शाहजहां, अकबर के पोते ने 1656 में प्रचलित छद्म-इटालियन शैली को अस्वीकृत कर दिया। विशाल मस्जिद, जिसे मस्जिद-ए-जहांनुमा के रूप में भी जाना जाता है, (जिसका मतलब है दुनिया का दर्शन)। मुगल वास्तुशिल्प कौशल को दर्शाते हुए यह अपनी दो मीनारों और तीन विशाल गुंबदों के साथ मजबूती से यह दिल्ली में लाल किले के सामने खड़ा है। 25,000 लोग यहाँ के आंगन में अच्छी तरह से 76 x 66 मीटर के आयाम में खड़े हो सकते हैं और अपनी नमाज़ अदा कर सकते है|इसे व्यापक हिंदू और मुस्लिम वास्तुकला तकनीक से तैयार किया गया है विभिन्न ऊँचाइयों के लगभग 15 गुंबदों को बनाए रखने के लिये 260 स्तंभों का प्रयोग किया गया है जो मस्जिद की भव्यता को बढ़ाते है। मस्जिद के दरवाजे क्रमशः 35,39,33 पूर्वी, उत्तरी, दक्षिणी ओर है। दक्षिणी छोर में एक मदरसा था, लेकिन 1857 के विद्रोह में इसे नष्ट कर दिया। पूरे मस्जिद 261 फीट x 90 फीट है, इसके आँगन में एक प्रार्थना स्थल है और मस्जिद का फर्श सफेद और काले पत्थरों के वैकल्पिक पट्टियों से बना है। मुस्लिमों के लिये प्रार्थना स्थल को कालीन से सजावट किया है। 2006 के ब्लास्ट से जामा मस्जिद के भीतर मुसलमानों के मन में जबरदस्त डर पैदा कर दिया। यह शुक्रवार का दिन था, यह एक ऐसा दिन जिसमें अल्लाह ने मस्जिद को बचाया लिया और यह दिल्ली शहर के लोगों के दिलों में सुंदर रूप से आज भी खड़ा है।
हाजी अली दरगाह का इतिहास || History of haji ali dargah
शहर के मध्य में स्थित ये पवित्र दरगाह मुंबई की मान्यता प्राप्त सरहद है। सुन्नी समूह के बरेलवी संप्रदाय द्वारा इस मंदिर की देखरेख की जाती है। यहां हर धर्म के लोग आकर अपनी मनोकामना का धागा बांधकर जाते हैं। उन्हें यह उम्मीद होती है कि यहां मांगी गई मुराद जरूर पूरी होती है। यह दरगाह वर्ली की खाड़ी से 500 गज की दूरी पर समुद्र में एक छोटे द्वीप पर स्थित है। यह शहर की सीमा महालक्ष्मी से एक संकरे सेतुमार्ग द्वारा जुड़ा है। इस पुल में कोई रेलिंग नहीं है किंतु ज्वार के आने पर रस्सी बांध दी जाती है। इसलिए दरगाह तक तभी जाया जा सकता है जबकि समुद्र का जलस्तर कम हो। यह 500 गज की यात्रा जिसके दोनों तरफ समुद्र हो यहां की यात्रा की मुख्य आकर्षण है। हाजी अली की दरगाह की स्थापना 1631 ई में की गयी थी । इसका निर्माण हाजी उसमान रनजीकर, जो तीर्थयात्रियों को मक्का ले जाने वाले जहाज के मालिक थे, ने कराया था। समुद्री नमकीन हवाओं के कारण इस इमारत को काफी नुकसान हुआ है। सन 1960 में आखिरी बार दरगाह का सुधार कार्य हुआ था। सुन्नी समुदाय के लोग इस मजार की देख-रेख करते हैं। ऐसा माना जाता है कि हाजी अली शाह बुखारी के निधन के पश्चात उनकी बहन ने उनके अधूरे स्वप्न को पूरा करने का बीड़ा उठा लिया था। वह भी इस्लाम के प्रसार-प्रचार में लीन हो गई थीं। वर्ली की खाड़ी से कुछ दूरी पर उनका मकबरा भी स्थित है। हाजी अली की यह दरगाह 4500 वर्ग मीटर तक फैली हुई है, जिसमें 85 फीट ऊंचा मीनार स्थित है। दरगाह के मुख्य भाग तक पहुंचने से पहले काफी लंबा मार्ग तय करना होता है। दरगाह के भीतर हाजी अली शाह बुखारी का मकबरा लाल और हरे रंग की चादर से ढका रहता है। यह दरगाह करीब 400 साल पुरानी है, जिसकी कई बार मरम्मत की जा चुकी है। मुख्य परिसर में पहुंचने पर आपको रंगीन कांच की नक्काशी से लैस स्तंभ नजर आएंगे, जिन पर अल्लाह के 99 नाम लिखे हुए हैं। इसके अलावा इस दरगाह के चारों ओर चांदी के खंबों का दायरा बना हुआ है, जो बेहद खूबसूरत हैं। अन्य दरगाहों की तरह यहां भी महिलाओं और पुरुषों के प्रार्थना करने के लिए अलग-अलग स्थान हैं। कुल-मिलाकर यह कहा जा सकता है कि हाजी अली शाह बुखारी की दरगाह मुस्लिम नक्काशी और कलाकारी का एक आकर्षक नमूना है। दरगाह तक पहुंचने के लिए जिस मार्ग को तय करना होता है वह दुकानों से भरा है, जहां आपको दरगाह पर चढ़ाने वाली चादर से लेकर फूल और अन्य सभी समान उपलब्ध हो जाएंगे। प्रत्येक आगंतुक मस्जिद में प्रवेश से पहले अपने जूते निकालते हैं।सप्ताह के प्रत्येक शुक्रवार को हाजी अली की दरगाह पर सूफी संगीत और कव्वाली की महफिल सजती है। आंकड़ों के अनुसार बृहस्पतिवार और शुक्रवार को यहां धर्मों के बंधन से मुक्त करीब 50 हजार से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं, जिनमें देश-विदेश से आए पर्यटक भी शामिल हैं।
खुल जायेंगी किताबे || Khul jaayengi kitabe bhajan lyrics
खुल जायेंगी किताबे जब भी हिसाब होगा इंसाफ का तराजू येशु के हाथ होगा…….. 2 खुल जायेंगी किताबे जो भी तू कर रहा है येशु वो देखता है……. 2 हर पल का तुझको इंसा…… 2 देना हिसाब होगा इंसाफ का तराजू येशु के हाथ होगा खुल जायेंगी किताबे जब भी हिसाब होगा इंसाफ का तराजू येशु के हाथ होगा आजा अभी भी मुड़कर येशु भुला रहा ही……. 2 वरना ये याद करले……. 2 तेरा ही नाश होगा इंसाफ का तराजू येशु के हाथ होगा खुल जायेंगी किताबे जब भी हिसाब होगा इंसाफ का तराजू येशु के हाथ होगा…….. 2 खुल जायेंगी किताबे
अच्चुतम केशवम् || Achchutam keshavam bhajan lyrics
अच्चुतम केशवं कृष्ण दामोदरं, राम नारायणं जानकी बल्लभम । कौन कहता हे भगवान आते नहीं, तुम मीरा के जैसे बुलाते नहीं । अच्चुतम केशवं कृष्ण दामोदरं, राम नारायणं जानकी बल्लभम । कौन कहता है भगवान खाते नहीं, बेर शबरी के जैसे खिलाते नहीं । अच्चुतम केशवं कृष्ण दामोदरं, राम नारायणं जानकी बल्लभम । कौन कहता है भगवान सोते नहीं, माँ यशोदा के जैसे सुलाते नहीं । अच्चुतम केशवं कृष्ण दामोदरं, राम नारायणं जानकी बल्लभम । कौन कहता है भगवान नाचते नहीं, गोपियों की तरह तुम नचाते नहीं । अच्चुतम केशवं कृष्ण दामोदरं, राम नारायणं जानकी बल्लभम । नाम जपते चलो काम करते चलो, हर समय कृष्ण का ध्यान करते चलो । अच्चुतम केशवं कृष्ण दामोदरं, राम नारायणं जानकी बल्लभम । याद आएगी उनको कभी ना कभी, कृष्ण दर्शन तो देंगे कभी ना कभी । अच्चुतम केशवं कृष्ण दामोदरं, राम नारायणं जानकी बल्लभम ।
रहम नज़र साईं भजन || Raham nazar sai bhajan lyrics
ना मांगू दुआ, ना चाहूँ मेहर, ना मांगू दुआ, ना चाहूँ मेहर, बस तेरा करम हो शामों शहर। ना मांगू दुआ, ना चाहूँ मेहर बस तेरा करम हो शामों शहर। राही को दिखाए राह गुजर, बस एक नज़र तेरी एक नज़र। रहम नज़र साई रहम नज़र रहम नज़र साई रहम नज़र रहम नज़र साई रहम नज़र बाँधी तूने सर पर कफनी, बाँधी तूने सर पर कफनी, तन पर पहना है झोला, कोई फ़क़ीर है मस्त ये मौला, या बैरागी भोला। कहाँ से आये जाये किधर, कहाँ से आये जाये किधर, ये तो है अमन की एक लहर। राही को दिखाए राह गुजर, बस एक नज़र तेरी एक नज़र। रहम नज़र साई रहम नज़र रहम नज़र साई रहम नज़र रहम नज़र साई रहम नज़र बन्दे हैं हम सारे उसके, बन्दे हैं हम सारे उसके, सबका मालिक एक, श्रद्धा और सबुरी रखकर काम किये जा नेक। कोई भी राह, कोई भी सफर, कोई भी राह, कोई भी सफर, उस तक पहुंचे हर एक डगर। राही को दिखाए राह गुजर, बस एक नज़र तेरी एक नज़र। रहम नज़र साईं रहम नज़र, रहम नज़र साईं रहम नज़र, रहम नज़र साईं रहम नज़र।
संभाल प्रभु जी के बोल हिंदी में || Lyrics of sambhal prabhu ji
संभाल प्रभु जी जीवन के हर पल में अभी तक हमको संभाला तूने आगे भी अगुवाई कर जैसा मुर्गी बच्चों को पंखो तले छिपाती – 2 वैसे ही तेरी छाया बना है शरणस्थान संभाल… सनातन के यहोवा तू ही हमारा बल है – 2 तेरे वचन से हमारे जीवन में ज्योति आई संभाल … वायदा ये तूने किया छोड़े न कभी मुझे – 2 खींचा है रूप मेरा हथेली पर अपनी, संभाल… संभाल … है यीशु तेरा ये प्यार वर्णन से है ये अपार – 2 हाथों से हाथ मिलाया आसमानी बाप से हमारा संभाल…
जय देने वाले, प्रभु येशु || Jay dene vale prabhu yeshu
जय देने वाले, प्रभु यीशु को कोटि कोटि धन्यवाद जीवन देने वाले प्रभु यीशु को जीवन भर धन्यवाद हल्लेलुयाह, हल्लेलुयाह गायेंगे आत्मा से भर कर गायेंगे -2. यीशु ज़िदा है वो आने वाला है -2. शांति देने वाले प्रभु यीशु को कोटि कोटि धन्यवाद मुक्ति देने वाले प्रभु यीशु को जीवन भर धन्यवाद चंगा करने वाले प्रभु यीशु को कोटि कोटि धन्यवाद आनंद देने वाले प्रभु यीशु को जीवन भर धन्यवाद जीवन देने वाले प्रभु यीशु को कोटि कोटि धन्यवाद तृप्ति देने वाले प्रभु यीशु को जीवन भर धन्यवाद
मुक्ति दिलाये येशु नाम || Mukti dilaye yeshu naam
मुक्ति दिलाये येशु नाम, शांति दिलाये येशु नाम मुक्ति दिलाये येशु नाम, शांति दिलाये येशु नाम चरणी में तूने जन्म लिया येशु, चरणी में तूने जन्म लिया येशु क्रूस पे हुआ बलिदान, क्रूस पे हुआ बलिदान मुक्ति दिलाये येशु नाम, शांति दिलाये येशु नाम मुक्ति दिलाये येशु नाम, शांति दिलाये येशु नाम क्रूस पर अपना खून बहाया, क्रूस पर अपना खून बहाया सारा चुकाया दाम, सारा चुकाया दाम मुक्ति दिलाये येशु नाम, शांति दिलाये येशु नाम मुक्ति दिलाये येशु नाम, शांति दिलाये येशु नाम येशु दया का बहता सागर, येशु दया का बहता सागर येशु है दाता महान, येशु है दाता महान मुक्ति दिलाये येशु नाम, शांति दिलाये येशु नाम मुक्ति दिलाये येशु नाम, शांति दिलाये येशु नाम हम सब के पापों को मिटाने, हम सब के पापों को मिटाने येशु हुआ बलिदान, येशु हुआ बलिदान मुक्ति दिलाये येशु नाम, शांति दिलाये येशु नाम मुक्ति दिलाये येशु नाम, शांति दिलाये येशु नाम हम पर भी येशु कृपा करना, हम पर भी येशु कृपा करना हम है पापी नादान, हम है पापी नादान मुक्ति दिलाये येशु नाम, शांति दिलाये येशु नाम मुक्ति दिलाये येशु नाम, शांति दिलाये येशु नाम
खाटू श्याम जी की आरती || Khatu shyam ji ki aarti
ॐ जय श्री श्याम हरे, बाबा जय श्री श्याम हरे। खाटू धाम विराजत, अनुपम रूप धरे॥ ॐ जय श्री श्याम हरे…॥ रतन जड़ित सिंहासन, सिर पर चंवर ढुरे । तन केसरिया बागो, कुण्डल श्रवण पड़े ॥ ॐ जय श्री श्याम हरे…॥ गल पुष्पों की माला, सिर पार मुकुट धरे । खेवत धूप अग्नि पर, दीपक ज्योति जले ॥ ॐ जय श्री श्याम हरे…॥ मोदक खीर चूरमा, सुवरण थाल भरे । सेवक भोग लगावत, सेवा नित्य करे ॥ ॐ जय श्री श्याम हरे…॥ झांझ कटोरा और घडियावल, शंख मृदंग घुरे । भक्त आरती गावे, जय-जयकार करे ॥ ॐ जय श्री श्याम हरे…॥ जो ध्यावे फल पावे, सब दुःख से उबरे । सेवक जन निज मुख से, श्री श्याम-श्याम उचरे ॥ ॐ जय श्री श्याम हरे…॥ श्री श्याम बिहारी जी की आरती, जो कोई नर गावे । कहत भक्त-जन, मनवांछित फल पावे ॥ ॐ जय श्री श्याम हरे…॥ जय श्री श्याम हरे, बाबा जी श्री श्याम हरे । निज भक्तों के तुमने, पूरण काज करे ॥ ॐ जय श्री श्याम हरे…॥
संतोषी माता की आरती || Santoshi mata ki aarti
जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता । अपने सेवक जन को, सुख संपति दाता ॥ ॥ ॐ जय संतोषी माता ॥ सुंदर चीर सुनहरी, मां धारण कीन्हों । हीरा पन्ना दमके, तन श्रृंगार लीन्हों ॥ ॥ ॐ जय संतोषी माता ॥ गेरू लाल छटा छवि, बदन कमल सोहे । मंदर हंसत करूणामयी, त्रिभुवन मन मोहे ॥ ॥ ॐ जय संतोषी माता ॥ स्वर्ण सिंहासन बैठी, चंवर ढुरे प्यारे । धूप, दीप,नैवैद्य,मधुमेवा, भोग धरें न्यारे ॥ ॥ ॐ जय संतोषी माता ॥ गुड़ अरु चना परमप्रिय, तामें संतोष कियो। संतोषी कहलाई, भक्तन वैभव दियो ॥ ॥ ॐ जय संतोषी माता ॥ शुक्रवार प्रिय मानत, आज दिवस सोही । भक्त मण्डली छाई, कथा सुनत मोही ॥ ॥ ॐ जय संतोषी माता ॥ मंदिर जगमग ज्योति, मंगल ध्वनि छाई । विनय करें हम बालक, चरनन सिर नाई ॥ ॥ ॐ जय संतोषी माता ॥ भक्ति भावमय पूजा, अंगीकृत कीजै । जो मन बसे हमारे, इच्छा फल दीजै ॥ ॥ ॐ जय संतोषी माता ॥ दुखी,दरिद्री ,रोगी , संकटमुक्त किए । बहु धनधान्य भरे घर, सुख सौभाग्य दिए ॥ ॥ ॐ जय संतोषी माता ॥ ध्यान धर्यो जिस जन ने, मनवांछित फल पायो । पूजा कथा श्रवण कर, घर आनंद आयो ॥ ॥ ॐ जय संतोषी माता ॥ शरण गहे की लज्जा, राखियो जगदंबे । संकट तू ही निवारे, दयामयी अंबे ॥ ॥ ॐ जय संतोषी माता ॥ संतोषी मां की आरती, जो कोई नर गावे । ॠद्धिसिद्धि सुख संपत्ति, जी भरकर पावे ॥ ॥ ॐ जय संतोषी माता ॥
लक्ष्मी माता की आरती || Laxmi mata ki aarti
ॐ जय लक्ष्मी माता, तुमको निस दिन सेवत, मैया जी को निस दिन सेवत हर विष्णु विधाता || ॐ जय || उमा रमा ब्रम्हाणी, तुम ही जग माता ओ मैया तुम ही जग माता सूर्य चन्द्र माँ ध्यावत, नारद ऋषि गाता || ॐ जय || दुर्गा रूप निरंजनी, सुख सम्पति दाता ओ मैया सुख सम्पति दाता जो कोई तुम को ध्यावत, ऋद्धि सिद्धि धन पाता || ॐ जय || तुम पाताल निवासिनी, तुम ही शुभ दाता ओ मैया तुम ही शुभ दाता कर्म प्रभाव प्रकाशिनी, भव निधि की दाता || ॐ जय || जिस घर तुम रहती तहँ सब सदगुण आता ओ मैया सब सदगुण आता सब सम्ब्नव हो जाता, मन नहीं घबराता || ॐ जय || तुम बिन यज्ञ न होता, वस्त्र न कोई पाता ओ मैया वस्त्र ना पाटा खान पान का वैभव, सब तुम से आता || ॐ जय || शुभ गुण मंदिर सुन्दर, क्षीरोदधि जाता ओ मैया क्षीरोदधि जाता रत्ना चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता || ॐ जय || धुप दीप फल मेवा, माँ स्वीकार करो मैया माँ स्वीकार करो ज्ञान प्रकाश करो माँ, मोहा अज्ञान हरो || ॐ जय || महा लक्ष्मीजी की आरती, जो कोई जन गाता ओ मैया जो कोई गाता उर आनंद समाता, पाप उतर जाता || ॐ जय ||
लक्ष्मीनारायण मंदिर का इतिहास || History of laxminarayan temple
नई दिल्ली में स्थित लक्ष्मीनारायण मंदिर का निर्माण 1933 में शुरू हुआ था। इस मंदिर का निर्माण उद्योगपति और समाजसेवी बलदेव दास बिड़ला और बिड़ला परिवार के सदस्य उनके बेटे जुगल किशोर बिड़ला द्वारा किया गया था। इसी कारण इस मंदिर को बिरला मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर की आधारशिला जाट महाराज उदयभानु सिंह ने रखी थी। मंदिर के निर्माण कार्य पंडित विश्वनाथ शास्त्री जी के दिशा निर्देश में हुआ। इस मंदिर का उद्घाटन सन 1939 ईस्वी महात्मा गांधी जी द्वारा किया गया था। उद्घाटन करते समय महात्मा गांधी जी ने एक शर्त रखी थी कि यह मंदिर उच्च जाति के हिंदुओं तक ही सीमित नहीं होगा इस मंदिर के अंदर सभी जतियों के लोग जा सकते है। यह मंदिर बिरलाओं द्वारा बनाया गया पहला मंदिर है। जिसे बिरला मंदिर भी कहा जाता ह लक्ष्मीनारायण मंदिर की वास्तुकला को हिंदू मंदिर वास्तुकला की नागर शैली के अनुसार बनाया गया है। मंदिर के प्रमुख वास्तुकार श्री चंद्र चटर्जी थे। जो आधुनिक भारतीय वास्तुकला आंदोलन के भी एक प्रमुख प्रस्तावक थे। लक्ष्मीनारायण मंदिर परिसर 7 एकड़ से अधिक भूमि में फैला हुआ है। इस मंदिर में 3 मंजिलें हैं और मंदिर का सबसे ऊंचा शिखर लगभग 160 फीट ऊंचा है। मंदिर के ऊपर का चक्र सुंदर दृश्यों को दर्शाती हुई नक्काशीओं से सुशोभित है। यह मंदिर स्वदेशी आंदोलन से प्रभावित था। इस मंदिर को बनाने के लिए आचार्य विश्वनाथ शास्त्री के नेतृत्व में सौ से अधिक कारीगरों ने बनाया था। बिड़ला मंदिर के मुख्य भगवान लक्ष्मी नारायण की मूर्तियों का निर्माण उच्च गुणवत्ता वाले संगमरमर से किया गया है, जो जयपुर से लाई गई थी। आगरा, कोटा और मकराना से लाये गए पत्थरों से इस मंदिर का निर्माण किया गया है। बिरला मंदिर के परिसर में अन्य भगवानों के मंदिर भी हैं। मंदिर परिसर में एक बहुत विशाल गीता भवन भी स्थित है, जिसका उपयोग व्याख्यान कक्ष के रूप में किया जाता है। इस परिसर में सुंदर उद्यान और झरने भी विराजमान हैं, जो इस मंदिर के आकर्षण को बढ़ाते हैं।
स्वर्ण मंदिर का इतिहास || History of golden temple
अमृतसर में स्थित विश्वप्रसिद्ध इस स्वर्ण मंदिर का इतिहास 400 से भी ज्यादा सालों से पुराना है। इस मंदिर के निर्माण के लिए चौथे सिख गुर रामदास साहिब जी ने कुछ जमीन दान दी थी, जबकि प्रथम सिख गुरु नानक और पांचवे सिख गुरु अर्जुन साहिब ने गोल्डन टेम्पल की अनूठी वास्तुकला की डिजाइन तैयार की थी। जिसके बाद 1577 ईसवी में इस मंदिर का निर्माण काम शुरु किया गया था। इसके बाद अर्जुन देव जी ने बाद में इसके अमृत सरोवर को पक्का करवाने का काम करवाया। आपको बता दें कि इस प्रसिद्ध स्वर्ण मंदिर का निर्माण पवित्र टंकी के बीचों-बीच यानि की तालाब के बीच किया गया है, जिसमें बाद में सिख धर्म के पवित्र ग्रंथ आदि ग्रंथ को भी स्थापित किया गया है। सिख धर्म के इस पवित्र तीर्थस्थल के अंदर ही एक अकाल तख्त भी स्थित है, जिसे सिख धर्म के छठवें गुरु हरगोविंद जी का घर माना जाता है। आपको बता दें कि 1604 ईसवी में इस मंदिर का निर्माण काम पूरा कर लिया गया था, हालांकि इस मंदिर पर कई बार आक्रमण किए गए, जिससे इस मंदिर की इमारत को काफी नुकसान पहुंचा। लेकिन बाद में फिर सरदार जस्सा सिंह आहलूवालिया ने इस मंदिर का फिर से निर्माण करवाया और इसे वर्तमान स्वरूप देने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। आपको बता दें आहूवालिया खालसा दल के कमांडर और मिसल के प्रमुख सरदार थे।
बंगला साहिब गुरुद्वारा का इतिहास || History of bangla sahib gurdwara
गुरुद्वारा बंगला साहिब असल में एक बंगला है, जो 17 वी शताब्दी के भारतीय शासक, राजा जय सिंह का था और जयसिंह पुर में, जयसिंहपुर पैलेस के नाम से जाना जाता था। इसके बाद कनौट पैलेस बनाने के लिये शासको ने अपने पडोसी राज्यों को ध्वस्त किया था। आठवे सिक्ख गुरु, गुरु हर कृष्ण 1664 में दिल्ली में रहते समय यहाँ रुके थे। इस समय, चेचक और हैजा की बीमारी से लोग पीड़ित थे और गुरु हर कृष्ण ने बीमारी से पीड़ित लोगो की सहायता उनका इलाज कर और उन्हें शुद्ध पानी पिलाकर की थी। जल्द ही उन्हें भी बीमारियों ने घेर लिया था और अचानक 30 मार्च 1664 को उनकी मृत्यु हो गयी। इस घटना के बाद राजा जय सिंह ने एक छोटे पानी के टैंक का निर्माण जरुर करवाया था। यह गुरुद्वारा और यहाँ का सरोवर सिक्खों के लिए एक श्रद्धा का स्थल है और हर साल गुरु हर कृष्ण की जयंती पर यहाँ विशेष मण्डली का आयोजन किया जाता है। इस भूमि पर गुरूद्वारे के साथ-साथ एक रसोईघर, बड़ा तालाबं एक स्कूल और एक आर्ट गैलरी भी है। और बाकी सभी दुसरे सिक्ख गुरुद्वारों की तरह यहाँ भी लंगर है, और सभी धर्म के लोग लंगर भवन में खाना खाते है। लंगर (खाने को) गुरसिख द्वारा बनाया जाता है, जो वहाँ काम करते है और साथ ही उनके साथ कुछ स्वयंसेवक भी होते है, जो उनकी सहायता करते है। गुरुद्वारा में दर्शनार्थियों को अपने सिर के बालो को ढँक देने के लिए और जूते ना पहनकर आने के लिए कहा जाता है। विदेशियों और दर्शनार्थीयो की सहायता के लिए गाइड भी होते है, जो बिना कोई पैसे लिए लोगो की सहायता करते है। गुरुद्वारा के बाहर सिर का स्कार्फ हमेशा रखा होता है, लोग उसका उपयोग अपने सिर को ढकने के लिए भी कर सकते है। स्वयंसेवक दिन-रात दर्शनार्थीयो की सेवा करते रहते है और गुरूद्वारे को स्वच्छ रखते है। वर्तमान में गुरूद्वारे और लंगर हॉल में एयर कंडीशनर भी लगाये गये है। और नये “यात्री निवास” और मल्टी-लेवल पार्किंग जगह का निर्माण भी किया गया है। वर्तमान में टॉयलेट की सुविधा भी उपलब्ध है। गुरूद्वारे के पिछले भाग को भी ढक दिया गया है, ताकि सामने से गुरुद्वारा काफी अच्छा दिखे।
हनुमान जी की आरती || Hanuman ji ki aarti
आरती कीजै हनुमान लला की । दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ॥ जाके बल से गिरवर काँपे । रोग-दोष जाके निकट न झाँके ॥ अंजनि पुत्र महा बलदाई । संतन के प्रभु सदा सहाई ॥ आरती कीजै हनुमान लला की ॥ दे वीरा रघुनाथ पठाए । लंका जारि सिया सुधि लाये ॥ लंका सो कोट समुद्र सी खाई । जात पवनसुत बार न लाई ॥ आरती कीजै हनुमान लला की ॥ लंका जारि असुर संहारे । सियाराम जी के काज सँवारे ॥ लक्ष्मण मुर्छित पड़े सकारे । लाये संजिवन प्राण उबारे ॥ आरती कीजै हनुमान लला की ॥ पैठि पताल तोरि जमकारे । अहिरावण की भुजा उखारे ॥ बाईं भुजा असुर दल मारे । दाहिने भुजा संतजन तारे ॥ आरती कीजै हनुमान लला की ॥ सुर-नर-मुनि जन आरती उतरें । जय जय जय हनुमान उचारें ॥ कंचन थार कपूर लौ छाई । आरती करत अंजना माई ॥ आरती कीजै हनुमान लला की ॥ जो हनुमानजी की आरती गावे । बसहिं बैकुंठ परम पद पावे ॥ लंक विध्वंस किये रघुराई । तुलसीदास स्वामी कीर्ति गाई ॥ आरती कीजै हनुमान लला की । दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ॥
श्री रामचंद्र जी की आरती || Sri ramchandra ji ki aarti
श्री रामचन्द्र कृपालु भजुमन हरण भवभय दारुणं । नव कंज लोचन कंज मुख कर कंज पद कंजारुणं ॥१॥ कन्दर्प अगणित अमित छवि नव नील नीरद सुन्दरं । पटपीत मानहुँ तडित रुचि शुचि नोमि जनक सुतावरं ॥२॥ भजु दीनबन्धु दिनेश दानव दैत्य वंश निकन्दनं । रघुनन्द आनन्द कन्द कोशल चन्द दशरथ नन्दनं ॥३॥ शिर मुकुट कुंडल तिलक चारु उदारु अङ्ग विभूषणं । आजानु भुज शर चाप धर संग्राम जित खरदूषणं ॥४॥ इति वदति तुलसीदास शंकर शेष मुनि मन रंजनं । मम् हृदय कंज निवास कुरु कामादि खलदल गंजनं ॥५॥ मन जाहि राच्यो मिलहि सो वर सहज सुन्दर सांवरो । करुणा निधान सुजान शील स्नेह जानत रावरो ॥६॥ एहि भांति गौरी असीस सुन सिय सहित हिय हरषित अली। तुलसी भवानिहि पूजी पुनि-पुनि मुदित मन मन्दिर चली ॥७॥ जानी गौरी अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि । मंजुल मंगल मूल वाम अङ्ग फरकन लगे। रचयिता: गोस्वामी तुलसीदास
कमल मंदिर का इतिहास || History of lotus temple
भारत की राजधानी दिल्ली में स्थित लोटस टेम्पल अपनी अद्भुत वास्तुकला और अद्धितीय शिल्पकारी के लिए यहां के प्रमुख आर्कषण केन्द्रों में से एक है। आपको बता दें कि कमल के फूल के आकार की तरह बने इस लोटस टेम्पल का निर्माण नवंबर, 1986 में पूरा हुआ था, जिसका उद्घाटन 24 दिसंबर, 1986 को किया गया था, जबकि आम पब्लिक के लिए इस मंदिर को नए साल पर 1 जनवरी 1987 को खोला गया है। इस मंदिर को भारतीय उपमहाद्धीप का मदर टेम्पल भी कहा जाता है। वहीं यह भारत के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से भी एक है। कमल के फूल के आकार में बना यह लोटस टेम्पल अपनी खूबसूरती के लिए बहुत सारे आर्किटेक्चरल अवॉर्ड से भी नवाजा जा चुका है। कमल मंदिर एक बहाई उपासना मंदिर है, जहां न कोई भगवान की प्रतिमा रखी गई है, और ना ही इधर किसी तरह की पूजा-अर्चना होती है, यहां लोग सिर्फ अपनी मन की शांति के लिए आते हैं और घंटों बैठकर यहां की खूबसूरती का आनंद लेते हैं। आपको बता दें कि लोटस टेम्पल को विश्व के 7 बहाई मंदिरों में से आखिरी मंदिर माना जाता है। लोटस टेम्पल के निर्माण में करीब 10 साल का लंबा समय लग गया था। इसके अलावा बहाई धर्म के अन्य मंदिर कम्पाला, सिडनी, इल्लिनॉइस, फ्रैंकपर्ट, विलमेट, पनामा, अपिया में हैं। लोटस टेम्पल अपने अद्धितीय वास्तुशिल्प और अनूठी डिजाइन के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध है। इस मंदिर को कनाडा में रहने वाले एक मशहूर पर्शियन वास्तुकार फरीबर्ज सहबा ने तैयार किया था। यह मंदिर भारत की सर्वधर्म समभाव की अनूठी संस्कृति को दर्शाता है, यह हर धर्म से जुड़े लोगों के लिए खुला हुआ है। यह भारत की आधुनिक वास्तुकला का एक नायाब नमूना है। आधे खिले कमल के आकार में संगमरमर की करीब 27 बेहद सुंदर पंखुड़ियों से बने इस भव्य कमल मंदिर के निर्माण में करीब 1 करोड़ डॉलर की लागत आई थी। वहीं करीब 26 एकड़ जमीन में बना यह मंदिर की आर्कषक डिजाइन को देखने दुनिया के कोने-कोने से लोग यहां आते हैं।
तिरुपति बालाजी मंदिर का इतिहास || History of tirupati balaji temple
तिरुपतिबालाजी मंदिर पृथ्वी पर सबसे लोकप्रिय मंदिर है. । प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में दर्शनार्थी यहां आते हैं। दैनिक आधार पर उनके द्वारा सबसे अधिक दान की राशि दान में दी जाती है। इस प्रकार लाखों श्रद्धालु अपने दान पुण्य करते हैं। पौराणिक कथाओं के आधार पर इस मंदिर की भी एक कहानी है। कहा जाता है की कलि युग के दौरान भक्तों को आशीर्वाद देने के लिए भगवान पृथ्वी पर प्रकट हुए थे। एक बार, ऋषि भृगु यह मूल्यांकन करना चाहता थे कि पवित्र तीन देवताओं में कौन सबसे बड़ा है। कथा के अनुसार एक बार महर्षि भृगु बैकुंठ पधारे और आते ही शेष शैय्या पर योगनिद्रा में लेटे भगवान विष्णु की छाती पर एक लात मारी। भगवान विष्णु ने तुरंत भृगु के चरण पकड़ लिए और पूछने लगे कि ऋषिवर पैर में चोट तो नहीं लगी। लेकिन देवी लक्ष्मी को भृगु ऋषि का यह व्यवहार पसंद नहीं आया और वह विष्णु जी से नाराज हो गई। नाराजगी इस बात से थी कि भगवान ने भृगु ऋषि को दंड क्यों नहीं दिया। नाराजगी में देवी लक्ष्मी बैकुंठ छोड़कर चली गई। भगवान विष्णु ने देवी लक्ष्मी को ढूंढना शुरु किया तो पता चला कि देवी ने पृथ्वी पर पद्मावती नाम की कन्या के रुप में जन्म लिया है। भगवान विष्णु ने भी तब अपना रुप बदला और पहुंच गए पद्मावती के पास। भगवान ने पद्मावती के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा जिसे देवी ने स्वीकार कर लिया। शादी के बाद भगवान तिरुमाला की पहाड़ियों पर रहने लगे, कुबेर से कर्ज लेते समय भगवान ने वचन दिया था कि कलियुग के अंत तक वह अपना सारा कर्ज चुका देंगे।भगवान के कर्ज में डूबे होने की इस मान्यता के कारण बड़ी मात्रा में भक्त धन-दौलत भेंट करते हैं ताकि भगवान कर्ज मुक्त हो जाएं।
सिद्धिविनायक मंदिर का इतिहास || History of siddhivinayak temple
सिद्धिविनायक मंदिर का निर्माण वर्ष 1801 ईस्वी में लक्ष्मण विथु नाम के व्यक्ति ने किया था। इस मंदिर के निर्माण के लिए देउबाई पाटिल नाम की एक अमीर, निःसंतान महिला ने इस विश्वास के साथ धन दिया था, कि भगवान गणेश उन अन्य महिलाओं की इच्छाओं को पूरा करेंगे, जिनके अभी तक कोई बच्चा नहीं हुआ है। प्राचीन मंदिर एक छोटी सी संरचना थी। जिसमें श्री सिद्धिविनायक की काले पत्थर की मूर्ति थी, जो ढाई फीट चौड़ी थी। श्री सिद्धिविनायक भगवान की सबसे बड़ी विशेषता सूंड का दाहिनी ओर झुकना है। इस मूर्ति के चार हाथ (चतुर्भुज) हैं, जिसमें ऊपरी दाएं कमल, ऊपरी बाएं में एक छोटी कुल्हाड़ी, निचले दाएं में पवित्र मोती और मोदक से भरा कटोरा (एक स्वादिष्ट व्यंजन जो श्री सिद्धिविनायक के साथ बारहमासी पसंदीदा है)। दोनों तरफ देवता को झुकाते हुए रिद्धि और सिद्धि हैं, देवी पवित्रता, पूर्ति, समृद्धि और धन का प्रतीक हैं। देवता के माथे पर उकेरी गई एक आंख है, जो भगवान शिव के तीसरे नेत्र के समान है।
खाटू श्याम मंदिर का इतिहास || History of khatu shyam temple
भारत में कृष्ण भगवान को समर्पित खाटू श्याम जी का मंदिर सबसे ज्यादा प्रचलित है। कलयुग के इस दौर में खाटू श्याम जी को सबसे अधिक महत्वपूर्ण बताया गया है। यह मंदिर राजस्थान में सीकर जिले के पास खाटू गांव में स्थित है। जो की हिंदू भक्तों के लिए बहुत मान्यता रखता है। कहते है की खाटू श्याम जी से जो भी मांगो वो लाखो बार देते है। इसीलिए इनको लखदातार के नाम से भी पुकारा जाता है। हिंदू धर्म के अनुसार खाटू शम जी को कृष्ण अवतार का रूप माना गया है। कृष्ण भगवान ने खाटू श्याम जी को वरदान दिया था की कलयुग में उन्हें खाटू श्याम जी के नाम से पूजा जायेगा। यही वजह है कि आज लाखो भक्त खाटू श्यामजी को पूजते है। पुराणों के अनुसार अगर हम खाटू श्याम जी के इतिहास के बारे में बात करे तो, उनके मंदिर का निर्माण संन 1027 में खाटू नगर के राजा रूपसिंह और उनकी पत्नी नर्मदा द्वारा कराया गया था। क्योंकि खाटू नगर के राजा रूपसिंह चौहान को एक बार स्वप्न में खाटू श्याम जी का सिर कटा हुआ दिखाई दिया जिसने उनसे मंदिर बनवाने के लिए कहा। जिस जगह से कटा हुआ सिर निकला था वहा पर अब खाटू श्याम जी का कुंड बना हुआ जिसमे लाखो श्रद्धालु स्नान करते है। और फिर खाटू श्याम मंदिर में जाकर उनके दर्शन करते है। संन 1720 में इस मंदिर के पुनः निर्माण दीवान अभयसिंह ने करवाया था।