कार्य सिद्धि करने का मन्त्र व विधि इस प्रकार है| ॐ रक्तकोमलधारिणी महामृत वासिनी जटो भवन्तु कत्थ्यै कथ शीघ्रं शुडुं कुरु नमः|| कार्य सिद्धि करने का मन्त्र की विधि इस प्रकार है| इस मन्त्र का एक हजार जप नवरात्रि में किया जाये फिर पंचमेवा और गुग्गल से हवन करके नौ कुँवारी कन्याओं को भोजन करायें| इससे सब कार्य का शुभाशुभ फल प्रत्यक्ष ज्ञात होता है|
शुक्रवार व्रत (जय माँ संतोषी)|
इस व्रत को करने वाला कथा कहते व सुनते समय हाथ मे गुड व भुने चने रखें| विधि: इस व्रत को करने वाला कथा कहते व सुनते समय हाथ मे गुड व भुने चने रखें| संतोषी माता की जय !संतोषी माता की जय! मुख से बोलते जायें| कथा ख़तम होते ही हाथ का गुड चना गों माता को खिलाये| कलश मे रखा गुड चना सबको प्रशाद रूप मे बाँट दे| कथा से पहला कलश को जल से भर दे| उसके ऊपर गुड चने से भरा कटोरा रखें| कथा और आरती ख़तम होने के बाद कलश के जल को घर में सब जगह छिडकें और बचा हुआ जल तुलसी की क्यारी में डाले| व्रत के उद्यापन में अडाये सेर खाजा, मोमनदार पुड़ी, खीर,चने का शाक, नैवेध रखें| घी का दीपक जला संतोषी माता की जय जयकारा बोल नारिअल फोड़े| इस दिन ना कोई खटाई खाए ना ही खाने दे| इस दिन ८ लड़को को भोजन कराये,पहल घर के लड़कों को दें| यथाशक्ति दक्षिणा भी दें| शुक्रवार संतोषीमाता की व्रतकथा: एक बुढ़िया थी और उसके सात पुत्र थे। छः कमाने वाले थे, एक निकम्मा था। बुढ़िया मां छहों पुत्रों की रसोई बनाती, भोजन कराती और पीछे से जो कुछ बचता सो सातवें को दे देती थी। परन्तु वह बड़ा भोला-भाला था, मन में कुछ विचार न करता था। एक दिन अपनी बहू से बोला – देखो, मेरी माता का मुझ पर कितना प्यार है। वह बोली – क्यों नही, सबका जूठा बचा हुआ तुमको खिलाती है। वह बोला – भला ऐसा भई कहीं हो सकता है, मैं जब तक आँखों से न देखूं, मान नहीं सकता। बहू ने हँसकर कहा – तुम देख लोगे तब तो मानोगे। कुछ दिन बाद बड़ा त्यौहार आया। घर में सात प्रकार के भोजन और चूरमा के लड़डू बने। वह जांचने को सिर-दर्द का बहाना कर पतला कपड़ा सिर पर ओढ़कर रसोई घर में सो गया और कपड़े में से सब देखता रहा। छहो भाई भोजन करने आय। उसने देखा माँ ने उनके लिये सुन्दर-सुन्दर आसन बिछाये है। सात प्रकार की रसोई परोसी है। वह आग्रह करके जिमाती है, वह देखता रहा। छहो भाई भोजन कर उठे तब माता ने उनकी जूठी थालियों में से लड़डुओं के टुकड़ों को उठाया और एक लड्डू बनाया। जूठन साफ कर बुढ़िया माँ ने पुकारा – उठो बेटा, छहों भाई भोजन कर गये अब तू ही बाकी है, उठ न, कब खायेगा। वह कहने लगा – माँ, मुझे भोजन नहीं करना। मैं परदेश जा रहा हूँ। माता ने कहा – कल जाता हो तो आज ही जा। वह बोला – हां-हां, आज ही जा रहा हूँ। यह कहकर वह घर से निकल गया। चलते समय बहू की याद आई। वह गोशाला में उपलें थाप रही थी, वहीं जाकर उससे बोला – हम जावें परदेश को आवेंगे कुछ काल । तुम रहियो संतोष से धरम आपनो पाल ।। वह बोली जाओ पिया आनन्द से हमरुं सोच हटाय । राम भरोसे हम रहें ईश्वर तुम्हें सहाय ।। देख निशानी आपकी देख धरुँ मैं धीर । सुधि हमारी मति बिसारियो रखियो मन गंभीर ।। वह बोला – मेरे पास तो कुछ नहीं, यह अंगूठी है सो ले और अपनी कुछ निशानी मुझे दे। वह बोली – मेरे पास क्या है यह गोबर से भरा हाथ है। यह कहकर उसकी पीठ में गोबर के हाथ की थाप मार दी। वह चल दिया। चलते-चलते दूर देश में पहुँचा। वहाँ पर एक साहूकार की दुकान थी, वहां जाकर कहने लगा – भाई मुझे नौकरी पर रख लो। साहूकार को जरुरत थी, बोला – रह जा। लड़के ने पूछा – तनखा क्या दोगे। साहूकार ने कहा – काम देखकर दाम मिलेंगे। साहूकार की नौकरी मिली। वह सवेरे सात बजे से रात तक नौकरी बजाने लगा। कुछ दिनों में दुकान का सारा लेने-देन, हिसाब-किताब, ग्राहकों को माल बेचना, सारा काम करने लगा। साहूकार ने 7-8 नौकर थे। वे सब चक्कर खाने लगे कि यह तो बहुत होशियार बन गया है। सेठ ने भी काम देखा और 3 महीने में उसे आधे मुनाफे का साझीदार बना लिया। वह 12 वर्ष में ही नामी सेठ बन गया और मालिक सारा कारोबार उस पर छो़ड़कर बाहर चला गया। अब बहू पर क्या बीती सो सुनो । सास-ससुर उसे दुःख देने लगे। सारी गृहस्थी का काम करके उसे लकड़ी लेने जंगल में भेजते। इस बीच घर की रोटियों के आटे से जो भूसी निकलती उसकी रोटी बनाकर रख दी जाती और फूटे नारियल के खोपरे में पानी। इस तरह दिन बीतते रहे। एक दिन वह लकड़ी लेने जा रही थी कि रास्ते में बहुत-सी स्त्रियाँ संतोषी माता का व्रत करती दिखाई दीं। वह वहाँ खड़ी हो कथा सुनकर बोली – बहिनों, यह तुम किस देवता का व्रत करती हो और इसके करने सेक्या फल ममिलता है। इस व्रत के करने की क्या विधि है। यदि तुम अपने व्रत का विधान मुझे समझाकर कहोगी तो मैं तुम्हारा अहसान मानूंगी। तब उनमें से एक स्त्री बोली – सुनो यह संतोषी माता का व्रत है, इसके करने से निर्धनता, दरिद्रता का नाश होता है और लक्ष्मी आती है। मन की चिंतायें दूर होती है। घर में सुख होने से मन को प्रसन्नता और शांति मिलती है। निःपुत्र को पुत्र मिलता है, प्रीतम बाहर गया हो तो जल्दी आवे। क्वांरी कन्या को मनपसन्द वर मिले । राजद्घार में बहुत दिनों से मुकदमा चलता हो तो खत्म हो जावे, सब तरह सुख-शान्ति हो, घर में धन जमा हो, पैसा-जायदाद का लाभ हो, वे सब इस संतोषी माता की कृपा से पूरी हो जावे। इसमें संदेह नहीं। वह पूछने लगी- यह व्रत कैसे किया जावे यह भी बताओ तो बड़ी कृपा होगी। स्त्री कहने लगी – सब रुपये का गुड़ चना लेना, इच्छा हो तो सवा पाँच रुपये का लेना या सवा ग्यारह रुपये का भी सहूलियत अनुसार लेना। बिना परेशानी, श्रद्घा, और प्रेम से जितना बन सके सवाया लेना। सवा रुपये से सवा पांच रुपये तथा इससे भी ज्यादा शक्ति और भक्ति के अनुसार लें। हर शुक्रवार को निराहार रह, कथा कहना – सुनना, इसके बीच क्रम टूटे नहीं, लगातार नियम पालन करना। सुनने वाला कोई न मिले तो घी का दीपक जला, उसके आगे जल के
आरती क्या है और कैसे करनी चाहिए?
पूजा के अन्त में आरती की जाती है| पूजन में जो त्रुटि रह जाती है, आरती से उसकी पूर्ति होती है| पूजन मन्त्रहीन और क्रियाहीन होने पर भी आरती कर लेने से उसमें सारी पूर्णता आ जाती है| आरती करने का ही नहीं, आरती देखने का भी बड़ा पुण्य होता है| जो धूप और आरती को देखता है और दोनों हाथों से आरती लेता है, वह समस्त पीदियों का उद्धार करता है और भगवान् विष्णु के परमपत को प्राप्त होता है| आरती क्या है और कैसे करनी चाहिए? इस प्रकार है: साधारणत: पाँच बत्तीयों से आरती की जाती है, इसे ‘ पंचप्रदिप’ भी कहते है| एक सात या उससे भी अधिक बत्तीयों से भी आरती की जाती है| कपूर से भी आरती होती है| कुमकुम, अगर, कपूर धुत और चन्दन, पाँच बत्तीयों अथवा दीए की ( रुई और घी की ) बत्तियाँ बनाकर शंख, घंटा आदि बजाते हुआ आरती करनी चाहिए| आरती उतारते समय सवर्प्रथम भगवान् की प्रतिमा के चरणों में उसे चार बार घुमाएँ, दो बार नाभिदेश में, एक बार मुखमण्डल पर और सात बार समस्त अंगों पर घुमाएँ| यथार्थ में आरती, पूजन के अन्त में इष्ट देवता की प्रसन्नता हेतु की जाती है| इसमें इष्टदेव को दीपक दिखाने के साथ ही उनका स्तवन तथा गुणगान किया जाता है|
इतनी शक्ति हमें देना दाता|
इतनी शक्ति हमें देना दाता मन का विश्वास कमज़ोर हो न हम चलें नेक रस्ते पे हमसे भूल कर भी कोई भूल हो न.. हर तरफ़ ज़ुल्म है, बेबसी है सहमा सहमा-सा हर आदमी है पाप का बोझ बढता ही जाये जाने कैसे ये धरती थमी है बोझ ममता का तू ये उठा ले तेरी रचना का ये अँत हो न हम चलें नेक रस्ते पे हमसे भूल कर भी कोई भूल हो न.. दूर अज्ञान के हों अँधेरे तू हमें ज्ञान की रौशनी दे हर बुराई से बचते रहें हम जितनी भी दे भली ज़िन्दग़ी दे बैर हो न, किसी का किसी से भवना मन में बदले की हो न हम चलें नेक रस्ते पे हमसे भूल कर भी कोई भूल हो न.. हम न सोचें हमें क्या मिला है हम ये सोचें किया क्या है अर्पण फूल खुशियों के बाँटें सभी को सबका जीवन ही बन जाये मधुबन अपनी करुणा का जल तू बहाकर करदे पावन हरेक मनका कोना हम चलें नेक रस्ते पे हमसे भूल कर भी कोई भूल हो न.. हम अँधेरे मे हैं रौशनी दे खो न दें खुद को ही दुश्मनी से हम सज़ा पायें अपने किये की मौत भी हो तो सह लें खुशी से कल जो गुज़रा है फिर से न गुज़रे आनेवाला वो कल ऐसा हो न हम चलें नेक रस्ते पे हमसे भूल कर भी कोई भूल हो न.. इतनी शक्ति हमें देना दाता मन का विश्वास कमज़ोर हो न…
मां सरस्वती चालीसा|
हिंदू धर्म में माता सरस्वती को ज्ञान की देवी कहा गया है। सरस्वती जी को वाग्देवी के नाम से भी जाना जाता है। सरस्वती जी को श्वेत वर्ण अत्यधिक प्रिय होता है। श्वेत वर्ण सादगी का परिचायक होता है। हिन्दू धर्म के अनुसार श्री कृष्ण जी ने सर्वप्रथम सरस्वती जी की आराधना की थी। सरस्वती जी की पूजा साधना में निम्न चालीसा का विशेष महत्त्व है। || चौपाई || जय श्रीसकल बुद्घि बलरासी । जय सर्वज्ञ अमर अविनाशी ॥ जय जय जय वीणाकर धारी । करती सदा सुहंस सवारी ॥ रुप चतुर्भुज धारी माता । सकल विश्व अन्दर विख्याता ॥ जग में पाप बुद्घि जब होती । तबहि धर्म की फीकी ज्योति ॥ तबहि मातु का निज अवतारा । पाप हीन करती महितारा ॥ बाल्मीकि जी थे हत्यारा । तव प्रसाद जानै संसारा ॥ रामचरित जो रचे बनाई । आदि कवि पदवी को पाई ॥ कालिदास जो भये विख्याता । तेरी कृपा दृष्टि से माता ॥ तुलसी सूर आदि विद्घाना । और भये जो ज्ञानी नाना ॥ तिन्ह न और रहेउ अवलम्बा । केवल कृपा आपकी अमबा ॥ करहु कृपा सोई मातु भवानी । दुखित दीन निज दासहिं जानी ॥ पुत्र करइ अपराध बहूता । तेहि न धरइ चित एकउ माता ॥ राखु लाज जननी अब मेरी । विनय करउं भांति बहुतेरी ॥ मैं अनाथ तेरी अवलंबा । कृपा करउ जय जय जगदम्बा ॥ मधुकैटभ जो अति बलवाना । बाहुयुद्घ विष्णु से ठाना ॥ समर हजार पांच में घोरा । फिर भी मुख उनसे नहीं मोरा ॥ मातु सहाय कीन्ह तेहि काला । बुद्घि विपरीत भई खलहाला ॥ तेहि ते मृत्यु भई खल केरी । पुरवहु मातु मनोरथ मेरी ॥ चण्ड मुण्ड जो थे विख्याता । क्षण महु संहारे उन माता ॥ रक्तबीज से समरथ पापी । सुर मुन हृदय धरा सब कांपी ॥ काटेउ सिर जिम कदली खम्बा । बार बार बिनवउं जगदंबा ॥ जगप्रसिद्घ जो शुंभ निशुंभा । क्षण में बांधे ताहि तूं अम्बा ॥ भरत-मातु बुद्घि फेरेउ जाई । रामचन्द्र बनवास कराई ॥ एहि विधि रावन वध तू कीन्हा । सुन नर मुनि सबको सुख दीन्हा ॥ को समरथ तव यश गुन गाना । निगम अनादि अनंत बखाना ॥ विष्णु रुद्र जस सकैं न मारी । जिनकी हो तुम रक्षाकारी ॥ रक्त दन्तिका और शताक्षी । नाम अपार है दानवभक्षी ॥ दुर्गम काज धरा पर कीन्हा । दुर्गा नाम सकल जग लीन्हा ॥ दुर्ग आदि हरनी तू माता । कृपा करहु जब जब सुखदाता ॥ नृप कोपित को मारन चाहै । कानन में घेरे मृग नाहै ॥ सागर मध्य पोत के भंगे । अति तूफान नहिं कोऊ संगे ॥ भूत प्रेत बाधा या दुःख में । हो दरिद्र अथवा संकट में ॥ नाम जपे मंगल सब होई । संशय इसमें करइ न कोई ॥ पुत्रहीन जो आतुर भाई । सबै छांड़ि पूजें एहि भाई ॥ करै पाठ नित यह चालीसा । होय पुत्र सुन्दर गुण ईसा ॥ धूपादिक नैवेघ चढ़ावै । संकट रहित अवश्य हो जावै ॥ भक्ति मातु की करै हमेशा । निकट न आवै ताहि कलेशा ॥ बंदी पाठ करै सत बारा । बंदी पाश दूर हो सारा ॥ रामसागर बांधि हेतु भवानी । कीजै कृपा दास निज जानी ॥ ॥ दोहा ॥ मातु सूर्य कान्त तव, अन्धकार मम रुप । डूबन से रक्षा करहु परुं न मैं भव कूप ॥ बलबुद्घि विघा देहु मोहि, सुनहु सरस्वती मातु । रामसागर अधम को आश्रय तू दे दातु ॥
श्री साईं जी की प्रार्थना|
साईं कृपा से व्रत कथा लिखवाई, भक्तों के हाथों में पहुंची| साईं गुरुवार व्रत करे जो कोई, उसका कल्याण तो हरदम होई| घर बार सुख शांति होवे, साईं ध्यान करे जो सोवे| भोग लगावे निसदिन बाबा को जोई उसके घर में कमी न होई| बाबा की प्रार्थना करिए, साईं मेरे दुःख को हरिए| शिरडी में बाबा की मूर्ति है प्यारी, भक्तों को लगे है न्यारी| मेरे साईं मेरे बाबा, मेरा मन्दिर मेरा काबा| राम भी तुम शाम भी तुम हो, शिवजी का अवतार भी तुम हो| हनुमान तुम ही हो साईं, तुम्ही ने थी लंका जलाई| कलियुग में तुम आए थे साईं, भक्तों का कल्याण हो जाई| भक्तिभाव से पड़े कथा जो, उसकी इच्छा पूरी हो जाती| बाबा मेरे आओ साईं हमको दर्शन दिखलाओ साईं| तुम बिन दिल नहीं लगता, आंसू का दरिया है निकलता| जब-जब देखें तेरी मूरत, तब-तब भीग जाए मेरी मूरत| अंधन को आंखे देते, दीन दुखी के दुख हर लेते| तुम सा नहीं है कोई सहाई, जपते रहें हम साईं साईं| नाम तुम्हारा मंगलकारी, भवसागर से भक्तों को तारी| बाबा मेरे अवगुण माफ कर देना, भक्ति मेरी को ही लेना| बाबा हम पर दया करना, अपने चरणों में ही रखना| चरणों में तुम्हारे शीतल छाया, बचे रहेंगे नहीं पड़ेगी मंद छाया| हमारी बुद्धि निर्मल करना, जग की भलाई हमसे करना| हमको साधन बना लो बाबा, दया कृपा क्षमा दो बाबा| अज्ञानी हम बालक मंदबुद्धि, तेरी दया से हो मन की शुद्धि| पाप ना कोई हमसे होने पाए, दुःख कोई जीव ना पाए| हरपल भला हम करते आए, गुणगान हरपल तेरे गांए| ||दोहा|| साईं हम पर कृपा करो, बालक हैं अनजान| मंदबुद्धि हम जीव हैं, हमको लो आन संभाल||१|| व्रत आपका कर रहे, दो आशीष यह आन| विध्न पड़े न इसमें कोई, कृपा करो दीनदयाल||२||
शिव भक्त मार्कंडेय|
एक बार भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए मृकंडु मुनि ने कठोर तपस्या की| उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए| मृकंडु ने उनसे विनती की – “हे प्रभु! मुझे पुत्र प्रदान करें|” शिव ने पूछा – “कैसा पुत्र चाहिए भक्त? ऐसा कि जिसकी आयु तो लंबी हो किंतु गुण कोई न हो, अथवा जो बुद्धिमान हो, गुणी हो किंतु जिसकी आयु मात्र सोलह वर्ष की हो|” मुनि ने कहा – “भगवान! मुझे गुणवान पुत्र चाहिए|” शिव ने कहा – “तथास्तु!” यह वरदान देकर शिव अंतर्धान हो गए| समय आने पर मृकंडु की पत्नी मरुद्वती ने पुत्र को जन्म दिया| अनेक ऋषि-मुनियों ने आकर प्रसन्नता जताई और बच्चे को आशीर्वाद दिया| ऋषि-मुनियों की उपस्थिति में ही मृकंडु दंपति ने बालक का नाम रखा – मार्कंडेय| बालक मार्कंडेय बहुत मेधावी निकला| सोलह वर्ष की आयु से पहले ही उसने वैदों का ज्ञान प्राप्त कर लिया| उसके आचार्यगण उसकी प्रशंसा करते न थकते| वे कहते-“मृकंडु! बहुत भाग्यशाली हो तुम, जो ऐसा होनहार बेटा मिला|” लेकिन मार्कंडेय के भाग्य को लेकर उसकी माता बहुत चिंतित रहती| मृकंडु जब उसे समझाते तो वह रोते हुए कहती – “स्वामी! मैं भूल नहीं पाती कि शीघ्र ही हमारा बेटा हमसे हमेशा के लिए दूर हो जाएगा|” एक दिन की बात है| कुमार मार्कंडेय पूजा के लिए फूल लेने वाटिका में गया हुआ था| लौटा तो उसने अपनी माता को रोते हुए देखा| समीप ही उदास भाव में उनके पिता बैठे हुए थे| माता को रोते हुए देख उसने पूछा – “मां! तुम रो क्यों रही हो?” मां कुछ न बोली, बस धीरे-धीरे सिसकियां भरती रही| इस पर मार्कंडेय ने पुन: पूछा – “मां! तुम बोलतीं क्यों नहीं| बोलो मां, बोलो| कौन-सा दुख है तुम्हें? कहीं ऐसा तो नहीं कि जो तुम चाहती हो, वह मैं नहीं कर पाऊंगा? पर देखो मां! अब मैं बालक नहीं रहा| कल पूरे सोलह वर्ष का हो जाऊंगा|” “तुम्हारी मां इसीलिए तो रो रही है, पुत्र!” पिता धीरे से बोले| मार्कंडेय ने उलझन भरे स्वर में पूछा – “क्यों? सोलह वर्ष का होने में क्या हानि है?” पिता बोले – “बताता हूं, सुनो|” तब मृकंडु ने उसके जन्म से संबंधित बातें उसे बताईं| सुनकर मार्कंडेय ने माता को धैर्य बंधाया, बोला – “रोओ मत मां! मैं नहीं मरूंगा| भगवान शिव मृत्युंजय हैं| मैं उनसे अमरत्व का वरदान प्राप्त करूंगा|” पिता ने आशीर्वाद देते हुए कहा – “मेरे बच्चे, शिव की कृपा से तुम्हें सफलता मिले|” मार्कंडेय माता-पिता से आशीर्वाद लेकर वन में चला गया| जाते समय माता ने शिव से प्रार्थना की – “हे सदाशिव, मृत्युंजय! मेरा पुत्र आपके आसरे है| हे देव! इसकी रक्षा करना|” अगले दिन प्रात:काल मार्कंडेय ने सागर तट पर जाकर गीली मिट्टी से शिवलिंग बनाया| उस पर पुष्प चढ़ाए और शिव का ध्यान लगाकर बैठ गया| रात होने पर वह प्रभु के सामने नाचने और गाने लगा| तभी अचानक यमराज वहां आ पहुंचे| बोले – “तुम्हारी आयु पूरी हुई| इस संसार से चलने के लिए तैयार हो जाओ|” मार्कंडेय बोले – “थोड़ी देर ठहरिए महाराज! जब तक मैं अपनी उपासना पूरी कर लेता हूं|” यमराज ने गुस्से से कहा – “मूर्ख! क्या तू जानता नहीं कि मृत्यु किसी का इंतजार नहीं करती| मार्कंडेय ने कहा – “कृपा कर मेरी उपासना में बाधा मत डालिए| मेरी उपासना पूरी होते ही आप मुझे अपने लोक ले चलना|” यमराज और भी क्रोधित होकर बोले – “मूर्ख! क्या तू समझता है कि शिव की शरण लेकर तू मुझसे बच जाएगा? तुझे अभी मालूम हो जाएगा कि काल के पाश से कोई नहीं बच सकता| यह कहकर जैसे ही यमराज पाश फेंकने को उद्यत हुए, तभी एक चमत्कार हुआ| एकाएक वहां शिव प्रकट हो गए| मृत्यु के स्वामी को देखकर यमराज ठिठक गए| मार्कंडेय शिव के चरणों में गिर गया| शिव ने उसके मन की इच्छा ताड़ ली और अमरत्व प्रदान कर दिया| आगे चलकर मार्कंडेय को प्रलय काल में स्वयं हरि ने दर्शन दिए और अपना मुख खोलकर उन्हें समूचे ब्रह्मांड के दर्शन कराए| कहा जाता है कि वे आज भी विद्यमान हैं और तीर्थों में आते-जाते रहते हैं नए-नए रूपों में|
गुरु पूर्णिमा के उत्सव के बारे में आने वाले भक्तों के लिए जरूरी सूचना
*जय माता दी जय माता दी जय माता दी* राजेश्वरी धाम मां देवी राज रानी वैष्णो मंदिर में गुरु पूर्णिमा के उत्सव के बारे में आने वाले भक्तों के लिए जरूरी सूचना | आप सब भक्तों को जानकर बहुत खुशी होगी कि हर साल की तरह इस साल भी गुरु पर्व मनाया जाएगा | इस शुभ अवसर पर दोपहर 12:00 से रात तक लंगर की सेवा चलती रहेगी जो भगत इस भंडारे में योगदान देना चाहते हैं वह हमारे मंदिर के मां के परम भक्त रामकृष्ण नानू जी को व दिए गए Code को स्कैन करके दे सकते हैं और दिए हुए दान की रसीद प्राप्त कर सकते हैं *मंदिर के लंगर इंचार्ज पवन नागपाल जी और रामकृष्ण नानू जी* *प्रधान : श्री कैलाश बब्बर व समूह सदस्य* संपर्क- 98142-53652, 98886-51501 राजेश्वरी धाम वैष्णो मंदिर देवी राजरानी जी बस्ती शेखर रोड जालंधर सभी भक्तों को सूचित किया जाता है कि मां देवी राज रानी जी के मंदिर में अष्टमी की चौकी 26.6.2023 सोमवार को रात 8:00 बजे शुरू होगी | जिसमें शहर की प्रसिद्ध भजन मंडलीया दीपू एंड पार्टी, पंकज ठाकुर एंड पार्टी मां के सुंदर भजनों का गुणगान करेंगे और लंगर रात 8:00 बजे आरंभ हो जाएगा | सभी भक्तों समय पर आकर मां जी का आशीर्वाद और प्रसाद ग्रहण करें *निवेदन करता : प्रधान श्री कैलाश बब्बर व समूह सदस्य*
श्री साईं जी के व्रत के लाभ|
श्री साईं बाबा व्रत के फलस्वरूप निम्नलिखित लाभ व फल प्राप्त हो सकते है: 1. पुत्र की प्राप्ति, 2. कार्य सिद्धि, 3. वर प्राप्ति, 4. वधु प्राप्ति, 5. खोया धन मिले, 6. जमीन जायदात मिले, 7. धन मिले, 8. साईं दर्शन, 9. मन की शान्ति, 10. शत्रु शांत होना, 11. व्यापार में वृद्धि, 12. बांझ को भी बच्चे की प्राप्ति हो, 13. इच्छित वास्तु की प्राप्ति, 14. पति का खोया प्रेम मिले, 15. परीक्षा में सफलता, 16. यात्रा का योग, 17. रोग निवारण, 18. कार्य सिद्धि, 19. सर्व मनोकामना पूर्ती, इत्यादि|
लंका में श्री हनुमान जी|
भगवान श्रीराम ने अपने प्रतिज्ञा पूरी की| उन्होंने बालि का वध करके सुग्रीव को भयमुक्त करके किष्किंधा का राज्य सौंप दिया| फिर कुछ दिनों के बाद अपने वायदे के अनुसार सुग्रीव ने जांबवान के नेतृत्व में अपने वानरों का समूह दक्षिण की ओर रवाना कर दिया| उस दल में जांबवान के अलावा बालि का पुत्र अंगद, नल-नील सहित अनेक पराक्रमी वानरों के साथ हनुमान जी भी थे| ऊंचे-ऊंचे पर्वत, वनों और दुर्गम स्थानों को पार करके वह दल दक्षिण समुद्र के किनारे पहुंचा| वहां सामने अगाध एवं असीम महासागर की भयानक लहरों को देखकर वानर-भालू घबरा गए| सीता की खोज कल इए सुग्रीव की दी हुई एक मास की अवधि भी समाप्त हो गई और सामने महासमुद्र| वीर वानर-भालुओं की बुद्धि काम नहीं कर रही थी| इस कारण वानरराज सुग्रीव के कठोर दंड की कल्पना करके उन्होंने कहा – “हम वापस भीं नहीं लौट सकते| माता सीता का पता लगाए बगैर अगर हम किष्किंधा पहुंचे तो सुग्रीव हमें मरवा डालेंगे|” तभी एक कड़कती आवाज सुनकर वे चौंक पड़े| फिर कुछ क्षण बाद एक विशाल गिद्ध वहां पहुंचा और अट्टहास करने लगा- “हा, हा, हा| बहुत दिनों के बाद मुझे स्वादिष्ट भोजन मिला है|” उस विशाल गिद्ध को देखकर हनुमान जी बड़ी निर्भीकता से बोले – “तुम कौन हो गिद्धराज? और तुम हमें किसलिए खाना चाहते हो? गिद्ध बोला – “मेरा नाम संपाती है| मैं बूढ़ा हो गया हूं, इसलिए अपना आहार नहीं खोज पाता| आज घर बैठे ही मुझे आहार मिल गया है तो उसे क्यों छोड़ूं?” हनुमान जी ने कहा – “ओह, कितना फर्क है गिद्ध गिद्ध में| एक जटायु था, जिसने भगवान राम के लिए अपने प्राण भी न्योछावर कर दिए और एक तुम हो जो हमें खा जाना चाहते हो|” यह सुनकर संपाती बोला – “जटायु, जटायु तो मेरा छोटा भाई है| तुम्हें कहां मिला और उसकी मृत्यु कैसे हुई?” हनुमान जी ने जटायु-रावण युद्ध की सारी घटना सुनाई जो उन्हें श्रीराम से सुनने को मिली थी| फिर बोले – “मैं श्रीराम के काम से आया हूं| दुष्ट रावण माता सीता को हरण करके ले गया है| मैं लंकापुरी जाना चाहता हूं| लेकिन कैसे जाऊं, बीच में तो इतना विशाल समुद्र है|” जटायु की मौत का समाचार सुनकर संपाती रो पड़ा| फिर उसने हनुमान जी से कहा – “लंका यहां से कई सौ योजन दूर है। अगर तुममें से कोई लंबी छलांग लगाकर समुद्र पार करे तो लंकापुरी पहुंचा जा सकता है|” संपाती की बात सुनकर वानर समूह में मंत्रणा होने लगी| अंगद बोला – “हममें से कौन ऐसा वीर है जो समुद्र को लांघकर लंकापुरी पहुंच सकता है?” अंगद का वचन सुनकर पहले तो समस्त भालू-बंदर चुप हो गए| किंतु कुछ देर बाद कोई कहता, ‘मैं दस योजन लंबी छलांग लगा सकता हूं| कोई कहता बीस, कोई कहता पचास| लेकिन हनुमान जी को चुप बैठा देखा तो जांबवान ने उनसे पूछा – “पवनपुत्र! तुम चुप क्यों हो? तुम शायद भूल गए हो कि तुममें वह शक्ति है, जिसका कोई भी मुकाबला नहीं कर सकता|” जांबवान की बात सुनकर हनुमान जी को अपनी शक्ति का भान हो गया, जो वे ऋषियों के शाप के कारण भूल चुके थे| स्वयं में नवशक्ति और स्फूर्ति का अनुभव करते हुए वे लंबी छलांग लगाकर सागर के ऊपर उड़ चले| जब वे कई योजन दूर निकल गए तो मार्ग में समुद्र में स्थित मैनाक पर्वत उन्हें दिखाई दिया| जहां सर्पो की माता सुरसा रहती थी| हनुमान जी को आते देख सुरसा अपना विकराल रूप धारण कर हनुमान जी के सामने आ खड़ी हुई| उसने हनुमान जी को निगलने के लिए अपना मुंह कई योजन फैला दिया| लेकिन हनुमान जी सतर्क थे| उन्होंने भी अपना आकार बढ़ाया, जिससे कि सुरसा को उन्हें निगलने में परेशानी होने लगी| उसने और भी बड़ा रूप धारण किया| हनुमान जी भी उसी अनुपात में बढ़ गए| सुरसा रूप बढ़ा-बढ़ाकर थक गई, किंतु वह हनुमान जी को निगल न सकी| अंत में जब वह अपनी पूरी शक्ति से विकराल रूप धारण कर चुकी तो हनुमान जी मच्छर जितना रूप धारण करके सुरसा के मुख से होकर दूसरी ओर से जा निकले| सुरसा को हैरानी के साथ आश्चर्य भी हुआ| उसके जीवन में यह पहला शिकार था, जो उसके मुंह में प्रविष्ट होकर सही सलामत बाहर निकल सका था| वह पूर्ववत रूप में आ गई| उसने हनुमान जी से पूछा – “सचसच बताओ, कौन हो तुम? कोई साधारण वानर तो नहीं दिखते| क्योंकि मेरा कोई भी शिकार आज तक मेरे हाथ से नहीं निकल सका है|” हनुमान जी ने कहा – मैं श्रीराम का सेवक हनुमान हूं| मैं माता सीता की खोज करने लंकापुरी जा रहा हूं| क्योंकि दुष्ट रावण उन्हें हरकर ले गया है|” श्रीराम का नाम सुनते ही सुरसा का व्यवहार एकदम बदल गया| वह विनम्र स्वर में बोली – उस भगवान राम के दूत हो, मेरे लिए यह बड़ी खुशी की बात है कि मैंने तुम्हारे दर्शन कर लिए| तुम निश्चित रहो, अब मैं तुम्हारा कोई अनिष्ट न करूंगी|” हनुमान जी ने पूछा – लेकिन माता तुम हो कौन?” सुरसा बोली – “मैं सर्पो की माता सुरसा हूं| देवताओं ने मुझे इस मार्ग की निगरानी का काम सौंपा हुआ है| उन्होंने मझे तुम्हारी परीक्षा लेने के लिए भेजा था कि वास्तव में तुम लंका से कुशल लौट सकते हो या नहीं| मुझे खुशी है कि तुम अपनी परीक्षा में सफल हुए|” यह कहकर सुरसा ने उन्हें आशीर्वाद दिया और हनुमान जी पुनः उसी वेग से लंका की ओर उड़ चले| लंका के प्रवेश द्वार पर पहुंचकर हनुमान जी सोच में पड़ गए कि प्रवेश कहां से करूं? प्रवेश द्वार पर अनेक बड़ी-बडी भयंकर आकृति वाले राक्षस पहरा दे रहे थे| उनसे उलझना बेकार समझकर हनुमान जी ने सूक्ष्म रूप धारण किया और राक्षसों के बीच से निकल चले| अभी के ही कदम आगे बढ़े थे कि एक विशाल राक्षसी ने उनका मार्ग रोक लिया| यह देख हनुमान जी अपने पूर्व रूप में आ गए| उन्होंने राक्षसी को एक भरपूर घूंसा जड़ दिया| जिससे लंकिनी अचेत होक गिर पड़ी| लेकिन जब उसे होश आया तो वह गिड़गिड़ाकर बोली – “मुझे क्षमा कर दो| मुझे मत मारो| मैं तुम्हें पहचान गई हूं| मैं पितामह ब्रह्मा के
करे कराए आपे प्रभू – साखी श्री गुरु अर्जन देव जी|
एक दिन गुरु अर्जन देव जी के पास चड्डे जाति के दटू, भानू, निहालू और तीर्था आए| उन्होंने आकर गुरु जी से प्रार्थना की महाराज! हमें तो आपके वचनों की समझ ही नहीं आती| एक जगह आप जी लिखते हैं – \”करे कराए आपि प्रभू, सभु किछु तिसही हाथ|\” पर दूसरे स्थान पर आप जी यह लिखते हैं – जैतसरी महला ५ वार सलोका नालि \”जैसा बीजै सो लुणै करम इहु खेत||\” गुरु जी कहने लगे हे भाई! जिस प्रकार बुद्धिमान वैद किसी रोगी का रोग देखकर दवाई देता है उसी प्रकार सिख के जीवन-व्यवहार, रहणी-बहणी को देख कर उपदेश दिया जाता है| जैसे कि जो दुनियादारी के कामों में लगा हुआ करम करता है, उसको अच्छे कर्मों की प्रेरणा के लिए ‘जैसा बीजै सो लुणै’ का अधिकारी समझ कर उपदेश दिया जाता है| परन्तु जो कोई विचारशील होकर परमात्मा की भक्ति करता है उसको ‘करे कराए आपि प्रभू’ का उपदेश दिया जाता है| ऐसा ना हो कि कहीं उसको अपनी करनी का गर्व हो जाए| इस प्रकार गुरु का उपदेश सिख की अध्यात्मिक अवस्था को ध्यान में रखकर दिया जाता है| इसलिए सिख को किसी प्रकार का भ्रम नहीं करना चाहिए| उसको अपनी मानसिक अवस्था के अनुसार उपदेश ग्रहण करना चाहिए|
श्री सीता राम जी की आरती|
जुगल छबिकी आरती करूँ नीकी| गौर बरन श्रीजनक ललीकी, स्याम बरन सिय पीकी| मुकुट चंद्रिका में द्युति राजै, अगनित सूर्य ससीकी| सुन्दर अंग अंग में छबि है, कोटिन काम रतीकी| जुगल रूप में सबही पटतर, उपमा हो गई फीकी| रामेश्वर लखि ललित जुगल, छबि हुलसत हिय सबकी की|
जलंधर वध की कथा|
एक बार इंद्र सहित देवताओं ने भगवान शिव की परीक्षा करनी चाही| वह देवों के गुरु वृहस्पति के साथ कैलाश पर्वत पर पहुंचे| शिव ने अपनी आत्मिक शक्ति के बल पर जान लिया| कि ये लोग मेरी परीक्षा लेने आ रहे हैं| अतः उन्होंने एक अवधूत का वेश धारण कर लिया और उनके मार्ग में आ खड़े हुए| इंद्र ने उन्हें राह से हट जाने का संकेत किया| किंतु अवधूत वेशधारी शिव अपने स्थान पर खड़े रहे| यह देख इंद्र को क्रोध आ गया। बोले-“अरे हट रास्ते से जानता नहीं, मैं कौन हूं? हट जा, नहीं तो वज्र से तेरे टुकड़े-टुकड़े कर दूंगा|” धमकी सुनकर अवधूत वेशधारी शिव को क्रोध आ गया। उन्होंने जोर से एक हुंकार भरी जिसे सुनकर चारों दिशाएं कांप उठीं| गुरु बृहस्पति तुरंत भांप गए कि अवधूत वास्तव में कोई और न होकर स्वयं भगवान शिव हैं| उन्होंने इंद्र को संकेत करके कहा-”क्या अनर्थ कर रहे हो सुरेंद्र ! तुम भगवान शिव को नहीं पहचान रहे हो| ये तो साक्षात भगवान शिव हैं|” इंद्र को अपनी भूल का ज्ञान हुआ| वह तुरंत भगवान शिव के चरणों में गिरकर क्षमा याचना करने लगा- “क्षमा करें भगवन ! मुझसे पहचानने में भूल हो गई|” गुरु बृहस्पति ने कहा- हां प्रभु! देवेंद्र को क्षमा कर दीजिए| ये आपको पहचान नहीं पाए थे| अंजाने में ही इन्होंने आपको अपशब्द कह दिए| क्षमा कीजिए|” गुरु बृहस्पति के अनुनय-विनय करने पर शिव ने इंद्र को क्षमा कर दिया| इस घटना के कुछ दिनों बाद एक विलक्षण चमत्कार हुआ| समुद्र तट पर गंगा सागर के किनारे एक बालक रेत में पड़ा रुदन कर रहा था| उसके गले से इतना प्रलयंकारी रुदन फूट रहा था कि उससे चारों दिशाएं कांपने लगीं| देव, दानव, दैत्य सब घबरा गए| वायु थम-सी गई| घबराए हुए देवता इंद्र सहित पितामह ब्रह्मा के पास पहुंचे और उनसे कहा – “पितामह ! सागर संगम पर एक अद्भुत बालक रेत में पड़ा रो रहा है| वह इतनी जोर-जोर से रुदन कर रहा है कि देवों में भय छा गया है| कृपया चलकर इस संकट को दूर कीजिए|” पितामह ब्रह्मा इंद्रादि देवताओं के साथ सागर संगम पहुंचे| पितामह के पहुंचते ही सागर अपने स्थान से निकला| उसने इंद्र सहित पितामह की वंदना की| ब्रह्मा ने सागर से पूछा – “जल में रेत पर पड़ा यह बालक कौन है? इसके रुदन को सुनकर समस्त संसार त्रस्त हो रहा है|” सागर ने कहा- मैं नहीं जानता भगवन! एक दिन एक विलक्षण तेज लहरों में आ गया था| उसी से इस बालक की उत्पत्ति हुई है|” यह कहकर सागर ने बालक को गोद में उठाया और ब्रह्मा की गोद में दे दिया| ब्रह्मा की गोद में आते ही बालक ने रोना बंद कर दिया और कुछ ही देर में अचानक बालक की बांहें आगे बढ़ीं, उसकी दोनों बांहों ने ब्रह्मा का गला पकड़ लिया| यह देख अन्य देवता स्तंभित हो उठे| ब्रह्मा ने अपना गला छुड़ाने का प्रयास किया किंतु बालक के हाथों की पकड़ और मजबूत हो गई| फिर अचानक बालक ने उनका गला छोड़ दिया और मुस्कुराने लगा| ब्रह्मा अपना गला सहलाते हुए बोले – “इस बालक का नाम क्या है सागर?” सागर बोला – “अभी इसका नामकरण नहीं हुआ है! पितामह| आप ही इसका कोई नाम रख दीजिए|” ब्रह्मा बोले – |मैं इसका नाम जलंधर रखता हूं| आज से यह तुम्हारा ही पुत्र कहा जाएगा|” बच्चे का नामकरण करके सागर के हाथों में सौंपकर पितामह सहित सब देवता अपने अपने धाम लौट गए| बालक कुछ बड़ा हुआ तो पितामह की आज्ञा से आचार्य शुक्र ने उसे शिक्षा देनी आरंभ कर दी| देखते ही देखते बालक युवक बन गया| शुक्राचार्य ने उसे दैत्यों का सम्राट बना दिया और कालनेमि नामक एक असुर की वृंदा नामक कन्या से उसका विवाह कर दिया| जलंधर महाबलवान सिद्ध हुआ| देखते ही देखते उसने समस्त सागर के द्वीपों पर अपना शासन स्थापित कर लिया| उसकी पत्नी वृंदा ने हर मामले में उसके साथ सहयोग किया| वृंदा एक सती स्त्री थी| उसे ब्रह्मा का वरदान मिला हुआ था कि जब तक उसका सतीत्व कायम रहेगा, सुर-असुर, देव-दानव कोई भी उसके पति का बाल भी बांका नहीं कर पाएगा| एक दिन आचार्य शुक्र जलंधर की राजसभा में पधारे| जलंधर ने आचार्य की चरण-वंदना की और उन्हें ऊंचे आसन पर बैठाकर पूछा – “आचार्य ! हमारे यहां एक राहु नामक वीर है| मैं जानना चाहता हूं कि उसका सिर क्यों कटा हुआ है|” आचार्य शुक्र ने कहा – “दैत्यराज ! राहु का सिर भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से काट दिया था|” जलंधर बोला – “मगर क्यों आचार्य ! राहु ने ऐसा क्या कसूर कर दिया था ?” उत्तर में शुक्राचार्य ने उसे सागर मंथन की समस्त कथा सुनाकर कहा – “उसका अपराध यह था कि उसने देवताओं की पंक्ति में बैठकर धोखे से अमृत पान कर लिया था|” जलंधर बोला – “तो इसमें क्या अपराध हो गया आचार्य! आखिर अमृत निकला भी तो दैत्यों और देवताओं के सम्मिलित प्रयास से ही था| फिर अकेले देवता ही उस अमृत को पी जाने के अधिकारी कैसे बन गए|” आचार्य बोले – “इसमें भी विष्णु की छलनीति थी दैत्यराज! समुद्र से निकले समस्त रत्न देवराज इंद्र ले गए थे|” यह सुनकर जलंधर क्रोधित होकर बोला – “मैं ऐसा हरगिज नहीं होने दूंगा| मेरे पिता के रत्नों का अधिकारी इंद्र नहीं, मैं स्वयं हूं| देवताओं को सागर के रत्न लौटाने ही पड़ेंगे|” उसके बाद शुक्राचार्य तो वापस अपने स्थान पर चले गए और जलंधर ने घस्मर नामक दैत्य को बुलाकर इंद्रपुरी रवाना कर दिया ताकि वह इंद्र को यह संदेश दे आए कि सागर मंथन से प्राप्त सारे रत्नों को उसे सौंप दें| घस्मर इंद्रपुरी पहुंचा| उसने इंद्र से कहा – देवराज! मैं दैत्यराज जलंधर का एक संदेश लेकर उपस्थित हुआ हूं| दैत्यराज ने कहा है कि सागर मंथन के दौरान उसके पिता के जो रत्न आपने हथिया लिए थे, उन्हें तुरंत लौटा दें|” इंद्र ने आश्चर्य से कहा – “रत्न! कैसे रत्न! दैत्यराज से कहना कि वह रत्न तो देवों के परिश्रम के फल थे|” सेवक बोला – “लेकिन परिश्रम तो देव और दानव दोनों ने ही किया था| फिर रत्न अकेले देवो के कैसे हो गए| सीधी तरह रत्नों को लौटा
भैरव चालीसा|
॥ दोहा ॥ श्री गणपति गुरु गौरी पद प्रेम सहित धरि माथ । चालीसा वंदन करो श्री शिव भैरवनाथ ॥ श्री भैरव संकट हरण मंगल करण कृपाल । श्याम वरण विकराल वपु लोचन लाल विशाल ॥ ॥ चौपाई ॥ जय जय श्री काली के लाला । जयति जयति काशी-कुतवाला ॥ जयति बटुक-भैरव भय हारी । जयति काल-भैरव बलकारी ॥ जयति नाथ-भैरव विख्याता । जयति सर्व-भैरव सुखदाता ॥ भैरव रूप कियो शिव धारण । भव के भार उतारण कारण ॥ भैरव रव सुनि हवै भय दूरी । सब विधि होय कामना पूरी ॥ शेष महेश आदि गुण गायो । काशी-कोतवाल कहलायो ॥ जटा जूट शिर चंद्र विराजत । बाला मुकुट बिजायठ साजत ॥ कटि करधनी घुंघरू बाजत । दर्शन करत सकल भय भाजत ॥ जीवन दान दास को दीन्ह्यो । कीन्ह्यो कृपा नाथ तब चीन्ह्यो ॥ वसि रसना बनि सारद-काली । दीन्ह्यो वर राख्यो मम लाली ॥ धन्य धन्य भैरव भय भंजन । जय मनरंजन खल दल भंजन ॥ कर त्रिशूल डमरू शुचि कोड़ा । कृपा कटाक्ष सुयश नहिं थोडा ॥ जो भैरव निर्भय गुण गावत । अष्टसिद्धि नव निधि फल पावत ॥ रूप विशाल कठिन दुख मोचन । क्रोध कराल लाल दुहुं लोचन ॥ अगणित भूत प्रेत संग डोलत । बम बम बम शिव बम बम बोलत ॥ रुद्रकाय काली के लाला । महा कालहू के हो काला ॥ बटुक नाथ हो काल गंभीरा । श्वेत रक्त अरु श्याम शरीरा ॥ करत नीनहूं रूप प्रकाशा । भरत सुभक्तन कहं शुभ आशा ॥ रत्न जड़ित कंचन सिंहासन । व्याघ्र चर्म शुचि नर्म सुआनन ॥ तुमहि जाइ काशिहिं जन ध्यावहिं । विश्वनाथ कहं दर्शन पावहिं ॥ जय प्रभु संहारक सुनन्द जय । जय उन्नत हर उमा नन्द जय ॥ भीम त्रिलोचन स्वान साथ जय । वैजनाथ श्री जगतनाथ जय ॥ महा भीम भीषण शरीर जय । रुद्र त्रयम्बक धीर वीर जय ॥ अश्वनाथ जय प्रेतनाथ जय । स्वानारुढ़ सयचंद्र नाथ जय ॥ निमिष दिगंबर चक्रनाथ जय । गहत अनाथन नाथ हाथ जय ॥ त्रेशलेश भूतेश चंद्र जय । क्रोध वत्स अमरेश नन्द जय ॥ श्री वामन नकुलेश चण्ड जय । कृत्याऊ कीरति प्रचण्ड जय ॥ रुद्र बटुक क्रोधेश कालधर । चक्र तुण्ड दश पाणिव्याल धर ॥ करि मद पान शम्भु गुणगावत । चौंसठ योगिन संग नचावत ॥ करत कृपा जन पर बहु ढंगा । काशी कोतवाल अड़बंगा ॥ देयं काल भैरव जब सोटा । नसै पाप मोटा से मोटा ॥ जनकर निर्मल होय शरीरा । मिटै सकल संकट भव पीरा ॥ श्री भैरव भूतों के राजा । बाधा हरत करत शुभ काजा ॥ ऐलादी के दुख निवारयो । सदा कृपाकरि काज सम्हारयो ॥ सुन्दर दास सहित अनुरागा । श्री दुर्वासा निकट प्रयागा ॥ श्री भैरव जी की जय लेख्यो । सकल कामना पूरण देख्यो ॥ ॥ दोहा ॥ जय जय जय भैरव बटुक स्वामी संकट टार । कृपा दास पर कीजिए शंकर के अवतार ॥
तुम्हारे विचार ही तुम्हारे कर्म हैं!
एक राजा हाथी पर बैठकर अपने राज्य का भ्रमण कर रहा था। अचानक वह एक दुकान के सामने रुका और अपने मंत्री से कहा: मुझे नहीं पता क्यों, पर मैं इस दुकान के स्वामी को फाँसी देना चाहता हूँ। यह सुनकर मंत्री को बहुत दु:ख हुआ। लेकिन जब तक वह राजा से कोई कारण पूछता, तब तक राजा आगे बढ़ गया। अगले दिन, मंत्री उस दुकानदार से मिलने के लिए एक साधारण नागरिक के वेष में उसकी दुकान पर पहुँचा। उसने दुकानदार से ऐसे ही पूछ लिया कि उसका व्यापार कैसा चल रहा है? दुकानदार चंदन की लकड़ी बेचता था। उसने बहुत दुखी होकर बताया कि मुश्किल से ही उसे कोई ग्राहक मिलता है। लोग उसकी दुकान पर आते हैं, चंदन को सूँघते हैं और चले जाते हैं। वे चंदन कि गुणवत्ता की प्रशंसा भी करते हैं, पर ख़रीदते कुछ नहीं। अब उसकी आशा केवल इस बात पर टिकी है कि राजा जल्दी ही मर जाएगा। उसकी अन्त्येष्टि के लिए बड़ी मात्रा में चंदन की लकड़ी खरीदी जाएगी। वह आसपास अकेला चंदन की लकड़ी का दुकानदार था, इसलिए उसे पक्का विश्वास था कि राजा के मरने पर उसके दिन बदलेंगे। अब मंत्री की समझ में आ गया कि राजा उसकी दुकान के सामने क्यों रुका था और क्यों दुकानदार को मार डालने की इच्छा व्यक्त की थी। शायद दुकानदार के नकारात्मक विचारों की तरंगों ने राजा पर वैसा प्रभाव डाला था, जिसने उसके बदले में दुकानदार के प्रति अपने अन्दर उसी तरह के नकारात्मक विचारों का अनुभव किया था। बुद्धिमान मंत्री ने इस विषय पर कुछ क्षण तक विचार किया। फिर उसने अपनी पहचान और पिछले दिन की घटना बताये बिना कुछ चन्दन की लकड़ी ख़रीदने की इच्छा व्यक्त की। दुकानदार बहुत खुश हुआ। उसने चंदन को अच्छी तरह कागज में लपेटकर मंत्री को दे दिया। जब मंत्री महल में लौटा तो वह सीधा दरबार में गया जहाँ राजा बैठा हुआ था और सूचना दी कि चंदन की लकड़ी के दुकानदार ने उसे एक भेंट भेजी है। राजा को आश्चर्य हुआ। जब उसने बंडल को खोला तो उसमें सुनहरे रंग के श्रेष्ठ चंदन की लकड़ी और उसकी सुगंध को देखकर बहुत प्रसन्न हुआ। प्रसन्न होकर उसने चंदन के व्यापारी के लिए कुछ सोने के सिक्के भिजवा दिये। राजा को यह सोचकर अपने हृदय में बहुत खेद हुआ कि उसे दुकानदार को मारने का अवांछित विचार आया था। जब दुकानदार को राजा से सोने के सिक्के प्राप्त हुए, तो वह भी आश्चर्यचकित हो गया। वह राजा के गुण गाने लगा जिसने सोने के सिक्के भेजकर उसे ग़रीबी के अभिशाप से बचा लिया था। कुछ समय बाद उसे अपने उन कलुषित विचारों की याद आयी जो वह राजा के प्रति सोचा करता था। उसे अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए ऐसे नकारात्मक विचार करने पर बहुत पश्चात्ताप हुआ। यदि हम दूसरे व्यक्तियों के प्रति अच्छे और दयालु विचार रखेंगे, तो वे सकारात्मक विचार हमारे पास अनुकूल रूप में ही लौटेंगे। लेकिन यदि हम बुरे विचारों को पालेंगे, तो वे विचार हमारे पास उसी रूप में लौटेंगे।
श्री सत्यनारायण कथा|
सूत जी बोले: हे ऋषियों ! जिसने पहले समय में इस व्रत को किया था उसका इतिहास कहता हूँ, ध्यान से सुनो! सुंदर काशीपुरी नगरी में एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मण रहता था। भूख प्यास से परेशान वह धरती पर घूमता रहता था। ब्राह्मणों से प्रेम से प्रेम करने वाले भगवान ने एक दिन ब्राह्मण का वेश धारण कर उसके पास जाकर पूछा: हे विप्र! नित्य दुखी होकर तुम पृथ्वी पर क्यूँ घूमते हो? दीन ब्राह्मण बोला: मैं निर्धन ब्राह्मण हूँ। भिक्षा के लिए धरती पर घूमता हूँ। हे भगवान ! यदि आप इसका कोई उपाय जानते हो तो बताइए। वृद्ध ब्राह्मण कहता है कि सत्यनारायण भगवान मनोवांछित फल देने वाले हैं इसलिए तुम उनका पूजन करो। इसे करने से मनुष्य सभी दुखों से मुक्त हो जाता है। वृद्ध ब्राह्मण बनकर आए सत्यनारायण भगवान उस निर्धन ब्राह्मण को व्रत का सारा विधान बताकर अन्तर्धान हो गए। ब्राह्मण मन ही मन सोचने लगा कि जिस व्रत को वृद्ध ब्राह्मण करने को कह गया है मैं उसे जरुर करूँगा। यह निश्चय करने के बाद उसे रात में नीँद नहीं आई। वह सवेरे उठकर सत्यनारायण भगवान के व्रत का निश्चय कर भिक्षा के लिए चला गया। उस दिन निर्धन ब्राह्मण को भिक्षा में बहुत धन मिला। जिससे उसने बंधु-बाँधवों के साथ मिलकर श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत संपन्न किया। भगवान सत्यनारायण का व्रत संपन्न करने के बाद वह निर्धन ब्राह्मण सभी दुखों से छूट गया और अनेक प्रकार की संपत्तियों से युक्त हो गया। उसी समय से यह ब्राह्मण हर माह इस व्रत को करने लगा। इस तरह से सत्यनारायण भगवान के व्रत को जो मनुष्य करेगा वह सभी प्रकार के पापों से छूटकर मोक्ष को प्राप्त होगा। जो मनुष्य इस व्रत को करेगा वह भी सभी दुखों से मुक्त हो जाएगा। सूत जी बोले कि इस तरह से नारद जी से नारायण जी का कहा हुआ श्रीसत्यनारायण व्रत को मैने तुमसे कहा। हे विप्रो ! मैं अब और क्या कहूँ? ऋषि बोले: हे मुनिवर ! संसार में उस विप्र से सुनकर और किस-किस ने इस व्रत को किया, हम सब इस बात को सुनना चाहते हैं। इसके लिए हमारे मन में श्रद्धा का भाव है। सूत जी बोले: हे मुनियों! जिस-जिस ने इस व्रत को किया है, वह सब सुनो ! एक समय वही विप्र धन व ऎश्वर्य के अनुसार अपने बंधु-बाँधवों के साथ इस व्रत को करने को तैयार हुआ। उसी समय एक एक लकड़ी बेचने वाला बूढ़ा आदमी आया और लकड़ियाँ बाहर रखकर अंदर ब्राह्मण के घर में गया। प्यास से दुखी वह लकड़हारा उनको व्रत करते देख विप्र को नमस्कार कर पूछने लगा कि आप यह क्या कर रहे हैं तथा इसे करने से क्या फल मिलेगा? कृपया मुझे भी बताएँ। ब्राह्मण ने कहा कि सब मनोकामनाओं को पूरा करने वाला यह सत्यनारायण भगवान का व्रत है। इनकी कृपा से ही मेरे घर में धन धान्य आदि की वृद्धि हुई है। विप्र से सत्यनारायण व्रत के बारे में जानकर लकड़हारा बहुत प्रसन्न हुआ। चरणामृत लेकर व प्रसाद खाने के बाद वह अपने घर गया। लकड़हारे ने अपने मन में संकल्प किया कि आज लकड़ी बेचने से जो धन मिलेगा उसी से श्रीसत्यनारायण भगवान का उत्तम व्रत करूँगा। मन में इस विचार को ले बूढ़ा आदमी सिर पर लकड़ियाँ रख उस नगर में बेचने गया जहाँ धनी लोग ज्यादा रहते थे। उस नगर में उसे अपनी लकड़ियों का दाम पहले से चार गुना अधिक मिलता है। बूढ़ा प्रसन्नता के साथ दाम लेकर केले, शक्कर, घी, दूध, दही और गेहूँ का आटा ले और सत्यनारायण भगवान के व्रत की अन्य सामग्रियाँ लेकर अपने घर गया। वहाँ उसने अपने बंधु-बाँधवों को बुलाकर विधि विधान से सत्यनारायण भगवान का पूजन और व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से वह बूढ़ा लकड़हारा धन पुत्र आदि से युक्त होकर संसार के समस्त सुख भोग अंत काल में बैकुंठ धाम चला गया। ॥इति श्री सत्यनारायण व्रत कथा का द्वितीय अध्याय संपूर्ण॥ श्रीमन्न नारायण-नारायण-नारायण । भज मन नारायण-नारायण-नारायण । श्री सत्यनारायण भगवान की जय॥
संतोषी माता चालीसा|
॥ दोहा ॥ बन्दौं सन्तोषी चरण रिद्धि-सिद्धि दातार । ध्यान धरत ही होत नर दुःख सागर से पार ॥ भक्तन को सन्तोष दे सन्तोषी तव नाम । कृपा करहु जगदम्ब अब आया तेरे धाम ॥ ॥ चौपाई ॥ जय सन्तोषी मात अनूपम । शान्ति दायिनी रूप मनोरम ॥ सुन्दर वरण चतुर्भुज रूपा । वेश मनोहर ललित अनुपा ॥ श्वेताम्बर रूप मनहारी । माँ तुम्हारी छवि जग से न्यारी ॥ दिव्य स्वरूपा आयत लोचन । दर्शन से हो संकट मोचन ॥ 4 ॥ जय गणेश की सुता भवानी । रिद्धि- सिद्धि की पुत्री ज्ञानी ॥ अगम अगोचर तुम्हरी माया । सब पर करो कृपा की छाया ॥ नाम अनेक तुम्हारे माता । अखिल विश्व है तुमको ध्याता ॥ तुमने रूप अनेकों धारे । को कहि सके चरित्र तुम्हारे ॥ 8 ॥ धाम अनेक कहाँ तक कहिये । सुमिरन तब करके सुख लहिये ॥ विन्ध्याचल में विन्ध्यवासिनी । कोटेश्वर सरस्वती सुहासिनी ॥ कलकत्ते में तू ही काली । दुष्ट नाशिनी महाकराली ॥ सम्बल पुर बहुचरा कहाती । भक्तजनों का दुःख मिटाती ॥ 12 ॥ ज्वाला जी में ज्वाला देवी । पूजत नित्य भक्त जन सेवी ॥ नगर बम्बई की महारानी । महा लक्ष्मी तुम कल्याणी ॥ मदुरा में मीनाक्षी तुम हो । सुख दुख सबकी साक्षी तुम हो ॥ राजनगर में तुम जगदम्बे । बनी भद्रकाली तुम अम्बे ॥ 16 ॥ पावागढ़ में दुर्गा माता । अखिल विश्व तेरा यश गाता ॥ काशी पुराधीश्वरी माता । अन्नपूर्णा नाम सुहाता ॥ सर्वानन्द करो कल्याणी । तुम्हीं शारदा अमृत वाणी ॥ तुम्हरी महिमा जल में थल में । दुःख दारिद्र सब मेटो पल में ॥ 20 ॥ जेते ऋषि और मुनीशा । नारद देव और देवेशा । इस जगती के नर और नारी । ध्यान धरत हैं मात तुम्हारी ॥ जापर कृपा तुम्हारी होती । वह पाता भक्ति का मोती ॥ दुःख दारिद्र संकट मिट जाता । ध्यान तुम्हारा जो जन ध्याता ॥ 24 ॥ जो जन तुम्हरी महिमा गावै । ध्यान तुम्हारा कर सुख पावै ॥ जो मन राखे शुद्ध भावना । ताकी पूरण करो कामना ॥ कुमति निवारि सुमति की दात्री । जयति जयति माता जगधात्री ॥ शुक्रवार का दिवस सुहावन । जो व्रत करे तुम्हारा पावन ॥ 28 ॥ गुड़ छोले का भोग लगावै । कथा तुम्हारी सुने सुनावै ॥ विधिवत पूजा करे तुम्हारी । फिर प्रसाद पावे शुभकारी ॥ शक्ति-सामरथ हो जो धनको । दान-दक्षिणा दे विप्रन को ॥ वे जगती के नर औ नारी । मनवांछित फल पावें भारी ॥ 32 ॥ जो जन शरण तुम्हारी जावे । सो निश्चय भव से तर जावे ॥ तुम्हरो ध्यान कुमारी ध्यावे । निश्चय मनवांछित वर पावै ॥ सधवा पूजा करे तुम्हारी । अमर सुहागिन हो वह नारी ॥ विधवा धर के ध्यान तुम्हारा । भवसागर से उतरे पारा ॥ 36 ॥ जयति जयति जय संकट हरणी । विघ्न विनाशन मंगल करनी ॥ हम पर संकट है अति भारी । वेगि खबर लो मात हमारी ॥ निशिदिन ध्यान तुम्हारो ध्याता । देह भक्ति वर हम को माता ॥ यह चालीसा जो नित गावे । सो भवसागर से तर जावे ॥ 40 ॥ ॥ दोहा ॥ संतोषी माँ के सदा बंदहूँ पग निश वास । पूर्ण मनोरथ हो सकल मात हरौ भव त्रास ॥ ॥ इति श्री संतोषी माता चालीसा ॥
हनुमान आरती
॥ श्री हनुमंत स्तुति ॥ मनोजवं मारुत तुल्यवेगं, जितेन्द्रियं, बुद्धिमतां वरिष्ठम् ॥ वातात्मजं वानरयुथ मुख्यं, श्रीरामदुतं शरणम प्रपद्धे ॥ ॥ आरती ॥ आरती कीजै हनुमान लला की । दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ॥ जाके बल से गिरवर काँपे । रोग-दोष जाके निकट न झाँके ॥ अंजनि पुत्र महा बलदाई । संतन के प्रभु सदा सहाई ॥ आरती कीजै हनुमान लला की ॥ दे वीरा रघुनाथ पठाए । लंका जारि सिया सुधि लाये ॥ लंका सो कोट समुद्र सी खाई । जात पवनसुत बार न लाई ॥ आरती कीजै हनुमान लला की ॥ लंका जारि असुर संहारे । सियाराम जी के काज सँवारे ॥ लक्ष्मण मुर्छित पड़े सकारे । लाये संजिवन प्राण उबारे ॥ आरती कीजै हनुमान लला की ॥ पैठि पताल तोरि जमकारे । अहिरावण की भुजा उखारे ॥ बाईं भुजा असुर दल मारे । दाहिने भुजा संतजन तारे ॥ आरती कीजै हनुमान लला की ॥ सुर-नर-मुनि जन आरती उतरें । जय जय जय हनुमान उचारें ॥ कंचन थार कपूर लौ छाई । आरती करत अंजना माई ॥ आरती कीजै हनुमान लला की ॥ जो हनुमानजी की आरती गावे । बसहिं बैकुंठ परम पद पावे ॥ लंक विध्वंस किये रघुराई । तुलसीदास स्वामी कीर्ति गाई ॥ आरती कीजै हनुमान लला की । दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ॥ ॥ इति संपूर्णंम् ॥
शिव स्तुति: ॐ वन्दे देव उमापतिं सुरगुरुं|
ॐ वन्दे देव उमापतिं सुरगुरुं, वन्दे जगत्कारणम् । वन्दे पन्नगभूषणं मृगधरं, वन्दे पशूनां पतिम् ॥ वन्दे सूर्य शशांक वह्नि नयनं, वन्दे मुकुन्दप्रियम् । वन्दे भक्त जनाश्रयं च वरदं, वन्दे शिवंशंकरम् ॥
श्री सत्यनारायण जी आरती|
जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा । सत्यनारायण स्वामी, जन पातक हरणा ॥ ॐ जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा । रत्न जडि़त सिंहासन, अद्भुत छवि राजै । नारद करत निराजन, घण्टा ध्वनि बाजै ॥ ॐ जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा । प्रकट भये कलि कारण, द्विज को दर्श दियो । बूढ़ा ब्राह्मण बनकर, कंचन महल कियो ॥ ॐ जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा । दुर्बल भील कठारो, जिन पर कृपा करी । चन्द्रचूड़ एक राजा, तिनकी विपत्ति हरी ॥ ॐ जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा । वैश्य मनोरथ पायो, श्रद्धा तज दीन्ही । सो फल भोग्यो प्रभुजी, फिर-स्तुति कीन्हीं ॥ ॐ जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा । भाव भक्ति के कारण, छिन-छिन रूप धरयो । श्रद्धा धारण कीन्हीं, तिनको काज सरयो ॥ ॐ जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा । ग्वाल-बाल संग राजा, वन में भक्ति करी । मनवांछित फल दीन्हों, दीनदयाल हरी ॥ ॐ जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा । चढ़त प्रसाद सवायो, कदली फल, मेवा । धूप दीप तुलसी से, राजी सत्यदेवा ॥ ॐ जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा । श्री सत्यनारायण जी की आरती, जो कोई नर गावै । ऋद्धि-सिद्ध सुख-संपत्ति, सहज रूप पावे ॥ जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा । सत्यनारायण स्वामी, जन पातक हरणा ॥