जय जय राधा रमण हरी बोल, जय जय राधा रमण हरि बोल ॥ मन तेरा बोले राधेकृष्णा, तन तेरा बोले राधेकृष्णा, जिव्हा तेरी बोले राधेकृष्णा, मुख से निकले राधेकृष्णा, जय जय राधा रमण हरि बोल, जय जय राधा रमण हरि बोल ॥ पलकें तेरी बोले राधेकृष्णा, अलके तेरी बोले राधेकृष्णा, आँखे तेरी बोले राधेकृष्णा, साँसे तेरी बोले राधेकृष्णा, जय जय राधा रमण हरि बोल, जय जय राधा रमण हरि बोल ॥ धड़कन बोले राधेकृष्णा, तड़पन बोले राधेकृष्णा, अंतर बोले राधेकृष्णा, रोम रोम बोले राधेकृष्णा, जय जय राधा रमण हरि बोल, जय जय राधा रमण हरि बोल ॥ पंछी बोले राधेकृष्णा, भंवरे बोले राधेकृष्णा, बंशी बोले राधेकृष्णा, वीणा बोले राधेकृष्णा, जय जय राधा रमण हरि बोल, जय जय राधा रमण हरि बोल ॥ वृन्दावन में राधेकृष्णा, बरसाने में राधेकृष्णा, गोवर्धन में राधेकृष्णा, नंदगांव में राधेकृष्णा, जय जय राधा रमण हरि बोल, जय जय राधा रमण हरि बोल ॥ मुनिजन बोले राधेकृष्णा, गुरुजन बोले राधेकृष्णा, हम सब बोले राधेकृष्णा, सब जग बोले राधेकृष्णा, जय जय राधा रमण हरि बोल, जय जय राधा रमण हरि बोल ॥ जय जय राधा रमण हरी बोल, जय जय राधा रमण हरि बोल ॥ जय जय राधा रमण हरी बोल॥ Jai jai radha raman hari bol
रणकपुर मंदिर का इतिहास || History of ranakpur jain temple
अपनी भव्यता और खूबसूरत नक्काशी के लिए मशहूर इस प्राचीन जैन मंदिर रणकपुरको बनाने की शुरुआत आज से करीब 600 साल पहले 1446 विक्रम संवत में हुई थी, इस मंदिर को बनाने में 50 साल से भी ज्यादा का समय लगा और इसके निर्माण में करीब 99 लाख रुपए की राशि का खर्च आया था। हालांकि, जैन धर्म के इस भव्य मंदिर के रखरखाव की जिम्मेदारी विक्रम संवत 1953 में एक ट्रस्ट को दे दी गई, जिसके बाद इस मंदिर का पुनरुद्दार कर इसे खूबसूरत और नया रुप दिया गया। आपको बता दें कि रणकपुर जैन मंदिर के निर्माण के बारे में यह कहा जाता है कि, इसका निर्माण आचार्य श्यामसुंदर जी,देपा, कुंभा राणा और धरनशाह नामक चार भक्तों ने करवाया था। आचार्य श्यामसुंदर एक धार्मिक प्रवृत्ति के नेता थे, जबकि राणा कुंभा, मलगढ़ के राजा और धरनशाह के मंत्री थे, धार्मिक भावनाओं से प्रेरित होकर धरनशाह ने भगवान श्रषभदेव का मंदिर बनवाने का फैसला लिया था, ऐसा भी कहा जाता है कि एक बार रात के समय उन्हें सपने में एक बेहद सुंदर और पवित्र विमान ‘नलिनीगुल्मा विमान’ के दर्शन हुए थे, जिसके बाद धरनशाह ने इस मंदिर का निर्माण करवाने का फैसला लिया था। वहीं जैन मंदिर रणकपुर के निर्माण के लिए बुलाए गए कई वास्तुकारों में सिर्फ मुंदारा के साधारण वास्तुकार दीपक की कारीगरी की योजना धरनशाह को पसंद आई थी। मलगढ़ के राजा राणा कुंभा ने इसके बाद रणकपुर जैन मंदिर को बनवाने के लिए धरनशाह को जमीन दे दी, इसके साथ ही एक नगर बसाने के लिए भी कहा। राणा कुंभा के नाम पर इस मंदिर को पहले रणपुर कहा गया और फिर बाद में यह मंदिर जैन मंदिर रणकपुरके नाम से जाना गया। रणकपुर मंदिर का इतिहास || History of ranakpur jain temple
जानिए साल में दो बार क्यों मनाई जाती है ईद? Know why eid is celebrated twice a year
ईद के चांद की मिसाल देते आपने लोगों को कई बार सुना होगा. दरअसल ईद का चांद साल में दो बार ही नजर आता है. एक ईद-उल-फितर (Eid Ul Fitr) जिसे हम मीठी ईद (Meethi Eid) भी कहते हैं और दूसरा ईद-उल-जुहा, जिसे बकरीद के नाम से जाना जाता है. ईद का चांद दिखने के बाद ही अगले दिन इस त्योहार को मनाया जाता है. इसका कारण है कि उर्दू कैलेंडर हिजरी संवत चांद पर आधारित है. हिजरी संवत का कोई भी महीना नया चांद देखकर ही शुरू होता है. रमजान के महीने की आखिरी रात का चांद देखकर शव्वाल के पहले दिन मीठी ईद मनाई जाती है. वहीं रमजान के करीब 70 दिनों बाद बकरीद का त्योहार मनाया जाता है. इसे ईद-उल-जुहा और ईद-उल-अजहा भी कहा जाता है. आज मुस्लिम समुदाय के बीच ईद-उल-फितर मनाई जा रही है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि आखिर ईद का त्योहार साल में दो बार क्यों मनाया जाता है? ईद-उल-फितर या मीठी ईद पहली बार 624 ईस्वी में मनाई गई थी. कहा जाता है कि इस दिन पैगम्बर हजरत मोहम्मद ने बद्र के युद्ध में विजय हासिल की थी. पैगम्बर साहब की जीत की खुशी जाहिर करते हुए लोगों ने उस समय मिठाइयां बांटीं थीं. कई तरह के पकवान बनाकर जश्न मनाया था. तब से हर साल बकरीद से पहले मीठी ईद मनाई जाने लगी. कुरआन के अनुसार मीठी ईद को अल्लाह की तरफ से मिलने वाले इनाम का दिन माना जाता है. इस्लामी कैलेंडर के नौवें महीने में पूरे माह रोजे रखे जाते हैं और जब अहले ईमान रमजान के पवित्र महीने के एहतेरामों से फारिग हो जाते हैं और रोजों-नमाजों तथा उसके तमाम कामों को पूरा कर लेते हैं तो अल्लाह एक दिन अपने इबादत करने वाले बंदों को बख्शीश व इनाम से नवाजता है. बख्शीश व इनाम के दिन को ईद-उल-फितर का नाम दिया गया है. वहीं अगर ईद-उल-अजहा की बात करें तो इस दिन का इतिहास हजरत इब्राहिम से जुड़ी एक घटना से है. ये दिन कुर्बानी का दिन माना जाता है. कहा जाता है कि अल्लाह ने एक दिन हजरत इब्राहिम से सपने में उनकी सबसे प्रिय चीज की कुर्बानी मांगी. हजरत इब्राहिम अपने बेटे से बहुत प्यार करते थे, लिहाजा उन्होंने अपने बेटे की कुर्बानी देने का फैसला किया. हजरत इब्राहिम जैसे ही अपने बेटे की कुर्बानी देने वाले थे कि उसी वक्त अल्लाह ने अपने दूत को भेजकर बेटे को एक बकरे से बदल दिया. तभी से इस्लाम में बकरीद मनाने की शुरुआत हुई. जानिए साल में दो बार क्यों मनाई जाती है ईद? Know why eid is celebrated twice a year
महाबोधि मंदिर का इतिहास || History of mahabodhi temple
महाबोधि मंदिर भारत के बिहार राज्य के बोधगया में स्थित एक पवित्र बौद्ध स्थल है। इसका बहुत महत्व है क्योंकि यह वह स्थान माना जाता है जहां बौद्ध धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था। महाबोधि मंदिर का इतिहास बुद्ध के जीवन और शिक्षाओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। यहां इसकी ऐतिहासिक यात्रा का सारांश दिया गया है: प्रारंभिक उत्पत्ति: माना जाता है कि मूल महाबोधि मंदिर का निर्माण तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में बौद्ध धर्म के कट्टर अनुयायी सम्राट अशोक द्वारा मौर्य साम्राज्य के दौरान किया गया था। अशोक को पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में बौद्ध धर्म फैलाने और इसकी शिक्षाओं और मूल्यों को बढ़ावा देने का श्रेय दिया जाता है। यह मंदिर बोधि वृक्ष के पास बनाया गया था, जिसके नीचे कहा जाता है कि बुद्ध ने ध्यान किया था और ज्ञान प्राप्त किया था। पतन और पुनरुद्धार: सदियों से, विभिन्न आक्रमणों और प्राकृतिक आपदाओं के कारण महाबोधि मंदिर को महत्वपूर्ण क्षति हुई और वह जीर्ण-शीर्ण हो गया। इसे कुछ समय तक उपेक्षा का सामना करना पड़ा और यहां तक कि विभिन्न शासकों और धार्मिक समूहों ने इस पर कब्ज़ा कर लिया। पुनर्स्थापना: 19वीं शताब्दी में, ब्रिटिश पुरातत्वविदों और भारत सरकार ने महाबोधि मंदिर को पुनर्स्थापित और संरक्षित करने के प्रयास शुरू किए। 1949 के बोधगया मंदिर अधिनियम के तहत, मंदिर को राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया गया और एक विशेष रूप से गठित समिति के प्रबंधन के तहत रखा गया। यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल: इसके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व की मान्यता में, महाबोधि मंदिर परिसर को 2002 में यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में नामित किया गया था। यह मंदिर भारतीय ईंट निर्माण का एक उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है और बौद्ध धर्म के प्रसार के प्रतीक के रूप में कार्य करता है। आधुनिक महत्व: आज, महाबोधि मंदिर परिसर दुनिया भर के बौद्धों के लिए एक प्रमुख तीर्थ स्थल है। यह आध्यात्मिक सांत्वना और बुद्ध के जीवन और शिक्षाओं से गहरा संबंध चाहने वाले आगंतुकों को आकर्षित करता है। मंदिर परिसर में मुख्य महाबोधि मंदिर, मूल वृक्ष का एक बड़ा वंशज बोधि वृक्ष, मठ, मंदिर और अन्य महत्वपूर्ण संरचनाएं शामिल हैं। महाबोधि मंदिर बौद्ध धर्म के स्थायी प्रभाव और भारत के सांस्कृतिक और धार्मिक परिदृश्य पर इसके प्रभाव का एक प्रमाण है। यह ज्ञान और आध्यात्मिक जागृति चाहने वाले लाखों लोगों के लिए श्रद्धा, चिंतन और चिंतन के स्थान के रूप में कार्य करता है। महाबोधि मंदिर का इतिहास || History of mahabodhi temple
सर धार ताली गली मेरी आओ || Sir Dhar Tali Gali Meri Aao
जौ तौ प्रेम खेलण का चाओ ॥ सिर धर तली गली मेरी आओ ॥ इत मारग पैर धरीजै ॥ सिर दीजै काण न कीजै ॥ कबीर ऐसी होइ परी मन को भावतु कीनु ॥ मरने ते किआ डरपना जब हाथि सिधउरा लीन ॥ जौ तौ प्रेम खेलण का चाओ.. पहिला मरण कबूल जीवण की छड आस ॥ होहु सभना की रेणुका तौ आओ हमारै पास ॥ जौ तौ प्रेम खेलण का चाओ.. सर धार ताली गली मेरी आओ || Sir Dhar Tali Gali Meri Aao
शनिदेव जी की आरती। Aarti of shani dev ji
जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी। सूर्य पुत्र प्रभु छाया महतारी॥ जय जय श्री शनि देव…. श्याम अंग वक्र-दृष्टि चतुर्भुजा धारी। नी लाम्बर धार नाथ गज की असवारी॥ जय जय श्री शनि देव…. क्रीट मुकुट शीश राजित दिपत है लिलारी। मुक्तन की माला गले शोभित बलिहारी॥ जय जय श्री शनि देव…. मोदक मिष्ठान पान चढ़त हैं सुपारी। लोहा तिल तेल उड़द महिषी अति प्यारी॥ जय जय श्री शनि देव…. जय जय श्री शनि देव…. देव दनुज ऋषि मुनि सुमिरत नर नारी। विश्वनाथ धरत ध्यान शरण हैं तुम्हारी॥ जय जय श्री शनि देव भक्तन हितकारी।। जय जय श्री शनि देव…. शनिदेव जी की आरती। Aarti of shani dev ji
भर दो झोली मेरी साई बाबा || Bhar do jholee meri sai baaba
भर दो झोली मेरी साई बाबा लौट कर मै ना जाऊंगा खाली उसकी किस्मत का चमका सितारा जिसपे नजरे करम तुमने डाली भर दो झोली मेरी साई बाबा लौट कर मै ना जाऊंगा खाली तेरे दर पर जो आये वो तर जायेगा जो भी मांगेगा तुझसे वो सब पायेगा भर दो झोली साई जी भर दो झोली हम सब की भर दो झोली मेरी साई बाबा लौट कर मै ना जाऊंगा खाली तू ज़माने के मुख़्तार हो साई जी बेकसों के मदतगार हो साई जी सबकी सुनते हो अपने हो या गैर हो तुम गरीबो के दातार हो साई जी भर दो झोली साई जी भर दो झोली हम सब की भर दो झोली मेरी साई बाबा लौट कर मै ना जाऊंगा खाली आपके दर से खाली अगर जाऊंगा ताने देगा जमाना जिधर जाऊंगा भर दो झोली साई जी भर दो झोली हम सब की भर दो झोली मेरी साई बाबा लौट कर मै ना जाऊंगा खाली भर दो झोली मेरी साई बाबा || Bhar do jholee meri sai baaba
सोमनाथ मंदिर का इतिहास || History of somnath temple
सोमनाथ मंदिर, पश्चिमी भारतीय राज्य गुजरात के वेरावल शहर में स्थित है, जो भारत के सबसे प्रतिष्ठित और प्राचीन मंदिरों में से एक है। इसका इतिहास कई शताब्दियों पुराना है और विभिन्न राजवंशों के उत्थान और पतन और हिंदू आस्था के लचीलेपन से जुड़ा हुआ है। यहां सोमनाथ मंदिर का संक्षिप्त इतिहास दिया गया है: प्राचीन उत्पत्ति: माना जाता है कि मूल सोमनाथ मंदिर का निर्माण प्राचीन काल में भगवान ब्रह्मा (निर्माता) के अनुरोध पर स्वयं भगवान सोम (चंद्र भगवान) ने किया था। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, ऐसा कहा जाता है कि इसका निर्माण सोने, चांदी और अन्य कीमती पत्थरों से किया गया था। समय के साथ, विभिन्न आक्रमणों और प्राकृतिक आपदाओं के कारण मंदिर को कई बार नष्ट किया गया और फिर से बनाया गया। प्रारंभिक पुनर्निर्माण: सोमनाथ मंदिर का पहला ऐतिहासिक संदर्भ चीनी यात्री जुआनज़ांग (ह्वेन त्सांग) के वृत्तांतों में मिलता है, जिन्होंने 7वीं शताब्दी में मंदिर का दौरा किया था। बाद में 8वीं शताब्दी में अरब आक्रमणकारियों ने मंदिर को नष्ट कर दिया था। इसका पुनर्निर्माण 10वीं शताब्दी में मैत्रक राजाओं द्वारा किया गया था, जिसे 1026 ई. में मध्य एशिया के एक तुर्क शासक महमूद गजनवी द्वारा फिर से नष्ट कर दिया गया था। चौलुक्य राजवंश: मंदिर का पुनर्निर्माण 11वीं शताब्दी में चौलुक्य (सोलंकी) वंश के शासकों, विशेष रूप से राजा भीमदेव प्रथम द्वारा एक बार फिर किया गया था। इस अवधि में मंदिर का महत्वपूर्ण पुनरुद्धार हुआ और यह हिंदुओं के लिए एक प्रमुख तीर्थ स्थल बन गया। महमूद ग़ज़नी के आक्रमण: ग़ज़नी के महमूद ने भारतीय उपमहाद्वीप में कई आक्रमण किए और अपने एक अभियान के दौरान, उसने 1026 ई. में सोमनाथ मंदिर को लूट लिया। मंदिर को लूट लिया गया, और उसकी संपत्ति और कीमती मूर्तियाँ लूट ली गईं। इस घटना के कारण व्यापक विनाश और जनहानि हुई। चौलुक्य और अन्य राजवंशों द्वारा पुनर्निर्माण: महमूद गजनी के आक्रमण के बाद, सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण चौलुक्य राजवंश और उसके बाद के शासकों द्वारा किया गया था। परमार राजवंश, यादव राजवंश और गुजरात सल्तनत सहित विभिन्न राजवंशों के तहत इसमें कई नवीकरण और विस्तार हुए। मुगल सम्राट औरंगजेब का विनाश: 1706 में, मुगल सम्राट औरंगजेब ने सोमनाथ मंदिर को अंतिम रूप से नष्ट करने का आदेश दिया। इसे ध्वस्त कर दिया गया और मंदिर परिसर खंडहर में तब्दील हो गया। आधुनिक पुनर्निर्माण: 1947 में भारत को स्वतंत्रता मिलने के बाद, सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के प्रयास किए गए। भारत सरकार ने श्री सोमनाथ ट्रस्ट की स्थापना की और जनता के दान से मंदिर का पुनर्निर्माण किया गया। नए मंदिर का उद्घाटन 11 मई 1951 को राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद द्वारा किया गया था। अपने पुनर्निर्माण के बाद से, सोमनाथ मंदिर हिंदू लचीलेपन और आस्था का प्रतीक बन गया है। यह हर साल लाखों भक्तों को आकर्षित करता है और भारत की स्थायी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत के प्रमाण के रूप में खड़ा है। सोमनाथ मंदिर का इतिहास || History of somnath temple
कर्नाटक के जैन स्मारक || Jain Monuments of Karnataka
कर्नाटक, दक्षिणी भारत का एक राज्य, अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक महत्व के लिए जाना जाता है। यह कई प्राचीन जैन स्मारकों का घर है जो इस क्षेत्र में जैन धर्म के प्रभाव को दर्शाते हैं। यहां कर्नाटक में कुछ उल्लेखनीय जैन स्मारक हैं: * श्रवणबेलगोला: हसन जिले में स्थित श्रवणबेलगोला कर्नाटक के सबसे महत्वपूर्ण जैन तीर्थ स्थलों में से एक है। यह भगवान गोमतेश्वर (बाहुबली) की विशाल मूर्ति के लिए प्रसिद्ध है, जो 57 फीट (17 मीटर) की ऊंचाई पर स्थित है। यह मूर्ति ग्रेनाइट के एक ही खंड से बनाई गई है और इसे दुनिया की सबसे ऊंची अखंड मूर्तियों में से एक माना जाता है। श्रवणबेलगोला में कई जैन मंदिर और प्राचीन शिलालेख भी हैं। * करकला: कर्नाटक के उडुपी जिले का एक शहर करकला अपने जैन मंदिरों और मूर्तियों के लिए जाना जाता है। करकला में सबसे प्रमुख जैन स्मारक भगवान बाहुबली (गोमतेश्वर) की मूर्ति है, जो गोम्मता बेट्टा नामक चट्टानी पहाड़ी की चोटी पर 42 फीट (13 मीटर) की ऊंचाई पर स्थित है। प्रतिमा पर बारीक नक्काशी की गई है और यह बड़ी संख्या में आगंतुकों और तीर्थयात्रियों को आकर्षित करती है। * मूडबिद्री: मूडबिद्री, जिसे जैन काशी के नाम से भी जाना जाता है, कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ जिले में एक शहर है। यह अपने जैन मंदिरों और प्रसिद्ध हजार स्तंभ बसदी (साविरा कंबाडा बसदी) के लिए प्रसिद्ध है। बसदी जटिल नक्काशी वाली एक शानदार संरचना है और इसमें कई जैन मूर्तियाँ हैं। मूडबिद्री अपने जैन मठों के लिए भी जाना जाता है और इसने जैन धर्म के इतिहास और संस्कृति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। * हुम्चा: कर्नाटक के शिवमोग्गा जिले में स्थित हुम्चा एक प्राचीन जैन विरासत स्थल है। यह जैन पौराणिक कथाओं में एक प्रमुख व्यक्ति देवी पद्मावती के पूजनीय देवता का घर है। हुम्चा जैन मंदिर परिसर अपनी सुंदर वास्तुकला और जटिल नक्काशी के लिए जाना जाता है। नवरात्रि उत्सव के दौरान आयोजित होने वाला वार्षिक हम्चा पद्मावती मेला कर्नाटक के विभिन्न हिस्सों से भक्तों को आकर्षित करता है। ये कर्नाटक में जैन स्मारकों के कुछ उदाहरण हैं। राज्य कई जैन मंदिरों, मूर्तियों और विरासत स्थलों से भरा हुआ है जो समृद्ध जैन प्रभाव को प्रदर्शित करते हैं और क्षेत्र की सांस्कृतिक विविधता में योगदान करते हैं। कर्नाटक के जैन स्मारक || Jain Monuments of Karnataka
बौद्ध धर्म के चार महान सत्य || Four noble truths of buddhism
चार आर्य सत्य बौद्ध धर्म की एक मौलिक शिक्षा है जो बुद्ध की शिक्षाओं के मूल सिद्धांतों को रेखांकित करती है। वे दुख की प्रकृति और मुक्ति के मार्ग के बारे में अंतर्दृष्टि प्रदान करते हैं। यहाँ बौद्ध धर्म के चार आर्य सत्य हैं: * दुःख (पीड़ा या असंतोष): पहला आर्य सत्य जीवन में दुःख के अस्तित्व को स्वीकार करता है। यह मानता है कि पीड़ा मानवीय स्थिति का एक अंतर्निहित हिस्सा है और इसमें शारीरिक और मानसिक दर्द, असंतोष और सभी चीजों की अस्थिरता शामिल है। जन्म, बुढ़ापा, बीमारी, मृत्यु, और किसी की इच्छा को प्राप्त करने में असमर्थता सभी दुख के उदाहरण हैं। * समुदय (दुख की उत्पत्ति): दूसरा महान सत्य दुख के कारणों और उत्पत्ति की जांच करता है। इसमें कहा गया है कि दुख का मूल कारण लालसा (तन्हा) और मोह है। लालसा का तात्पर्य आनंद, भौतिक संपत्ति और यहां तक कि अस्तित्व या गैर-अस्तित्व की अतृप्त इच्छा से है। इच्छाओं और द्वेषों के प्रति यह लगाव दुख के चक्र को कायम रखता है। * निरोध (दुख की समाप्ति): तीसरा आर्य सत्य दुख पर काबू पाने की संभावना की ओर इशारा करता है। इसमें कहा गया है कि तृष्णा और आसक्ति को समाप्त करके दुख को समाप्त करने का एक तरीका है। इस समाप्ति को निर्वाण कहा जाता है, जो मुक्ति, शांति और पीड़ा से मुक्ति की स्थिति है। आसक्ति और लालसा को त्यागकर व्यक्ति निर्वाण प्राप्त कर सकता है और सच्चे सुख और संतोष का अनुभव कर सकता है। * मग्गा (दुख की समाप्ति का मार्ग): चौथा आर्य सत्य उस मार्ग की रूपरेखा बताता है जो पीड़ा की समाप्ति की ओर ले जाता है। इसे महान आठ गुना पथ के रूप में जाना जाता है और इसमें आठ परस्पर जुड़े सिद्धांत या अभ्यास शामिल हैं: सही दृष्टिकोण, सही इरादा, सही भाषण, सही कार्रवाई, सही आजीविका, सही प्रयास, सही दिमागीपन और सही एकाग्रता। इस मार्ग का अनुसरण करके, व्यक्ति ज्ञान, नैतिक आचरण और मानसिक अनुशासन विकसित कर सकते हैं, जिससे अंततः दुख की समाप्ति हो सकती है। चार आर्य सत्य दुख की प्रकृति और उस पर काबू पाने के साधनों को समझने के लिए एक रूपरेखा प्रदान करते हैं, जो बौद्ध दर्शन और अभ्यास का एक केंद्रीय सिद्धांत बनाते हैं। बौद्ध धर्म के चार महान सत्य || Four noble truths of buddhism
मंगलवार के दिन शाम के समय हनुमान जी को ये चीजें चढ़ाएं, मिलेगा धन-संपत्ति का वरदान || Offer these things to Hanuman ji in the evening on Tuesday, you will get the boon of wealth.
धरती पर जब-जब बुरी शक्तियों का हमला होता है. तब भगवान धरती पर अवतरित होकर रक्षा करते हैं और बुरी शक्तियों का खात्मा करते हैं. मगर ज्योतिष के जानकारों की मानें तो इस धरती पर एक शक्ति अब भी हमारे आसपास मौजूद है जो उन बुरी शक्तियों का नाश करती है. वो हैं महाबली हनुमान जी. वैसे तो राम भक्त हनुमान को साधने के कई तरीके हैं. लेकिन हम यहां आपको ऐसे तरीके के बारे में बता रहे हैं जिसे ज्योतिषी सबसे आसान और कारगर मानते हैं. बजरंगबली को यदि प्रसन्न करना चाहते हैं तो उन्हें कुछ विशेष वस्तुओं का चढ़ावा चढ़ाना चाहिए. इससे उनकी विशेष कृपा प्राप्त होती है. 1. सिंदूर: सिंदूर चढ़ाने से भगवान हनुमान जी जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं और अपने भक्तों पर दिल खोलकर कृपा बरसाते हैं. ध्यान रहे कि सिंदूर नारंगी रंग का होना चाहिए. मंगलवार को सिंदूर अर्पित करने से ग्रह दोष दूर होते हैं. दुर्घटनाओं से रक्षा होती है और कर्ज से मुक्ति मिलती है. सिंदूर को पीपल या पान के पत्ते पर रखकर चढ़ाएं. ध्यान रहे कि महिलाओं को हनुमान जी को सिंदूर अर्पित नहीं करना चाहिए. महिलाएं श्री हनुमान को लाल रंग का फूल चढ़ा सकती हैं. इसे उत्तम माना जाता है. 2. चमेली का तेल: हनुमान जी को चमेली का तेल चढ़ाने की परंपरा है. गलती से भी बिना सिंदूर के चमेली का तेल ना चढ़ाएं. चमेली के तेल में एक खास सु्गंध होती है. इसका औषधि के रूप में भी इस्तेमाल होता है. हनुमान जी को चमेली का तेल चढ़ाने से मन एकाग्र होता है और आंखों की रोशनी बढ़ती है. चमेली के तेल का दीप जलाने पर शत्रु शांत हो जाते हैं. दुनिया का कोई ऐसा काम नहीं है जो हनुमान जी के लिए मुश्किल हो. क्योंकि वह अष्ट सिद्धि और नवनिधि के दाता हैं. वह अजर अमर हैं और आज भी इस धरती पर अपने भक्तों की रक्षा के लिए मौजूद हैं. 3. ध्वज: ज्योतिषी मानते हैं कि हनुमान जी के मंदिर में लाल ध्वज चढ़ाना लाभकारी होता है. ध्वज तिकोना होना चाहिए. इस पर राम लिखा होना चाहिए. मंगलवार को ध्वज चढ़ाने से संपत्ति का लाभ होता है और संपत्ति से संबंधित सारी अड़चने दूर होती हैं. इस तरह का ध्वज यदि वाहन पर लगाया जाए तो दुर्घटनाओं से बचाव होता है. 4. तुलसीदल: हनुमान जी को तुलसीदल अर्पित करने से हनुमान जी प्रसन्न होते हैं. हनुमान जी तुलसीदल से ही तृप्त होते हैं. हनुमान जी को तुलसीदल की माला अर्पित करें. हर मंगलवार को माला अर्पित करने से समृद्धि बनी रहती है. हनुमान जी को अर्पित किए गए तुलसीदल का सेवन करने से सेहत अच्छी रहती है. 5. लड्डू: हनुमान जी को आमतौर पर लड्डू का भोग लगाया जाता है. बेसन और बूंदी दोनों तरह के लड्डू हनुमान जी को चढ़ाए जाते हैं. बूंदी का लड्डू अर्पित करने से सारे ग्रह नियंत्रित होते हैं. बेसन के लड्डू अर्पित करने से कुछ ग्रह नियंत्रित होते हैं. मंगलवार शाम को हनुमान जी को तुलसीदल रखकर लड्डू अर्पित करें. खुद भी प्रसाद ग्रहण करें और दूसरों को भी खुलाएं. 6. राम का नाम: इस दुनिया में हनुमान जी को राम का नाम सबसे प्रिय है. हनुमान जी श्रीराम की पूजा से सबसे ज्यादा खुश होते हैं. चमेली के तेल में सिंदूर मिलाकर पीपल के पत्ते पर राम-राम लिखें. राम-राम लिखे इस पीपल के पत्ते को हनुमान जी को अर्पित करें. इसके बाद अपनी समस्याओं के निवारण के लिए प्रार्थना करें. जीवन की हर समस्या को खत्म करने के लिए यह उपाय कारगर है. मंगलवार के दिन शाम के समय हनुमान जी को ये चीजें चढ़ाएं, मिलेगा धन-संपत्ति का वरदान || Offer these things to Hanuman ji in the evening on Tuesday, you will get the boon of wealth.
सोमवार के व्रत में भूलकर भी न करें ये गलतियां, नहीं तो नाराज हो जाएंगे भगवान शिव। Do not commit these mistakes in Monday\’s fast, otherwise Lord Shiva will get angry.
हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सोमवार का दिन भगवान शिव शंकर को समर्पित माना जाता है। इस दिन लोग भगवान भोलेनाथ की पूजा करते हैं और व्रत भी रखते हैं। शिव जी को प्रसन्न करने और उनका आशीर्वाद पाने के लिए सोमवार का व्रत करना सबसे उत्तम माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने और विधि पूर्वक पूजा करने से भक्तों की हर मनोकामना पूरी होती है। साथ ही भोलेनाथ की कृपा से कष्ट दूर होते हैं। लेकिन सोमवार का व्रत करते समय इन बातों का ध्यान रखना जरूरी है- * सोमवार के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करके साफ वस्त्र धारण करना चाहिए। फिर घर में या आस-पास किसी शिव मंदिर में जाकर शिवलिंग का जल से अभिषेक करना चाहिए। जलाभिषेक के बाद भगवान शिव और माता पार्वती की श्रद्धा भाव से पूजा अर्चना करें और व्रत कथा अवश्य सुनें। सोमवार के व्रत में एक ही समय भोजन करना चाहिए। इसके अलावा इस व्रत में आप फलाहार भी ले सकते हैं। * भगवान शिव की पूजा में अभिषेक के समय इस बात का विशेष ध्यान रखें कि दूध से अभिषेक करने के लिए तांबे के कलश का इस्तेमाल न करें। तांबे के पात्र में दूध डालने से दूध संक्रमित होता हो जाता है और चढ़ाने योग्य नहीं रह जाता।शिव जी की पूजा के दौरान शिवलिंग पर दूध, दही, शहद या कोई भी वस्तु चढ़ाने के बाद जल जरूर चढ़ाएं। आखिर में जल चढ़ाने से ही जलाभिषेक पूर्ण माना जाता है। * मान्यताओं के अनुसार, शिवलिंग पर कभी भी रोली और सिंदूर का तिलक नहीं लगाना चाहिए। शिव जी की पूजा में चंदन के तिलक का इस्तेमाल करना चाहिए। * सोमवार व्रत के दौरान इस बात का हमेशा ध्यान रखें कि भगवान शिव के मंदिर में शिवलिंग की कभी भी पूरी परिक्रमा न करें। परिक्रमा के दौरान ध्यान दें कि जिस जगह से दूध बहता है, वहां रुक जाएं और वापस घूम जाएं। सोमवार के व्रत में भूलकर भी न करें ये गलतियां, नहीं तो नाराज हो जाएंगे भगवान शिव। Do not commit these mistakes in Monday\’s fast, otherwise Lord Shiva will get angry.
सोमवार के व्रत में भूलकर भी न करें ये गलतियां, नहीं तो नाराज हो जाएंगे भगवान शिव। Do not commit these mistakes in Monday\’s fast, otherwise Lord Shiva will get angry.
हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सोमवार का दिन भगवान शिव शंकर को समर्पित माना जाता है। इस दिन लोग भगवान भोलेनाथ की पूजा करते हैं और व्रत भी रखते हैं। शिव जी को प्रसन्न करने और उनका आशीर्वाद पाने के लिए सोमवार का व्रत करना सबसे उत्तम माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने और विधि पूर्वक पूजा करने से भक्तों की हर मनोकामना पूरी होती है। साथ ही भोलेनाथ की कृपा से कष्ट दूर होते हैं। लेकिन सोमवार का व्रत करते समय इन बातों का ध्यान रखना जरूरी है- * सोमवार के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करके साफ वस्त्र धारण करना चाहिए। फिर घर में या आस-पास किसी शिव मंदिर में जाकर शिवलिंग का जल से अभिषेक करना चाहिए। जलाभिषेक के बाद भगवान शिव और माता पार्वती की श्रद्धा भाव से पूजा अर्चना करें और व्रत कथा अवश्य सुनें। सोमवार के व्रत में एक ही समय भोजन करना चाहिए। इसके अलावा इस व्रत में आप फलाहार भी ले सकते हैं। * भगवान शिव की पूजा में अभिषेक के समय इस बात का विशेष ध्यान रखें कि दूध से अभिषेक करने के लिए तांबे के कलश का इस्तेमाल न करें। तांबे के पात्र में दूध डालने से दूध संक्रमित होता हो जाता है और चढ़ाने योग्य नहीं रह जाता।शिव जी की पूजा के दौरान शिवलिंग पर दूध, दही, शहद या कोई भी वस्तु चढ़ाने के बाद जल जरूर चढ़ाएं। आखिर में जल चढ़ाने से ही जलाभिषेक पूर्ण माना जाता है। * मान्यताओं के अनुसार, शिवलिंग पर कभी भी रोली और सिंदूर का तिलक नहीं लगाना चाहिए। शिव जी की पूजा में चंदन के तिलक का इस्तेमाल करना चाहिए। * सोमवार व्रत के दौरान इस बात का हमेशा ध्यान रखें कि भगवान शिव के मंदिर में शिवलिंग की कभी भी पूरी परिक्रमा न करें। परिक्रमा के दौरान ध्यान दें कि जिस जगह से दूध बहता है, वहां रुक जाएं और वापस घूम जाएं। सोमवार के व्रत में भूलकर भी न करें ये गलतियां, नहीं तो नाराज हो जाएंगे भगवान शिव। Do not commit these mistakes in Monday\’s fast, otherwise Lord Shiva will get angry.
सोमवार के व्रत में भूलकर भी न करें ये गलतियां, नहीं तो नाराज हो जाएंगे भगवान शिव। Do not commit these mistakes in Monday\’s fast, otherwise Lord Shiva will get angry.
हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सोमवार का दिन भगवान शिव शंकर को समर्पित माना जाता है। इस दिन लोग भगवान भोलेनाथ की पूजा करते हैं और व्रत भी रखते हैं। शिव जी को प्रसन्न करने और उनका आशीर्वाद पाने के लिए सोमवार का व्रत करना सबसे उत्तम माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने और विधि पूर्वक पूजा करने से भक्तों की हर मनोकामना पूरी होती है। साथ ही भोलेनाथ की कृपा से कष्ट दूर होते हैं। लेकिन सोमवार का व्रत करते समय इन बातों का ध्यान रखना जरूरी है- * सोमवार के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करके साफ वस्त्र धारण करना चाहिए। फिर घर में या आस-पास किसी शिव मंदिर में जाकर शिवलिंग का जल से अभिषेक करना चाहिए। जलाभिषेक के बाद भगवान शिव और माता पार्वती की श्रद्धा भाव से पूजा अर्चना करें और व्रत कथा अवश्य सुनें। सोमवार के व्रत में एक ही समय भोजन करना चाहिए। इसके अलावा इस व्रत में आप फलाहार भी ले सकते हैं। * भगवान शिव की पूजा में अभिषेक के समय इस बात का विशेष ध्यान रखें कि दूध से अभिषेक करने के लिए तांबे के कलश का इस्तेमाल न करें। तांबे के पात्र में दूध डालने से दूध संक्रमित होता हो जाता है और चढ़ाने योग्य नहीं रह जाता।शिव जी की पूजा के दौरान शिवलिंग पर दूध, दही, शहद या कोई भी वस्तु चढ़ाने के बाद जल जरूर चढ़ाएं। आखिर में जल चढ़ाने से ही जलाभिषेक पूर्ण माना जाता है। * मान्यताओं के अनुसार, शिवलिंग पर कभी भी रोली और सिंदूर का तिलक नहीं लगाना चाहिए। शिव जी की पूजा में चंदन के तिलक का इस्तेमाल करना चाहिए। * सोमवार व्रत के दौरान इस बात का हमेशा ध्यान रखें कि भगवान शिव के मंदिर में शिवलिंग की कभी भी पूरी परिक्रमा न करें। परिक्रमा के दौरान ध्यान दें कि जिस जगह से दूध बहता है, वहां रुक जाएं और वापस घूम जाएं। सोमवार के व्रत में भूलकर भी न करें ये गलतियां, नहीं तो नाराज हो जाएंगे भगवान शिव। Do not commit these mistakes in Monday\’s fast, otherwise Lord Shiva will get angry.
निज़ामुद्दीन दरगाह इतनी प्रसिद्ध क्यों है? Why nizamuddin dargah is so famous.
निज़ामुद्दीन दरगाह, जिसे हज़रत निज़ामुद्दीन दरगाह के नाम से भी जाना जाता है, भारत के दिल्ली में स्थित एक प्रसिद्ध सूफ़ी दरगाह है। यह अपने आध्यात्मिक महत्व के लिए प्रसिद्ध है और दुनिया भर से भक्तों, पर्यटकों और सूफी संगीत प्रेमियों को आकर्षित करता है। यहाँ कुछ कारण दिए गए हैं कि निज़ामुद्दीन दरगाह इतनी प्रसिद्ध क्यों है: * हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया का दफ़नाना स्थान: दरगाह में 14वीं सदी के सूफी संत और आध्यात्मिक गुरु हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की कब्र है। हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया प्रेम, करुणा और भक्ति पर अपनी शिक्षाओं के लिए जाने जाते थे और उनकी कब्र उनके अनुयायियों के लिए तीर्थ स्थान बन गई। * सूफी संगीत और कव्वाली: निज़ामुद्दीन दरगाह अपने कव्वाली प्रदर्शन के लिए प्रसिद्ध है, जो भक्तिपूर्ण सूफी संगीत सत्र हैं। कव्वाली सूफी संगीत का एक रूप है जो आत्मा-उत्तेजक धुनों, लयबद्ध धड़कनों और काव्यात्मक गीतों की विशेषता है। दरगाह में कव्वाली सत्र आयोजित करने की एक लंबी परंपरा है, और इन संगीत समारोहों ने दरगाह को लोकप्रिय बनाने और आगंतुकों को आकर्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। * सांस्कृतिक विरासत: निज़ामुद्दीन दरगाह न केवल एक धार्मिक स्थल है बल्कि एक सांस्कृतिक और ऐतिहासिक स्थल भी है। यह अपने जटिल डिजाइन, संगमरमर की सजावट और भव्य प्रवेश द्वार के साथ मुगल युग की समृद्ध वास्तुकला विरासत को दर्शाता है। दरगाह परिसर में अन्य कब्रें, मस्जिदें और ऐतिहासिक संरचनाएं भी शामिल हैं, जो एक शांत और आध्यात्मिक रूप से उत्थानकारी माहौल बनाती हैं। * आध्यात्मिक महत्व: दरगाह को आध्यात्मिक शक्ति और आशीर्वाद का स्थान माना जाता है। भक्तों का मानना है कि प्रार्थना करने और हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया का आशीर्वाद मांगने से शांति, सांत्वना और संतुष्टि मिल सकती है। कई लोग आध्यात्मिक मार्गदर्शन लेने, प्रार्थना करने और सूफी संत की उपस्थिति में सांत्वना पाने के लिए दरगाह पर जाते हैं। * एकता और सद्भाव: निज़ामुद्दीन दरगाह एकता और सद्भाव के प्रतीक के रूप में खड़ी है, जो विविध पृष्ठभूमि, संस्कृतियों और धर्मों के लोगों को आकर्षित करती है। यह एक ऐसा स्थान है जहां विभिन्न धर्मों के लोग बाधाओं को पार करके एक साथ आते हैं और सांप्रदायिक सद्भाव, प्रेम और भाईचारे की भावना को बढ़ावा देते हैं। कुल मिलाकर, निज़ामुद्दीन दरगाह की प्रसिद्धि श्रद्धेय सूफी संत हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के साथ इसके जुड़ाव, इसकी संगीत विरासत, सांस्कृतिक महत्व, आध्यात्मिक माहौल और लोगों को सद्भाव और भक्ति की भावना से एक साथ लाने की क्षमता से उपजी है। निज़ामुद्दीन दरगाह इतनी प्रसिद्ध क्यों है? Why nizamuddin dargah is so famous.
यीशु मसीह को सूली पर क्यों चढ़ाया गया। why jesus christ was crucifixion?
ईसाई मान्यता और बाइबिल खातों के अनुसार, धार्मिक और राजनीतिक कारकों के संयोजन के कारण यीशु मसीह को सूली पर चढ़ाया गया था। यहां उनके सूली पर चढ़ने से जुड़ी घटनाओं का सारांश दिया गया है: * धार्मिक अधिकारियों को ख़तरा: यीशु ने अपने मंत्रालय के दौरान एक महत्वपूर्ण अनुयायी प्राप्त किया, जिसने फरीसियों और सदूकियों सहित यहूदी धार्मिक नेताओं के अधिकार और शिक्षाओं को चुनौती दी। उन्होंने उनकी प्रथाओं की आलोचना की, पाखंड को उजागर किया, और ईश्वर का पुत्र होने का दावा किया, जिसे कुछ लोगों ने ईशनिंदा के रूप में देखा। * राजनीतिक चिंताएँ: यीशु के समय में रोमन साम्राज्य ने इस क्षेत्र को नियंत्रित किया था, और राजनीतिक स्थिरता बनाए रखना महत्वपूर्ण था। कुछ यहूदी नेताओं को डर था कि यीशु की लोकप्रियता और उनके मसीहा होने के दावे से यहूदी आबादी में अशांति या विद्रोह हो सकता है। इस चिंता ने रोमन अधिकारियों का ध्यान आकर्षित किया। * जुडास इस्करियोती द्वारा विश्वासघात: यीशु के शिष्यों में से एक, जुडास इस्करियोती ने यहूदी धार्मिक नेताओं को जानकारी प्रदान करके उन्हें धोखा दिया, जिन्होंने यीशु को गिरफ्तार करने की मांग की थी। * यहूदी अधिकारियों के समक्ष मुकदमा: यीशु को गिरफ्तार कर लिया गया और यहूदी महायाजक कैफा और यहूदी परिषद महासभा के सामने लाया गया। उन्होंने यीशु से उसकी शिक्षाओं और दावों के बारे में प्रश्न किया। अंततः, उन्होंने खुद को ईश्वर का पुत्र घोषित करने के लिए उन पर ईशनिंदा का आरोप लगाया। * रोमन भागीदारी: यहूदी अधिकारियों को मृत्युदंड को अधिकृत करने के लिए रोमन गवर्नर, पोंटियस पिलाट की आवश्यकता थी। उन्होंने यीशु को विद्रोह भड़काने और राजा होने का दावा करने का आरोप लगाते हुए पीलातुस के सामने पेश किया, जिसे रोमन सत्ता के लिए सीधी चुनौती के रूप में देखा जा सकता था। * रोमन सज़ा के रूप में सूली पर चढ़ना: सूली पर चढ़ना रोमन लोगों द्वारा सार्वजनिक व्यवस्था या रोमन शासन के लिए खतरा माने जाने वाले लोगों के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला निष्पादन का एक सामान्य रूप था। यीशु में कोई दोष न पाए जाने के बावजूद, पीलातुस भीड़ और धार्मिक नेताओं के दबाव के आगे झुक गया, और अंततः उसे सूली पर चढ़ाने का आदेश दिया। इस प्रकार, यीशु मसीह का क्रूस पर चढ़ना धार्मिक चिंताओं, राजनीतिक दबावों और यहूदी और रोमन अधिकारियों दोनों के कार्यों के संयोजन का परिणाम था। ईसाइयों का मानना है कि यीशु ने पापों की क्षमा और मानवता की मुक्ति के लिए स्वेच्छा से खुद को बलिदान कर दिया, और उनका सूली पर चढ़ना ईसाई धर्मशास्त्र और मुक्ति की कहानी में एक केंद्रीय भूमिका निभाता है। यीशु मसीह को सूली पर क्यों चढ़ाया गया। why jesus christ was crucifixion?
बुद्ध का प्रारंभिक जीवन ॥ Early life of buddha
बुद्ध, जिन्हें सिद्धार्थ गौतम के नाम से भी जाना जाता है, का जन्म छठी शताब्दी ईसा पूर्व के आसपास लुंबिनी (अब वर्तमान नेपाल में स्थित) में हुआ था। उनकी सटीक जन्मतिथि निश्चित नहीं है और अक्सर अनुमान लगाया जाता है कि यह लगभग 563 ईसा पूर्व की है। वह शाक्य वंश से थे, जो क्षत्रिय (योद्धा) जाति का हिस्सा था। पारंपरिक खातों के अनुसार, सिद्धार्थ के पिता, राजा शुद्धोदन, शाक्य साम्राज्य पर शासन करते थे। सिद्धार्थ की मां, रानी महामाया ने एक सपना देखा था जिसमें एक सफेद हाथी उनके गर्भ में प्रवेश कर गया था, यह दर्शाता था कि वह एक महान प्राणी को जन्म देगी। सिद्धार्थ का जन्म लुंबिनी के बगीचे में साल वृक्ष के नीचे उनकी दाहिनी ओर से हुआ था। बच्चे का नाम सिद्धार्थ रखा गया, जिसका अर्थ है \”जिसने अपने लक्ष्य प्राप्त कर लिए हैं।\” सिद्धार्थ का प्रारंभिक जीवन विलासिता और विशेषाधिकार से भरा हुआ था क्योंकि वह महल में बड़े हुए थे। उनके पिता चाहते थे कि वह एक महान राजा बनें और उन्हें दुनिया की कठोर वास्तविकताओं से बचाएं। सिद्धार्थ ने उत्कृष्ट शिक्षा प्राप्त की और कला, विज्ञान और मार्शल आर्ट सहित विभिन्न विषयों में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। हालाँकि, 29 वर्ष की आयु में, सिद्धार्थ ने महल के बाहर कदम रखा और बुढ़ापे, बीमारी और मृत्यु की पीड़ा का सामना किया। इन अनुभवों ने उन पर गहरा प्रभाव डाला और वे जीवन के उद्देश्य और अर्थ पर सवाल उठाने लगे। उत्तर खोजने के लिए दृढ़ संकल्पित होकर, उन्होंने अपने परिवार, धन और शाही जिम्मेदारियों को पीछे छोड़ते हुए, अपने राजसी जीवन का त्याग कर दिया। अगले कई वर्षों तक, सिद्धार्थ आध्यात्मिक गतिविधियों में लगे रहे और विभिन्न शिक्षकों और तपस्वी समूहों के साथ तपस्या की। हालाँकि, अंततः उन्हें एहसास हुआ कि अत्यधिक आत्म-पीड़न आत्मज्ञान का मार्ग नहीं था। उन्होंने इस रास्ते को त्याग दिया और अत्यधिक आत्म-भोग और अत्यधिक आत्म-त्याग के बीच एक मध्य मार्ग अपनाने का फैसला किया। भारत के बोधगया में बोधि वृक्ष के नीचे, सिद्धार्थ गहन ध्यान में लगे रहे और उन्होंने आत्मज्ञान प्राप्त होने तक न उठने की कसम खाई। गहन ध्यान की अवधि के बाद, 35 वर्ष की आयु में, अंततः उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ और वे जागृत बुद्ध बन गये। अपने ज्ञानोदय के बाद, बुद्ध ने अपने जीवन के शेष वर्ष दूसरों को पढ़ाने और अपनी अंतर्दृष्टि साझा करने में बिताए। उन्होंने पूरे उत्तर भारत में बड़े पैमाने पर यात्रा की, प्रवचन दिए और अनुयायियों के एक समुदाय की स्थापना की जिसे संघ के नाम से जाना जाता है। उनकी शिक्षाओं ने बौद्ध धर्म की नींव रखी, जिसमें दुख को समाप्त करने और मुक्ति प्राप्त करने के साधन के रूप में चार आर्य सत्य और अष्टांगिक मार्ग पर जोर दिया गया। बुद्ध का प्रारंभिक जीवन उनकी आध्यात्मिक यात्रा और बाद में उनके द्वारा प्रचारित शिक्षाओं को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि प्रदान करता है। बुद्ध का प्रारंभिक जीवन ॥ Early life of buddha
श्री वक्रतुंड महाकाय मंत्र॥ Shree Vakratunda Mahakaya Mantra
श्री वक्रतुण्ड महाकाय सूर्य कोटी समप्रभा। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्व-कार्येशु सर्वदा॥ Shree Vakratunda Mahakaya Suryakoti Samaprabha। Nirvighnam Kuru Me Deva Sarva-Kaaryeshu Sarvada॥ श्री वक्रतुण्ड महाकाय सूर्य कोटी समप्रभा। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्व-कार्येशु सर्वदा॥
बुद्ध का अष्टांगिक मार्ग || Buddh ka Ashtangik marg
बुद्ध का अष्टांगिक मार्ग बौद्ध धर्म में साधकों के आध्यात्मिक एवं नैतिक प्रगति के लिए एक मार्ग है। इस मार्ग को \’आठ पथ\’ या \’आठ आंग\’ भी कहा जाता है। यह मार्ग मध्यमा पाठ, ध्यान, सम्यक्त्व, देशना, विमुक्ति, समाधि, श्रद्धा और प्रज्ञा – ये आठ अंगों से मिलकर बना होता है। इन आठ अंगों का पालन करने से भिक्षु या साधक आत्मज्ञान, शान्ति, मोक्ष और निर्वाण की प्राप्ति करता है। यहां नीचे दिए गए हैं अष्टांगिक मार्ग के आठ अंग: मध्यमा पाठ (Right View): सत्य की प्राप्ति, कर्मों के कारण दुःख की पहचान करना। ध्यान (Right Intention): संयमित चित्त के साथ सचेतता और उद्देश्य की स्थापना करना। सम्यक्त्व (Right Speech): सत्य और उचित वचन बोलना, अहिंसा की पालना करना। देशना (Right Action): शुद्ध और न्यायपूर्ण कर्म करना, अहिंसा और धार्मिकता का पालन करना। विमुक्ति (Right Livelihood): सत्य और न्यायपूर्ण आजीविका चुनना, जो किसी को हानि नहीं पहुंचाए। समाधि (Right Effort): दुःख से रहित समता एवं अभियांत्रिकीकरण की प्राप्ति करना। श्रद्धा (Right Mindfulness): ध्यान और जागृत चेतना का पालन करना। प्रज्ञा (Right Concentration): एकाग्रता, अद्वैत ज्ञान और मेधावी चित्त का समर्पण करना। ये आठ अंग संतोष, आत्मसंयम, ध्यान, आत्मसाक्षात्कार और समय के साथ साधक की आध्यात्मिक प्रगति में मदद करते हैं। अष्टांगिक मार्ग बौद्ध धर्म के महात्माओं और शिक्षाओं में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। बुद्ध का अष्टांगिक मार्ग ||Buddh ka Ashtangik marg
माँ पार्वती की आरती । Aarti Maa Parvati
जय पार्वती माता जय पार्वती माता ब्रह्म सनातन देवी शुभफल की दाता । ॥ जय पार्वती माता ॥ अरिकुल पद्दं विनासनी जय सेवक त्राता, जगजीवन जगदंबा हरिहर गुणगाता । ॥ जय पार्वती माता ॥ सिंह को वाहन साजे कुण्डल है साथा, देब बंधु जस गावत नृत्य करत ता था । ॥ जय पार्वती माता ॥ सतयुग रूपशील अति सुन्दर नाम सती कहलाता, हेमांचल घर जन्मी सखियन संग राता । ॥ जय पार्वती माता ॥ शुम्भ निशुम्भ विदारे हेमाचल स्थाता, सहस्त्र भुज तनु धारिके चक्र लियो हाथा । ॥ जय पार्वती माता ॥ सृष्टिरूप तुही है जननी शिवसंग रंगराता, नन्दी भृंगी बीन लही है हाथन मदमाता । ॥ जय पार्वती माता ॥ देवन अरज करत तव चित को लाता, गावत दे दे ताली मन में रंग राता । ॥ जय पार्वती माता ॥ श्री कमल आरती मैया की जो कोई गाता , सदा सुखी नित रहता सुख सम्पति पाता । ॥ जय पार्वती माता ॥ माँ पार्वती की आरती । Aarti Maa Parvati