नमो नमो दुर्गे सुख करनी । नमो नमो दुर्गे दुःख हरनी ॥ निरंकार है ज्योति तुम्हारी । तिहूँ लोक फैली उजियारी ॥ शशि ललाट मुख महाविशाला । नेत्र लाल भृकुटि विकराला ॥ रूप मातु को अधिक सुहावे । दरश करत जन अति सुख पावे ॥ ४ तुम संसार शक्ति लै कीना । पालन हेतु अन्न धन दीना ॥ अन्नपूर्णा हुई जग पाला । तुम ही आदि सुन्दरी बाला ॥ प्रलयकाल सब नाशन हारी । तुम गौरी शिवशंकर प्यारी ॥ शिव योगी तुम्हरे गुण गावें । ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें ॥ ८ रूप सरस्वती को तुम धारा । दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा ॥ धरयो रूप नरसिंह को अम्बा । परगट भई फाड़कर खम्बा ॥ रक्षा करि प्रह्लाद बचायो । हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो ॥ लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं । श्री नारायण अंग समाहीं ॥ १२ क्षीरसिन्धु में करत विलासा । दयासिन्धु दीजै मन आसा ॥ हिंगलाज में तुम्हीं भवानी । महिमा अमित न जात बखानी ॥ मातंगी अरु धूमावति माता । भुवनेश्वरी बगला सुख दाता ॥ श्री भैरव तारा जग तारिणी । छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी ॥ १६ केहरि वाहन सोह भवानी । लांगुर वीर चलत अगवानी ॥ कर में खप्पर खड्ग विराजै । जाको देख काल डर भाजै ॥ सोहै अस्त्र और त्रिशूला । जाते उठत शत्रु हिय शूला ॥ नगरकोट में तुम्हीं विराजत । तिहुँलोक में डंका बाजत ॥ २० शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे । रक्तबीज शंखन संहारे ॥ महिषासुर नृप अति अभिमानी । जेहि अघ भार मही अकुलानी ॥ रूप कराल कालिका धारा । सेन सहित तुम तिहि संहारा ॥ परी गाढ़ सन्तन पर जब जब । भई सहाय मातु तुम तब तब ॥ २४ अमरपुरी अरु बासव लोका । तब महिमा सब रहें अशोका ॥ ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी । तुम्हें सदा पूजें नरनारी ॥ प्रेम भक्ति से जो यश गावें । दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें ॥ ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई । जन्ममरण ताकौ छुटि जाई ॥ २८ जोगी सुर मुनि कहत पुकारी । योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी ॥ शंकर आचारज तप कीनो । काम अरु क्रोध जीति सब लीनो ॥ निशिदिन ध्यान धरो शंकर को । काहु काल नहिं सुमिरो तुमको ॥ शक्ति रूप का मरम न पायो । शक्ति गई तब मन पछितायो ॥ ३२ शरणागत हुई कीर्ति बखानी । जय जय जय जगदम्ब भवानी ॥ भई प्रसन्न आदि जगदम्बा । दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा ॥ मोको मातु कष्ट अति घेरो । तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो ॥ आशा तृष्णा निपट सतावें । मोह मदादिक सब बिनशावें ॥ ३६ शत्रु नाश कीजै महारानी । सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी ॥ करो कृपा हे मातु दयाला । ऋद्धिसिद्धि दै करहु निहाला ॥ जब लगि जिऊँ दया फल पाऊँ । तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊँ ॥ श्री दुर्गा चालीसा जो कोई गावै । सब सुख भोग परमपद पावै ॥ ४० देवीदास शरण निज जानी । कहु कृपा जगदम्ब भवानी ॥
साईं बाबा की आरती || Sai baba ki aarti
आरती श्री साईं गुरुवर की, परमानन्द सदा सुरवर की। जा की कृपा विपुल सुखकारी, दुःख, शोक, संकट, भयहारी। शिरडी में अवतार रचाया, चमत्कार से तत्त्व दिखाया। कितने भक्त शरण में आए, वे सुख शान्ति निरंतर पाये। भाव धरै जो मन में जैसा, साईं का अनुभव हो वैसा। गुरु की उदी लगावे तन को, समाधान लाभत उस तन को। साईं नाम सदा जो गावे, सो फल जग में शाश्वत पावे। गुरुवासर करि पूजा सेवा, उस पर कृपा करत गुरुदेवा। राम, कृष्ण, हनुमान रूप में, दे दर्शन जानत जो मन में। विविध धर्म के सेवक आते, दर्शन कर इच्छित फल पाते। जै बोलो साईं बाबा की, जै बोलो अवधूत गुरु की। साईं की आरती जो कोई गावै, घर में बस सुख मंगल पावे।
नवदुर्गा देवी के मंत्र || Navdurga Devi ke Mantra
1️⃣.माता शैलपुत्री- ह्रीं शिवायै नम:। पर्वतराज हिमालय की पुत्री माता दुर्गा का प्रथम रूप है. इनकी आराधना से कई सिद्धियां प्राप्त होती हैं. प्रतिपदा को मंत्र- ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं शैलपुत्र्ये नम:’ की माला दुर्गा जी के चित्र के सामने यशाशक्ति जप कर घृत से हवन करें । 2️⃣. माता ब्रह्मचारिणी- ह्रीं श्री अम्बिकायै नम:। माता दुर्गा का दूसरा स्वरूप पार्वती जी का तप करते हुए हैं. इनकी साधना से सदाचार-संयम तथा सर्वत्र विजय प्राप्त होती है. चैत्र नवरात्रि के दूसरे दिन पर इनकी साधना की जाती है। द्वितिया को मंत्र- ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं ब्रह्मचारिण्यै नम:’, की माला दुर्गा जी के चित्र के सामने यशाशक्ति जप कर घृत से हवन करें. 3️⃣. माता चन्द्रघण्टा- ऐं श्रीं शक्तयै नम:। माता दुर्गा का यह तृतीय रूप है. समस्त कष्टों से मुक्ति हेतु इनकी साधना की जाती है. तृतीया को मंत्र- ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चन्द्रघंटायै नम:’ की एक माला जप कर घृत से हवन करें. 4️⃣. माता कूष्मांडा- ऐं ह्री देव्यै नम:। यह मां दुर्गा का चतुर्थ रूप है. चतुर्थी इनकी तिथि है. आयु वृद्धि, यश-बल को बढ़ाने के लिए इनकी साधना की जाती है. चतुर्थी को मंत्र- ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै नम:’ की एक माला जप कर घृत से हवन करें. 5️⃣. माता स्कंदमाता- ह्रीं क्लीं स्वमिन्यै नम:। दुर्गा जी के पांचवे रूप की साधना पंचमी को की जाती है. सुख-शांति एवं मोक्ष को देने वाली हैं. पांचवें दिन मंत्र- ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं स्कंदमातायै नम:’ की एक माला जप कर घृत से हवन करें. 6️⃣. माता कात्यायनी- क्लीं श्री त्रिनेत्रायै नम:। मां दुर्गा के छठे रूप की साधना षष्ठी तिथि को की जाती है. रोग, शोक, संताप दूर कर अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष को भी देती हैं. छठे दिन मंत्र- ‘ॐ क्रीं कात्यायनी क्रीं नम:’ की एक माला जप कर घृत से हवन करें. 7️⃣. माता कालरात्रि – क्लीं ऐं श्री कालिकायै नम:। सप्तमी को पूजित मां दुर्गा जी का सातवां रूप है. वे दूसरों के द्वारा किए गए प्रयोगों को नष्ट करती हैं. सातवें दिन मंत्र- ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कालरात्र्यै नम:’ की एक माला जप कर घृत से हवन करें. 8️⃣.माता महागौरी- श्री क्लीं ह्रीं वरदायै नम:। मां दुर्गा के आठवें रूप की पूजा अष्टमी को की जाती है. समस्त कष्टों को दूर कर असंभव कार्य सिद्ध करती हैं. आठवें दिन मंत्र- ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं महागौर्ये नम:’ की एक माला जप कर घृत या खीर से हवन करें. 9️⃣. माता सिद्धिदात्री – ह्रीं क्लीं ऐं सिद्धये नम:। मां दुर्गा के इस रूप की अर्चना नवमी को की जाती है. अगम्य को सुगम बनाना इनका कार्य है. नौवें दिन मंत्र- ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं सिद्धिदात्र्यै नम:’ की एक माला जप कर जौ, तिल और घृत से हवन करें. कलियुग में प्रत्येक दिन की देवियां अलग-अलग अधिष्ठात्री हैं, जिनकी साधना से कामना-पूर्ति अलग-अलग है, जो निम्न प्रकार से की जा सकती है।
छतरपुर मंदिर का इतिहास || History of chhatarpur temple
उस पौराणिक कहानी के अनुसार एक बार एक ऋषि ने दुर्गा देवी की कठोर तपस्या की थी। उस ऋषि का नाम कात्यायन ऋषि था। उस ऋषि की कठोर तपस्या को देखकर दुर्गा देवी प्रसन्न हुई और उस ऋषि के सामने प्रकट हुई। देवी ने उस ऋषि की तपस्या से प्रसन्न होकर कहा की जो भी वरदान चाहते हो वो अवश्य मांगो।उसके बाद कात्यायन ऋषि ने देवी से कहा की आप मेरे घर में मेरी पुत्री बनकर जन्म लो। मुझे आपका पिता बनने की इच्छा है। ऋषि के यह शब्द सुनकर देवी प्रसन्न हुई और उसे इच्छा अनुरूप वरदान दे दिया। देवी ने फिर ऋषि के घर में कात्यायन पुत्री के रूप में जन्म लिया और तभी से देवी के उस अवतार को कात्यायनी देवी अवतार कहा जाता है। इसीलिए दिल्ली के इस मंदिर को कात्यायनी देवी का छतरपुर मंदिर कहा जाता है। यह मंदिर दिल्ली के दक्षिण पश्चिम के हिस्से में आता है और यह क़ुतुब मीनार से केवल 4 किमी की दुरी पर है। इस मंदिर की स्थापना बाबा संत नागपाल ने सन 1974 में की थी। उनकी मृत्यु 1998 में हो गयी।इस मंदिर परिसर में देवी कात्यायनी का मंदिर साल में दो बार नवरात्री के मौके पर ही खोला जाता है। क्यों की उस वक्त हजारों भक्त देवी के दर्शन हेतु यहाँ पर बड़ी दुर से आते है। यहाँ पर एक कमरे में चांदी से बनी हुई कुर्सी और टेबल है तो दुसरे कमरे में जिसे शयन कक्ष भी कहा जाता है, उसमे बिस्तर, ड्रेसिंग टेबल और चांदी से नक्काशी किये हुए टेबल दिखाई देते है।यह मंदिर जब कोई बड़ा सत्संग आयोजित किया है तभी खोला जाता है जैसे की कोई धार्मिक कार्यक्रम और भजन का आयोजन किया जाता है।इस मंदिर के प्रवेश द्वार पर ही एक पुराना पेड़ है और इस पेड़ पर पवित्र धागे बांधे जाते है। अपनी इच्छाओं को पूरा करने के लिए लोग इस पेड़ को धागे और चुडिया बांधते है। लोग इस विश्वास के साथ इस पेड़ को धागे बांधते है की उनकी हर व्यक्त की गयी इच्छा पूरी हो जाए। नवरात्री उत्सव के दौरान हजारों भक्त देवी के दर्शन करने के लिए आते रहते है। कम शब्दों में कहा जाए तो भारत की धार्मिक विरासत को दर्शाने वाला छतरपुर का मंदिर काफी महत्वपूर्ण मंदिर है। यहाँ के शिव मंदिर, राम मंदिर, माँ कात्यायनी मंदिर, माँ महिषासुरमर्दिनी मंदिर, माँ अष्टभुजी मंदिर, झर्पीर मंदिर, मार्कंडेय मंदिर, बाबा की समाधी, नागेश्वर मंदिर, त्रिशूल, 101 फीट की हनुमान मूर्ति भक्तों के विशेष आकर्षण का मुख्य केंद्र है। इन मंदिरों के अलावा भी यहाँ पर एक बहुत बड़ी ईमारत बनाई गयी है जिसमे हर दिन भंडारा का आयोजन किया जाता है। लगभग पुरे 24 घंटे यहाँ पर कुछ ना कुछ धार्मिक प्रार्थनाये की जाती है।नवरात्री, महाशिवरात्रि और जन्माष्टमी के दौरान तो मंदिर में हजारों भक्तों की भीड़ लगी रहती है। इस अवसर पर लाखों भक्त देवी के दर्शन के लिए आते है, जिसकी वजह से यहाँ का नजारा काफी देखनेलायक होता है। नवरात्री के दिनों में यहाँ पर लाखों लोगो को लंगर का प्रसाद बाटा जाता है, यह दृश्य देखनेवालो को अपनी आँखों पे विश्वास ही नहीं होता क्यों की यह दृश्य देखने में काफी सुन्दर होता है। वास्तुकला की दृष्टि से छतरपुर का मंदिर एक अद्भुत मंदिर है क्यों की इस मंदिर के पत्थर कविताये दर्शाते है। 2005 में दिल्ली में अक्षरधाम मंदिर बनने से पहले यह छतरपुर मंदिर भारत का सबसे बड़ा और दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मंदिर हुआ करता था।इस मंदिर को पूरी तरह से संगेमरमर से बनाया गया था और मंदिर के सभी जगहों पर जाली से काम करवाया गया था। इस तरह की वास्तुकला को वेसारा वास्तुकला कहा जाता है। बहुत बड़े जमीन पर फैले हुए इस मंदिर की सारी इमारते विभिन्न तरह के वस्तुओ से बनी है। इस मंदिर के परिसर में कई सारे सुन्दर बाग और लॉन बनाये गए है जिन्हें देखकर किसी भी भक्त के मन को शांति मिलती है। मंदिर में किये गए नक्काशी का काम सच में काफी प्रशंसनीय है। मंदिर के बड़े आकार की वजह से यहाँ का परिसर काफी अच्छा दीखता है। देवी कात्यायनी की मूर्ति एक बडेसे से भवन में स्थापित की गयी है और इस भवन में प्रार्थना के हॉल से भी प्रवेश किया जा सकता है। सोने के मुलामे से बने हुई देवी कात्यायनी की मूर्ति हमेशा भव्य कपडे, सोने और सुन्दर फूलो के हार से अलंकृत की जाती है। नवरात्रि के दिनों में तो यहाँ पर हजारों भक्तों की भीड़ लगी रहती है। इतनी बड़ी भक्तों की भीड़ को नियंत्रित करने के लिए उन्हें साप की कतार में खड़ा किया जाता है। इन लम्बी लम्बी कतारों को नियंत्रित करने के लिए बहुत सारे सुरक्षा रक्षक तैनात किये जाते है।
अक्षरधाम मंदिर का इतिहास || History of akshardham temple
अक्षरधाम या स्वामीनारायण अक्षरधाम मंदिर एक हिन्दू मंदिर है और भारत के नयी दिल्ली में स्थापित साहित्यिक-सांस्कृतिक स्थान है। यह मंदिर दिल्ली अक्षरधाम या स्वामीनारायण अक्षरधाम के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर में लाखो हिन्दू साहित्यों और संस्कृतियों और कलाकृतियों को मनमोहक अंदाज़ में दर्शाया गया है। दिल्ली में आने वाले 70% यात्रियों को अक्षरधाम मंदिर आकर्षित करता है। इस मंदिर को डॉ.ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने 6 नवम्बर 2005 को शासकीय रूप से खोला था। यह मंदिर यमुना के तट पर बना हुआ है और 2010 में खेले जाने वाले कामनवेल्थ गेम्स भी दिल्ली के इसी भाग में खेले गए थे। कॉम्प्लेक्स के बीच में बना यह मंदिर वास्तु शास्त्र और पंचरात्र शास्त्र के अनुसार बना हुआ है। इस कॉम्प्लेक्स में अभिषेक मंडप, सहज आनंद वाटर शो, थीम गार्डन और तीन प्रदर्शनी (Exhibition) सहजआनंद दर्शन, नीलकंठ दर्शन और संस्कृति दर्शन है। स्वामीनारायण में हिन्दुओ के अनुसार अक्षरधाम शब्द का अर्थ भगवान के घर से है और भगवान के भक्तो का ऐसा मानना है की अक्षरधाम भगवान का निवास स्थान हुआ करता था। स्वामीनारायण अक्षरधाम कॉम्प्लेक्स का मुख्य आकर्षण अक्षरधाम मंदिर है। यह 141 फूट (43 मी.) ऊँचा, 316 फूट (96 मी.) फैला और 356 फूट लंबा (109 मी.) है। यह जटिलतापूर्वक इसे फूलो, पशु, नर्तको, संगीतकारों और अनुयायियों से सजाया गया है। महर्षि वास्तु आर्किटेक्चर के अनुसार ही इसे डिजाईन किया गया है। इसे मुख्य रूप से राजस्थानी गुलाबी पत्थरो से और इतालियन कार्रारा मार्बल से बनाया गया। इसका निर्माण हिन्दू शिल्प शास्त्र के अनुसार ही किया गया है और साथ ही दुसरे इतिहासिक हिन्दू मंदिरों की तरह ही इसमें भी मेटल का उपयोग नही किया गया है। इसे बनाते समय स्टील और कोंक्रीट का उपयोग भी नही किया गया। इस मंदिर में 234 आभूषित किये हुए पिल्लर, 9 गुम्बद और 20000 साधुओ, अनुयायियों और आचार्यो की मूर्तियाँ है। मंदिर के निचले भाग में गजेन्द्र पीठ भी है और हाथी को श्रधांजलि देने वाला एक स्तम्भ भी है और हिन्दू साहित्य और संस्कृति में इसे बहुत महत्त्व दिया जाता है। इसमें 148 विशाल हाथी बनाये गए है जिनका वजन तक़रीबन 3000 टन होगा। मंदिर के बीच के गुम्बद के निचे 11 फूट (3.4 मी) ऊँची स्वामीनारायण भगवान की अभयमुद्रा में बैठी हुई मूर्ति है। स्वामीनारायण मंदिर जातिगत गुरुओ के विचारो की प्रतिमाओ से घिरा हुआ है। स्वामीनारायण में बनी हर एक मूर्ति हिन्दू परंपरा के अनुसार पञ्च धातु से बनी हुई है। इस मंदिर में सीता-राम, राधा-कृष्णा, शिव-पार्वती और लक्ष्मी-नारायण की मूर्तियाँ भी है।अक्षरधाम मंदिर के पीछे संस्था BAPS का हात है, जिसका अर्थ बोचासनवासी श्री अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था से है। इसके प्रमुख स्वामी महाराज ने मंदिर को बनाने में मुख्य भूमिका निभाई है। आज अक्षरधाम मंदिर दिल्ली शहर का मुख्य आकर्षण केंद्र बन चूका है और वर्तमान में अक्षरधाम मंदिर के बिना दिल्ली शहर की कल्पना करना मुश्किल ही नही नामुमकिन है। भारत में अक्षरधाम मंदिर जैसे बहोत से इतिहासिक मंदिर बने हुए है, आज यही मंदिर भारत के इतिहासिक और इतिहासिक कलाकृतियों की बयाँ करते है। हमें भारत के इन मंदिर पर हमेशा गर्व होना चाहिए की आज भी हम एक ऐसे देश में रहते है जहाँ के लोग सदियों पुरानी परम्पराओ को आज भी मानते है।
आरती कुंज बिहारी कि || Aarti kunj bihari Ki
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥ गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला । श्रवण में कुण्डल झलकाला, नंद के आनंद नंदलाला । गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली । लतन में ठाढ़े बनमाली | भ्रमर सी अलक | कस्तूरी तिलक | चंद्र सी झलक | ललित छवि श्यामा प्यारी की ॥ श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की… कनकमय मोर मुकुट बिलसै, देवता दरसन को तरसैं । गगन सों सुमन रासि बरसै; बजे मुरचंग | मधुर मिरदंग | ग्वालिन संग | अतुल रति गोप कुमारी की ॥ श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की… जहां ते प्रकट भई गंगा, कलुष कलि हारिणि श्रीगंगा । स्मरन ते होत मोह भंगा; बसी सिव सीस | जटा के बीच | हरै अघ कीच | चरन छवि श्रीबनवारी की ॥ श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की… चमकती उज्ज्वल तट रेनू, बज रही वृंदावन बेनू । चहुं दिसि गोपि ग्वाल धेनू; हंसत मृदु मंद | चांदनी चंद | कटत भव फंद | टेर सुन दीन भिखारी की ॥ श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की…
सूर्य नमस्कार मंत्र अर्थ सहित || Surya namaskar mantra with meaning
ॐ मित्राय नमः ( मित्र को प्रणाम ) ॐ मित्राय नमः मित्राय का मतलब मित्रता। सूर्य देव हम सब के सच्चे मित्र है और सहायक है। सच्चे मित्र का सम्बोधन मित्र कहके किया गया है | उनसे इस मंत्र का प्रयोग हम सूर्य देव से मित्रता का भाव प्रकट कर रहे हैं। उसी तरह हम इस बात का विश्वाश भी जगता है हमें सबके साथ मित्रता की भावना रखनी चाहिए। ॐ रवये नमः ( प्रकाशवान को प्रणाम ) “रवये“ का तात्पर्य है जो स्वयं प्रकाशवान है तथा सम्पूर्ण जीवधारियों को दिव्य आशीष प्रदान करता है। तृतीय स्थिति हस्तउत्तानासन में इन्हीें दिव्य आशीषों को ग्रहण करने के उद्देश्य से शरीर को प्रकाश के स्त्रोत की ओर ताना जाता है ॐ सूर्याय नमः ( क्रियाओं के प्रेरक को प्रणाम ) यहाँ सूर्य को ईश्वर के रूप में अत्यन्त सक्रिय माना गया है। प्राचीन वैदिक ग्रंथों में सात घोड़ों के जुते रथ पर सवार होकर सूर्य के आकाश गमन की कल्पना की गई है। ये सात घोड़े परम चेतना से निकलने वाल सप्त किरणों के प्रतीक है। जिनका प्रकटीकरण चेतना के सात स्तरों में होता है – भू (भौतिक), – भुवः (मध्यवर्ती, सूक्ष्म ( नक्षत्रीय), स्वः ( सूक्ष्म, आकाशीय), मः ( देव आवास), जनः (उन दिव्य आत्माओं का आवास जो अहं से मुक्त है), तपः (आत्मज्ञान, प्राप्त सिद्धों का आवास) और सप्तम् (परम सत्य)। सूर्य स्वयं सर्वोच्च चेतना का प्रतीक है तथा चेतना के सभी सात स्वरों को नियंत्रित करता है। देवताओं में सूर्य का स्थान महत्वपूर्ण है। वेदों में वर्णित सूर्य देवता का आवास आकाश में है उसका प्रतिनिधित्त्व करने वाली अग्नि का आवास भूमि पर है। ॐ भानवे नमः ( प्रदीप्त होने वाले को प्रणाम ) सूर्य भौतिक स्तर पर गुरू का प्रतीक है। इसका सूक्ष्म तात्पर्य है कि गुरू हमारी भ्रांतियों के अंधकार को दूर करता है – उसी प्रकार जैसे प्रातः वेला में रात्रि का अंधकार दूर हो जाता है। अश्व संचालनासन की स्थिति में हम उस प्रकाश की ओर मुँह करके अपने अज्ञान रूपी अंधकार की समाप्ति हेतु प्रार्थना करते हैं। ॐ खगाय नमः ( आकाशगामी को प्रणाम ) समय का ज्ञान प्राप्त करने हेतु प्राचीन काल से सूर्य यंत्रों (डायलों ) के प्रयोग से लेकर वर्तमान कालीन जटिल यंत्रों के प्रयोग तक के लंबे काल में समय का ज्ञान प्राप्त करने के लिए आकाश में सूर्य की गति को ही आधार माना गया है। हम इस शक्ति के प्रति सम्मान प्रकट करते हैं जो समय का ज्ञान प्रदान करती है तथा उससे जीवन को उन्नत बनाने की प्रार्थना करते हैं। ॐ पूष्णे नमः ( पोषक को प्रणाम ) सूर्य सभी शक्तियों का स्त्रोत है। एक पिता की भाँति वह हमें शक्ति, प्रकाश तथा जीवन देकर हमारा पोषण करता है। साष्टांग नमस्कार की स्थिति में हमे शरीर के सभी आठ केन्द्रों को भूमि से स्पर्श करते हुए उस पालनहार को अष्टांग प्रणाम करते हैं। तत्त्वतः हम उसे अपने सम्पूर्ण अस्तित्व को समर्पित करते है तथा आशा करते हैं कि वह हमें शारीरिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करें। ॐ हिरण्यगर्भाय नमः ( स्वर्णिम् विश्वात्मा को प्रणाम ) हिरण्यगर्भ, स्वर्ण के अण्डे के समान सूर्य की तरह देदीप्यमान, ऐसी संरचना है जिससे सृष्टिकर्ता ब्रह्म की उत्पत्ति हुई है। हिरण्यगर्भ प्रत्येक कार्य का परम कारण है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड, प्रकटीकरण के पूर्व अन्तर्निहित अवस्था में हिरण्यगर्भ के अन्दर निहित रहता है। इसी प्रकार समस्त जीवन सूर्य (जो महत् विश्व सिद्धांत का प्रतिनिधित्व करता है ) में अन्तर्निहित है। भुजंगासन में हम सूर्य के प्रति सम्मान प्रकट करते है तथा यह प्रार्थना करते है कि हममें रचनात्मकता का उदय हो। ॐ मरीचये नमः ( सूर्य रश्मियों को प्रणाम ) मरीच ब्रह्मपुत्रों में से एक है। परन्तु इसका अर्थ मृग मरीचिका भी होता है। हम जीवन भर सत्य की खोज में उसी प्रकार भटकते रहते हैं | जिस प्रकार एक प्यासा व्यक्ति मरूस्थल में ( सूर्य रश्मियों से निर्मित ) मरीचिकाओं के जाल में फँसकर जल के लिए मूर्ख की भाँति इधर-उधर दौड़ता रहता है। पर्वतासन की स्थिति में हम सच्चे ज्ञान तथा विवके को प्राप्त करने के लिए नतमस्तक होकर प्रार्थना करते हैं जिससे हम सत् अथवा असत् के अन्तर को समझ सकें। ॐ आदित्याय नमः ( अदिति-सुत को प्रणाम) विश्व जननी ( महाशक्ति ) के अनन्त नामों में एक नाम अदिति भी है। वहीं समस्त देवों की जननी, अनन्त तथा सीमारहित है। वह आदि रचनात्मक शक्ति है जिससे सभी शक्तियाँ निःसृत हुई हैं। अश्व संचलानासन में हम उस अनन्त विश्व-जननी को प्रणाम करते हैं। ॐ सवित्रे नमः ( सूर्य की उद्दीपन शक्ति को प्रणाम ) सवित्र उद्दीपक अथवा जागृत करने वाला देव है। इसका संबंध सूर्य देव से स्थापित किया जाता है। सवित्री उगते सूर्य का प्रतिनिधि है जो मनुष्य को जागृत करता है और क्रियाशील बनाता है। “सूर्य“ पूर्ण रूप से उदित सूरज का प्रतिनिधित्त्व करता है। जिसके प्रकाश में सारे कार्यकलाप होते है। सूर्य नमस्कार की हस्तपादासन स्थिति में सूर्य की जीवनदायनी शक्ति की प्राप्ति हेतु सवित्र को प्रणाम किया जाता है। ॐ अर्काय नमः ( प्रशंसनीय को प्रणाम ) अर्क का तात्पर्य है – उर्जा । सूर्य विश्व की शक्तियों का प्रमुख स्त्रोत है। हस्तउत्तानासन में हम जीवन तथा उर्जा के इस स्त्रोत के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करते है। ॐ भास्कराय नमः ( आत्मज्ञान-प्रेरक को प्रणाम ) सूर्य नमस्कार की अंतिम स्थिति प्रणामासन (नमस्कारासन) में अनुभवातीत तथा आघ्यात्मिक सत्यों के महान प्रकाशक के रूप में सूर्य को अपनी श्रद्वा समर्पित की जाती है। सूर्य हमारे चरम लक्ष्य-जीवनमुक्ति के मार्ग को प्रकाशित करता है। प्रणामासन में हम यह प्रार्थना करते हैं कि वह हमें यह मार्ग दिखायें। इस प्रकार सूर्य नमस्कार पद्धति में बारह मंत्रों का अर्थ सहित भावों का समावेश किया जा रहा है।
अम्बे माँ की आरती || Ambe maa ki aarti
जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी, तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी। मांग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को, उज्ज्वल से दोउ नैना, चंद्रवदन नीको॥ ॥ॐ जय अम्बे गौरी…॥ कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै, रक्तपुष्प गल माला, कंठन पर साजै॥ ॥ॐ जय अम्बे गौरी…॥ केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी, सुर-नर-मुनिजन सेवत, तिनके दुखहारी॥ ॥ॐ जय अम्बे गौरी…॥ कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती, कोटिक चंद्र दिवाकर, सम राजत ज्योती॥ ॥ॐ जय अम्बे गौरी…॥ शुंभ-निशुंभ बिदारे, महिषासुर घाती, धूम्र विलोचन नैना, निशदिन मदमाती॥ ॥ॐ जय अम्बे गौरी…॥ चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे, मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे॥ ॥ॐ जय अम्बे गौरी…॥ ब्रह्माणी, रूद्राणी, तुम कमला रानी, आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी॥ ॥ॐ जय अम्बे गौरी…॥ चौंसठ योगिनी मंगल गावत, नृत्य करत भैरों, बाजत ताल मृदंगा, अरू बाजत डमरू॥ ॥ॐ जय अम्बे गौरी…॥ तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता, भक्तन की दुख हरता, सुख संपति करता॥ ॥ॐ जय अम्बे गौरी…॥ भुजा चार अति शोभित, खडग खप्पर धारी, मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी॥ ॥ॐ जय अम्बे गौरी…॥ कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती, श्रीमालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योती॥ ॥ॐ जय अम्बे गौरी…॥ श्री अंबेजी की आरति, जो कोइ नर गावे, कहत शिवानंद स्वामी, सुख-संपति पावे॥ ॥ॐ जय अम्बे गौरी…॥ जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी, तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी।
हनुमान चालीसा || Hanuman chalisa in hindi
दोहा श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि । बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि ॥ बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन कुमार बल बुधि विद्या देहु मोहि, हरहु कलेश विकार चौपाई जय हनुमान ज्ञान गुन सागर जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥१॥ राम दूत अतुलित बल धामा अंजनि पुत्र पवनसुत नामा॥२॥ महाबीर बिक्रम बजरंगी कुमति निवार सुमति के संगी॥३॥ कंचन बरन बिराज सुबेसा कानन कुंडल कुँचित केसा॥४॥ हाथ बज्र अरु ध्वजा बिराजे काँधे मूँज जनेऊ साजे॥५॥ शंकर सुवन केसरी नंदन तेज प्रताप महा जगवंदन॥६॥ विद्यावान गुनी अति चातुर राम काज करिबे को आतुर॥७॥ प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया राम लखन सीता मनबसिया॥८॥ सूक्ष्म रूप धरि सियहि दिखावा विकट रूप धरि लंक जरावा॥९॥ भीम रूप धरि असुर सँहारे रामचंद्र के काज सवाँरे॥१०॥ लाय सजीवन लखन जियाए श्री रघुबीर हरषि उर लाए॥११॥ रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई तुम मम प्रिय भरत-हि सम भाई॥१२॥ सहस बदन तुम्हरो जस गावै अस कहि श्रीपति कंठ लगावै॥१३॥ सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा नारद सारद सहित अहीसा॥१४॥ जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते कवि कोविद कहि सके कहाँ ते॥१५॥ तुम उपकार सुग्रीवहि कीन्हा राम मिलाय राज पद दीन्हा॥१६॥ तुम्हरो मंत्र बिभीषण माना लंकेश्वर भये सब जग जाना॥१७॥ जुग सहस्त्र जोजन पर भानू लिल्यो ताहि मधुर फ़ल जानू॥१८॥ प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माही जलधि लाँघि गए अचरज नाही॥१९॥ दुर्गम काज जगत के जेते सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥२०॥ राम दुआरे तुम रखवारे होत ना आज्ञा बिनु पैसारे॥२१॥ सब सुख लहैं तुम्हारी सरना तुम रक्षक काहु को डरना॥२२॥ आपन तेज सम्हारो आपै तीनों लोक हाँक तै कापै॥२३॥ भूत पिशाच निकट नहि आवै महावीर जब नाम सुनावै॥२४॥ नासै रोग हरे सब पीरा जपत निरंतर हनुमत बीरा॥२५॥ संकट तै हनुमान छुडावै मन क्रम वचन ध्यान जो लावै॥२६॥ सब पर राम तपस्वी राजा तिनके काज सकल तुम साजा॥२७॥ और मनोरथ जो कोई लावै सोई अमित जीवन फल पावै॥२८॥ चारों जुग परताप तुम्हारा है परसिद्ध जगत उजियारा॥२९॥ साधु संत के तुम रखवारे असुर निकंदन राम दुलारे॥३०॥ अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता अस बर दीन जानकी माता॥३१॥ राम रसायन तुम्हरे पासा सदा रहो रघुपति के दासा॥३२॥ तुम्हरे भजन राम को पावै जनम जनम के दुख बिसरावै॥३३॥ अंतकाल रघुवरपुर जाई जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई॥३४॥ और देवता चित्त ना धरई हनुमत सेई सर्व सुख करई॥३५॥ संकट कटै मिटै सब पीरा जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥३६॥ जै जै जै हनुमान गुसाईँ कृपा करहु गुरु देव की नाई॥३७॥ जो सत बार पाठ कर कोई छूटहि बंदि महा सुख होई॥३८॥ जो यह पढ़े हनुमान चालीसा होय सिद्ध साखी गौरीसा॥३९॥ तुलसीदास सदा हरि चेरा कीजै नाथ हृदय मह डेरा॥४०॥ दोहा पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप। राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥
हनुमान जी की आरती || Hanumaan Ji Ki Aarti
आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की॥ जाके बल से गिरिवर कांपे। रोग दोष जाके निकट न झांके॥ अंजनि पुत्र महा बलदाई। सन्तन के प्रभु सदा सहाई॥ आरती कीजै हनुमान लला की। दे बीरा रघुनाथ पठाए। लंका जारि सिया सुधि लाए॥ लंका सो कोट समुद्र-सी खाई। जात पवनसुत बार न लाई॥ आरती कीजै हनुमान लला की। लंका जारि असुर संहारे। सियारामजी के काज सवारे॥ लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे। आनि संजीवन प्राण उबारे॥ आरती कीजै हनुमान लला की। पैठि पाताल तोरि जम-कारे। अहिरावण की भुजा उखारे॥ बाएं भुजा असुरदल मारे। दाहिने भुजा संतजन तारे॥ आरती कीजै हनुमान लला की। सुर नर मुनि आरती उतारें। जय जय जय हनुमान उचारें॥ कंचन थार कपूर लौ छाई। आरती करत अंजना माई॥ आरती कीजै हनुमान लला की। जो हनुमानजी की आरती गावे। बसि बैकुण्ठ परम पद पावे॥ आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की॥ जय श्रीराम, जय हनुमान, जय हनुमान। Hanumaan Ji Ki Aarti
श्री विष्णु चालीसा और आरती
श्री विष्णु चालीसा ॥ दोहा॥ विष्णु सुनिए विनय। सेवक की चितलाय॥कीरत कुछ वर्णन करूं। दीजै ज्ञान बताय ॥ ॥ चौपाई ॥ नमो विष्णु भगवान खरारी। कष्ट नशावन अखिल बिहारी॥प्रबल जगत में शक्ति तुम्हारी। त्रिभुवन फैल रही उजियारी ॥सुन्दर रूप मनोहर सूरत। सरल स्वभाव मोहनी मूरत॥तन पर पीताम्बर अति सोहत। बैजन्ती माला मन मोहत ॥ शंख चक्र कर गदा विराजे। देखत दैत्य असुर दल भाजे॥सत्य धर्म मद लोभ न गाजे। काम क्रोध मद लोभ न छाजे ॥सन्तभक्त सज्जन मनरंजन। दनुज असुर दुष्टन दल गंजन॥सुख उपजाय कष्ट सब भंजन। दोष मिटाय करत जन सज्जन ॥ पाप काट भव सिन्धु उतारण। कष्ट नाशकर भक्त उबारण॥करत अनेक रूप प्रभु धारण। केवल आप भक्ति के कारण ॥धरणि धेनु बन तुमहिं पुकारा। तब तुम रूप राम का धारा ॥भार उतार असुर दल मारा। रावण आदिक को संहारा ॥ आप वाराह रूप बनाया। हिरण्याक्ष को मार गिराया॥धर मत्स्य तन सिन्धु बनाया। चौदह रतनन को निकलाया ॥अमिलख असुरन द्वन्द मचाया। रूप मोहनी आप दिखाया॥देवन को अमृत पान कराया। असुरन को छवि से बहलाया ॥ कूर्म रूप धर सिन्धु मझाया। मन्द्राचल गिरि तुरत उठाया॥शंकर का तुम फन्द छुड़ाया। भस्मासुर को रूप दिखाया ॥वेदन को जब असुर डुबाया। कर प्रबन्ध उन्हें ढुढवाया॥मोहित बनकर खलहि नचाया। उसही कर से भस्म कराया ॥ असुर जलन्धर अति बलदाई। शंकर से उन कीन्ह लड़ाई ॥हार पार शिव सकल बनाई। कीन सती से छल खल जाई ॥सुमिरन कीन तुम्हें शिवरानी। बतलाई सब विपत कहानी ॥तब तुम बने मुनीश्वर ज्ञानी। वृन्दा की सब सुरति भुलानी ॥ देखत तीन दनुज शैतानी। वृन्दा आय तुम्हें लपटानी॥हो स्पर्श धर्म क्षति मानी। हना असुर उर शिव शैतानी ॥तुमने ध्रुव प्रहलाद उबारे। हिरणाकुश आदिक खल मारे ॥गणिका और अजामिल तारे। बहुत भक्त भव सिन्धु उतारे ॥ हरहु सकल संताप हमारे। कृपा करहु हरि सिरजन हारे॥देखहुं मैं निज दरश तुम्हारे। दीन बन्धु भक्तन हितकारे ॥चाहता आपका सेवक दर्शन। करहु दया अपनी मधुसूदन॥जानूं नहीं योग्य जब पूजन। होय यज्ञ स्तुति अनुमोदन ॥ शीलदया सन्तोष सुलक्षण। विदित नहीं व्रतबोध विलक्षण॥करहुं आपका किस विधि पूजन। कुमति विलोक होत दुख भीषण ॥करहुं प्रणाम कौन विधिसुमिरण। कौन भांति मैं करहु समर्पण॥सुर मुनि करत सदा सेवकाई। हर्षित रहत परम गति पाई ॥ दीन दुखिन पर सदा सहाई। निज जन जान लेव अपनाई॥पाप दोष संताप नशाओ। भव बन्धन से मुक्त कराओ ॥सुत सम्पति दे सुख उपजाओ। निज चरनन का दास बनाओ॥निगम सदा ये विनय सुनावै। पढ़ै सुनै सो जन सुख पावै ॥ आरती ॐ जय जगदीश हरे। स्वामी जय जगदीश हरे॥ भक्त जनों के संकट। क्षण में दूर करे ॥॥ ॐ जय जगदीश हरे। स्वामी जय जगदीश…..॥जो ध्यावे फल पावे। दुख विनसे मन का॥ सुख सम्पति घर आवे। कष्ट मिटे तन का॥॥ ॐ जय जगदीश हरे। स्वामी जय जगदीश…..॥मात पिता तुम मेरे। शरण गहूं मैं किसकी॥ तुम बिन और न दूजा। आस करूं मैं जिसकी॥॥ ॐ जय जगदीश हरे। स्वामी जय जगदीश…..॥ तुम पूरण परमात्मा। स्वामी तुम अंतर्यामी॥ पारब्रह्म परमेश्वर। तुम सब के स्वामी ॥॥ ॐ जय जगदीश हरे। स्वामी जय जगदीश…..॥तुम करुणा के सागर। तुम पालन कर्ता॥ मैं मूरख खल कामी। कृपा करो भर्ता॥॥ ॐ जय जगदीश हरे। स्वामी जय जगदीश…..॥तुम हो एक अगोचर। सबके प्राणपति॥ किस विधि मिलूं दयामय। तुमको मैं कुमति ॥॥ ॐ जय जगदीश हरे। स्वामी जय जगदीश…..॥ दीनबंधु दुखहर्ता। ठाकुर तुम मेरे॥ अपने हाथ उठाओ। द्वार पड़ा मैं तेरे ॥॥ ॐ जय जगदीश हरे। स्वामी जय जगदीश…..॥विषय विकार मिटाओ। पाप हरो देवा॥ श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ। संतन की सेवा ॥॥ ॐ जय जगदीश हरे। स्वामी जय जगदीश…..॥श्री जगदीशजी की आरती। जो कोई नर गावे॥ कहत शिवानन्द स्वामी। सुख संपत्ति पावे॥॥ ॐ जय जगदीश हरे। स्वामी जय जगदीश…..॥
शिव चालीसा और आरती
शिव चालीसा श्री गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान। कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥ जय गिरिजा पति दीन दयाला। सदा करत संतन प्रतिपाला॥ भाल चंद्रमा सोहत नीके। कानन कुण्डल नागफनी के॥ अंग गौर शिर गंग बहाए। मुण्डमाल तन छार लगाए॥ वस्त्र खाल बाघंबर सोहे। छवि को देख नाग मुनि मोहे॥ मैना मातु की ह्वै दुलारी। बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥ कर त्रिशूल सोहत छवि भारी। करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥ नन्दि गणेश सोहै तहं कैसे। सागर मध्य कमल हैं जैसे॥ कार्तिक श्याम और गणराऊ। या छवि को कहि जात न काऊ॥ देवन जबहीं जाय पुकारा। तब ही दुख प्रभु आप निवारा॥ किया उपद्रव तारक भारी। देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥ तुरत षडानन आप पठायउ। लवनिमेष महं मारि गिरायउ॥ आप जलंधर असुर संहारा। सुयश तुम्हार विदित संसारा॥ त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई। सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥ किया तपहिं भागीरथ भारी। पुरब प्रतिज्ञा तसु पुरारी॥ दानिन महं तुम सम कोउ नाहीं। सेवक स्तुति करत सदाहीं॥ वेद नाम महिमा तव गाई। अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥ प्रगट उदधि मंथन में ज्वाला। जरे सुरासुर भये विहाला॥ कीन्ह दया तहँ करी सहाई। नीलकण्ठ तब नाम कहाई॥ पूजन रामचंद्र जब कीन्हा। जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥ सहस कमल में हो रहे धारी। कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥ देवन जबहीं जाय पुकारा। तब ही दुख प्रभु आप निवारा॥ किया उपद्रव तारक भारी। देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥ तुरत षडानन आप पठायउ। लवनिमेष महं मारि गिरायउ॥ आप जलंधर असुर संहारा। सुयश तुम्हार विदित संसारा॥ त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई। सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥ किया तपहिं भागीरथ भारी। पुरब प्रतिज्ञा तसु पुरारी॥ एक कमल प्रभु राखेउ जोई। कमल नयन पूजन चहं सोई॥ कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर। भये प्रसन्न दिए इच्छित वर॥ जय जय जय अनंत अविनाशी। करत कृपा सब के घटवासी॥ दुष्ट सकल नित मोहि सतावै । भ्रमत रहे मोहि चैन न आवै॥ त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो। यहि अवसर मोहि आन उबारो॥ लै त्रिशूल शत्रुन को मारो। संकट से मोहि आन उबारो॥ मातु पिता भ्राता सब कोई। संकट में पूछत नहिं कोई॥ स्वामी एक है आस तुम्हारी। आय हरहु अब संकट भारी॥ धन निर्धन को देत सदाहीं। जो कोई जांचे वो फल पाहीं॥ अस्तुति केहि विधि करौं तुम्हारी। क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥ शंकर हो संकट के नाशन। मंगल कारण विघ्न विनाशन॥ योगी यति मुनि ध्यान लगावैं। नारद शारद शीश नवावैं॥ नमो नमो जय नमो शिवाय। सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥ जो यह पाठ करे मन लाई। ता पार होत है शम्भु सहाई॥ ॠनिया जो कोई हो अधिकारी। पाठ करे सो पावन हारी॥ पुत्र हीन कर इच्छा कोई। निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥ पण्डित त्रयोदशी को लावे। ध्यान पूर्वक होम करावे ॥ त्रयोदशी ब्रत करे हमेशा। तन नहीं ताके रहे कलेशा॥ धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे। शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥ जन्म जन्म के पाप नसावे। अन्तवास शिवपुर में पावे॥ कहे अयोध्या आस तुम्हारी। जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥ ॥दोहा॥ नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करौं चालीसा। तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश॥ मगसर छठि हेमन्त ॠतु, संवत चौसठ जान। अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण॥ शिव आरती जय शिव ओंकारा ॐ जय शिव ओंकारा । ब्रह्मा विष्णु सदा शिव अर्द्धांगी धारा ॥ ॐ जय शिव…॥ एकानन चतुरानन पंचानन राजे । हंसानन गरुड़ासन वृषवाहन साजे ॥ ॐ जय शिव…॥ दो भुज चार चतुर्भुज दस भुज अति सोहे। त्रिगुण रूपनिरखता त्रिभुवन जन मोहे ॥ ॐ जय शिव…॥ अक्षमाला बनमाला रुण्डमाला धारी । चंदन मृगमद सोहै भाले शशिधारी ॥ ॐ जय शिव…॥ श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे । सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे ॥ ॐ जय शिव…॥ कर के मध्य कमंडलु चक्र त्रिशूल धर्ता । जगकर्ता जगभर्ता जगसंहारकर्ता ॥ ॐ जय शिव…॥ ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका । प्रणवाक्षर मध्ये ये तीनों एका ॥ ॐ जय शिव…॥ काशी में विश्वनाथ विराजत नन्दी ब्रह्मचारी । नित उठि भोग लगावत महिमा अति भारी ॥ ॐ जय शिव…॥ त्रिगुण शिवजीकी आरती जो कोई नर गावे । कहत शिवानन्द स्वामी मनवांछित फल पावे ॥ ॐ जय शिव…॥