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लंका में श्री हनुमान जी|

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भगवान श्रीराम ने अपने प्रतिज्ञा पूरी की| उन्होंने बालि का वध करके सुग्रीव को भयमुक्त करके किष्किंधा का राज्य सौंप दिया| फिर कुछ दिनों के बाद अपने वायदे के अनुसार सुग्रीव ने जांबवान के नेतृत्व में अपने वानरों का समूह दक्षिण की ओर रवाना कर दिया| उस दल में जांबवान के अलावा बालि का पुत्र अंगद, नल-नील सहित अनेक पराक्रमी वानरों के साथ हनुमान जी भी थे| ऊंचे-ऊंचे पर्वत, वनों और दुर्गम स्थानों को पार करके वह दल दक्षिण समुद्र के किनारे पहुंचा| वहां सामने अगाध एवं असीम महासागर की भयानक लहरों को देखकर वानर-भालू घबरा गए| सीता की खोज कल इए सुग्रीव की दी हुई एक मास की अवधि भी समाप्त हो गई और सामने महासमुद्र| वीर वानर-भालुओं की बुद्धि काम नहीं कर रही थी| इस कारण वानरराज सुग्रीव के कठोर दंड की कल्पना करके उन्होंने कहा – “हम वापस भीं नहीं लौट सकते| माता सीता का पता लगाए बगैर अगर हम किष्किंधा पहुंचे तो सुग्रीव हमें मरवा डालेंगे|” तभी एक कड़कती आवाज सुनकर वे चौंक पड़े| फिर कुछ क्षण बाद एक विशाल गिद्ध वहां पहुंचा और अट्टहास करने लगा- “हा, हा, हा| बहुत दिनों के बाद मुझे स्वादिष्ट भोजन मिला है|” उस विशाल गिद्ध को देखकर हनुमान जी बड़ी निर्भीकता से बोले – “तुम कौन हो गिद्धराज? और तुम हमें किसलिए खाना चाहते हो? गिद्ध बोला – “मेरा नाम संपाती है| मैं बूढ़ा हो गया हूं, इसलिए अपना आहार नहीं खोज पाता| आज घर बैठे ही मुझे आहार मिल गया है तो उसे क्यों छोड़ूं?” हनुमान जी ने कहा – “ओह, कितना फर्क है गिद्ध गिद्ध में| एक जटायु था, जिसने भगवान राम के लिए अपने प्राण भी न्योछावर कर दिए और एक तुम हो जो हमें खा जाना चाहते हो|” यह सुनकर संपाती बोला – “जटायु, जटायु तो मेरा छोटा भाई है| तुम्हें कहां मिला और उसकी मृत्यु कैसे हुई?” हनुमान जी ने जटायु-रावण युद्ध की सारी घटना सुनाई जो उन्हें श्रीराम से सुनने को मिली थी| फिर बोले – “मैं श्रीराम के काम से आया हूं| दुष्ट रावण माता सीता को हरण करके ले गया है| मैं लंकापुरी जाना चाहता हूं| लेकिन कैसे जाऊं, बीच में तो इतना विशाल समुद्र है|” जटायु की मौत का समाचार सुनकर संपाती रो पड़ा| फिर उसने हनुमान जी से कहा – “लंका यहां से कई सौ योजन दूर है। अगर तुममें से कोई लंबी छलांग लगाकर समुद्र पार करे तो लंकापुरी पहुंचा जा सकता है|” संपाती की बात सुनकर वानर समूह में मंत्रणा होने लगी| अंगद बोला – “हममें से कौन ऐसा वीर है जो समुद्र को लांघकर लंकापुरी पहुंच सकता है?” अंगद का वचन सुनकर पहले तो समस्त भालू-बंदर चुप हो गए| किंतु कुछ देर बाद कोई कहता, ‘मैं दस योजन लंबी छलांग लगा सकता हूं| कोई कहता बीस, कोई कहता पचास| लेकिन हनुमान जी को चुप बैठा देखा तो जांबवान ने उनसे पूछा – “पवनपुत्र! तुम चुप क्यों हो? तुम शायद भूल गए हो कि तुममें वह शक्ति है, जिसका कोई भी मुकाबला नहीं कर सकता|” जांबवान की बात सुनकर हनुमान जी को अपनी शक्ति का भान हो गया, जो वे ऋषियों के शाप के कारण भूल चुके थे| स्वयं में नवशक्ति और स्फूर्ति का अनुभव करते हुए वे लंबी छलांग लगाकर सागर के ऊपर उड़ चले| जब वे कई योजन दूर निकल गए तो मार्ग में समुद्र में स्थित मैनाक पर्वत उन्हें दिखाई दिया| जहां सर्पो की माता सुरसा रहती थी| हनुमान जी को आते देख सुरसा अपना विकराल रूप धारण कर हनुमान जी के सामने आ खड़ी हुई| उसने हनुमान जी को निगलने के लिए अपना मुंह कई योजन फैला दिया| लेकिन हनुमान जी सतर्क थे| उन्होंने भी अपना आकार बढ़ाया, जिससे कि सुरसा को उन्हें निगलने में परेशानी होने लगी| उसने और भी बड़ा रूप धारण किया| हनुमान जी भी उसी अनुपात में बढ़ गए| सुरसा रूप बढ़ा-बढ़ाकर थक गई, किंतु वह हनुमान जी को निगल न सकी| अंत में जब वह अपनी पूरी शक्ति से विकराल रूप धारण कर चुकी तो हनुमान जी मच्छर जितना रूप धारण करके सुरसा के मुख से होकर दूसरी ओर से जा निकले| सुरसा को हैरानी के साथ आश्चर्य भी हुआ| उसके जीवन में यह पहला शिकार था, जो उसके मुंह में प्रविष्ट होकर सही सलामत बाहर निकल सका था| वह पूर्ववत रूप में आ गई| उसने हनुमान जी से पूछा – “सचसच बताओ, कौन हो तुम? कोई साधारण वानर तो नहीं दिखते| क्योंकि मेरा कोई भी शिकार आज तक मेरे हाथ से नहीं निकल सका है|” हनुमान जी ने कहा – मैं श्रीराम का सेवक हनुमान हूं| मैं माता सीता की खोज करने लंकापुरी जा रहा हूं| क्योंकि दुष्ट रावण उन्हें हरकर ले गया है|” श्रीराम का नाम सुनते ही सुरसा का व्यवहार एकदम बदल गया| वह विनम्र स्वर में बोली – उस भगवान राम के दूत हो, मेरे लिए यह बड़ी खुशी की बात है कि मैंने तुम्हारे दर्शन कर लिए| तुम निश्चित रहो, अब मैं तुम्हारा कोई अनिष्ट न करूंगी|” हनुमान जी ने पूछा – लेकिन माता तुम हो कौन?” सुरसा बोली – “मैं सर्पो की माता सुरसा हूं| देवताओं ने मुझे इस मार्ग की निगरानी का काम सौंपा हुआ है| उन्होंने मझे तुम्हारी परीक्षा लेने के लिए भेजा था कि वास्तव में तुम लंका से कुशल लौट सकते हो या नहीं| मुझे खुशी है कि तुम अपनी परीक्षा में सफल हुए|” यह कहकर सुरसा ने उन्हें आशीर्वाद दिया और हनुमान जी पुनः उसी वेग से लंका की ओर उड़ चले| लंका के प्रवेश द्वार पर पहुंचकर हनुमान जी सोच में पड़ गए कि प्रवेश कहां से करूं? प्रवेश द्वार पर अनेक बड़ी-बडी भयंकर आकृति वाले राक्षस पहरा दे रहे थे| उनसे उलझना बेकार समझकर हनुमान जी ने सूक्ष्म रूप धारण किया और राक्षसों के बीच से निकल चले| अभी के ही कदम आगे बढ़े थे कि एक विशाल राक्षसी ने उनका मार्ग रोक लिया| यह देख हनुमान जी अपने पूर्व रूप में आ गए| उन्होंने राक्षसी को एक भरपूर घूंसा जड़ दिया| जिससे लंकिनी अचेत होक गिर पड़ी| लेकिन जब उसे होश आया तो वह गिड़गिड़ाकर बोली – “मुझे क्षमा कर दो| मुझे मत मारो| मैं तुम्हें पहचान गई हूं| मैं पितामह ब्रह्मा के

June 15, 2023 / 0 Comments
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करे कराए आपे प्रभू – साखी श्री गुरु अर्जन देव जी|

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एक दिन गुरु अर्जन देव जी के पास चड्डे जाति के दटू, भानू, निहालू और तीर्था आए| उन्होंने आकर गुरु जी से प्रार्थना की महाराज! हमें तो आपके वचनों की समझ ही नहीं आती| एक जगह आप जी लिखते हैं – \”करे कराए आपि प्रभू, सभु किछु तिसही हाथ|\” पर दूसरे स्थान पर आप जी यह लिखते हैं – जैतसरी महला ५ वार सलोका नालि \”जैसा बीजै सो लुणै करम इहु खेत||\” गुरु जी कहने लगे हे भाई! जिस प्रकार बुद्धिमान वैद किसी रोगी का रोग देखकर दवाई देता है उसी प्रकार सिख के जीवन-व्यवहार, रहणी-बहणी को देख कर उपदेश दिया जाता है| जैसे कि जो दुनियादारी के कामों में लगा हुआ करम करता है, उसको अच्छे कर्मों की प्रेरणा के लिए ‘जैसा बीजै सो लुणै’ का अधिकारी समझ कर उपदेश दिया जाता है| परन्तु जो कोई विचारशील होकर परमात्मा की भक्ति करता है उसको ‘करे कराए आपि प्रभू’ का उपदेश दिया जाता है| ऐसा ना हो कि कहीं उसको अपनी करनी का गर्व हो जाए| इस प्रकार गुरु का उपदेश सिख की अध्यात्मिक अवस्था को ध्यान में रखकर दिया जाता है| इसलिए सिख को किसी प्रकार का भ्रम नहीं करना चाहिए| उसको अपनी मानसिक अवस्था के अनुसार उपदेश ग्रहण करना चाहिए|      

June 14, 2023 / 0 Comments
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श्री सीता राम जी की आरती|

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जुगल छबिकी आरती करूँ नीकी| गौर बरन श्रीजनक ललीकी, स्याम बरन सिय पीकी| मुकुट चंद्रिका में द्युति राजै, अगनित सूर्य ससीकी| सुन्दर अंग अंग में छबि है, कोटिन काम रतीकी| जुगल रूप में सबही पटतर, उपमा हो गई फीकी| रामेश्वर लखि ललित जुगल, छबि हुलसत हिय सबकी की|  

June 13, 2023 / 0 Comments
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जलंधर वध की कथा|

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एक बार इंद्र सहित देवताओं ने भगवान शिव की परीक्षा करनी चाही| वह देवों के गुरु वृहस्पति के साथ कैलाश पर्वत पर पहुंचे| शिव ने अपनी आत्मिक शक्ति के बल पर जान लिया| कि ये लोग मेरी परीक्षा लेने आ रहे हैं| अतः उन्होंने एक अवधूत का वेश धारण कर लिया और उनके मार्ग में आ खड़े हुए| इंद्र ने उन्हें राह से हट जाने का संकेत किया| किंतु अवधूत वेशधारी शिव अपने स्थान पर खड़े रहे| यह देख इंद्र को क्रोध आ गया। बोले-“अरे हट रास्ते से जानता नहीं, मैं कौन हूं? हट जा, नहीं तो वज्र से तेरे टुकड़े-टुकड़े कर दूंगा|” धमकी सुनकर अवधूत वेशधारी शिव को क्रोध आ गया। उन्होंने जोर से एक हुंकार भरी जिसे सुनकर चारों दिशाएं कांप उठीं| गुरु बृहस्पति तुरंत भांप गए कि अवधूत वास्तव में कोई और न होकर स्वयं भगवान शिव हैं| उन्होंने इंद्र को संकेत करके कहा-”क्या अनर्थ कर रहे हो सुरेंद्र ! तुम भगवान शिव को नहीं पहचान रहे हो| ये तो साक्षात भगवान शिव हैं|” इंद्र को अपनी भूल का ज्ञान हुआ| वह तुरंत भगवान शिव के चरणों में गिरकर क्षमा याचना करने लगा- “क्षमा करें भगवन ! मुझसे पहचानने में भूल हो गई|” गुरु बृहस्पति ने कहा- हां प्रभु! देवेंद्र को क्षमा कर दीजिए| ये आपको पहचान नहीं पाए थे| अंजाने में ही इन्होंने आपको अपशब्द कह दिए| क्षमा कीजिए|” गुरु बृहस्पति के अनुनय-विनय करने पर शिव ने इंद्र को क्षमा कर दिया| इस घटना के कुछ दिनों बाद एक विलक्षण चमत्कार हुआ| समुद्र तट पर गंगा सागर के किनारे एक बालक रेत में पड़ा रुदन कर रहा था| उसके गले से इतना प्रलयंकारी रुदन फूट रहा था कि उससे चारों दिशाएं कांपने लगीं| देव, दानव, दैत्य सब घबरा गए| वायु थम-सी गई| घबराए हुए देवता इंद्र सहित पितामह ब्रह्मा के पास पहुंचे और उनसे कहा – “पितामह ! सागर संगम पर एक अद्भुत बालक रेत में पड़ा रो रहा है| वह इतनी जोर-जोर से रुदन कर रहा है कि देवों में भय छा गया है| कृपया चलकर इस संकट को दूर कीजिए|” पितामह ब्रह्मा इंद्रादि देवताओं के साथ सागर संगम पहुंचे| पितामह के पहुंचते ही सागर अपने स्थान से निकला| उसने इंद्र सहित पितामह की वंदना की| ब्रह्मा ने सागर से पूछा – “जल में रेत पर पड़ा यह बालक कौन है? इसके रुदन को सुनकर समस्त संसार त्रस्त हो रहा है|” सागर ने कहा- मैं नहीं जानता भगवन! एक दिन एक विलक्षण तेज लहरों में आ गया था| उसी से इस बालक की उत्पत्ति हुई है|” यह कहकर सागर ने बालक को गोद में उठाया और ब्रह्मा की गोद में दे दिया| ब्रह्मा की गोद में आते ही बालक ने रोना बंद कर दिया और कुछ ही देर में अचानक बालक की बांहें आगे बढ़ीं, उसकी दोनों बांहों ने ब्रह्मा का गला पकड़ लिया| यह देख अन्य देवता स्तंभित हो उठे| ब्रह्मा ने अपना गला छुड़ाने का प्रयास किया किंतु बालक के हाथों की पकड़ और मजबूत हो गई| फिर अचानक बालक ने उनका गला छोड़ दिया और मुस्कुराने लगा| ब्रह्मा अपना गला सहलाते हुए बोले – “इस बालक का नाम क्या है सागर?” सागर बोला – “अभी इसका नामकरण नहीं हुआ है! पितामह| आप ही इसका कोई नाम रख दीजिए|” ब्रह्मा बोले – |मैं इसका नाम जलंधर रखता हूं| आज से यह तुम्हारा ही पुत्र कहा जाएगा|” बच्चे का नामकरण करके सागर के हाथों में सौंपकर पितामह सहित सब देवता अपने अपने धाम लौट गए| बालक कुछ बड़ा हुआ तो पितामह की आज्ञा से आचार्य शुक्र ने उसे शिक्षा देनी आरंभ कर दी| देखते ही देखते बालक युवक बन गया| शुक्राचार्य ने उसे दैत्यों का सम्राट बना दिया और कालनेमि नामक एक असुर की वृंदा नामक कन्या से उसका विवाह कर दिया| जलंधर महाबलवान सिद्ध हुआ| देखते ही देखते उसने समस्त सागर के द्वीपों पर अपना शासन स्थापित कर लिया| उसकी पत्नी वृंदा ने हर मामले में उसके साथ सहयोग किया| वृंदा एक सती स्त्री थी| उसे ब्रह्मा का वरदान मिला हुआ था कि जब तक उसका सतीत्व कायम रहेगा, सुर-असुर, देव-दानव कोई भी उसके पति का बाल भी बांका नहीं कर पाएगा| एक दिन आचार्य शुक्र जलंधर की राजसभा में पधारे| जलंधर ने आचार्य की चरण-वंदना की और उन्हें ऊंचे आसन पर बैठाकर पूछा – “आचार्य ! हमारे यहां एक राहु नामक वीर है| मैं जानना चाहता हूं कि उसका सिर क्यों कटा हुआ है|” आचार्य शुक्र ने कहा – “दैत्यराज ! राहु का सिर भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से काट दिया था|” जलंधर बोला – “मगर क्यों आचार्य ! राहु ने ऐसा क्या कसूर कर दिया था ?” उत्तर में शुक्राचार्य ने उसे सागर मंथन की समस्त कथा सुनाकर कहा – “उसका अपराध यह था कि उसने देवताओं की पंक्ति में बैठकर धोखे से अमृत पान कर लिया था|” जलंधर बोला – “तो इसमें क्या अपराध हो गया आचार्य! आखिर अमृत निकला भी तो दैत्यों और देवताओं के सम्मिलित प्रयास से ही था| फिर अकेले देवता ही उस अमृत को पी जाने के अधिकारी कैसे बन गए|” आचार्य बोले – “इसमें भी विष्णु की छलनीति थी दैत्यराज! समुद्र से निकले समस्त रत्न देवराज इंद्र ले गए थे|” यह सुनकर जलंधर क्रोधित होकर बोला – “मैं ऐसा हरगिज नहीं होने दूंगा| मेरे पिता के रत्नों का अधिकारी इंद्र नहीं, मैं स्वयं हूं| देवताओं को सागर के रत्न लौटाने ही पड़ेंगे|” उसके बाद शुक्राचार्य तो वापस अपने स्थान पर चले गए और जलंधर ने घस्मर नामक दैत्य को बुलाकर इंद्रपुरी रवाना कर दिया ताकि वह इंद्र को यह संदेश दे आए कि सागर मंथन से प्राप्त सारे रत्नों को उसे सौंप दें| घस्मर इंद्रपुरी पहुंचा| उसने इंद्र से कहा – देवराज! मैं दैत्यराज जलंधर का एक संदेश लेकर उपस्थित हुआ हूं| दैत्यराज ने कहा है कि सागर मंथन के दौरान उसके पिता के जो रत्न आपने हथिया लिए थे, उन्हें तुरंत लौटा दें|” इंद्र ने आश्चर्य से कहा – “रत्न! कैसे रत्न! दैत्यराज से कहना कि वह रत्न तो देवों के परिश्रम के फल थे|” सेवक बोला – “लेकिन परिश्रम तो देव और दानव दोनों ने ही किया था| फिर रत्न अकेले देवो के कैसे हो गए| सीधी तरह रत्नों को लौटा

June 12, 2023 / 0 Comments
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भैरव चालीसा|

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॥ दोहा ॥ श्री गणपति गुरु गौरी पद प्रेम सहित धरि माथ । चालीसा वंदन करो श्री शिव भैरवनाथ ॥ श्री भैरव संकट हरण मंगल करण कृपाल । श्याम वरण विकराल वपु लोचन लाल विशाल ॥ ॥ चौपाई ॥ जय जय श्री काली के लाला । जयति जयति काशी-कुतवाला ॥ जयति बटुक-भैरव भय हारी । जयति काल-भैरव बलकारी ॥ जयति नाथ-भैरव विख्याता । जयति सर्व-भैरव सुखदाता ॥ भैरव रूप कियो शिव धारण । भव के भार उतारण कारण ॥ भैरव रव सुनि हवै भय दूरी । सब विधि होय कामना पूरी ॥ शेष महेश आदि गुण गायो । काशी-कोतवाल कहलायो ॥ जटा जूट शिर चंद्र विराजत । बाला मुकुट बिजायठ साजत ॥ कटि करधनी घुंघरू बाजत । दर्शन करत सकल भय भाजत ॥ जीवन दान दास को दीन्ह्यो । कीन्ह्यो कृपा नाथ तब चीन्ह्यो ॥ वसि रसना बनि सारद-काली । दीन्ह्यो वर राख्यो मम लाली ॥ धन्य धन्य भैरव भय भंजन । जय मनरंजन खल दल भंजन ॥ कर त्रिशूल डमरू शुचि कोड़ा । कृपा कटाक्ष सुयश नहिं थोडा ॥ जो भैरव निर्भय गुण गावत । अष्टसिद्धि नव निधि फल पावत ॥ रूप विशाल कठिन दुख मोचन । क्रोध कराल लाल दुहुं लोचन ॥ अगणित भूत प्रेत संग डोलत । बम बम बम शिव बम बम बोलत ॥ रुद्रकाय काली के लाला । महा कालहू के हो काला ॥ बटुक नाथ हो काल गंभीरा । श्‍वेत रक्त अरु श्याम शरीरा ॥ करत नीनहूं रूप प्रकाशा । भरत सुभक्तन कहं शुभ आशा ॥ रत्‍न जड़ित कंचन सिंहासन । व्याघ्र चर्म शुचि नर्म सुआनन ॥ तुमहि जाइ काशिहिं जन ध्यावहिं । विश्वनाथ कहं दर्शन पावहिं ॥ जय प्रभु संहारक सुनन्द जय । जय उन्नत हर उमा नन्द जय ॥ भीम त्रिलोचन स्वान साथ जय । वैजनाथ श्री जगतनाथ जय ॥ महा भीम भीषण शरीर जय । रुद्र त्रयम्बक धीर वीर जय ॥ अश्‍वनाथ जय प्रेतनाथ जय । स्वानारुढ़ सयचंद्र नाथ जय ॥ निमिष दिगंबर चक्रनाथ जय । गहत अनाथन नाथ हाथ जय ॥ त्रेशलेश भूतेश चंद्र जय । क्रोध वत्स अमरेश नन्द जय ॥ श्री वामन नकुलेश चण्ड जय । कृत्याऊ कीरति प्रचण्ड जय ॥ रुद्र बटुक क्रोधेश कालधर । चक्र तुण्ड दश पाणिव्याल धर ॥ करि मद पान शम्भु गुणगावत । चौंसठ योगिन संग नचावत ॥ करत कृपा जन पर बहु ढंगा । काशी कोतवाल अड़बंगा ॥ देयं काल भैरव जब सोटा । नसै पाप मोटा से मोटा ॥ जनकर निर्मल होय शरीरा । मिटै सकल संकट भव पीरा ॥ श्री भैरव भूतों के राजा । बाधा हरत करत शुभ काजा ॥ ऐलादी के दुख निवारयो । सदा कृपाकरि काज सम्हारयो ॥ सुन्दर दास सहित अनुरागा । श्री दुर्वासा निकट प्रयागा ॥ श्री भैरव जी की जय लेख्यो । सकल कामना पूरण देख्यो ॥ ॥ दोहा ॥ जय जय जय भैरव बटुक स्वामी संकट टार । कृपा दास पर कीजिए शंकर के अवतार ॥

June 11, 2023 / 0 Comments
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तुम्हारे विचार ही तुम्हारे कर्म हैं!

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एक राजा हाथी पर बैठकर अपने राज्य का भ्रमण कर रहा था। अचानक वह एक दुकान के सामने रुका और अपने मंत्री से कहा: मुझे नहीं पता क्यों, पर मैं इस दुकान के स्वामी को फाँसी देना चाहता हूँ। यह सुनकर मंत्री को बहुत दु:ख हुआ। लेकिन जब तक वह राजा से कोई कारण पूछता, तब तक राजा आगे बढ़ गया। अगले दिन, मंत्री उस दुकानदार से मिलने के लिए एक साधारण नागरिक के वेष में उसकी दुकान पर पहुँचा। उसने दुकानदार से ऐसे ही पूछ लिया कि उसका व्यापार कैसा चल रहा है? दुकानदार चंदन की लकड़ी बेचता था। उसने बहुत दुखी होकर बताया कि मुश्किल से ही उसे कोई ग्राहक मिलता है। लोग उसकी दुकान पर आते हैं, चंदन को सूँघते हैं और चले जाते हैं। वे चंदन कि गुणवत्ता की प्रशंसा भी करते हैं, पर ख़रीदते कुछ नहीं। अब उसकी आशा केवल इस बात पर टिकी है कि राजा जल्दी ही मर जाएगा। उसकी अन्त्येष्टि के लिए बड़ी मात्रा में चंदन की लकड़ी खरीदी जाएगी। वह आसपास अकेला चंदन की लकड़ी का दुकानदार था, इसलिए उसे पक्का विश्वास था कि राजा के मरने पर उसके दिन बदलेंगे। अब मंत्री की समझ में आ गया कि राजा उसकी दुकान के सामने क्यों रुका था और क्यों दुकानदार को मार डालने की इच्छा व्यक्त की थी। शायद दुकानदार के नकारात्मक विचारों की तरंगों ने राजा पर वैसा प्रभाव डाला था, जिसने उसके बदले में दुकानदार के प्रति अपने अन्दर उसी तरह के नकारात्मक विचारों का अनुभव किया था। बुद्धिमान मंत्री ने इस विषय पर कुछ क्षण तक विचार किया। फिर उसने अपनी पहचान और पिछले दिन की घटना बताये बिना कुछ चन्दन की लकड़ी ख़रीदने की इच्छा व्यक्त की। दुकानदार बहुत खुश हुआ। उसने चंदन को अच्छी तरह कागज में लपेटकर मंत्री को दे दिया। जब मंत्री महल में लौटा तो वह सीधा दरबार में गया जहाँ राजा बैठा हुआ था और सूचना दी कि चंदन की लकड़ी के दुकानदार ने उसे एक भेंट भेजी है। राजा को आश्चर्य हुआ। जब उसने बंडल को खोला तो उसमें सुनहरे रंग के श्रेष्ठ चंदन की लकड़ी और उसकी सुगंध को देखकर बहुत प्रसन्न हुआ। प्रसन्न होकर उसने चंदन के व्यापारी के लिए कुछ सोने के सिक्के भिजवा दिये। राजा को यह सोचकर अपने हृदय में बहुत खेद हुआ कि उसे दुकानदार को मारने का अवांछित विचार आया था। जब दुकानदार को राजा से सोने के सिक्के प्राप्त हुए, तो वह भी आश्चर्यचकित हो गया। वह राजा के गुण गाने लगा जिसने सोने के सिक्के भेजकर उसे ग़रीबी के अभिशाप से बचा लिया था। कुछ समय बाद उसे अपने उन कलुषित विचारों की याद आयी जो वह राजा के प्रति सोचा करता था। उसे अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए ऐसे नकारात्मक विचार करने पर बहुत पश्चात्ताप हुआ। यदि हम दूसरे व्यक्तियों के प्रति अच्छे और दयालु विचार रखेंगे, तो वे सकारात्मक विचार हमारे पास अनुकूल रूप में ही लौटेंगे। लेकिन यदि हम बुरे विचारों को पालेंगे, तो वे विचार हमारे पास उसी रूप में लौटेंगे।  

June 10, 2023 / 0 Comments
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श्री सत्यनारायण कथा|

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सूत जी बोले: हे ऋषियों ! जिसने पहले समय में इस व्रत को किया था उसका इतिहास कहता हूँ, ध्यान से सुनो! सुंदर काशीपुरी नगरी में एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मण रहता था। भूख प्यास से परेशान वह धरती पर घूमता रहता था। ब्राह्मणों से प्रेम से प्रेम करने वाले भगवान ने एक दिन ब्राह्मण का वेश धारण कर उसके पास जाकर पूछा: हे विप्र! नित्य दुखी होकर तुम पृथ्वी पर क्यूँ घूमते हो? दीन ब्राह्मण बोला: मैं निर्धन ब्राह्मण हूँ। भिक्षा के लिए धरती पर घूमता हूँ। हे भगवान ! यदि आप इसका कोई उपाय जानते हो तो बताइए। वृद्ध ब्राह्मण कहता है कि सत्यनारायण भगवान मनोवांछित फल देने वाले हैं इसलिए तुम उनका पूजन करो। इसे करने से मनुष्य सभी दुखों से मुक्त हो जाता है। वृद्ध ब्राह्मण बनकर आए सत्यनारायण भगवान उस निर्धन ब्राह्मण को व्रत का सारा विधान बताकर अन्तर्धान हो गए। ब्राह्मण मन ही मन सोचने लगा कि जिस व्रत को वृद्ध ब्राह्मण करने को कह गया है मैं उसे जरुर करूँगा। यह निश्चय करने के बाद उसे रात में नीँद नहीं आई। वह सवेरे उठकर सत्यनारायण भगवान के व्रत का निश्चय कर भिक्षा के लिए चला गया। उस दिन निर्धन ब्राह्मण को भिक्षा में बहुत धन मिला। जिससे उसने बंधु-बाँधवों के साथ मिलकर श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत संपन्न किया। भगवान सत्यनारायण का व्रत संपन्न करने के बाद वह निर्धन ब्राह्मण सभी दुखों से छूट गया और अनेक प्रकार की संपत्तियों से युक्त हो गया। उसी समय से यह ब्राह्मण हर माह इस व्रत को करने लगा। इस तरह से सत्यनारायण भगवान के व्रत को जो मनुष्य करेगा वह सभी प्रकार के पापों से छूटकर मोक्ष को प्राप्त होगा। जो मनुष्य इस व्रत को करेगा वह भी सभी दुखों से मुक्त हो जाएगा। सूत जी बोले कि इस तरह से नारद जी से नारायण जी का कहा हुआ श्रीसत्यनारायण व्रत को मैने तुमसे कहा। हे विप्रो ! मैं अब और क्या कहूँ? ऋषि बोले: हे मुनिवर ! संसार में उस विप्र से सुनकर और किस-किस ने इस व्रत को किया, हम सब इस बात को सुनना चाहते हैं। इसके लिए हमारे मन में श्रद्धा का भाव है। सूत जी बोले: हे मुनियों! जिस-जिस ने इस व्रत को किया है, वह सब सुनो ! एक समय वही विप्र धन व ऎश्वर्य के अनुसार अपने बंधु-बाँधवों के साथ इस व्रत को करने को तैयार हुआ। उसी समय एक एक लकड़ी बेचने वाला बूढ़ा आदमी आया और लकड़ियाँ बाहर रखकर अंदर ब्राह्मण के घर में गया। प्यास से दुखी वह लकड़हारा उनको व्रत करते देख विप्र को नमस्कार कर पूछने लगा कि आप यह क्या कर रहे हैं तथा इसे करने से क्या फल मिलेगा? कृपया मुझे भी बताएँ। ब्राह्मण ने कहा कि सब मनोकामनाओं को पूरा करने वाला यह सत्यनारायण भगवान का व्रत है। इनकी कृपा से ही मेरे घर में धन धान्य आदि की वृद्धि हुई है। विप्र से सत्यनारायण व्रत के बारे में जानकर लकड़हारा बहुत प्रसन्न हुआ। चरणामृत लेकर व प्रसाद खाने के बाद वह अपने घर गया। लकड़हारे ने अपने मन में संकल्प किया कि आज लकड़ी बेचने से जो धन मिलेगा उसी से श्रीसत्यनारायण भगवान का उत्तम व्रत करूँगा। मन में इस विचार को ले बूढ़ा आदमी सिर पर लकड़ियाँ रख उस नगर में बेचने गया जहाँ धनी लोग ज्यादा रहते थे। उस नगर में उसे अपनी लकड़ियों का दाम पहले से चार गुना अधिक मिलता है। बूढ़ा प्रसन्नता के साथ दाम लेकर केले, शक्कर, घी, दूध, दही और गेहूँ का आटा ले और सत्यनारायण भगवान के व्रत की अन्य सामग्रियाँ लेकर अपने घर गया। वहाँ उसने अपने बंधु-बाँधवों को बुलाकर विधि विधान से सत्यनारायण भगवान का पूजन और व्रत किया। इस व्रत के प्रभाव से वह बूढ़ा लकड़हारा धन पुत्र आदि से युक्त होकर संसार के समस्त सुख भोग अंत काल में बैकुंठ धाम चला गया। ॥इति श्री सत्यनारायण व्रत कथा का द्वितीय अध्याय संपूर्ण॥ श्रीमन्न नारायण-नारायण-नारायण । भज मन नारायण-नारायण-नारायण । श्री सत्यनारायण भगवान की जय॥  

June 8, 2023 / 0 Comments
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संतोषी माता चालीसा|

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॥ दोहा ॥ बन्दौं सन्तोषी चरण रिद्धि-सिद्धि दातार । ध्यान धरत ही होत नर दुःख सागर से पार ॥ भक्तन को सन्तोष दे सन्तोषी तव नाम । कृपा करहु जगदम्ब अब आया तेरे धाम ॥ ॥ चौपाई ॥ जय सन्तोषी मात अनूपम । शान्ति दायिनी रूप मनोरम ॥ सुन्दर वरण चतुर्भुज रूपा । वेश मनोहर ललित अनुपा ॥ श्‍वेताम्बर रूप मनहारी । माँ तुम्हारी छवि जग से न्यारी ॥ दिव्य स्वरूपा आयत लोचन । दर्शन से हो संकट मोचन ॥ 4 ॥ जय गणेश की सुता भवानी । रिद्धि- सिद्धि की पुत्री ज्ञानी ॥ अगम अगोचर तुम्हरी माया । सब पर करो कृपा की छाया ॥ नाम अनेक तुम्हारे माता । अखिल विश्‍व है तुमको ध्याता ॥ तुमने रूप अनेकों धारे । को कहि सके चरित्र तुम्हारे ॥ 8 ॥ धाम अनेक कहाँ तक कहिये । सुमिरन तब करके सुख लहिये ॥ विन्ध्याचल में विन्ध्यवासिनी । कोटेश्वर सरस्वती सुहासिनी ॥ कलकत्ते में तू ही काली । दुष्ट नाशिनी महाकराली ॥ सम्बल पुर बहुचरा कहाती । भक्तजनों का दुःख मिटाती ॥ 12 ॥ ज्वाला जी में ज्वाला देवी । पूजत नित्य भक्त जन सेवी ॥ नगर बम्बई की महारानी । महा लक्ष्मी तुम कल्याणी ॥ मदुरा में मीनाक्षी तुम हो । सुख दुख सबकी साक्षी तुम हो ॥ राजनगर में तुम जगदम्बे । बनी भद्रकाली तुम अम्बे ॥ 16 ॥ पावागढ़ में दुर्गा माता । अखिल विश्‍व तेरा यश गाता ॥ काशी पुराधीश्‍वरी माता । अन्नपूर्णा नाम सुहाता ॥ सर्वानन्द करो कल्याणी । तुम्हीं शारदा अमृत वाणी ॥ तुम्हरी महिमा जल में थल में । दुःख दारिद्र सब मेटो पल में ॥ 20 ॥ जेते ऋषि और मुनीशा । नारद देव और देवेशा । इस जगती के नर और नारी । ध्यान धरत हैं मात तुम्हारी ॥ जापर कृपा तुम्हारी होती । वह पाता भक्ति का मोती ॥ दुःख दारिद्र संकट मिट जाता । ध्यान तुम्हारा जो जन ध्याता ॥ 24 ॥ जो जन तुम्हरी महिमा गावै । ध्यान तुम्हारा कर सुख पावै ॥ जो मन राखे शुद्ध भावना । ताकी पूरण करो कामना ॥ कुमति निवारि सुमति की दात्री । जयति जयति माता जगधात्री ॥ शुक्रवार का दिवस सुहावन । जो व्रत करे तुम्हारा पावन ॥ 28 ॥ गुड़ छोले का भोग लगावै । कथा तुम्हारी सुने सुनावै ॥ विधिवत पूजा करे तुम्हारी । फिर प्रसाद पावे शुभकारी ॥ शक्ति-सामरथ हो जो धनको । दान-दक्षिणा दे विप्रन को ॥ वे जगती के नर औ नारी । मनवांछित फल पावें भारी ॥ 32 ॥ जो जन शरण तुम्हारी जावे । सो निश्‍चय भव से तर जावे ॥ तुम्हरो ध्यान कुमारी ध्यावे । निश्चय मनवांछित वर पावै ॥ सधवा पूजा करे तुम्हारी । अमर सुहागिन हो वह नारी ॥ विधवा धर के ध्यान तुम्हारा । भवसागर से उतरे पारा ॥ 36 ॥ जयति जयति जय संकट हरणी । विघ्न विनाशन मंगल करनी ॥ हम पर संकट है अति भारी । वेगि खबर लो मात हमारी ॥ निशिदिन ध्यान तुम्हारो ध्याता । देह भक्ति वर हम को माता ॥ यह चालीसा जो नित गावे । सो भवसागर से तर जावे ॥ 40 ॥ ॥ दोहा ॥ संतोषी माँ के सदा बंदहूँ पग निश वास । पूर्ण मनोरथ हो सकल मात हरौ भव त्रास ॥ ॥ इति श्री संतोषी माता चालीसा ॥

June 7, 2023 / 0 Comments
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हनुमान आरती

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॥ श्री हनुमंत स्तुति ॥ मनोजवं मारुत तुल्यवेगं, जितेन्द्रियं, बुद्धिमतां वरिष्ठम् ॥ वातात्मजं वानरयुथ मुख्यं, श्रीरामदुतं शरणम प्रपद्धे ॥ ॥ आरती ॥ आरती कीजै हनुमान लला की । दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ॥ जाके बल से गिरवर काँपे । रोग-दोष जाके निकट न झाँके ॥ अंजनि पुत्र महा बलदाई । संतन के प्रभु सदा सहाई ॥ आरती कीजै हनुमान लला की ॥ दे वीरा रघुनाथ पठाए । लंका जारि सिया सुधि लाये ॥ लंका सो कोट समुद्र सी खाई । जात पवनसुत बार न लाई ॥ आरती कीजै हनुमान लला की ॥ लंका जारि असुर संहारे । सियाराम जी के काज सँवारे ॥ लक्ष्मण मुर्छित पड़े सकारे । लाये संजिवन प्राण उबारे ॥ आरती कीजै हनुमान लला की ॥ पैठि पताल तोरि जमकारे । अहिरावण की भुजा उखारे ॥ बाईं भुजा असुर दल मारे । दाहिने भुजा संतजन तारे ॥ आरती कीजै हनुमान लला की ॥ सुर-नर-मुनि जन आरती उतरें । जय जय जय हनुमान उचारें ॥ कंचन थार कपूर लौ छाई । आरती करत अंजना माई ॥ आरती कीजै हनुमान लला की ॥ जो हनुमानजी की आरती गावे । बसहिं बैकुंठ परम पद पावे ॥ लंक विध्वंस किये रघुराई । तुलसीदास स्वामी कीर्ति गाई ॥ आरती कीजै हनुमान लला की । दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ॥ ॥ इति संपूर्णंम् ॥

June 6, 2023 / 0 Comments
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शिव स्तुति: ॐ वन्दे देव उमापतिं सुरगुरुं|

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ॐ वन्दे देव उमापतिं सुरगुरुं, वन्दे जगत्कारणम् । वन्दे पन्नगभूषणं मृगधरं, वन्दे पशूनां पतिम् ॥ वन्दे सूर्य शशांक वह्नि नयनं, वन्दे मुकुन्दप्रियम् । वन्दे भक्त जनाश्रयं च वरदं, वन्दे शिवंशंकरम् ॥  

June 5, 2023 / 0 Comments
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श्री सत्यनारायण जी आरती|

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जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा । सत्यनारायण स्वामी, जन पातक हरणा ॥ ॐ जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा । रत्‍‌न जडि़त सिंहासन, अद्भुत छवि राजै । नारद करत निराजन, घण्टा ध्वनि बाजै ॥ ॐ जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा । प्रकट भये कलि कारण, द्विज को दर्श दियो । बूढ़ा ब्राह्मण बनकर, कंचन महल कियो ॥ ॐ जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा । दुर्बल भील कठारो, जिन पर कृपा करी । चन्द्रचूड़ एक राजा, तिनकी विपत्ति हरी ॥ ॐ जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा । वैश्य मनोरथ पायो, श्रद्धा तज दीन्ही । सो फल भोग्यो प्रभुजी, फिर-स्तुति कीन्हीं ॥ ॐ जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा । भाव भक्ति के कारण, छिन-छिन रूप धरयो । श्रद्धा धारण कीन्हीं, तिनको काज सरयो ॥ ॐ जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा । ग्वाल-बाल संग राजा, वन में भक्ति करी । मनवांछित फल दीन्हों, दीनदयाल हरी ॥ ॐ जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा । चढ़त प्रसाद सवायो, कदली फल, मेवा । धूप दीप तुलसी से, राजी सत्यदेवा ॥ ॐ जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा । श्री सत्यनारायण जी की आरती, जो कोई नर गावै । ऋद्धि-सिद्ध सुख-संपत्ति, सहज रूप पावे ॥ जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा । सत्यनारायण स्वामी, जन पातक हरणा ॥

June 4, 2023 / 0 Comments
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श्री गंगा स्तोत्रम्|

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श्री गंगा जी की स्तुति गांगं वारि मनोहारि मुरारिचरणच्युतम् । त्रिपुरारिशिरश्चारि पापहारि पुनातु माम् ॥ माँ गंगा स्तोत्रम्॥ देवि सुरेश्वरि भगवति गङ्गे त्रिभुवनतारिणि तरलतरङ्गे । शङ्करमौलिविहारिणि विमले मम मतिरास्तां तव पदकमले ॥१॥ भागीरथि सुखदायिनि मातस्तव जलमहिमा निगमे ख्यातः । नाहं जाने तव महिमानं पाहि कृपामयि मामज्ञानम् ॥ २॥ हरिपदपाद्यतरङ्गिणि गङ्गे हिमविधुमुक्ताधवलतरङ्गे । दूरीकुरु मम दुष्कृतिभारं कुरु कृपया भवसागरपारम् ॥ ३॥ तव जलममलं येन निपीतं, परमपदं खलु तेन गृहीतम् । मातर्गङ्गे त्वयि यो भक्तः किल तं द्रष्टुं न यमः शक्तः ॥ ४॥ पतितोद्धारिणि जाह्नवि गङ्गे खण्डितगिरिवरमण्डितभङ्गे । भीष्मजननि हे मुनिवरकन्ये, पतितनिवारिणि त्रिभुवनधन्ये ॥ ५॥ कल्पलतामिव फलदां लोके, प्रणमति यस्त्वां न पतति शोके । पारावारविहारिणि गङ्गे विमुखयुवतिकृततरलापाङ्गे ॥ ६॥ तव चेन्मातः स्रोतःस्नातः पुनरपि जठरे सोऽपि न जातः । नरकनिवारिणि जाह्नवि गङ्गे कलुषविनाशिनि महिमोत्तुङ्गे ॥ ७॥ पुनरसदङ्गे पुण्यतरङ्गे जय जय जाह्नवि करुणापाङ्गे । इन्द्रमुकुटमणिराजितचरणे सुखदे शुभदे भृत्यशरण्ये ॥ ८॥ रोगं शोकं तापं पापं हर मे भगवति कुमतिकलापम्। त्रिभुवनसारे वसुधाहारे त्वमसि गतिर्मम खलु संसारे॥ ९॥ अलकानन्दे परमानन्दे कुरु करुणामयि कातरवन्द्ये । तव तटनिकटे यस्य निवासः खलु वैकुण्ठे तस्य निवासः ॥ १०॥ वरमिह नीरे कमठो मीनः किं वा तीरे शरटः क्षीणः । अथवा श्वपचो मलिनो दीनस्तव न हि दूरे नृपतिकुलीनः॥ ११॥ भो भुवनेश्वरि पुण्ये धन्ये देवि द्रवमयि मुनिवरकन्ये । गङ्गास्तवमिमममलं नित्यं पठति नरो यः स जयति सत्यम् ॥ १२॥ येषां हृदये गङ्गाभक्तिस्तेषां भवति सदा सुखमुक्तिः । मधुराकान्तापज्झटिकाभिः परमानन्दकलितललिताभिः ॥ १३॥ गङ्गास्तोत्रमिदं भवसारं वाञ्छितफलदं विमलं सारम् । शङ्करसेवकशङ्कररचितं पठति सुखी स्तव इति च समाप्तः ॥ १४॥ देवि सुरेश्वरि भगवति गङ्गे त्रिभुवनतारिणि तरलतरङ्गे । शङ्करमौलिविहारिणि विमले मम मतिरास्तां तव पदकमले ॥

June 3, 2023 / 0 Comments
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बुरे विचारों से बचने के उपाय|

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एक धनवान व्यक्ति था, बडा विलासी था। हर समय उसके मन में भोग विलास सुरा-सुंदरी के विचार ही छाए रहते थे। वह खुद भी इन विचारों से त्रस्त था, पर आदत से लाचार, वे विचार उसे छोड ही नहीं रहे थे। एक दिन आचानक किसी संत से उसका सम्पर्क हुआ। वह संत से उक्त अशुभ विचारों से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना करने लगा। संत ने कहा अच्छा, अपना हाथ दिखाओं, हाथ देखकर संत भी चिंता में पड गये। संत बोले बुरे विचारों से मैं तुम्हारा पिंड तो छुडा देता, पर तुम्हारे पास समय बहुत ही कम है। आज से ठीक एक माह बाद तुम्हारी मृत्यु निश्चित है, इतने कम समय में तुम्हे कुत्सित विचारों से निजात कैसे दिला सकता हूं। और फ़िर तुम्हें भी तो तुम्हारी तैयारियां करनी होगी। वह व्यक्ति चिंता में डूब गया। अब क्या होगा, चलो समय रहते यह मालूम तो हुआ कि मेरे पास समय कम है। वह घर और व्यवसाय को व्यवस्थित व नियोजीत करने में लग गया। परलोक के लिये पुण्य अर्जन की योजनाएं बनाने लगा, कि कदाचित परलोक हो तो पुण्य काम लगेगा। वह सभी से अच्छा व्यवहार करने लगा। जब एक दिन शेष रहा तो उसने विचार किया, चलो एक बार संत के दर्शन कर लें। संत ने देखते ही कहा- बडे शान्त नजर आ रहे हो, जबकि मात्र एक दिन शेष है\’। अच्छा बताओ क्या इस अवधि में कोई सुरा-सुंदरी की योजना बनी क्या? व्यक्ति का उत्तर था- महाराज! जब मृत्यु समक्ष हो तो विलास कैसा? संत हंस दिये। और कहा- वत्स! अशुभ चिंतन से दूर रहने का मात्र एक ही उपाय है मृत्यु निश्चित है यह चिंतन सदैव सम्मुख रखना चाहिए,और उसी ध्येय से प्रत्येक क्षण का सदुपयोग करना चाहिए।

June 2, 2023 / 0 Comments
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राजेश्वरी धाम देवी राज रानी वैष्णो मंदिर में अष्टमी पर करवाई चौंकी

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राजेश्वरी धाम देवी राज रानी वैष्णो मंदिर में अष्टमी पर करवाई चौंकी सांसद सुशील रिंकू तथा विधायक रमन अरोड़ा ने हाजरी लगवाकर लिया मां का आशीर्वाद जालंधर: गत दिनों बस्ती शेख रोड पर स्थित राजेश्वरी धाम देवा राज रानी वैष्णव मंदिर में अष्टमी पर विशाल माता की चौंकी का आयोजन किया गया। जिसमें दीपक सरगम एंड पार्टी तथा पंकज ठाकुर एंड पार्टी द्वारा गाई माता की भेंटों से उपस्थित संगत भाव विभोर हो गई। इस चौंकी में विशेष रूप से माता जी का आशीर्वाद लेने जालंधर के सांसद सुशील कुमार रिंकू तथा जालंधर सेंट्रल से विधायक रमन अरोड़ा पहुंच। राजेश्वरी मां देवा राज रानी ने अपना आशीर्वाद सब भक्तों को देकर संगत को कृतार्थ किया। इस चौंकी के आयोजन का प्रबंध मंदिर कमेटी के प्रधान कैलाश बब्बर एवं अन्य कमेटी सदस्यों द्वारा माता जी के आशीर्वाद से किया गया था। चौंकी के उपरांत संगत के लिए लंगर की सुव्यवस्था भी मंदिर कमेटी द्वारा की गई थी। इस अवसर पर रामकृष्ण नानू, विजय दुआ, पवन नागपाल, सुरेंद्र अरोड़ा, सतीश बब्बर, ज्योति बब्बर, जतिन बब्बर, पंकज ठाकुर, पंडित विष्णु प्रसाद, राजीव सहदेव, प्रवेश सहदेव, संगीता बब्बर, रेनू बब्बर, शमा अरोड़ा, कमलेश कुमारी, आशा रानी एवं बड़ी संख्या में संगत उपस्थित रही।

June 2, 2023 / 0 Comments
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माँ बगलामुखी पौराणिक कथा|

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एक बार सतयुग में महाविनाश उत्पन्न करने वाला ब्रह्मांडीय तूफान उत्पन्न हुआ, जिससे संपूर्ण विश्व नष्ट होने लगा इससे चारों ओर हाहाकार मच गया। संसार की रक्षा करना असंभव हो गया। यह तूफान सब कुछ नष्ट-भ्रष्ट करता हुआ आगे बढ़ता जा रहा था, जिसे देख कर भगवान विष्णु जी चिंतित हो गए। इस समस्या का कोई हल न पा कर वह भगवान शिव को स्मरण करने लगे, तब भगवान शिव ने कहा: शक्ति रूप के अतिरिक्त अन्य कोई इस विनाश को रोक नहीं सकता अत: आप उनकी शरण में जाएं। तब भगवान विष्णु ने हरिद्रा सरोवर के निकट पहुंच कर कठोर तप किया। भगवान विष्णु के तप से देवी शक्ति प्रकट हुईं। उनकी साधना से महात्रिपुरसुंदरी प्रसन्न हुईं। सौराष्ट्र क्षेत्र की हरिद्रा झील में जलक्रीड़ा करती महापीतांबरा स्वरूप देवी के हृदय से दिव्य तेज उत्पन्न हुआ। इस तेज से ब्रह्मांडीय तूफान थम गया। मंगलयुक्त चतुर्दशी की अर्धरात्रि में देवी शक्ति का देवी बगलामुखी के रूप में प्रादुर्भाव हुआ था। त्रैलोक्य स्तम्भिनी महाविद्या भगवती बगलामुखी ने प्रसन्न होकर भगवान विष्णु जी को इच्छित वर दिया और तब सृष्टि का विनाश रुक सका। देवी बगलामुखी को वीर रति भी कहा जाता है क्योंकि देवी स्वयं ब्रह्मास्त्र रूपिणी हैं। इनके शिव को महारुद्र कहा जाता है। इसीलिए देवी सिद्ध विद्या हैं। तांत्रिक इन्हें स्तंभन की देवी मानते हैं। गृहस्थों के लिए देवी समस्त प्रकार के संशयों का शमन करने वाली हैं। दसमहाविधाओ मे से आठवी महाविधा है देवी बगलामुखी। इनकी उपासना इनके भक्त शत्रु नाश, वाकसिद्ध और वाद विवाद मे विजय के लिए करते है। इनमे सारे ब्राह्मण की शक्ति का समावेश है, इनकी उपासना से भक्त के जीवन की हर बाधा दूर होती है और शत्रुओ का नाश के साथ साथ बुरी शक्तियों का भी नाश करती है। देवी को बगलामुखी, पीताम्बरा, बगला, वल्गामुखी, वगलामुखी, ब्रह्मास्त्र विद्या आदि नामों से भी जाना जाता है।

May 21, 2023 / 0 Comments
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बुरी परिस्थितियों में भी आशा नहीं छोड़ें – प्रेरक कहानी

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एक राजा ने दो लोगों को मौत की सजा सुनाई। उसमें से एक यह जानता था कि राजा को अपने घोड़े से बहुत ज्यादा प्यार है। उसने राजा से कहा कि यदि मेरी जान बख्श दी जाए तो मैं एक साल में उसके घोड़े को उड़ना सीखा दूँगा। यह सुनकर राजा खुश हो गया कि वह दुनिया के इकलौते उड़ने वाले घोड़े की सवारी कर सकता है। दूसरे कैदी ने अपने मित्र की ओर अविश्वास की नजर से देखा और बोला, तुम जानते हो कि कोई भी घोड़ा उड़ नहीं सकता! फिर तुमने इस तरह पागलपन की बात सोची भी कैसे? तुम तो अपनी मौत को एक साल के लिए टाल रहे हो। पहला कैदी बोला: ऐसी बात नहीं है, मैंने दरअसल खुद को स्वतंत्रता के चार मौके दिए हैं। ◉ पहली बात राजा एक साल के भीतर मर सकता है। ◉ दूसरी बात मैं मर सकता हूं। ◉ तीसरी बात घोड़ा मर सकता है। ◉ और चौथी बात, हो सकता है, मैं घोड़े को उड़ना सीखा दूं। कहानी की सीख यह है कि बुरी से बुरी परिस्थितियों में भी आशा नहीं छोड़नी चाहिए।

May 20, 2023 / 0 Comments
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गुरु ग्रंथ साहिब, सिखों की पवित्र पुस्तक|

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Like the Bible of Christianity, the Vedas of Hinduism or the Koran of Islam, the Guru Granth Sahib, also known as the Adi Granth, is the main scripture of Sikhism. Compared to other religions, Sikhism is a religion of recent origin, founded in the 15th Century AD by its founder Sri Guru Nanak. Although like Islam it believes in the oneness of God and is opposed to idol worship, in many respects it is an offshoot of Hinduism and is much closer to Hinduism. It evolved primarily out of Hinduism, in line with the Bhakti marg or the devotional path of Hinduism, as a kind of reform movement In many respects, it is much more closer to Hinduism than either Buddhism or Jainism and unlike the latter it maintained a very healthy relationship with Hinduism throughout. The relationship between Hinduism and Sikhism can be compared to that of a son and father, where the son though a grown up individual has never lost his respect towards his father and took upon himself the responsibility of taking care of the latter. In all fairness we should say that during the Muslim rule and the subsequent British rule of India, Hinduism owed as much to Sikhs as to Hindus for its survival and continuity. Whenever it became vulnerable to the outside attacks and threats, the Sikhs stepped themselves into the role of the Kshatriyas and defended the land as well as the faith like true warriors of God. Whatever may be the case, however, those who study the Guru Granth Sahib are bound to realize that with regard to the emphasis it lays on pure and unconditional devotion to God, on a life that is dedicated completely to the remembrance of God, to the chanting of His Glory, His words and His Name, and the importance and necessity of a true Guru in ones spiritual salvation, Sikhism stands apart as a purely devotional religion and is way beyond all the known religions as an expression of pure and unconditional love to God. In its philosophy and emphasis it transcends all faiths. Because of its simplicity and unpretentious approach to God, it does not hurt, beyond tolerable limits, the religious sentiments or beliefs of any. And irrespective of the religion, the caste or the creed to which each belongs, it has the potential to appeal to all and inspire all. The Guru Granth Sahib in its present form was originally compiled by the tenth Guru, Guru Gobind Singh. The Scripture contains 5894 hymns of pure devotion composed in 18 ragas (musical patterns) by the ten Gurus and 15 Hindu and Muslim saints such as Kabir, Shiak Fareed etc. Of these Guru Nanak contributed 974 hymns. The hymns were originally composed in different languages such as Persian, mediaeval Prakrit, Hindi, Marathi, old Punjabi, Multani, and several local dialects. The basic philosophy of Sikhism revolves mainly around three concepts: Naam, the name of God, Shabad the word of God and Sat Sang, the company of the pious and the holy. These are the simple means to salvation. The Book teaches that outward rituals and indulgence in the worldly pleasure only bring us pain. What is required is inner purification, true devotion and surrender to God. The true Guru is the Naam, the name of God by remembering which constantly one can achieve salvation. However a Guru, who has become completely absorbed in the contemplation of Naam and has become united with God in thought and deed, can also help us to cross the world of illusion and taste the sweetness of the Lord. Special mention may be made of Japji, comprising of the thirty eight short poems of Nanak which appear at the beginning of the Adi Granth. It contains the essential teachings and beliefs of Sikhism and is considered to be very important. The poems are rendered in various ragas (musical modes) and are sung by Sikh devotees as a mark of devotion and respect to the Guru. Compiled in the sixteenth century and composed entirely in lyrical form, the hymns are mostly devotional in nature. During ceremonial occasions and functions, they are sung individually or in a chorus by the devotees with utmost devotion, love and humility. The Guru Granth Sahib can be truly called the essence of all religions, since it contains hymns and verses from many sacred books of various religions and sects of Hinduism.

May 19, 2023 / 0 Comments
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इस मंत्र को पढ़ने से आएगा वैभव|

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हर किसी के जीवन में पैसा सबसे जरूरी होता है. आज के समय में बिना पैसे के आप कुछ नहीं कर सकते हैं. पैसा पास में रहने पर आदमी का तन और मन दोनों स्वस्थ रहता है. ज्योतिष शास्त्र में व्यक्ति की आर्थिक स्थिति सुधारने और धन लाभ के लिए कई उपाय बताए गए हैं. अगर आप इन उपाय को अपनाएंगे तो धन की प्राप्ति कर सकता हैं. अक्सर लोग कई उपायों को करके तंगी को दूर कर अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत करना चाहते हैं. आइए, हम आपको पैसों की तंगी से निजात दिलाने वाले उपायों के बारे में बताते हैं. मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए कुछ मंत्रों के बारे में बताने जा रहे हैं. जिससे जाप से मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त हो सकती है. धन प्राप्ति के लिए करें शिव मंत्र धन प्राप्ति के लिए आप भगवान शिव की अराधना करें. भगवान शिव को प्रसन्न कर आप अपार धन की प्राप्ति कर सकते हैं. आपको सोमवार के दिन शिव लिंग पर दूध मिश्रित जल चढ़ाना चाहिए. शिवलिंग पर जल अर्पित करने के बाद रूद्राक्ष की माला से \”ॐ सोमेश्वराय नमः\” मंत्र का 108 बार जाप करें. इससे व्यापार में तरक्की होती है. धन की प्राप्ति के लिए मंत्र धन प्रदान करने वाले देवी मां लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए आप स्फटिक की माला से \’पद्मानने पद्म पद्माक्ष्मी पद्म संभवे तन्मे भजसि पद्माक्षि येन सौख्यं लभाम्यहम्\’ मंत्र का जाप करें. रोज सुबह इस मंत्र के जाप से आपके घर में धन की बारिश होगी. कर्ज से छुटकारा पान के लिए मंत्र कई लोग अपनी जरूरतों का पूरा करने के लिए एक-दूसरे से कर्ज लेते हैं और समय पर कर्ज का निपटारा न करने के कारण से कर्ज के बोझ से दब जाते हैं. ऐसे में कर्ज से छुटकारा पाने के लिए आप रोजाना \’ऊं ह्रीं श्री क्रीं क्लीं श्री लक्ष्मी मम गृहे धन पूरये, धन पूरये, चिंताएं दूरये-दूरये स्वाहा\’ मंत्र का जाप करें. इस मंत्र के जाप से आपको कर्ज से काफी राहत मिल सकती है. पीपल की जड़ में अर्पित करें जल पीपल के वृक्ष का बहुत ही अधिक धार्मिक महत्व होता है. ऐसे में पीपल की जड़ में जल चढ़ाने से मां लक्ष्मी प्रसन्न होती है. मां लक्ष्मी के प्रसन्न होने से उनका वास हमेशा घर में बना रहता है. ऐसे में आप लोहे के बर्तन में जल, चीनी, दूध और घी का घोल लेकर आपको इसे पीपल की जड़ में अर्पित करना से धन की बारिश होगी. आर्थिक संकट से छुटकारा पाने के लिए मंत्र आर्थिक संकट से छुटकारा पाने के लिए आपको रोजाना कमलगट्टे की माला लेकर \’ धनाय नमो नम:\’ और \’ऊं धनाय नम:\’ का जाप करें. इससे मां लक्ष्मी प्रसन्न होंगी और आपकी सारी समस्या दूर हो जायेगी. यह उपाय है कारगर कहा जाता है कि आटे में कैसर और तुलसी के पत्ते मिलाकर रखने से मां लक्ष्मी प्रसन्न हो जाता है. बस आपको हर सोमवार और शनिवार के दिन गेहूं में 11 पत्ते और 2 दाने केसर के डाल कर पिसवा लें. इसे सारे आटे में मिलाकर रख लें. ऐसा करने से मां लक्ष्मी की कृपा से खूब तरक्की होती है. इस उपाय से दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की होती है.

May 9, 2023 / 0 Comments
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चंद्र देव चालीसा: इसका पाठ करने से मिलेगी मानसिक विकारों से मुक्ति

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जिस तरह ग्रहों के राजा सूर्य देव की आराधना लाभदायी मानी जाती है, ठीक इसी तरह धार्मिक शास्त्रों में चंद्र देव की पूजा पुण्यदायी मानी गई है। जिस तरह ग्रहों के राजा सूर्य देव की आराधना लाभदायी मानी जाती है, ठीक इसी तरह धार्मिक शास्त्रों में चंद्र देव की पूजा पुण्यदायी मानी गई है। इतना ही नहीं हिंदू धर्म के अन्य देवी-देवताओं की तरह शास्त्रों में न केवल इनसे जुड़ा वर्णन मिलता है बल्कि इनसे जुड़े मंत्र, स्तोत्र तथा चालीसा आदि का वर्णन भी है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार चंद्र देव तो मन मस्तिष्क का कारक माना गया है। कहा जाता है इनका कुंडली में शुभ दशा-दिशा में होना अति आवश्यक होता है, क्योंकि अगर ये शुभ न हो तो व्यक्ति को कई तरह के मानसिक विकारों से जूझना पड़ता है। तो आइए जानते हैं चंद्र देव की चालीसा, जिसका जप करने से आपको चंद्र देव की कृपा प्राप्त होती है। शीश नवा अरिहंत को, सिद्धन करूं प्रणाम। उपाध्याय आचार्य का, ले सुखकारी नाम।। सर्व साधु और सरस्वती, जिन मंदिर सुखकर। चन्द्रपुरी के चन्द्र को, मन मंदिर में धार।। ।। चौपाई ।। जय-जय स्वामी श्री जिन चन्दा, तुमको निरख भये आनन्दा। तुम ही प्रभु देवन के देवा, करूँ तुम्हारे पद की सेवा।। वेष दिगम्बर कहलाता है, सब जग के मन भाता है। नासा पर है द्रष्टि तुम्हारी, मोहनि मूरति कितनी प्यारी।। तीन लोक की बातें जानो, तीन काल क्षण में पहचानो। नाम तुम्हारा कितना प्यारा , भूत प्रेत सब करें निवारा।। तुम जग में सर्वज्ञ कहाओ, अष्टम तीर्थंकर कहलाओ।। महासेन जो पिता तुम्हारे, लक्ष्मणा के दिल के प्यारे।। तज वैजंत विमान सिधाये , लक्ष्मणा के उर में आये। पोष वदी एकादश नामी , जन्म लिया चन्दा प्रभु स्वामी।। मुनि समन्तभद्र थे स्वामी, उन्हें भस्म व्याधि बीमारी। वैष्णव धर्म जभी अपनाया, अपने को पण्डित कहाया।। कहा राव से बात बताऊं , महादेव को भोग खिलाऊं। प्रतिदिन उत्तम भोजन आवे , उनको मुनि छिपाकर खावे।। इसी तरह निज रोग भगाया , बन गई कंचन जैसी काया। इक लड़के ने पता चलाया , फौरन राजा को बतलाया।। तब राजा फरमाया मुनि जी को , नमस्कार करो शिवपिंडी को। राजा से तब मुनि जी बोले, नमस्कार पिंडी नहिं झेले।। राजा ने जंजीर मंगाई , उस शिवपिंडी में बंधवाई। मुनि ने स्वयंभू पाठ बनाया , पिंडी फटी अचम्भा छाया।। चन्द्रप्रभ की मूर्ति दिखाई, सब ने जय-जयकार मनाई। नगर फिरोजाबाद कहाये , पास नगर चन्दवार बताये।। चन्द्रसैन राजा कहलाया , उस पर दुश्मन चढ़कर आया। राव तुम्हारी स्तुति गई , सब फौजो को मार भगाई।। दुश्मन को मालूम हो जावे , नगर घेरने फिर आ जावे। प्रतिमा जमना में पधराई , नगर छोड़कर परजा धाई।। बहुत समय ही बीता है कि , एक यती को सपना दीखा। बड़े जतन से प्रतिमा पाई , मन्दिर में लाकर पधराई।। वैष्णवों ने चाल चलाई , प्रतिमा लक्ष्मण की बतलाई। अब तो जैनी जन घबरावें , चन्द्र प्रभु की मूर्ति बतावें।। चिन्ह चन्द्रमा का बतलाया , तब स्वामी तुमको था पाया। सोनागिरि में सौ मन्दिर हैं , इक बढ़कर इक सुन्दर हैं।। समवशरण था यहां पर आया , चन्द्र प्रभु उपदेश सुनाया। न्द्र प्रभु का मंदिर भारी , जिसको पूजे सब नर – नारी।। सात हाथ की मूर्ति बताई , लाल रंग प्रतिमा बतलाई। मंदिर और बहुत बतलाये , शोभा वरणत पार न पाये।। पार करो मेरी यह नैया , तुम बिन कोई नहीं खिवैया। प्रभु मैं तुमसे कुछ नहीं चाहूं , भव – भव में दर्शन पाऊँ।। मैं हूं स्वामी दास तिहारा , करो नाथ अब तो निस्तारा। स्वामी आप दया दिखलाओ , चन्द्रदास को चन्द्र बनाओ।।  ।।सोरठ।। नित चालीसहिं बार , पाठ करे चालीस दिन। खेय सुगन्ध अपार , सोनागिर में आय के।। होय कुबेर सामान , जन्म दरिद्री होय जो। जिसके नहिं संतान , नाम वंश जग में चले।।

May 7, 2023 / 0 Comments
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कौन हैं माँ छिन्नमस्तिका?

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कौन हैं माँ छिन्नमस्तिका छिन्नमस्ता या \’छिन्नमस्तिका\’ या \’प्रचण्ड चण्डिका\’ दस महाविद्यायों में से एक हैं। छिन्नमस्ता देवी के हाथ में अपना ही कटा हुआ सिर है तथा दूसरे हाथ में खड्क है। मान्यता है कि छिन्नमस्ता महाविद्या सकल चिंताओं का अंत करती है और मन में चिन्तित हर कामना को पूरा करती हैं। इसलिए उन्हें चिंतपुरणी भी कहा जाता है। चिंतपुरणी मंदिर हिमाचल प्रदेश मे है देवी छिन्नमस्ता का एक प्रसिद्ध मंदिर रजरप्पा मे है सहारनपुर की शिवालिक पहाडियों के मध्य प्राचीन शाकम्भरी देवी शक्तिपीठ मे भी छिन्नमस्ता देवी का एक भव्य मंदिर है। एक बार माँ छिन्नमस्तिका अपनी दो सहचरियों के संग मन्दाकिनी नदी में स्नान के लिए गयीं । स्नान के पश्चात् माँ की दोनों सहचरियों को बहुत तेज भूख का आभास होने लगा । सहचरियों ने भोजन के लिये भवानी से कुछ मांगा । माँ ने कुछ देर प्रतिक्षा करने को कहा । सहचरियों की भूख बढ़ती जा रही थी । कहते हैं की भूख कि पीड़ा से उनका रंग काला होता जा रहा था । तब सहचरियों ने नम्रतापूर्वक माँ से कहा की “मां तो भूखे शिशु को अविलम्ब भोजन प्रदान करती है” । ऎसा वचन सुनते ही भवानी ने बिना एक भी क्षण गंवाए, खडग से अपना ही सिर काट दिया । कटा हुआ सिर उनके बायें हाथ में आ गिरा और तीन रक्तधाराएं बह निकली । दो धाराओं को उन्होंने सहचरियों की और प्रवाहित कर दिया तीसरी धारा जो ऊपर की प्रबह रही थी, उसे देवी स्वयं पान करने लगी । अब माँ की दोनों सहचरियां रक्त पान कर तृ्प्त हो गयीं थीं । मान्यता है की तभी से माँ को छिन्नमस्ता के रूप में जाना जाने लगा और माँ इस “छिन्नमस्तिका” नाम से विख्यात हो गयीं । माँ को अपने भक्त अत्यंत प्रिय हैं । भक्तों के लिए वात्सल्य की प्रतिमूर्ति है माँ । यदि भक्तों के लिए माँ को अपना सर भी काटना पड़ जाये तो माँ देर नहीं करती । अपना लहू पिलाकर भी भक्तों को नया जीवन प्रदान करती है माँ । माँ का बखान करना तो अपने बस की बात नहीं है, बस यूँ ही समझ लीजिये की कुछ कुछ ऐसी है हमारी माँ छिन्नमस्तिका जय माता दी शनि कृपा मूर्ति ईशु जी महाराज

May 6, 2023 / 0 Comments
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