ॥ जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा । सत्यनारायण स्वामी, जन पातक हरणा ॥
वैष्णो देवी मंदिर का इतिहास || History of Vaishno Devi Temple
वैष्णो देवी के इतिहास के बारे में कहा जाता है कि जम्मू कश्मीर में गांव हंसाली (वर्तमान कटरा) में एक श्री धर नाम का पंडित रहता था। उसने एक बार नवरात्रियों में नौ कन्याओं को भोजन के लिए बुलाया और माता वैष्णो भी बल रूप रखकर उन कन्याओं के साथ सामिल हो गयी थी। भोजन करने के बाद सभी कन्याएँ चली गयी लेकिन माता वैष्णो वहीं बैठी रही और उन्होने श्री धर से एक भोज (भंडारा) का आयोजन करने का आदेश दिया, और आस पास के सभी गाँव वालों को बुलाने का आदेश दिया। जब भंडारा शुरू हुआ तो माता ने अपने चमत्कारी बर्तन से भोजन परोसना शुरू किया भोजन परोसते हुये माता जैसे ही गोरखनाथ के एक शिष्य भैरों नाथ के पास पहुंची तो वह मांस और शराब की मांग करने लगा। लेकिन माता वैष्णो देवी ने उनसे कहा कि उन्हें केवल शाकाहारी भोजन मिलेगा, क्योंकि यह एक ब्राह्मण की दावत है। यह देखकर भैरो नाथ ने माता को पकड़ने कि कोशिस की तो माता त्रिकुटा पर्वत की ओर भाग गयी। भैरों नाथ भी माता का पीछा करने लगा। उससे बचने के लिए माता वैष्णो एक गुफा में चली गयी और नौ महीने तक उसी गुफा में तपस्या की। भैरो नाथ भी माता का पीछा करते हुये गुफा तक पहुँच गया। वहाँ एक साधु ने भैरो नाथ से कहा जिसे तू एक कन्या समझ रहा है वह आदिशक्ति जगदंबा है तू उसका पीछा करना छोड़ दे। भैरो नाथ ने साधू की बात नहीं मानी और माता गुफा के दूसरी ओर से रास्ता बनाकर बाहर निकल गयी। यह गुफा आज भी अर्ध कुमारी और आदि कुमारी के नामों से जानी जाती है। जब माता बाहर निकली तो उन्होने देवी का रूप धारण किया था। और उन्होने भैरो नाथ से वापस जाने को कहा लेकिन भैरो नाथ नहीं माना तो माता ने महा काली का रूप धारण कर अपने चक्र से भैरो नाथ का सिर धड़ से अलग कर दिया था। भैरो नाथ का सिर कट कर उस स्थान से 8 किलोमीटर दूर त्रिकुट पर्वत की घाटी में जा गिरा। जिसे बाद में भैरो घाटी के नाम से जाना जाने लगा। जिस स्थान पर माता ने भैरो नाथ का वध किया उस स्थान पर माता के पवित्र मंदिर स्थापित हुआ। इसी स्थान पर माँ काली दाहिने, माँ सरस्वती मध्य और माँ लक्ष्मी बाएँ स्थान पर पवित्र पिंड के रूप में विराजमान हैं। माता के इन तीनों स्वरूपों को ही माता वैष्णो कहा जाता है।अपना वध होने के बाद भैरों नाथ ने पश्चाताप किया और माता से उसका उद्धार करने को कहा माता वैष्णो देवी ने उसे माफ किया और मोक्ष प्रदान किया। उसे मोक्ष देते समय माता ने एक शर्त रखी कि उनके दर्शन करने के बाद जब तक तीर्थयात्री भैरो नाथ के दर्शन नहीं करेंगे तब तक उनकी तीर्थयात्रा फलदायी नहीं होगी। बाद में वैष्णो देवी 3 छोटी चट्टानों (पिंडिका) के रुप में प्रकट हुईं और आज तक वहीं रहती हैं। बाद में श्री धर ने गुफा में जाकर माता की इन पिंडियों की पूजा अर्चना करना शुरू किया और उनके वंशज आज भी माता वैष्णो देवी की पुजा करते हैं।
जगदीश जी की आरती || Jagdish ji ki aarti
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे । भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे ॥ ॥ ॐ जय जगदीश हरे..॥ जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का, स्वामी दुःख बिनसे मन का । सुख सम्पति घर आवे, सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का ॥ ॥ ॐ जय जगदीश हरे..॥ मात पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी, स्वामी शरण गहूं मैं किसकी । तुम बिन और न दूजा, तुम बिन और न दूजा, आस करूं मैं जिसकी ॥ ॥ ॐ जय जगदीश हरे..॥ तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी, स्वामी तुम अन्तर्यामी । पारब्रह्म परमेश्वर, पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी ॥ ॥ ॐ जय जगदीश हरे..॥ तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता, स्वामी तुम पालनकर्ता । मैं मूरख फलकामी, मैं सेवक तुम स्वामी, कृपा करो भर्ता॥ ॥ ॐ जय जगदीश हरे..॥ तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति, स्वामी सबके प्राणपति । किस विधि मिलूं दयामय, किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति ॥ ॥ ॐ जय जगदीश हरे..॥ दीन-बन्धु दुःख-हर्ता, ठाकुर तुम मेरे, स्वामी रक्षक तुम मेरे । अपने हाथ उठाओ, अपने शरण लगाओ, द्वार पड़ा तेरे ॥ ॥ ॐ जय जगदीश हरे..॥ विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा, स्वमी पाप(कष्ट) हरो देवा । श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, सन्तन की सेवा ॥ ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे । भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे ॥
गायत्री मंत्र अर्थ सहित || Gayatri mantra with meaning
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्यः धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्॥ हे प्रभु! आप हमारे जीवन के दाता हैं आप हमारे दुख़ और दर्द का निवारण करने वाले हैं आप हमें सुख़ और शांति प्रदान करने वाले हैं हे संसार के विधाता हमें शक्ति दो कि हम आपकी उज्जवल शक्ति प्राप्त कर सकें क्रिपा करके हमारी बुद्धि को सही रास्ता दिखायें
झंडेवालान मंदिर का इतिहास || History of jhandewalan temple
राजधानी दिल्ली के मध्य में स्थित झंडेवालान एक सिद्धपीठ है। अपने धाार्मिक एवं ऐतिहासिक महत्व के कारण राज्य सरकार ने भी दिल्ली के प्रासिद्ध दर्शनीय स्थलों में इसे शामिल किया है। वर्तमान में यह मंदिर झंडेवालान मेट्रो स्टेशन के पास है। श्री कॄष्ण छठी और अन्न्कूट के पावन दिवस पर मंदिर में भकक़्तों के लिए विशाल भण्डारे का आयोजन किया जाता है। झंडेवाला मंदिर का इतिहास 18वाीं सदी के उत्तरार्ध से प्रारंभ होता है। आज जिस स्थान पर मंदिर स्थित है उस समय यहां पर अरावली पर्वत श्रॄंखला की हरी भरी पहाडियाँ, घने वन और कलकल करते बहते थे। अनेक पशु पक्षियों का यह बसेरा था। इस शांत और रमणीय स्थान पर आसपास के निवासी सैर करने आया करते थे। ऐसे ही लोगों में चांदनी चौक के एक प्रसिद्ध कपडा व्यपारी श्री बद्री दास भी थे। श्री बद्री दास धाार्मिक वॄत्ति के व्यक्ति थे और वैष्णो देवी के भक़्त थे। वे नियमित रूप से इस पहाडी स्थान पर सैर करने आते थे और ध्यान में लीन हो जाते थे। एक बार ध्यान में लीन श्री बद्री दास को ऐसी अनुभूति हुई कि वही निकट ही एक पहाड़ी के पास स्थित एक गुफा में कोई प्राचीन मंदिर दबा हुआ है। पुनः एक दिन सपने में इसी क्षेत्र में उन्हें एक मंदिर दिखाई पडा और उन्हें लगा की कोई अदृश्य शक्ति उन्हें इस मंदिर को खोज निकालने के लिए प्रेरित कर रही है। इस अनोखी अनुभूति के बाद श्री बद्री दास ने उस स्थान को खोजने में ध्यान लगा दिया और एक दिन स्वप्न में दिखाई दिए झरने के पास खुदाई करते समय गहरी गुफा में एक मूर्ति दिखाई दी। यह एक देवी की मूर्ति थी परंतु खुदाई में मूर्ति के हाथ खंडित हो गए इसलिए उन्होंने खुदाई में प्राप्त मूर्ति को उस के ऐतिहासिक महत्व को ध्यान में रखते हुए उसी स्थान पर रहने दिया और ठीक उसके ऊपर देवी की एक नयी मूार्ति स्थापित कर उसकी विधिवत प्राण प्रतिष्ठा करवायी। इस अवसर पर मंदिर के ऊपर एक बहुत बडा ध्वज लगाया गया जो पहाडी पर स्थित होने के कारण दूर-दूर तक दिखाई देता था जिसके कारण कालान्तर में यह मंदिर झंडेवाला मंदिर के नाम से विख्यात हो गया। खुदाई में प्राप्त मूार्ति जिस स्थान पर स्थापित है वह स्थान गुफा वाली माता के नाम से विख्यात हो गया। गुफा वाली देवी जी के खंडित हाथों के स्थान पर चांदी के हाथ लगाये गये और इस मूर्ति की पूजा भी पूर्ण विधि विधान से की जाने लगी। वही पर खुदाई में प्राप्त एक चटटान के ऊपर बने शिवलिंग को भी स्थापित किया गया है जिस पर नाग-नागिन का जोडा उकेरा हुआ है । यह प्राचीन गुफा वाली माता और शिवलिंग भी भक़्तों की श्रद्धा का केंद्र है । इसी गुफा में जगाई गई ज्योतियाँ भी लगभग आठ दशकों से अखंड रूप में जल रही है।
हनुमान मंदिर का इतिहास || History of hanuman temple
वर्तमान हनुमान मंदिर का स्वरूप सन 1724 में श्रद्धालुओं के सम्मुख आया जब तत्कालीन जयपुर रियासत के महाराज जयसिंह ने इसका फिर से जीर्णोद्धार करवाया. उसके पूर्व कनाट प्लेस स्थित भगवान हनुमान का ये दिव्य मंदिर आक्रमण और आततायी अत्याचार के तमाम झंझावातों से भी जूझता रहा था. मुगल शासकों के दौर में इस मंदिर पर कई आक्रमण होने की भी कहानियां भी मंदिर के महंत और श्रद्धालु सुनाते हैं. लेकिन अपने आप में ये बात भी उतनी ही चमत्कार और श्रद्धापूर्ण है कि हनुमान मंदिर के इस बालरूप को कभी भी कोई क्षति नहीं पहुंचा सका. मंदिर के महंत जिनकी पिछली 33 पीढ़ियां यहां बालरूप हनुमान की सेवा करती आ रही हैं बताते हैं कि कनाट प्लेस के हनुमान मंदिर में आने भक्तों पर बजरंगबली की हमेशा से कृपादृष्टि बरसती रहती है. विधिपूर्वक पूजित होने पर कनाट प्लेस के बजरंगबली सभी मनोरथों की पूर्ति करने वाले सुख समृद्धि की पूर्ति करने वाले हैं. बजरंग बली के इस बालरूप के पूजन की एक और विशेषता है मोदक, लड्डू चढ़ाने वाले भक्तों पर ये विशेष मुदित होते हैं। ऐतिहासिक संदर्भों के साथ-साथ इस मंदिर से सर्वधर्म समभाव और सांप्रदायिक एकता की कई मिसालें भी इस मंदिर के साथ जुड़ी हुई हैं. कहा जाता है कि मुगल बादशाह अकबर को जब काफी समय तक पुत्र प्राप्ति नहीं हुई तब वे कनाट प्लेस के इस मंदिर में आए और पूरी आस्था के साथ पुत्ररत्न की कामना की । और अंतत बजरंग बली की कृपा से सलीम के रूप में उनकी मुराद पूरी हुई. सौहार्द्र की मिसाल के तौर पर मंदिर के विमान पर आज भी ओम अथवा कलश के स्थान पर चांद का चिन्ह अवस्थित है. इस मंदिर की तमाम विशेषताओं में सबसे उल्लेखनीय तथ्य यह है कि ये हनुमानजी के बाल्यकाल को दर्शाने वाले देश का सबसे प्रमुख मंदिर है। यहां बाल हनुमान के एक हाथ में खिलौना और दूसरा हाथ उनके सीने पर है. ये महावली वीरवर बजरंगबली का ही प्रताप है कि इस मंदिर में 1 अगस्त 1964 से आज तक लगातार श्री राम जयराम जय जय राम का जाप जारी है. जिसके लिए इसे गिनीज बुक में भी शामिल किया गया है। शिल्पकला की दृष्टि भी ये मंदिर बेहद उत्कृष्ट कोटि का है. इसके मुख्य द्वार का वास्तुशिल्प रामायण में वर्णित कला के अनुरूप है. मुख्य द्वार के स्तंभों पर संपूर्ण सुंदरकांड की चौपाइयां खुदी हुई हैं. ऐसा माना जाता है कि रामचरित मानस जैसा ऐतिहासिक धर्मग्रंथ लिखने वाले गोस्वामी तुलसीदास 16वीं सदी में जब दिल्ली आए तब वे इस मंदिर में भी दर्शन को आए थे. कहा जाता है कि यही वो पवित्र स्थान है जहां से उन्हें 40 चौपाइयों की हनुमान चालीसा लिखने की प्रेरणा मिली .ऐसे संकट मोचन प्रभु श्री हनुमान का स्तवन मानव मात्र के आधि-व्याधि-शोक-संताप-ज्वर का प्रशमन कर विजय प्रदान करने वाला है। जो भी भक्त मन में साध लिए सात शनिवार तक लगातार यहां परिक्रमा करने आता है वो भक्त निश्चय ही मनोवांछित फल पाता है। दिल्ली के दिल यानी कनाट प्लेस के बाबा खड़ग सिंग मार्ग पर स्थित यह मंदिर कई मायनों में विशिष्ट इसलिए भी है कि इसके एक तरफ गुरुद्वारा बंगला साहिब स्थित है तो वहीं थोड़ी ही दूरी पर मस्जिद और चर्च भी हैं. सोमवार, बुधवार और शुक्रवार को मंदिर में चोला चढ़ाने की खास परंपरा है. चोला चढ़ावे में श्रद्धालु घी, सिंदूर, चांदी का वर्क और इत्र की शीशी का इस्तेमाल करते हैं. कनाट प्लेस के हनुमान मंदिर की एक अद्भुद चमत्कारिक विशेषता है यहां हनुमानजी लगभग दस साल बाद अपना चोला छोड़कर अपने प्राचीन स्वरूप में आ जाते हैं। इसके अतिरिक्त साल में चार तिथियां इस मंदिर के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण हैं. दीपावली, हनुमान जयंती, जन्माष्टमी, और शिवरात्रि के दिन मंदिर में बाल हनुमान का विशेष श्रृंगार किया जाता है. इस दिन भगवान को सोने का श्रंगार किया जाता है। यहां मनौती मानने वाले भक्त बड़ी संख्या में संसारभर से आते हैं और मनौती पूर्ण होने पर भगवान को सवामनी चढ़ाते हैं। कनाट प्लेस देश और दिल्ली का व्यावसायिक केंद्र होने के साथ ही धर्म और आस्था का भी केंद्र है। और इसमें हनुमान मंदिर की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। इसका सबूत हैं यहां हर दिन दर्शन करने वाले लाखो भक्त। इस लिहाज से कनाट प्लेस स्थित हनुमान मंदिर पर्यटन और धार्मिक पर्यटन में महतवपूर्ण भूमिका निभा रहा है। अमूमन देश विदेश से आने वाले पर्यटक और श्रद्धालु इस मंदिर में शीश झुकाना नहीं भूलते। मंगलवार और शनिवार भगवान हनुमान के पूजन के दो विशेष दिन हैं। इन दिनों में मंदिर 24 घंटे के लिए खुला होता है। भगवन की आराधना में जलने वाली अखंड ज्योति यहां हमेशा जलती रहती है।
सरस्वती माता की आरती || Saraswati mata ki aarti
जय सरस्वती माता, मैया जय सरस्वती माता, सदगुण वैभव शालिनी, त्रिभुवन विख्याता । जय सरस्वती माता… चन्द्रवदनि पद्मासिनि, द्युति मंगलकारी, सोहे शुभ हंस सवारी, अतुल तेजधारी । जय सरस्वती माता… बाएं कर में वीणा, दाएं कर माला, शीश मुकुट मणि सोहे, गल मोतियन माला । जय सरस्वती माता… देवी शरण जो आए, उनका उद्धार किया, पैठी मंथरा दासी, रावण संहार किया । जय सरस्वती माता… विद्या ज्ञान प्रदायिनि, ज्ञान प्रकाश भरो, मोह अज्ञान और तिमिर का, जग से नाश करो । जय सरस्वती माता… धूप दीप फल मेवा, माँ स्वीकार करो, ज्ञानचक्षु दे माता, जग निस्तार करो । जय सरस्वती माता… माँ सरस्वती की आरती, जो कोई जन गावे, हितकारी सुखकारी, ज्ञान भक्ति पावे । जय सरस्वती माता… जय सरस्वती माता, जय जय सरस्वती माता । सदगुण वैभव शालिनी, त्रिभुवन विख्याता ।
महामृत्युंजय मंत्र अर्थ सहित || Mahamrityunjaya mantra with meaning
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॥ महामृत्युंजय मंत्र मृत्यु को जीतने वाला महान मंत्र जिसे त्रयंबकम मंत्र भी कहा जाता है, ऋग्वेद का एक श्लोक है। यह त्रयंबक त्रिनेत्रों वाला, रुद्र का विशेषण (जिसे बाद में शिव के साथ जोड़ा गया)को संबोधित है। यह श्लोक यजुर्वेद में भी आता है। गायत्री मंत्र के साथ यह समकालीन हिंदू धर्म का सबसे व्यापक रूप से जाना जाने वाला मंत्र है। शिव को मृत्युंजय के रूप में समर्पित महान मंत्र ऋग्वेद में पाया जाता है। इसे मृत्यु पर विजय पाने वाला महा मृत्युंजय मंत्र कहा जाता है। त्र्यम्बकम् – त्रैलोक्यक शक्ति का बोध कराता है जो सिर में स्थित है। यजा – सुगन्धात शक्ति का घोतक है जो ललाट में स्थित है। महे – माया शक्ति का द्योतक है जो कानों में स्थित है। सुगन्धिम् – सुगन्धि शक्ति का द्योतक है जो नासिका (नाक) में स्थित है। पुष्टि – पुरन्दिरी शक्ति का द्योतक है जो मुख में स्थित है। वर्धनम – वंशकरी शक्ति का द्योतक है जो कंठ में स्थित है। उर्वा – ऊर्ध्देक शक्ति का द्योतक है जो ह्रदय में स्थित है। रुक – रुक्तदवती शक्ति का द्योतक है जो नाभि में स्थित है। मिव रुक्मावती शक्ति का बोध कराता है जो कटि भाग में स्थित है। बन्धानात् – बर्बरी शक्ति का द्योतक है जो गुह्य भाग में स्थित है। मृत्यो: – मन्त्र्वती शक्ति का द्योतक है जो उरुव्दंय में स्थित है। मुक्षीय – मुक्तिकरी शक्तिक का द्योतक है जो जानुव्दओय में स्थित है। मा – माशकिक्तत सहित महाकालेश का बोधक है जो दोंनों जंघाओ में स्थित है। अमृतात – अमृतवती शक्तिका द्योतक है जो पैरो के तलुओं में स्थित है।
काल्काजी मंदिर का इतिहास || History of kalkaji temple
काल्काजी मंदिर भारत के प्राचीन और सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है। यह मंदिर भारत के दिल्ली शहर में स्थित हैं। इसे ‘जयंती पीठ’ और ‘मनोकामना सिद्ध पीठ’ के नाम से भी जाना जाता है। मनोकामना का अर्थ इच्छा, सिद्ध का अर्थ पूरी करने और पीठ का अर्थ मंदिर से है। यह माँ कालिका देवी का प्रसिद्ध है, जो अपने भक्तो की मनोकामना को पूरा करती है। 3000 साल पहले बने इस मंदिर का कुछ भाग अभी भी बचा हुआ है, क्योकि मुघलो ने इस मंदिर पर आक्रमण कर इसे ध्वस्त कर दिया था। कहा जाता है की पांडव और कौरवो ने यहाँ सर्वशक्तिमान बनने की प्रार्थना की थी। जबकि मंदिर की वास्तविक संरचना के छोटे से भाग का निर्माण 1734 में किया गया, जिसे पहाड़ी के उपर देखा जा सकता है। बाद में 19 वी शताब्दी के बीच में अकबर द्वितीय के कोषाध्यक्ष रजा केदारनाथ ने मंदिर में कुछ बदलाव और सुधार किये। पिछले 5 से 6 दशको में, मंदिर के आस-पास बहुत सी धर्मशालाओ का निर्माण किया गया। वर्तमान मंदिर का निर्माण शामलट थोक ब्राह्मण और थोक जोगियन की जमीन पर किया गया, जो काल्काजी मंदिर के पुजारी है। लाखो साल पहले, मंदिर के पड़ोस में रहने वाले भगवान को दो विशाल दानव कष्ट देने लगे और परिणामस्वरूप उन्होंने सृष्टि के निर्माता ब्रह्मा जी से शिकायत की। लेकिन ब्रह्मा जी ने बीच में आने से मना कर दिया और उन्हें माँ पार्वती के पास जाने के लिए कहा। तभी माँ पार्वती के मुख से कौशकी देवी निकली, जिन्होंने उन दो दानवो पर आक्रमण कर उन्हें मार डाला, लेकिन जैसे ही उन दो दानवो का रक्त सुखी धरती पर गिरा वैसे ही जीवन में हजारो दानव जीवित हो गये और विविध बाधाओ के बावजूद कौशकी देवी लडती रही। यह सब देखकर माँ पार्वती को उनपर दया आ गयी और परिणामस्वरूप कौशकी देवी की भौहो से माँ काली देवी निकली, जिनके निचले ओंठ निचे पहाडियों पर और उपरी ओंठ आकाश को छु रहे थे। आते ही उन्होंने मरे हुए दानवो का रक्त ग्रहण किया और शत्रुओ पर विजय प्राप्त की। इसके बाद माँ काली देवी ने उसी जगह को अपना निवासस्थान बना लिया और तभी से उनकी पूजा उस स्थल की मुख्य देवी के रूप में की जाने लगी। माना जाता है की देवी काल्काजी प्रार्थना करने से खुश होती है और वरदान देती है। वर्षो से देवी काल्काजी वहां रहते हुए अपने भक्तो की मनोकामना पूरी करती है। महाभारत के समय भगवान कृष्णा और पांडव ने यही देवी की पूजा की थी। आज भी उत्सवो के आयोजन के साथ-साथ काल्काजी मंदिर में रोज देवी काली की पूजा की जाती है। रोज देवी काली की मूर्ति का अभिषक दूध से किया जाता है। अभिषेक के बाद सुबह 6 बजे और शाम 7:30 बजे आरती की जाती है। यह पूजा मंदिर के पुजारियों द्वारा ही की जाती है। हर रोज हजारो श्रद्धालु यहाँ देवी के दर्शन के लिए आते है और माँ कलिका देवी का आशीर्वाद लेते है। नवरात्र के समय श्रद्धालुओ की समस्या हजारो से बढ़कर लाख तक पहुच जाती है। पर्यटकों के लिए मंदिर सुबह से देर रात तक खुला रखा जाता है। पर्यटक मंदिर के आस-पास के मनोरम वायुमंडल का भी आनंद ले सकते है।