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तख्त श्री हरमंदिर साहिब जी का इतिहास || History of takhat shri harmandir sahib ji

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पटना का इतिहास हमेशा से ही गौरवशाली रहा है। इस धरती पर अनेकों महापुरुषों ने जन्म लेकर पटना की धरती को गौरान्वित करने का कार्य किया है। यह भूमि चाणक्य और आर्यभट्ट की रही है। यह स्थल ऋषियों मुनियों की जन्म भूमि और कर्मभूमि रही है। जिन्होंने इस स्थल पर अवतरित होकर समाज को सन्मार्ग पर चलना सिखाया। उन्ही महापुरुषों में गुरु गोबिन्द सिंह जी का नाम आता है। तख्त श्री हरिमंदिर जी पटना साहिब के नाम से भी जाना जाता है। पटना साहिब सिखों के लिए अति पावन एतिहासिक धर्म-स्थल में से एक है। सिक्ख समुदाय के कुल पाँच प्रमुख तख्त हैं। इन तख्तों में गुरुद्वारा पटना साहिब की गिनती सिक्खों के दूसरे सबसे पवित्र तख्त के रूप में की जाती है। जैसा की हम जानते हैं की यह गुरुद्वारा सिक्खों के दसवें और अंतिम गुरु गुरुगोविंद सिंह जी को समर्पित है। इस गुरुद्वारा में गुरु गोविंद सिंह से जुड़ी हुई अनेक वस्तुएं रखी गयी है। यह वस्तुएं सिक्ख समुदाय और पर्यटक के आकर्षण का केंद्र बिंदु है। यह स्थान पटना जंक्शन से करीब  4 की मी की दूरी पर पटना सिटी इलाके में स्थित है। उन्हीं के नाम पर पटना सिटी रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर पटना साहिब रख दिया गया है। यही पर सिक्खों के दसवें और अंतिम गुरु, गुरु गोविंद सिंह जी का जन्म हुआ था। उनका जन्म 26 दिसम्बर 1666 ईस्वी में शनिवार के दिन हुआ था। उनके बचपन का नाम गोबिन्द राय था। इस स्थल पर न केबल गुरुजी का जन्म हुआ था बल्कि उनका बचपन भी यहीं बीता था। इस गुरुद्वारे में गुरुजी के बचपन का पालना, तलवार, तीर कमान, बघनख खंजर आदि संरक्षित हैं। इसके अलाबा नवम गुरु तेग बहादुर जी महाराज के खड़ाऊँ भी पटना हरमंदिर साहिब में रखी हुई है। प्रतिवर्ष लाखों की संखया में सिक्ख समुदाय के लोग व पर्यटक इस एतिहासिक गुरुद्वारा का दर्शन करने पटना आते हैं। हालांकि गुरु गोबिन्द सिंह जी के बचपन इस स्थान पर बीता है। लेकिन इस स्थल का इतिहास गुरु गोबिन्द सिंह जी के साथ अन्य गुरुओं से भी सम्बद्ध रहा है। कहते हैं की इस स्थल का इतिहास गुरु नानक देव जी और गुर तेग बहादुर सिंह जी की यात्रा से जुड़ा हुआ है। कहते हैं की गुर तेग बहादुर सिंह यहाँ असम और बंगाल की यात्रा के दौरान रुके थे। कहते हैं की यह एरिया कभी कुचा फरुख खान के नाम से प्रसिद्ध था। लेकिन वर्तमान में यह हरमंदिर मुहल्ला के नाम से जाना जाता है। जब गुरु गोविंद सिंह जी का जन्म पटना में हुआ था उस बक्त उनके पिता गुर तेग बहादुर सिंह जी महाराज असम की यात्रा पर थे। जिसका वर्णन सिक्खों के पवित्र ग्रंथ में भी उल्लेखित है। महाराजा रंजीत सिंह ने अखंड भारत के कई शहरों में एतिहासिक गुरुद्वारे का निर्माण कराया है। इस गुरुद्वारे का निर्माण भी महाराजा रंजीत सिंह ने गुरु गोबिन्द सिंह जी की यादगार में कराया था। इस गुरुद्वारा के निर्माण उन्होंने सन 1837 से 1839 के बीच कराया था। यह स्थान गुरु गोबिंद सिंह जी की जन्मभूमि होने के कारण सिख समुदाय के लिए अति पावन है। गुरुद्वारा श्री हरिमंदर जी पटना साहिब अपने अनुपम स्थापत्य कला के कारण पर्यटक का ध्यान आकर्षित करता है। गुंबदशैली में बना यह गुरुद्वारा सिक्ख स्थापत्य कला का सुंदर उदाहरण पेश करता है। इसके अलावा पटना में ही एक और प्रसिद्ध गुरुद्वारा स्थित है जो गुरुद्वारा हांडी साहिब के नाम से जाना जाता है। कहते हैं की यह स्थल गुरु तेग बहादुर जी महाराज से जुड़ी हुई हैं। इस स्थल पर गुरुजी को हांडी में पकाया हुआ खिचड़ी परोसा गया था।

June 12, 2022 / 0 Comments
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हेमकुंड साहिब का इतिहास || History of hemkund sahib

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 भारत के उत्तराखंड राज्य में चमोली नामक जिले में हेमकुंड साहिब बना हुआ है। हेमकुंड साहिब पूरे भारत में सिख धर्म के लोगों का एक बहुत ही ज्यादा प्रसिद्ध तीर्थ स्थल माना जाता है । हेमकुंड साहिब हिमालय के अंदर 4632 मीटर यानी कि 15200 फुट की खड़ी ऊंचाई पर बनी बर्फीली झील के किनारे सात बड़ी चट्टानों वाली पहाड़ों के बीच बना हुआ है। कहा जाता है कि इन साथ पहाड़ों पर निशान साहिब झूलते हैं । यहां पर चढ़ाई करने के लिए आपको अपने पैरों का ही सहारा लेना पड़ेगा क्योंकि यहां पर कोई भी वहीकल नहीं चल पाता है । हेमकुंड साहिब तक पहुंचने के लिए आपको ऋषिकेश से बद्रीनाथ रास्ते पर बने हुए गोविंदघाट से होकर ही पहुंचा जा सकता है। श्री हेमकुंड साहिब जी वास्तव में एक संस्कृत का शब्द है अगर इसका हिंदी में अर्थ देखा जाए तो हेम का मतलब बर्फ से है और कुंड माने कटोरा है | हेमकुंड साहिब के यहां बोली जाने वाली भाषाएं मुख्यतः दो प्रकार की ही है जिनमें हिंदी और पंजाबी सम्मिलित है। हेमकुंड साहिब गुरुद्वारे में पर्यटक भारत के अलावा भी अन्य देशों से लोग घूमने के लिए यहां आते हैं। यहां गुरुद्वारा हरदम विभिन्न प्रकार की लाइटों से सुशोभित रहता है। हेमकुंड साहिब गुरुद्वारे का वर्णन सिख धर्म के ग्रंथों में किया गया है। साथ ही साथ इनका उल्लेख श्री गुरु गोबिंद सिंह जी द्वारा लिखित दसम ग्रंथ मैं भी आता है। जो लोग दसम ग्रंथ में अपनी श्रद्धा रखते हैं वह लोग पूरे विश्वास के साथ इस गुरुद्वारे में हर साल मत्था टेकने आते हैं। प्राचीन समय में श्री हेमकुंड साहिब में एक मंदिर बना हुआ करता था । जिसका निर्माण भगवान राम के छोटे भाई भगवान लक्ष्मण ने करवाया था । उसके बाद सिख धर्म के दसवें गुरुजी श्री गुरु गोविंद सिंह जी ने इस मंदिर में कुछ साल पूजा अर्चना व तपस्या की थी। बाद में इस प्राचीन मंदिर को एक गुरुद्वारे के रूप में प्रतिस्थापित कर दिया गया । श्री हेमकुंड साहिब हरदम चारों तरफ से बर्फीली चट्टानों से घिरा रहता है । यहां पर एक विशालकाय झील भी बनी हुई है जिसके अंदर बर्फ की ऊंची चोटियों का रोमांस से भरा हुआ प्रतिबिंब दिखाई पड़ता है जिसे देखने से दिल में सुकून मिल जाता है । इस झील में हाथी पर्वत और सप्त ऋषि पर्वत की बर्फीली पहाड़ियों से पानी आता है । इसके साथ-साथ यहां पर एक छोटी जलधारा भी इस झील से निकलती है । जिस जलधारा को हिमगंगा के नाम से जाना जाता है । यहां पर झील के किनारे पर भगवान राम के अनुज श्री लक्ष्मण जी का मंदिर बना हुआ है। जो हेमकुंड साहब पर घूमने आते हैं वह लोग भी इस मंदिर पर जरूर ही घूमने आते हैं । यहां की पहाड़ी की ऊंचाई बड़ी होने के कारण तकरीबन 7 से 8 महीनों के अंदर अंदर यहां झील के अंदर बर्फ जम जाती है और झील का पानी फर्श नुमा आकार ले लेता है। श्री हेमकुंड साहिब जी के इस स्थान को बहुत ही पवित्र, असामान्य, आस्था का प्रतीक माना जाता है | यहां पर स्थानीय लोग जो आस पास रहते हैं उन लोगों को लोकपाल कहा जाता है जिसका सामान्य भाषा में अर्थ निर्वाहक से है।

June 9, 2022 / 0 Comments
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राजेश्वरी धाम देवी राज रानी मंदिर में दुर्गा अष्टमी पर किया विशाल भजन संध्या का आयोजन

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राजेश्वरी धाम में दुर्गा अष्टमी पर किया विशाल भजन संध्या का आयोजन जालंधर : राजेश्वरी धाम देवी राज रानी वैष्णो मन्दिर बस्ती नौ (बस्ती शेख रोड) जालंधर के दरबार में दुर्गा अष्टमी पर मां अम्बे जी की विशाल भजन संध्या आयोजित की गई। भजन संध्या के पूर्व मां भगवती की पुजा अर्चना की गई। भजन संध्या करने के लिए पहुंची भजन मंडलीया पंकज ठाकुर एंड पार्टी,पवन पुजारी एंड पार्टी और दीपक सरगम एंड पार्टी ने पहुंच कर मां का गुणगान किया भजन संध्या का प्रारंभ दीपक सरगम द्वारा गणेश वंदना गा कर किया गया। इस भजन संध्या में पूर्व सिनियर डिप्टी मेयर कमलजीत सिंह भाटिया तथा अन्य भक्तजनों के इलावा बाला जी के परम भक्त जालंधर सेंट्रल से विधायक रमन अरोड़ा ने विशेष रुप से पहुंच कर माता जी का आशीर्वाद प्राप्त किया तथा अपने गाए भजनों से संगत को झूमने पर विवश कर दिया। मन्दिर कमेटी के प्रधान कैलाश बब्बर तथा उनके सदस्यों द्वारा आए हुए अतिथियों को देवी राज रानी से मां की चुनरी तथा स्मृति चिन्ह दिलवा कर सम्मानित किया गया। उन्होंने बताया कि हर महीने दुर्गा अष्टमी को मन्दिर में लंगर का आयोजन किया जाता है।देवी राज रानी जी द्वारा अपने प्रवचनों द्वारा संगत को आशीर्वाद स्वरुपी प्रशाद बांटा गया। उन्होंने दुर्गाष्टमी की बधाइयां देते हुए कहा कि जो भक्त सच्चे मन से निस्वार्थ भाव से माता दुर्गा शक्ति की अराधना करता है मां उसका कभी अहित नहीं होने देती तथा मां के चरणों से जुड़ा भक्त संसार रुपी भवसागर से पार हो जाता है। इस अवसर पर राजेश्वरी धाम वेलफेयर ट्रस्ट के प्रधान कैलाश बब्बर व सदस्य विजय दुआ, एस एम नय्यर, सुरेंद्र अरोड़ा, रामकृष्ण नानू, ज्योति बब्बर, अमन बत्रा, जतिन बब्बर, युद्राज सिंह, राजीव सहदेव, सतीश बब्बर, मनमोहन अरोड़ा, जतिन मिंटू, टिम्मी अरोड़ा, किशन अरोड़ा, पंकज अरोड़ा, विजय बेगोवाल, लकी कपूरथला, पवन नागपाल एवं अन्य सदस्य उपस्थित थे। दुर्गा अष्टमी पर राजेश्वरी धाम वेल्फेस ट्रस्ट की ओर से विशाल भंडारे तथा छबील का आयोजन भी किया गया।

June 9, 2022 / 0 Comments
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कैसे श्रीकृष्ण ने तोड़ा इंद्र का अभिमान? How Shri Krishna broke Indra\’s pride?

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गांव के सभी लोग किसी कार्यक्रम के लिए तैयार हो रहे थे। शायद कोई पूजा होने वाली थी। भगवान कृष्ण ने जाकर नंद बाबा से पूछा कि गांव के लोग कौन से समारोह की तैयारी कर रहे हैं। नंद बाबा ने श्रीकृष्ण को बताया, “हम लोग हर साल वर्षा के देवता भगवान इंद्र की पूजा करते हैं। पशु ही हमारे धन हैं और उनके भोजन के लिए हमें ताजी घास की आवश्यकता होती है। वह घास वर्षा होने पर ही पहाड़ों पर उगती है। सही समय पर वर्षा हो, इसलिए हम भगवान इंद्र की पूजा करते हैं। वे हमारी पूजा से प्रसन्न होकर सही समय पर वर्षा करते हैं, जिससे चारों ओर हरियाली फैल जाती है।” भगवान कृष्ण अपने पिता नंद बाबा की बात सुनकर संतुष्ट नहीं हुए। वे बोले, “पिता जी, वर्षा होना तो एक प्राकृतिक घटना है। इसमें इंद्र देवता का क्या श्रेय हो सकता है? यह गोवर्धन पर्वत अपनी हरी घास से हमारी गौओं का पेट भरता है। हमें तो इंद्र देवता के बजाय गोवर्धन पर्वत और गौओं की पूजा करनी चाहिए?”  भगवान कृष्ण की बातें सुनकर सभी लोग आश्चर्य चकित रह गए। वे काफी देर तक इस बारे में वाद-विवाद करते रहे। लेकिन कोई भी निर्णय नहीं लिया जा सका। अंततः श्रीकृष्ण ने गांव वालों को इस बात के लिए राजी कर लिया कि उन्हें भगवान इंद्र की पूजा करने के बजाय गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए। उन्होंने कहा, “मीठे और नमकीन-कई तरह के व्यंजन तैयार करो। भोग के लिए सारा दूध एकत्र कर लो। वेद-पाठ करने में निपुण पंडितों को बुलावा भेजा जाए। गरीबों को भोजन करवाने का प्रबंध किया जाए। गौओं को उनका पेट भरने तक हरी घास का चारा दिया जाए।” भगवान कृष्ण के कथनानुसार गांव वालों ने वैसा ही किया। उन्होंने गोवर्धन पर्वत को प्रसाद चढ़ाया और माथा टेका। उन्हें यह देखकर हैरानी हुई कि गोवर्धन पर्वत ने बड़ी मात्रा में चढ़ाए गए भोग को स्वीकार कर लिया। दरअसल, यह चमत्कार भगवान कृष्ण का था, जिन्होंने गोवर्धन पर्वत की विशाल आत्मा का रूप लेकर भोग का प्रसाद ग्रहण किया था। उधर स्वर्ग में जब भगवान इंद्र ने यह सब देखा, तो उनके गुस्से की सीमा न रही। उन्होंने बादलों के एक झुंड से कहा, “देखो, अब ग्वालों की जाति मुझे अनदेखा कर रही है। उन्होंने आज गोवर्धन पर्वत को प्रसाद चढ़ाया है।” भगवान इंद्र क्रोध और द्वेष के मारे बौखला गए। वे भगवान कृष्ण के दिव्य रूप को भूल गए और निश्चय किया कि वे गांव वालों का नाश करने के लिए एक तूफान भेजेंगे। उन्होंने बादलों को आदेश दिया, “जाओ, गोवर्धन पर्वत पर घनघोर वर्षा करके ग्वालों की जाति का नाश कर दो। मैं तुम्हारे पीछे आ रहा हूं।” भगवान इंद्र के आदेशानुसार गोवर्धन पर्वत पर मूसलाधार वर्षा होने लगी। वर्षा के साथ-साथ बादल गरज रहे थे और बिजली कड़क रही थी। तेज हवा पेड़ों को उखाड़ने लगी। गाय भयभीत होकर इधर-उधर भागने लगीं। गांव वाले भी डर के मारे अपने घरों की ओर भागे। दोपहर का समय था, लेकिन तूफान के कारण चारों ओर अंधेरा-सा छा गया था। सूरज कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। गांव वालों ने भगवान कृष्ण से विनती की, “भगवान इंद्र कुपित हो गए हैं। हमने तो वही किया, जो आपने कहा था। अब कृपा करके इस घनघोर वर्षा से हमारी रक्षा करें।” भगवान कृष्ण ने गांव वालों को दिलासा दिया, “हमने गोवर्धन पर्वत की पूजा की है। यही हमारा रक्षक है। अब यही हमारी रक्षा करेगा।” इतना कहकर भगवान कृष्ण पहाड़ की तलहटी में चले गए। उन्होंने ग्रामीणों से कहा कि वे लोग अपने पशुओं को लेकर पहाड़ की ओट में आ जाएं। जब सभी लोग अपने पशुओं सहित गोवर्धन पर्वत के निकट खड़े हो गए, तो अचानक भगवान कृष्ण ने एक करिश्मा किया। उन्होंने अपनी छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत को उठाकर छतरी की तरह सबके ऊपर तान दिया। पूरे सात दिनों तक लगातार वर्षा होती रही और भगवान कृष्ण गोवर्धन पर्वत को उठाए खड़े रहे। भगवान इंद्र श्रीकृष्ण की शक्ति देखकर हैरान हो गए और उन्होंने बादलों को वापस आने का आदेश दे दिया। जब वर्षा रुक गई, तो सभी लोग वहां से निकलकर अपने घरों की ओर चल दिए। भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को उसके मूल स्थान पर रख दिया। यह देखकर भगवान इंद्र आश्चर्य चकित हो गए। वे इस बात का यकीन नहीं कर सके कि कोई बालक ऐसा करिश्मा कर सकता है। तभी भगवान इंद्र को एहसास हुआ कि भगवान विष्णु ने ही भगवान कृष्ण के रूप में धरती पर जन्म लिया है। उन्होंने सोचा, ‘मैं भी कितना मूर्ख था। भगवान कृष्ण तो दैवीय शक्तियों से भरपूर हैं। मैंने अपने क्रोध और द्वेष के कारण महाप्रभु को चुनौती दे दी।’ तत्पश्चात भगवान इंद्र धरती पर आए और भगवान कृष्ण के आगे हाथ जोड़कर अपने किए की माफी मांगने लगे। उन्होंने प्रभु का स्तुति गान किया, जिससे वे प्रसन्न हो गए। दयालु भगवान कृष्ण ने उन्हें स्नेह से अपने गले लगा लिया। इस तरह भगवान कृष्ण ने भगवान इंद्र का अहंकार तोड़ दिया तथा उन्हें विनम्रता और दयालुता का पाठ पढ़ाया। भगवान इंद्र भगवान कृष्ण को नहीं पहचान पाए। उन्होंने वर्षा और तूफान के साथ उनका अपमान करना चाहा। लेकिन भगवान कृष्ण ने गांव वालों की रक्षा करके यह दिखा दिया कि वे अपनीछोटी उंगली पर संपूर्ण ब्रह्माण्ड को संभाल सकते हैं। तभी से भगवान कृष्ण ‘गिरधारी’ के नाम से भी जाने जाते हैं। यही नहीं, वे ‘गिरधर’ और ‘गोवर्धनधारी’ भी कहलाते हैं, क्योंकि उन्होंने गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठा लिया था। उस दिन गांव वालों को यह शिक्षा मिली कि उन्हें डर के मारे किसी भी देवी-देवता की पूजा नहीं करनी चाहिए। पूजा का संबंध प्रेम से होता है। भक्ति और आस्था के साथ किया गया पूजन ही सफल होता है। आडंबर से की जाने वाली पूजा सफल नहीं मानी जाती। प्रेम, त्याग और समर्पण द्वारा की गई पूजा को ही प्रभु ग्रहण करते हैं।तभी से गांव वाले हर वर्ष गोवर्धन पर्वत की उसी तरह पूजा करने लगे, जिस तरह भगवान कृष्ण ने उन्हें सिखाया था। लेकिन भगवान इंद्र ने फिर कभी गांव वालों को अपना रौद्र रूप नहीं दिखाया। अब गांव वालों के लिए

June 8, 2022 / 0 Comments
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कैसे श्रीकृष्ण ने तोड़ा इंद्र का अभिमान? How Shri Krishna broke Indra\’s pride?

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गांव के सभी लोग किसी कार्यक्रम के लिए तैयार हो रहे थे। शायद कोई पूजा होने वाली थी। भगवान कृष्ण ने जाकर नंद बाबा से पूछा कि गांव के लोग कौन से समारोह की तैयारी कर रहे हैं। नंद बाबा ने श्रीकृष्ण को बताया, “हम लोग हर साल वर्षा के देवता भगवान इंद्र की पूजा करते हैं। पशु ही हमारे धन हैं और उनके भोजन के लिए हमें ताजी घास की आवश्यकता होती है। वह घास वर्षा होने पर ही पहाड़ों पर उगती है। सही समय पर वर्षा हो, इसलिए हम भगवान इंद्र की पूजा करते हैं। वे हमारी पूजा से प्रसन्न होकर सही समय पर वर्षा करते हैं, जिससे चारों ओर हरियाली फैल जाती है।” भगवान कृष्ण अपने पिता नंद बाबा की बात सुनकर संतुष्ट नहीं हुए। वे बोले, “पिता जी, वर्षा होना तो एक प्राकृतिक घटना है। इसमें इंद्र देवता का क्या श्रेय हो सकता है? यह गोवर्धन पर्वत अपनी हरी घास से हमारी गौओं का पेट भरता है। हमें तो इंद्र देवता के बजाय गोवर्धन पर्वत और गौओं की पूजा करनी चाहिए?”  भगवान कृष्ण की बातें सुनकर सभी लोग आश्चर्य चकित रह गए। वे काफी देर तक इस बारे में वाद-विवाद करते रहे। लेकिन कोई भी निर्णय नहीं लिया जा सका। अंततः श्रीकृष्ण ने गांव वालों को इस बात के लिए राजी कर लिया कि उन्हें भगवान इंद्र की पूजा करने के बजाय गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए। उन्होंने कहा, “मीठे और नमकीन-कई तरह के व्यंजन तैयार करो। भोग के लिए सारा दूध एकत्र कर लो। वेद-पाठ करने में निपुण पंडितों को बुलावा भेजा जाए। गरीबों को भोजन करवाने का प्रबंध किया जाए। गौओं को उनका पेट भरने तक हरी घास का चारा दिया जाए।” भगवान कृष्ण के कथनानुसार गांव वालों ने वैसा ही किया। उन्होंने गोवर्धन पर्वत को प्रसाद चढ़ाया और माथा टेका। उन्हें यह देखकर हैरानी हुई कि गोवर्धन पर्वत ने बड़ी मात्रा में चढ़ाए गए भोग को स्वीकार कर लिया। दरअसल, यह चमत्कार भगवान कृष्ण का था, जिन्होंने गोवर्धन पर्वत की विशाल आत्मा का रूप लेकर भोग का प्रसाद ग्रहण किया था। उधर स्वर्ग में जब भगवान इंद्र ने यह सब देखा, तो उनके गुस्से की सीमा न रही। उन्होंने बादलों के एक झुंड से कहा, “देखो, अब ग्वालों की जाति मुझे अनदेखा कर रही है। उन्होंने आज गोवर्धन पर्वत को प्रसाद चढ़ाया है।” भगवान इंद्र क्रोध और द्वेष के मारे बौखला गए। वे भगवान कृष्ण के दिव्य रूप को भूल गए और निश्चय किया कि वे गांव वालों का नाश करने के लिए एक तूफान भेजेंगे। उन्होंने बादलों को आदेश दिया, “जाओ, गोवर्धन पर्वत पर घनघोर वर्षा करके ग्वालों की जाति का नाश कर दो। मैं तुम्हारे पीछे आ रहा हूं।” भगवान इंद्र के आदेशानुसार गोवर्धन पर्वत पर मूसलाधार वर्षा होने लगी। वर्षा के साथ-साथ बादल गरज रहे थे और बिजली कड़क रही थी। तेज हवा पेड़ों को उखाड़ने लगी। गाय भयभीत होकर इधर-उधर भागने लगीं। गांव वाले भी डर के मारे अपने घरों की ओर भागे। दोपहर का समय था, लेकिन तूफान के कारण चारों ओर अंधेरा-सा छा गया था। सूरज कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। गांव वालों ने भगवान कृष्ण से विनती की, “भगवान इंद्र कुपित हो गए हैं। हमने तो वही किया, जो आपने कहा था। अब कृपा करके इस घनघोर वर्षा से हमारी रक्षा करें।” भगवान कृष्ण ने गांव वालों को दिलासा दिया, “हमने गोवर्धन पर्वत की पूजा की है। यही हमारा रक्षक है। अब यही हमारी रक्षा करेगा।” इतना कहकर भगवान कृष्ण पहाड़ की तलहटी में चले गए। उन्होंने ग्रामीणों से कहा कि वे लोग अपने पशुओं को लेकर पहाड़ की ओट में आ जाएं। जब सभी लोग अपने पशुओं सहित गोवर्धन पर्वत के निकट खड़े हो गए, तो अचानक भगवान कृष्ण ने एक करिश्मा किया। उन्होंने अपनी छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत को उठाकर छतरी की तरह सबके ऊपर तान दिया। पूरे सात दिनों तक लगातार वर्षा होती रही और भगवान कृष्ण गोवर्धन पर्वत को उठाए खड़े रहे। भगवान इंद्र श्रीकृष्ण की शक्ति देखकर हैरान हो गए और उन्होंने बादलों को वापस आने का आदेश दे दिया। जब वर्षा रुक गई, तो सभी लोग वहां से निकलकर अपने घरों की ओर चल दिए। भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को उसके मूल स्थान पर रख दिया। यह देखकर भगवान इंद्र आश्चर्य चकित हो गए। वे इस बात का यकीन नहीं कर सके कि कोई बालक ऐसा करिश्मा कर सकता है। तभी भगवान इंद्र को एहसास हुआ कि भगवान विष्णु ने ही भगवान कृष्ण के रूप में धरती पर जन्म लिया है। उन्होंने सोचा, ‘मैं भी कितना मूर्ख था। भगवान कृष्ण तो दैवीय शक्तियों से भरपूर हैं। मैंने अपने क्रोध और द्वेष के कारण महाप्रभु को चुनौती दे दी।’ तत्पश्चात भगवान इंद्र धरती पर आए और भगवान कृष्ण के आगे हाथ जोड़कर अपने किए की माफी मांगने लगे। उन्होंने प्रभु का स्तुति गान किया, जिससे वे प्रसन्न हो गए। दयालु भगवान कृष्ण ने उन्हें स्नेह से अपने गले लगा लिया। इस तरह भगवान कृष्ण ने भगवान इंद्र का अहंकार तोड़ दिया तथा उन्हें विनम्रता और दयालुता का पाठ पढ़ाया। भगवान इंद्र भगवान कृष्ण को नहीं पहचान पाए। उन्होंने वर्षा और तूफान के साथ उनका अपमान करना चाहा। लेकिन भगवान कृष्ण ने गांव वालों की रक्षा करके यह दिखा दिया कि वे अपनीछोटी उंगली पर संपूर्ण ब्रह्माण्ड को संभाल सकते हैं। तभी से भगवान कृष्ण ‘गिरधारी’ के नाम से भी जाने जाते हैं। यही नहीं, वे ‘गिरधर’ और ‘गोवर्धनधारी’ भी कहलाते हैं, क्योंकि उन्होंने गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठा लिया था। उस दिन गांव वालों को यह शिक्षा मिली कि उन्हें डर के मारे किसी भी देवी-देवता की पूजा नहीं करनी चाहिए। पूजा का संबंध प्रेम से होता है। भक्ति और आस्था के साथ किया गया पूजन ही सफल होता है। आडंबर से की जाने वाली पूजा सफल नहीं मानी जाती। प्रेम, त्याग और समर्पण द्वारा की गई पूजा को ही प्रभु ग्रहण करते हैं।तभी से गांव वाले हर वर्ष गोवर्धन पर्वत की उसी तरह पूजा करने लगे, जिस तरह भगवान कृष्ण ने उन्हें सिखाया था। लेकिन भगवान इंद्र ने फिर कभी गांव वालों को अपना रौद्र रूप नहीं दिखाया। अब गांव वालों के लिए

June 8, 2022 / 0 Comments
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कैसे श्रीकृष्ण ने तोड़ा इंद्र का अभिमान? How Shri Krishna broke Indra\’s pride?

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गांव के सभी लोग किसी कार्यक्रम के लिए तैयार हो रहे थे। शायद कोई पूजा होने वाली थी। भगवान कृष्ण ने जाकर नंद बाबा से पूछा कि गांव के लोग कौन से समारोह की तैयारी कर रहे हैं। नंद बाबा ने श्रीकृष्ण को बताया, “हम लोग हर साल वर्षा के देवता भगवान इंद्र की पूजा करते हैं। पशु ही हमारे धन हैं और उनके भोजन के लिए हमें ताजी घास की आवश्यकता होती है। वह घास वर्षा होने पर ही पहाड़ों पर उगती है। सही समय पर वर्षा हो, इसलिए हम भगवान इंद्र की पूजा करते हैं। वे हमारी पूजा से प्रसन्न होकर सही समय पर वर्षा करते हैं, जिससे चारों ओर हरियाली फैल जाती है।” भगवान कृष्ण अपने पिता नंद बाबा की बात सुनकर संतुष्ट नहीं हुए। वे बोले, “पिता जी, वर्षा होना तो एक प्राकृतिक घटना है। इसमें इंद्र देवता का क्या श्रेय हो सकता है? यह गोवर्धन पर्वत अपनी हरी घास से हमारी गौओं का पेट भरता है। हमें तो इंद्र देवता के बजाय गोवर्धन पर्वत और गौओं की पूजा करनी चाहिए?”  भगवान कृष्ण की बातें सुनकर सभी लोग आश्चर्य चकित रह गए। वे काफी देर तक इस बारे में वाद-विवाद करते रहे। लेकिन कोई भी निर्णय नहीं लिया जा सका। अंततः श्रीकृष्ण ने गांव वालों को इस बात के लिए राजी कर लिया कि उन्हें भगवान इंद्र की पूजा करने के बजाय गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए। उन्होंने कहा, “मीठे और नमकीन-कई तरह के व्यंजन तैयार करो। भोग के लिए सारा दूध एकत्र कर लो। वेद-पाठ करने में निपुण पंडितों को बुलावा भेजा जाए। गरीबों को भोजन करवाने का प्रबंध किया जाए। गौओं को उनका पेट भरने तक हरी घास का चारा दिया जाए।” भगवान कृष्ण के कथनानुसार गांव वालों ने वैसा ही किया। उन्होंने गोवर्धन पर्वत को प्रसाद चढ़ाया और माथा टेका। उन्हें यह देखकर हैरानी हुई कि गोवर्धन पर्वत ने बड़ी मात्रा में चढ़ाए गए भोग को स्वीकार कर लिया। दरअसल, यह चमत्कार भगवान कृष्ण का था, जिन्होंने गोवर्धन पर्वत की विशाल आत्मा का रूप लेकर भोग का प्रसाद ग्रहण किया था। उधर स्वर्ग में जब भगवान इंद्र ने यह सब देखा, तो उनके गुस्से की सीमा न रही। उन्होंने बादलों के एक झुंड से कहा, “देखो, अब ग्वालों की जाति मुझे अनदेखा कर रही है। उन्होंने आज गोवर्धन पर्वत को प्रसाद चढ़ाया है।” भगवान इंद्र क्रोध और द्वेष के मारे बौखला गए। वे भगवान कृष्ण के दिव्य रूप को भूल गए और निश्चय किया कि वे गांव वालों का नाश करने के लिए एक तूफान भेजेंगे। उन्होंने बादलों को आदेश दिया, “जाओ, गोवर्धन पर्वत पर घनघोर वर्षा करके ग्वालों की जाति का नाश कर दो। मैं तुम्हारे पीछे आ रहा हूं।” भगवान इंद्र के आदेशानुसार गोवर्धन पर्वत पर मूसलाधार वर्षा होने लगी। वर्षा के साथ-साथ बादल गरज रहे थे और बिजली कड़क रही थी। तेज हवा पेड़ों को उखाड़ने लगी। गाय भयभीत होकर इधर-उधर भागने लगीं। गांव वाले भी डर के मारे अपने घरों की ओर भागे। दोपहर का समय था, लेकिन तूफान के कारण चारों ओर अंधेरा-सा छा गया था। सूरज कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। गांव वालों ने भगवान कृष्ण से विनती की, “भगवान इंद्र कुपित हो गए हैं। हमने तो वही किया, जो आपने कहा था। अब कृपा करके इस घनघोर वर्षा से हमारी रक्षा करें।” भगवान कृष्ण ने गांव वालों को दिलासा दिया, “हमने गोवर्धन पर्वत की पूजा की है। यही हमारा रक्षक है। अब यही हमारी रक्षा करेगा।” इतना कहकर भगवान कृष्ण पहाड़ की तलहटी में चले गए। उन्होंने ग्रामीणों से कहा कि वे लोग अपने पशुओं को लेकर पहाड़ की ओट में आ जाएं। जब सभी लोग अपने पशुओं सहित गोवर्धन पर्वत के निकट खड़े हो गए, तो अचानक भगवान कृष्ण ने एक करिश्मा किया। उन्होंने अपनी छोटी उंगली पर गोवर्धन पर्वत को उठाकर छतरी की तरह सबके ऊपर तान दिया। पूरे सात दिनों तक लगातार वर्षा होती रही और भगवान कृष्ण गोवर्धन पर्वत को उठाए खड़े रहे। भगवान इंद्र श्रीकृष्ण की शक्ति देखकर हैरान हो गए और उन्होंने बादलों को वापस आने का आदेश दे दिया। जब वर्षा रुक गई, तो सभी लोग वहां से निकलकर अपने घरों की ओर चल दिए। भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को उसके मूल स्थान पर रख दिया। यह देखकर भगवान इंद्र आश्चर्य चकित हो गए। वे इस बात का यकीन नहीं कर सके कि कोई बालक ऐसा करिश्मा कर सकता है। तभी भगवान इंद्र को एहसास हुआ कि भगवान विष्णु ने ही भगवान कृष्ण के रूप में धरती पर जन्म लिया है। उन्होंने सोचा, ‘मैं भी कितना मूर्ख था। भगवान कृष्ण तो दैवीय शक्तियों से भरपूर हैं। मैंने अपने क्रोध और द्वेष के कारण महाप्रभु को चुनौती दे दी।’ तत्पश्चात भगवान इंद्र धरती पर आए और भगवान कृष्ण के आगे हाथ जोड़कर अपने किए की माफी मांगने लगे। उन्होंने प्रभु का स्तुति गान किया, जिससे वे प्रसन्न हो गए। दयालु भगवान कृष्ण ने उन्हें स्नेह से अपने गले लगा लिया। इस तरह भगवान कृष्ण ने भगवान इंद्र का अहंकार तोड़ दिया तथा उन्हें विनम्रता और दयालुता का पाठ पढ़ाया। भगवान इंद्र भगवान कृष्ण को नहीं पहचान पाए। उन्होंने वर्षा और तूफान के साथ उनका अपमान करना चाहा। लेकिन भगवान कृष्ण ने गांव वालों की रक्षा करके यह दिखा दिया कि वे अपनीछोटी उंगली पर संपूर्ण ब्रह्माण्ड को संभाल सकते हैं। तभी से भगवान कृष्ण ‘गिरधारी’ के नाम से भी जाने जाते हैं। यही नहीं, वे ‘गिरधर’ और ‘गोवर्धनधारी’ भी कहलाते हैं, क्योंकि उन्होंने गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर उठा लिया था। उस दिन गांव वालों को यह शिक्षा मिली कि उन्हें डर के मारे किसी भी देवी-देवता की पूजा नहीं करनी चाहिए। पूजा का संबंध प्रेम से होता है। भक्ति और आस्था के साथ किया गया पूजन ही सफल होता है। आडंबर से की जाने वाली पूजा सफल नहीं मानी जाती। प्रेम, त्याग और समर्पण द्वारा की गई पूजा को ही प्रभु ग्रहण करते हैं।तभी से गांव वाले हर वर्ष गोवर्धन पर्वत की उसी तरह पूजा करने लगे, जिस तरह भगवान कृष्ण ने उन्हें सिखाया था। लेकिन भगवान इंद्र ने फिर कभी गांव वालों को अपना रौद्र रूप नहीं दिखाया। अब गांव वालों के लिए

June 8, 2022 / 0 Comments
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इस दिन गणेश जी की पूजा करने से मिलेंगे ये लाभ || Worshiping ganesha on this day will give these benefits

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पार्वती जी के स्नेही पुत्र एवं सभी देवताओं में प्रथम आराध्य भगवान गणपति की पूजा के लिए बुधवार का दिन सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। वे रिद्धि-सिद्धि के दाता हैं और उनकी आराधना से हर कार्य बिना विघ्न के पूर्ण हो जाता है। मान्यता है कि बुधवार के दिन श्री गणेश जी की विधि-विधान से पूजा अर्चना करने पर शुभ फल की प्राप्ति होती है और सारी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत करने से पूर्व भगवान गणेश की पूजा करने की परंपरा भी चली आ रही है। गणपति जी खुशी के देवता भी कहे जाते हैं। उनका प्रिय भोग मोदक है। हाथी के मस्तक वाले भगवान गणेश जी का वाहन चूहा है। उनकी दो पत्नियां रिद्धि एवं सिद्धि हैं। ये भी मान्यता है कि श्री गणेश का सच्चे मन से स्मरण करने से ही जीवन से जुड़ी सभी बाधाओं का नाश होने लगता है। गणपति जी की उपासना मात्र से ही उनके प्रसन्न होने पर रिद्धि-सिद्धि, सुख और सौभाग्य की प्राप्ति होने लगती है। गणपति पूजन के ये हैं 5 बड़े लाभ –  – रिद्धि-सिद्धि के दाता की साधना करने पर करियर-कारोबार में फायदा मिलता है. व्यापार में भी लाभ पहुंचता है. – गणपति जी की प्रतिदिन साधना करने से जीवन के दु:ख और दरिद्रता दूर होने लगती है. – लंबोदर की पूजा करने से माता लक्ष्मी की भी कृपा प्राप्त होने लगती है. प्रथम आराध्य के आशीर्वाद से धन का सदुपयोग होने लगता है. – गजानन की सच्चे मन से साधना करने पर उनके दिव्य दर्शन का सौभाग्य भी प्राप्त होता है. – बुधवार के दिन गणपति आराधना से मन की इच्छा शीघ्र पूरी हो जाती है.

June 7, 2022 / 0 Comments
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गणेश चतुर्थी की कहानी || Story of ganesh chaturthi

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एक बार की बात है सभी देवता बहुत ही मुश्किल में थे। इसलिए सभी देव गण शिवजी के शरण में अपनी मुश्किलों के हल के लिए पहुंचे। उस समय भगवान शिवजी के साथ गणेश और कार्तिकेय भी वहीँ बैठे थे तो देवताओं की मुश्किल को देखकर शिवजी नें गणेश और कार्तिकेय से प्रश्न पुछा – तुममें से कौन देवताओं की मुश्किलों को हल करेगा और उनकी मदद करेगा। जब दोनों भाई मदद करने के लिए तैयार हो गए तो शिवजी नें उनके सामने एक प्रतियोगिता रखी। इस प्रतियोगिता के अनुसार दोनों भाइयों में जो भी सबसे पहले पृथ्वी की परिक्रमा करके लौटेगा वही देवताओं की मुश्किलों में मदद करेगा। जैसे ही शिवजी नें यह बात कही – कार्तिकेय अपनी सवारी मोर पर बैठ कर पृथ्वी की परिक्रमा करने चले गए। परन्तु गणेश जी वही अपनी जगह पर खड़े रहे और सोचने लगे की वह मूषक की मदद से पुरे पृथ्वी का चक्कर कैसे लगा सकते हैं? उसी समय उनके मन में एक उपाय आया। वे अपने पिता शिवजी और माता पारवती के पास गए और उनकी सात बार परिक्रमा करके वापस अपनी जगह पर आकर खड़े हो गए। कुछ समय बाद कार्तिकेय पृथ्वी का पूरा चक्कर लगा कर वापस पहुंचे और स्वयं को विजेता कहने लगे। तभी शिवजी नें गणेश जी की ओर देखा और उनसे प्रश्न किया – क्यों गणेश तुम क्यों पृथ्वी की परिक्रमा करने नहीं गए? तभी गणेश जी ने उत्तर दिया – “माता पिता में ही तो पूरा संसार बसा है?” चाहे में पृथ्वी की परिक्रमा करूँ या अपने माता पिता की एक ही बात है। यह सुन कर शिवजी बहुत खुश हुए और उन्होंने गणेश जी को सभी देवताओं के मुश्किलों को दूर करने की आज्ञा दी। साथ ही शिवजी नें गणेश जी को यह भी आशीर्वाद दिया कि कृष्ण पक्ष के चतुर्थी में जो भी व्यक्ति तुम्हारी पूजा और व्रत करेगा उसके सभी दुःख दूर होंगे और भौतिक सुखों की प्राप्ति होगी।

June 7, 2022 / 0 Comments
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हनुमान जी की पूजा मंगलवार को ही क्यों होती है? Why is Hanuman ji worshiped only on Tuesday?

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भक्तों के लिए अपने भगवान को याद करने और उनकी आराधना करने के लिए वैसे तो हर दिन ही समान होता है, लेकिन हफ्ते के सातों दिन किसी न किसी भगवान को समर्पित किए गए हैं ।मंगलवार (Tuesday) का दिन भगवान राम के परमभक्त और पवन पुत्र बजरंगबली (BajrangBali) का दिन माना जाता है। इस दिन हनुमान जी की पूजा करने से मनोकामना पूर्ण होती है और उत्तम फल की प्राप्ति होती है. मान्यता है कि बजरंगबली की जो भी भक्त मंगलवार को उपासना करता है तो उसके हनुमानजी सारे कष्ट हर लेते हैं। कई बार दिमाग में यह सवाल आता है कि आखिर मंगलवार ही क्यों हनुमान जी का दिन विशेष है और इसी दिन क्यों उनकी पूजा होती है. अगर आपके मन में भी कभी ये सवाल आया है तो जानें कि आखिर ऐसा क्यों होता है – स्कंद पुराण के अनुसार मंगलवार के दिन ही हनुमानजी का जन्म हुआ था। इसी वजह से यह दिन उनकी पूजा के लिए समर्पित कर दिया गया। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कठोर नियमपूर्वक बजरंगबली की पूजा करने से वे जल्दी प्रसन्न हो जाते हैं और भक्तों की समस्त मनोकामना को पूर्ण कर देते है। इतना ही नहीं भक्तों पर आने वाले संकटों को भी हनुमानजी हर लेते हैं। इस वजह से हनुमानजी का एक नाम संकटमोचन भी पड़ा। हनुमानजी को मंगल ग्रह का नियंत्रक माना जाता है, इस वजह से भी मंगलवार को हनुमानजी की पूजा करने का विधान है। इस दिन भक्तों द्वारा हनुमान चालीसा का पाठ और सुंदरकांड का पाठ करने से विशेष लाभ प्राप्त होता है।

June 7, 2022 / 0 Comments
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शिव और सती की कहानी || Story of shiv and sati in hindi

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ब्रह्मा के बेटे दक्ष की सती नाम की बेटी थी जो शिवजी से प्रेम करती थी और उनसे विवाह करना चाहती थी। दक्ष अपने आप को शिव से बड़ा मानते थे, इसीलिए उन्होंने सती की बात नहीं मानी। शिव और सती ने दक्ष की इच्छा के बिना ही विवाह कर लिया। एक दिन एक समारोह ने शिव ने दक्ष के सामने खड़े होकर उन्हें प्रणाम नहीं किया। दक्ष ने बहुत अपमान महसूस किया। उन्होंने बदला लेने की ठान ली। दक्ष ने एक यज्ञ कराया और उसने शिव को छोड़कर सारे देवताओं को आमंत्रित किया। सती को बहुत बुरा लगा। वह अपने पिता से मिलने पहुंच गई। दक्ष ने सबके सामने शिव का अपमान किया। सती यह नहीं सह पाई और उसने यज्ञ की आहुति में कूदकर अपनी जान दे दी। क्रोधित होकर शिव ने समूचे ब्रह्मांड को नष्ट करने के लिए विनाशकारी नृत्य तांडव शुरू कर दिया। ब्रह्मा ने प्रकट होकर शिव से क्षमा मांगी। शिव मान तो गए लेकिन उन्होंने दक्ष को शाप दे दिया कि उनका सिर हमेशा बकरी का रहेगा। बाद में सती ने पार्वती के रूप में फिर से जन्म लिया।

June 7, 2022 / 0 Comments
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भगवान कार्तिकेय की कहानी || Story of lord karthikeya in hindi

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एक बार की बात है तारकासुर नाम के एक असुर ने बड़ी कठोर तपस्या की। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उसे वरदान दिया कि उसे सिर्फ शिव जी का पुत्र ही मार पाएगा।इस शक्तिशाली वरदान को पाकर तारकासुर बहुत घमंडी हो गया। और उसने स्वर्ग लोक और पृथ्वी लोक पर उपद्रव मचाना शुरू कर दिया। उसके उत्पाद से देवता परेशान हो गए। उन्हें शिवजी से तारकासुर को रोकने का अनुरोध किया उस समय तक शिवजी को कोई पुत्र नहीं था। पुत्र बनाने के लिए शिव ने छह चेहरे बनाए। हर चेहरे पर एक तीसरा नेत्र भी था। इन आंखों से चिंगारियां निकली और उनसे 6 बच्चे बन गए। शिव की पत्नी पार्वती बहुत प्रसन्न हुई और सभी बच्चों को गोद में लेकर गले से लगाने लगी। उन्होंने इन बच्चों को इतने जोर से गले लगाया कि 6 बच्चे मिलकर 6 सिर वाले 1 बच्चे में बदल गए। इस बच्चे का नाम कार्तिकेय रखा गया। इस प्रकार शिवपुत्र कार्तिकेय ने देवताओं की सेना लेकर तारकासुर से लड़ाई लड़ी और उसे मार डाला। तभी से कार्तिकेय को युद्ध का देवता कहा जाने लगा।

June 7, 2022 / 0 Comments
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अपनी मेहर कर || Apni mehar kar

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अपनी मेहर कर, अपणी मेहर कर अपनी मेहर कर, आपणी मेहर कर सभे जीअ समाल, सभे जीअ समाल सभे जीअ समाल, सभे जीअ समाल अपनी मेहर कर, अपणी मेहर कर अपनी मेहर कर, आपणी मेहर कर अन्न पाणी मुच उपाय, मुच उपाय अन्न पाणी मुच उपाय, मुच उपाय दुख दालद भन्न तर, दुख दालद भन्न तर दुख दालद भन्न तर, दुख दालद भन्न तर अपनी मेहर कर, अपणी मेहर कर अपनी मेहर कर, आपणी मेहर कर सभे जीअ समाल, अपनी मेहर कर सभे जीअ समाल, आपणी मेहर कर अपनी मेहर कर, अपणी मेहर कर अपनी मेहर कर, आपणी मेहर कर अरदास सुणी दातार, सुणी दातार हाहाहा.. अरदास.. सुणी दातार अरदास सुणी दातार.. सुणी दातार अरदास सुणी दातार, सुणी दातार अरदास सुणी दातार, सुणी दातार होई सिसट ठर, होई सिसट ठर होई सिसट ठर, होई सिसट ठर अपनी मेहर कर, अपणी मेहर कर अपनी मेहर कर, आपणी मेहर कर सभे जीअ समाल, अपनी मेहर कर सभे जीअ समाल, आपणी मेहर कर अपनी मेहर कर, अपणी मेहर कर अपनी मेहर कर, आपणी मेहर कर लेवहु कंठ लगाय,  कंठ लगाय लेवहु कंठ लगाय, कंठ लगाय अपदा सभ हर, अपदा सभ हर अपदा सभ हर, अपदा सभ हर अपनी मेहर कर, अपणी मेहर कर अपनी मेहर कर, आपणी मेहर कर सभे जीअ समाल, अपनी मेहर कर सभे जीअ समाल, आपणी मेहर कर अपनी मेहर कर, अपणी मेहर कर अपनी मेहर कर, आपणी मेहर कर नानक नाम धियाए, नाम धियाए नानक नाम.. नानक नाम धियाए नानक नाम.. नानक नाम.. नानक नाम धियाए नानक नाम धियाए, नाम धियाए प्रभ का सफल घर, प्रभ का सफल घर प्रभ का सफल घर, प्रभ का सफल घर अपनी मेहर कर, अपणी मेहर कर अपनी मेहर कर, आपणी मेहर कर सभे जीअ समाल, अपनी मेहर कर सभे जीअ समाल, आपणी मेहर कर अपनी मेहर कर, अपणी मेहर कर अपनी मेहर कर, आपणी मेहर कर आपणी मेहर कर, आपणी मेहर कर आपणी मेहर कर, आपणी मेहर कर https://youtu.be/CVXrLTViyGI

June 7, 2022 / 0 Comments
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मनुष्य की कीमत की कहानी || story of man\’s worth in hindi

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आरव नाम का एक लड़का था । उसके पिता की लोहे की दुकान थी । आरव अपने पिता के साथ लोहे की दुकान में मदद करता था । एक दिन उसने अपने पिता से पूछा की पिताजी इस दुनिया में मनुष्य की कीमत क्या होती है ? अपने छोटे से बच्चे के इस सवाल से पिताजी हैरान रह गए । वो सोचने लगे की आखिर इस बालक को ऐसा सवाल क्यों हुआ । पिताजीने अपने बेटे को कहा की बेटा किसी भी मनुष्य की कीमत को आंकना बहुत ही मुश्किल होता है क्योकि उसकी कीमत अनमोल होती है । बेटे ने पूछा वह कैसे पिताजी ? अगर सभी मनुष्य की कीमत अनमोल होती है तो फिर कोई अमीर तो फिर कोई गरीब क्यों होता है ? किसी को कम Respect मिलती है , तो किसी को ज्यादा क्यों मिलती है ? पिताजी ने अपने बेटे को समझाने के लिए कहा की तुम Store Room में जो लोहे का बड़ा सा टुकड़ा पड़ा है वो लेकर आओ । बेटे ने कहा जी पिताजी । वो लोहे का टुकड़ा लेकर आता है । पिताजी उससे पूछते है की बताओ इस लोहे के टुकड़े की क्या कीमत होगी ? आरव बताता है की 500 रूपये । पिताजी अब उससे पूछते है की अगर में इस टुकड़े के छोटे छोटे कील बना दू तो फिर उसकी क्या कीमत होगी ? वो थोड़ा सोच कर बताता है की पिताजी ऐसा करने से उसकी कीमत बढ़ जाएगी । तब तो ये और भी महंगा बिकेगा लगभग 1500 रुपयों में । पिताजी अब उसे पूछते है की बेटा अगर में इस लोहे के टुकडे से घड़ी के बहुत सारे स्प्रिंग बना दूँ तो ? आरव कहता है की पापा फिर तो इससे और भी ज्यादा पैसे मिलेंगे । पिताजी अपने बेटे को समजाते हुए बोलते है की ठीक इस लोहे के टुकडे की तरह ही मनुष्य की कीमत होती है । मनुष्य की कीमत भी इसमे नही होती है की अभी वो क्या है, बल्की इसमे होती है कि वो अपने आप को क्या बना सकता है। आरव अब समज चूका था की उसके पिता क्या कहना चाहते है । हम भी अपनी कीमत आंकने में कई बार गलती कर देते है । हम अपने Present Status को देखकर अपने आप को Valueless और Meaningless मानने लगते है । हम ये नहीं सोचते है की हम अपने आप को क्या बना सकते है और हम अभी क्या है उससे अपने आप की कीमत आंक लेते है । हमें हमेशा अपने आप को Improve करते रहना चाहिये और अपनी सही कीमत प्राप्त करने की दिशा में आगे बढ़ते रहना चाहिये ।

June 7, 2022 / 0 Comments
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मनुष्य की कीमत की कहानी || story of man\’s worth in hindi

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आरव नाम का एक लड़का था । उसके पिता की लोहे की दुकान थी । आरव अपने पिता के साथ लोहे की दुकान में मदद करता था । एक दिन उसने अपने पिता से पूछा की पिताजी इस दुनिया में मनुष्य की कीमत क्या होती है ? अपने छोटे से बच्चे के इस सवाल से पिताजी हैरान रह गए । वो सोचने लगे की आखिर इस बालक को ऐसा सवाल क्यों हुआ । पिताजीने अपने बेटे को कहा की बेटा किसी भी मनुष्य की कीमत को आंकना बहुत ही मुश्किल होता है क्योकि उसकी कीमत अनमोल होती है । बेटे ने पूछा वह कैसे पिताजी ? अगर सभी मनुष्य की कीमत अनमोल होती है तो फिर कोई अमीर तो फिर कोई गरीब क्यों होता है ? किसी को कम Respect मिलती है , तो किसी को ज्यादा क्यों मिलती है ? पिताजी ने अपने बेटे को समझाने के लिए कहा की तुम Store Room में जो लोहे का बड़ा सा टुकड़ा पड़ा है वो लेकर आओ । बेटे ने कहा जी पिताजी । वो लोहे का टुकड़ा लेकर आता है । पिताजी उससे पूछते है की बताओ इस लोहे के टुकड़े की क्या कीमत होगी ? आरव बताता है की 500 रूपये । पिताजी अब उससे पूछते है की अगर में इस टुकड़े के छोटे छोटे कील बना दू तो फिर उसकी क्या कीमत होगी ? वो थोड़ा सोच कर बताता है की पिताजी ऐसा करने से उसकी कीमत बढ़ जाएगी । तब तो ये और भी महंगा बिकेगा लगभग 1500 रुपयों में । पिताजी अब उसे पूछते है की बेटा अगर में इस लोहे के टुकडे से घड़ी के बहुत सारे स्प्रिंग बना दूँ तो ? आरव कहता है की पापा फिर तो इससे और भी ज्यादा पैसे मिलेंगे । पिताजी अपने बेटे को समजाते हुए बोलते है की ठीक इस लोहे के टुकडे की तरह ही मनुष्य की कीमत होती है । मनुष्य की कीमत भी इसमे नही होती है की अभी वो क्या है, बल्की इसमे होती है कि वो अपने आप को क्या बना सकता है। आरव अब समज चूका था की उसके पिता क्या कहना चाहते है । हम भी अपनी कीमत आंकने में कई बार गलती कर देते है । हम अपने Present Status को देखकर अपने आप को Valueless और Meaningless मानने लगते है । हम ये नहीं सोचते है की हम अपने आप को क्या बना सकते है और हम अभी क्या है उससे अपने आप की कीमत आंक लेते है । हमें हमेशा अपने आप को Improve करते रहना चाहिये और अपनी सही कीमत प्राप्त करने की दिशा में आगे बढ़ते रहना चाहिये ।

June 7, 2022 / 0 Comments
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मनुष्य की कीमत की कहानी || story of man\’s worth in hindi

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आरव नाम का एक लड़का था । उसके पिता की लोहे की दुकान थी । आरव अपने पिता के साथ लोहे की दुकान में मदद करता था । एक दिन उसने अपने पिता से पूछा की पिताजी इस दुनिया में मनुष्य की कीमत क्या होती है ? अपने छोटे से बच्चे के इस सवाल से पिताजी हैरान रह गए । वो सोचने लगे की आखिर इस बालक को ऐसा सवाल क्यों हुआ । पिताजीने अपने बेटे को कहा की बेटा किसी भी मनुष्य की कीमत को आंकना बहुत ही मुश्किल होता है क्योकि उसकी कीमत अनमोल होती है । बेटे ने पूछा वह कैसे पिताजी ? अगर सभी मनुष्य की कीमत अनमोल होती है तो फिर कोई अमीर तो फिर कोई गरीब क्यों होता है ? किसी को कम Respect मिलती है , तो किसी को ज्यादा क्यों मिलती है ? पिताजी ने अपने बेटे को समझाने के लिए कहा की तुम Store Room में जो लोहे का बड़ा सा टुकड़ा पड़ा है वो लेकर आओ । बेटे ने कहा जी पिताजी । वो लोहे का टुकड़ा लेकर आता है । पिताजी उससे पूछते है की बताओ इस लोहे के टुकड़े की क्या कीमत होगी ? आरव बताता है की 500 रूपये । पिताजी अब उससे पूछते है की अगर में इस टुकड़े के छोटे छोटे कील बना दू तो फिर उसकी क्या कीमत होगी ? वो थोड़ा सोच कर बताता है की पिताजी ऐसा करने से उसकी कीमत बढ़ जाएगी । तब तो ये और भी महंगा बिकेगा लगभग 1500 रुपयों में । पिताजी अब उसे पूछते है की बेटा अगर में इस लोहे के टुकडे से घड़ी के बहुत सारे स्प्रिंग बना दूँ तो ? आरव कहता है की पापा फिर तो इससे और भी ज्यादा पैसे मिलेंगे । पिताजी अपने बेटे को समजाते हुए बोलते है की ठीक इस लोहे के टुकडे की तरह ही मनुष्य की कीमत होती है । मनुष्य की कीमत भी इसमे नही होती है की अभी वो क्या है, बल्की इसमे होती है कि वो अपने आप को क्या बना सकता है। आरव अब समज चूका था की उसके पिता क्या कहना चाहते है । हम भी अपनी कीमत आंकने में कई बार गलती कर देते है । हम अपने Present Status को देखकर अपने आप को Valueless और Meaningless मानने लगते है । हम ये नहीं सोचते है की हम अपने आप को क्या बना सकते है और हम अभी क्या है उससे अपने आप की कीमत आंक लेते है । हमें हमेशा अपने आप को Improve करते रहना चाहिये और अपनी सही कीमत प्राप्त करने की दिशा में आगे बढ़ते रहना चाहिये ।

June 7, 2022 / 0 Comments
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थोड़ा ध्यान लगा साईं दौड़े दौड़े आएंगे || Thoda dhyan laga sai daude daude ayenge

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थोड़ा ध्यान लगा, साईं दौड़े दौड़े आएंगे, थोड़ा ध्यान लगा, साईं दौड़े दौड़े आएंगे, तुझे गले से लगाएंगे। अखियाँ मन की खोल, तुझको दर्शन वो कराएंगे, अखियाँ मन की खोल, तुझको दर्शन वो कराएंगे, तुझे गले से लगाएंगे॥ हैं राम रमिया वो, हैं कृष्ण कन्हैया वो, वही मेरा साईं है। सत्कर्म राहों पे चलना सिखाते वो, वही जगदीश हैं। प्रेम से पुकार तेरे पाप को जलाएंगे, तुझे गले से लगाएंगे॥ थोड़ा ध्यान लगा… किरपा की छाया में बिठाएंगे तुझको, कहाँ तुम जाओगे। उनकी दया दृष्टि जब जब पड़ेगी तुम यह भव तर जाओगे। ऐसा है विशवास मन में ज्योत जगायेंगे, तुझे गले से लगाएंगे॥ थोड़ा ध्यान लगा… मुनिओं ने ऋषिओं ने, गुरु शिष्य महिमा का, किया गुणगान है। साईं के चरणो में, झुकती सकल सृष्टि, झुके भगवान है। महिमा है अपार, सत्य की राह वो दिखलाएंगे, तुझे गले से लगाएंगे॥ थोड़ा ध्यान लगा… 

June 5, 2022 / 0 Comments
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सांवली सूरत पे मोहन || Sanwali surat pe mohan lyrics in hindi

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सांवली सूरत पे मोहन, दिल दीवाना हो गया । दिल दीवाना हो गया, दिल दीवाना हो गया ॥ एक तो तेरे नैन तिरछे, दूसरा काजल लगा । तीसरा नज़रें मिलाना, दिल दीवाना हो गया ॥ सांवली सूरत पे मोहन, दिल दीवाना हो गया…. एक तो तेरे होंठ पतले, दूसरा लाली लगी । तीसरा तेरा मुस्कुराना, दिल दीवाना हो गया ॥ सांवली सूरत पे मोहन, दिल दीवाना हो गया…. एक तो तेरे हाथ कोमल, दूसरा मेहँदी लगी । तीसरा मुरली बजाना, दिल दीवाना हो गया ॥ सांवली सूरत पे मोहन, दिल दीवाना हो गया…. एक तो तेरे पाँव नाज़ुक, दूसरा पायल बंधी । तीसरा घुंगरू बजाना, दिल दीवाना हो गया ॥ सांवली सूरत पे मोहन, दिल दीवाना हो गया…. एक तो तेरे भोग छप्पन, दूसरा माखन धरा । तीसरा खिचडे का खाना, दिल दीवाना हो गया ॥ सांवली सूरत पे मोहन, दिल दीवाना हो गया…. एक तो तेरे साथ राधा दूसरा रुक्मण खड़ी । तीसरा मीरा का आना, दिल दीवाना हो गया ॥ सांवली सूरत पे मोहन, दिल दीवाना हो गया…. एक तो तुम देवता हो, दूसरा प्रियतम मेरे । तीसरा सपनों में आना, दिल दीवाना हो गया ॥ सांवली सूरत पे मोहन, दिल दीवाना हो गया…. सांवली सूरत पे मोहन, दिल दीवाना हो गया । दिल दीवाना हो गया, दिल दीवाना हो गया ॥

June 4, 2022 / 0 Comments
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साई राम साई श्याम भजन || Sai ram sai shyam bhajan lyrics in hindi

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साईं राम साईं श्याम साईं भगवान, शिर्डी के दाता सबसे महान, करुणा के सागर दया निधान, शिर्डी के दाता सबसे महान । साईं चरण की धुल को, माथे जो लगाओगे, पुण्य चारों धाम का, शिरडी में ही पाओगे, होगा तुम्हारा वही कल्याण, शिर्डी के दाता सबसे महान, साईं राम साईं श्याम साईं भगवान, शिर्डी के दाता सबसे महान । कोई शहंशाह उनको कहे, शिव का ही तो रूप है, छाया हैं वो धर्म की, कर्म की वो धुप है, पढ़के जो आये हैं वेद पुराण, शिर्डी के दाता सबसे महान, साईं राम साईं श्याम साईं भगवान, शिर्डी के दाता सबसे महान । मानवता के साई रवि, दया के साई चाँद हैं, साँची प्रेम की डोर से, रहे वो सबको बांध हैं, मंदिर मस्जिद एक सामान, शिर्डी के दाता सबसे महान, साईं राम साईं श्याम साईं भगवान, शिर्डी के दाता सबसे महान । सबको समझते वो एक सा, राजा हो या रंक हो, भेद और भाव के, मिटा रहे कलंक को, सबको समझते निज संतान, शिर्डी के दाता सबसे महान, साईं राम साईं श्याम साईं भगवान, शिर्डी के दाता सबसे महान । साई के द्वार हर घड़ी, सत्य की बरखा हो रही, झूठे इस जहान के, पाप काले धो रही, करते है शंका का समाधान, शिर्डी के दाता सबसे महान, साईं राम साईं श्याम साईं भगवान, शिर्डी के दाता सबसे महान । बैर रहित कशिश भरी, साई से निर्मल प्रीत लो, दुश्मनी जो कर रहे, उनके दिल भी जीत लो, सब पे चलाते प्रेम के बाण शिर्डी के दाता सबसे महान, साईं राम साईं श्याम साईं भगवान, शिर्डी के दाता सबसे महान । साई हमें सीखा रहे, सबका मालिक एक है, एक सी नज़र से वो, रहे सभी को देख है, करते न सहते जो अभिमान, शिर्डी के दाता सबसे महान, साईं राम साईं श्याम साईं भगवान, शिर्डी के दाता सबसे महान । साई के द्वार शीश धर, दो घडी जो सो गए, नफरतों के नाग भी, विष रहित वह हो गए, हर एक मुश्किल वो करते आसान, शिर्डी के दाता सबसे महान, साईं राम साईं श्याम साईं भगवान, शिर्डी के दाता सबसे महान । साई के दर असर होता, हर दिली फ़रियाद का, बेऔलाद पा गए, सुख वहां औलाद का, बेजान भी वहां पा गए जान, शिर्डी के दाता सबसे महान, साईं राम साईं श्याम साईं भगवान, शिर्डी के दाता सबसे महान । दूर अँधेरे कर रही, साई भजन की रोशनी, रोग शोक हर रही, साई नाम संजीवनी, श्रद्धा सबुरी का देते है दान, शिर्डी के दाता सबसे महान, साईं राम साईं श्याम साईं भगवान, शिर्डी के दाता सबसे महान । साफ़ शुद्ध होती है, जिन दिलो की भावना, पूरी होती उनकी ही, साई के द्वार कामना, कष्ट मिटाते कष्ट निधान, शिर्डी के दाता सबसे महान, साईं राम साईं श्याम साईं भगवान, शिर्डी के दाता सबसे महान । साई की धूलि से कभी, तुम भभूत ले भी लो, हर बला से लड़ने की, दिव्य शक्ति ले भी लो, जग में बढ़ाते भक्तों की शान, शिर्डी के दाता सबसे महान, साईं राम साईं श्याम साईं भगवान, शिर्डी के दाता सबसे महान । आस्था में भीग के, साई को जो है पुकारते, साई खिवैया बनके ही, उनकी नैया तारते, मन की दशा वो लेते है जान, शिर्डी के दाता सबसे महान, साईं राम साईं श्याम साईं भगवान, शिर्डी के दाता सबसे महान । चमत्कार साई बाबा ने, जब निराले थे किये, दिव्य अनोखे पानी से, जल गए थे सब दिए, पल में किया चूर था अभिमान शिर्डी के दाता सबसे महान, साईं राम साईं श्याम साईं भगवान, शिर्डी के दाता सबसे महान । जिन क्रूर दुष्टों ने, डर दिलो में भर दिया, सीधे सादे संत ने, सही मार्ग उनको दिखा दिया, दया धरम का वो देते है ज्ञान, शिर्डी के दाता सबसे महान, साईं राम साईं श्याम साईं भगवान, शिर्डी के दाता सबसे महान । साई के द्वार जो झुके, मेल मन का साफ कर, कसूर सबके साई ने, माफ़ किये उनको अपनाकर, कहता सही है सारा जहान, शिर्डी के दाता सबसे महान, साईं राम साईं श्याम साईं भगवान, शिर्डी के दाता सबसे महान । दुनिया भर की नेमते, साई जी के पास है, मांग ले जो है मांगना, फिर क्यों इतना उदास है, सबको ही सुख का देंगे वरदान, शिर्डी के दाता सबसे महान, साईं राम साईं श्याम साईं भगवान, शिर्डी के दाता सबसे महान । निश्चय वृक्ष को यहाँ, फलते हमने देखा है, खोटे सिक्को को भी तो, चलते हमने देखा है, श्रद्धा का देते सदा वरदान, शिर्डी के दाता सबसे महान, साईं राम साईं श्याम साईं भगवान, शिर्डी के दाता सबसे महान । मीठी वाणी का सदा, रस यहाँ मांगिये, कीर्ति और सम्मान संग, यश यहाँ से मांगिये, विनती वो लेते भक्तों की मान, शिर्डी के दाता सबसे महान, साईं राम साईं श्याम साईं भगवान, शिर्डी के दाता सबसे महान । साईं जी से योग का, कुछ तो ज्ञान लीजिये, आत्मा को सत्य की, कुछ खुराक दीजिये, घर बैठे पाओगे तुम भगवान, शिर्डी के दाता सबसे महान, साईं राम साईं श्याम साईं भगवान, शिर्डी के दाता सबसे महान । साईं के द्वार मिल गयी, जिनको साची नौकरी, साईं दया से उनकी तो, सात पुस्ते तर गयी, देते अलौकिक खुशियों का दान, शिर्डी के दाता सबसे महान, साईं राम साईं श्याम साईं भगवान, शिर्डी के दाता सबसे महान । जिस किसी ने साईं का, जाप दिल से कर लिए, रहमतों से उसने ही, अपने घर को भर लिया, रहने न देते दुःख का निशान, शिर्डी के दाता सबसे महान, साईं राम साईं श्याम साईं भगवान, शिर्डी के दाता सबसे महान । अल्ल्हा, ईशू, सतगुरु, प्रभु के तीनो रूप हैं, तोनो को मिला बना, साईं का ये स्वरूप है, पूजा जिनकी करता जहाँ, शिर्डी के दाता सबसे महान, साईं राम साईं श्याम साईं भगवान, शिर्डी के दाता सबसे महान । दूर करलो मन से तुम, पहले ये दुर्भावना, प्रीत अगर तुम्हारी सच्ची हो, पूर्ण होगी कामना, छल वल लेते पहचान, शिर्डी के दाता सबसे महान, साईं राम साईं श्याम साईं भगवान, शिर्डी के दाता सबसे महान । साईं सुधा से अंत हो, पाप और संताप का, साईं ने सीखा दिया, गुर हैं पश्चाताप का, अज्ञानी को देते हैं ज्ञान, शिर्डी

June 4, 2022 / 0 Comments
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ॐ नम: शिवाय मंत्र अर्थ सहित || Om namah shivaay mantra with meaning

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ऊंं- मैं मना आत्मा। नम:— नमस्कार। शिवाय्- शिव परमात्मा। ऊॅं नम: शिवाय्- मैं आत्मा शिव परमात्मा को नमस्कार करता हूं। इस मंत्र का निरंतर जप करते रहने से चिंतामुक्त जीवन मिलता है।  यह मंत्र जीवन में शांति और शीतलता प्रदान करता है।  शिवलिंग पर जल व बिल्वपत्र चढ़ाते हुए यह शिव मंत्र बोलें व रुद्राक्ष की माला से जप भी करें।  तीन शब्दों का यह मंत्र महामंत्र है।

June 3, 2022 / 0 Comments
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मां लक्ष्मी से जुड़ी मान्यताएं क्या हैं? शुक्रवार के दिन लक्ष्मी की पूजा करने से धन की प्राप्ति होती है!

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शुक्रवार के दिन लक्ष्मी की पूजा करने से धन की प्राप्ति होती है! मां लक्ष्मी से जुड़ी अन्य मान्यताएं क्या हैं? शुक्रवार के दिन लक्ष्मी की पूजा करने से धन की प्राप्ति होती है! मां लक्ष्मी से जुड़ी अन्य मान्यताएं क्या हैं? शुक्रवार के दिन मां लक्ष्मी और मां संतोषी की पूजा की जाती है। शास्त्रों में लक्ष्मी को चंचला कहा गया है। चंचला का अर्थ है एक ऐसी देवी जिसे लंबे समय तक एक स्थान पर नहीं रहना पड़ता है। पूजा करने वाले और भक्ति में लीन रहने वाले लोग शुक्रवार के दिन मां लक्ष्मी की पूजा करते हैं। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, शुक्रवार के दिन लक्ष्मी की पूजा करने से देवी लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और घर में धन की वर्षा होती है। हिंदू धर्म में शुक्रवार को मां लक्ष्मी का दिन माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन लक्ष्मी जी की पूजा करने से धन की प्राप्ति होती है। इसलिए जो लोग आर्थिक तंगी का सामना कर रहे हैं वे शुक्रवार के दिन देवी लक्ष्मी की पूजा करते हैं। इस दिन व्रत रखने की भी व्यवस्था है। हिंदू धर्म में, सप्ताह का हर दिन किसी न किसी देवता या देवी को समर्पित होता है। शुक्रवार के दिन मां लक्ष्मी और मां संतोषी की पूजा की जाती है। शास्त्रों में लक्ष्मी को चंचला कहा गया है। चंचला का अर्थ है एक ऐसी देवी जिसे लंबे समय तक एक स्थान पर नहीं रहना पड़ता है। वे चंचल होते हैं, इसलिए एक ही स्थान पर ज्यादा न रुकें। इसलिए कहा जाता है कि पैसा, आज आपके पास बहुत कुछ है, कल नहीं हो सकता। यह भी पड़े : – https://www.devotionalnetwork.com/laxmi-mata-ki-aarti/ हिंदू धर्म में लक्ष्मी को धन की देवी माना जाता है। इसलिए धन को स्थायी बनाने के लिए देवी लक्ष्मी की पूजा कर उन्हें प्रसन्न रखा जाता है, जिससे वे कहीं नहीं जाते। इसके लिए हिंदू धर्म में कई उपाय, पूजा और मंत्र हैं। श्रद्धा : लक्ष्मी पूजा से जुड़ी कुछ मान्यताएं हैं, जिनका पालन करके देवी लक्ष्मी की पूजा की जाती है। पौराणिक कथा के अनुसार लक्ष्मी समुद्र मंथन में निकली थीं। मंथन से पहले, सभी देवता गरीब थे और धन से वंचित थे। समुंदर मंथन में लक्ष्मी के प्रकट होने के बाद, इंद्र महालक्ष्मी की स्तुति करते हैं। इसके बाद उन्हें महालक्ष्मी की कृपा से धन की प्राप्ति हुई। ऐसा माना जाता है कि ऋषि विश्वामित्र के सख्त आदेश के अनुसार लक्ष्मी साधना को गुप्त और दुर्लभ रखा जाता है। ऐसा कहा जाता है कि देवी लक्ष्मी की पूजा गुप्त रखी जानी चाहिए। शास्त्रों में महालक्ष्मी के आठ रूपों का उल्लेख है। मातृत्व के इन रूपों को जीवन का आधार माना जाता है।

June 3, 2022 / 0 Comments
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