जैन धर्म में कुल 24 तीर्थकर हुए। इनमें ऋषभदेव पहले तीर्थंकर एवं महावीर अंतिम तीर्थंकर थे। ऋग्वेद में प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव तथा 22वें तीर्थंकर अरिष्ठनमि का उल्लेख मिलता है। ऋषभदेव कोआदिनाथ के नाम से भी जाना जाता है। ऋषभदेव ने कैलाश पर्वत पर अपना शरीर त्यागा। 22वें तीर्थंकर अरिष्टनेमि को वासुदेव कृष्ण का भाई बताया जाता है। यद्यपि महावीर स्वामी जैन धर्म के संस्थापक नहीं थे किंतु उन्होंने जैन धर्म को सुव्यवस्थित आधार प्रदान किया और व्यापक लोकप्रिय बनाया। अतः जैन धर्म का वास्तविक संस्थापक महावीर स्वामी को माना जाता है। 24 तीर्थंकरों के नाम – 1. ऋषभदेव जी ऋषभदेव जी जैन धर्म के पहले तीर्थकर थे जिनका जन्म अयोध्या में उत्तरषाढ़ा नक्षत्र में हुआ था। इनको आदिनाथ या वृषभनाथ के नाम से भी जाना जाता है। इनके पिता का नाम नाभिराज व माता का नाम मरूदेवी था जो कि इश्वाकू वंश से थे। इनकी 2 पत्नियाँ थी जिनसे उनको 100 पुत्र व 2 पुत्रियाँ हुई। इनका चिन्ह वृषभ (बैल) को माना जाता हैं। ऋषभदेव जी को मोक्ष कैलाश पर्वत में वट वृक्ष के नीचे प्राप्त हुआ था। 2. अजितनाथ जी अजितनाथ जी जैन धर्म के दूसरे तीर्थकर थे जिनका जन्म अयोध्या में रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। इनके पिता का नाम जीतशत्रु व माता का नाम विजयादेवी था जो इश्वाकू वंश से थे। इनका चिन्ह हाथी था। अजितनाथ जी को मोक्ष सम्मेद शिखरजी में सर्पपर्ण वृक्ष के नीचे प्राप्त हुआ था। 3.सम्भवनाथ जी सम्भवनाथ जी जैन धर्म के तीसरे तीर्थकर थे जिनका जन्म श्रावस्ती में पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र में हुआ था। इनके पिता का नाम जितारी व माता का नाम सेनारानी था जो इश्वाकू वंश से थे। इनका चिन्ह घोड़ा था। सम्भवनाथ जी को मोक्ष सम्मेद शिखर में शाल वृक्ष के नीचे प्राप्त हुआ था। 4. अभिनन्दन जी अभिनन्दन जी जैन धर्म के चौथे तीर्थकर थे जिनका जन्म अयोध्या में पुनर्वसु नक्षत्र में हुआ था। इनके पिता का नाम संवर व माता का नाम सिद्धार्था था जो इश्वाकू वंश से थे। इनका चिन्ह बंदर था। अभिनन्दन जी को मोक्ष सम्मेद शिखर में देवदा वृक्ष के नीचे प्राप्त हुआ था। 5. सुमतिनाथ जी सुमतिनाथ जी जैन धर्म के पांचवे तीर्थकर थे जिनका जन्म अयोध्या में मद्या नक्षत्र में हुआ था। इनके पिता का नाम मेघरथ व माता का नाम सुमंगला था जो इश्वाकू वंश से थे। इनका चिन्ह चकवा था। सुमतिनाथ जी को मोक्ष सम्मेद शिखर में प्रियंगु वृक्ष के नीचे प्राप्त हुआ था। 6. पद्मप्रभ जी पद्मप्रभ जी जैन धर्म के छठे तीर्थकर थे जिनका जन्म कौशाम्बीपुरी में चित्रा नक्षत्र में हुआ था। इनके पिता का नाम श्रीधर धरण राज व माता का नाम सुसीमा था जो इश्वाकू वंश से थे। इनका चिन्ह कमल था। पद्मप्रभ जी को मोक्ष सम्मेद शिखर में प्रियंगु वृक्ष के नीचे प्राप्त हुआ था। 7. सुपार्श्वनाथ जी सुपार्श्वनाथ जी जैन धर्म के सांतवे तीर्थकर थे जिनका जन्म काशीनगरी में विशाखा नक्षत्र में हुआ था। इनके पिता का नाम सुप्रतिष्ठ व माता का नाम पृथ्वी था जो इश्वाकू वंश से थे। इनका चिन्ह साथिया था। सुपार्श्वनाथ जी को मोक्ष सम्मेद शिखर में शिरीष वृक्ष के नीचे प्राप्त हुआ था। 8. चंद्रप्रभु जी चंद्रप्रभु जी जैन धर्म के आठवें तीर्थकर थे जिनका जन्म चंद्रपुरी में अनुराधा नक्षत्र में हुआ था। इनके पिता का नाम महासेन व माता का नाम लक्ष्मणा था जो इश्वाकू वंश से थे। इनका चिन्ह चंद्रमा था। चंद्रप्रभु जी को मोक्ष सम्मेद शिखर में नाग वृक्ष के नीचे प्राप्त हुआ था। 9. सुविधिनाथ जी सुविधिनाथ जी जैन धर्म के नौवे तीर्थकर थे जिनका जन्म काकंदी में मूल नक्षत्र में हुआ था। इन्हें पुष्पदंत के नाम से भी जाना जाता है। इनके पिता का नाम सुग्रीव व माता का नाम रामा था जो इश्वाकू वंश से थे। इनका चिन्ह मगर था। सुविधिनाथ जी को मोक्ष सम्मेद शिखर में साल वृक्ष के नीचे प्राप्त हुआ था। 10. शीतलनाथ जी शीतलनाथ जी जैन धर्म के दसवे तीर्थकर थे जिनका जन्म भद्रिकापुरी में पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र में हुआ था। इनके पिता का नाम दृढरथ राज व माता का नाम सुनंदा था जो इश्वाकू वंश से थे। इनका चिन्ह कल्पवृक्ष था। शीतलनाथ जी को मोक्ष सम्मेद शिखर में प्लक्ष वृक्ष के नीचे प्राप्त हुआ था। 11. श्रेयांसनाथ जी श्रेयांसनाथ जी जैन धर्म के ग्यारहवें तीर्थकर थे जिनका जन्म सारनाथ में वण नक्षत्र में हुआ था। इनके पिता का नाम विष्णु राज व माता का नाम विष्णुद्री था जो इश्वाकू वंश से थे। इनका चिन्ह गैंडा था। श्रेयांसनाथ जी को मोक्ष सम्मेद शिखर में तेंदुका वृक्ष के नीचे प्राप्त हुआ था। 12. वासुपूज्य जी वासुपूज्य जी जैन धर्म के बारहवे तीर्थकर थे जिनका जन्म चम्पापुरी में शतभिषा नक्षत्र में हुआ था। इनके पिता का नाम वासुपूज्य व माता का नाम जया था जो इश्वाकू वंश से थे। इनका चिन्ह भैंसा था। वासुपूज्य जी को मोक्ष चम्पापुरी में पाटला वृक्ष के नीचे प्राप्त हुआ था। 13.: विमलनाथ जी विमलनाथ जी जैन धर्म के तेरहवे तीर्थकर थे जिनका जन्म काम्पिल्य में उत्तराभाद्रपद नक्षत्र में हुआ था। इनके पिता का नाम कृतवर्मन व माता का नाम श्यामा था जो इश्वाकू वंश से थे। इनका चिन्ह शूकर (जंगली सूअर) था। विमलनाथ जी को मोक्ष सम्मेद शिखर में जम्बू वृक्ष के नीचे प्राप्त हुआ था। 14. अनंतनाथ जी अनंतनाथ जी जैन धर्म के चौदहवे तीर्थकर थे जिनका जन्म अयोध्या में रेवती नक्षत्र में हुआ था। इनके पिता का नाम सिंहसेन व माता का नाम सुयशा था जो इश्वाकू वंश से थे। इनका चिन्ह सेही था। अनंतनाथ जी को मोक्ष सम्मेद शिखर में पीपल वृक्ष के नीचे प्राप्त हुआ था। 15. धर्मनाथ जी धर्मनाथ जी जैन धर्म के पंद्रहवे तीर्थकर थे जिनका जन्म रत्नपुरी में पुष्य नक्षत्र में हुआ था। इनके पिता का नाम भानुराजा व माता का नाम सुव्रता था जो इश्वाकू वंश से थे। इनका चिन्ह वज्रदंड था। धर्मनाथ जी को मोक्ष सम्मेद शिखर में दधिपर्ण वृक्ष के नीचे प्राप्त हुआ था। 16. शांतिनाथ जी शांतिनाथ जी जैन धर्म के सौलहवे तीर्थकर थे जिनका जन्म हस्तिनापुर में भरणी नक्षत्र में हुआ था। इनके पिता का नाम विश्वसेन व माता का नाम अचिरा था जो इश्वाकू वंश से थे। इनका चिन्ह हिरण था। शांतिनाथ जी को मोक्ष सम्मेद शिखर में नंद वृक्ष के नीचे प्राप्त
ईद त्योहार के बारे में जानकारी || Information about eid festival
ईद की शुरुआत सुबह दिन की पहली प्रार्थना के साथ होती है। इसके बाद पूरा परिवार कुछ मीठा खाता है। वैसे ईद पर खजूर खाने की परंपरा है। फिर नए कपड़ों में सजकर लोग ईदगाह के लिए एक बड़े खुले स्थान पर जाते हैं, जहां पूरा समुदाय एक साथ ईद की नमाज़ अदा करता है। प्रार्थना के बाद, ईद की बधाईयां दी जाती है। उस समय ईद-मुबारक कहा जाता है। ये एक दूसरे के प्यार और आपसी भाईचारे को दर्शाता है। ईद-उल-फितर के मौके पर एक खास दावत तैयार की जाती है। जिसमें खासतौर से मीठा खाना शामिल होता है। इसलिए इसे भारत और कुछ दक्षिण एशियाई देशों में मीठी ईद भी कहा जाता है। ईद-उल-फितर पर खासतौर से सेवइयां यानी गेहूं के नूडल्स को दूध के साथ उबालकर बनाया जाता है और इसे सूखे मेवों और फलों के साथ परोसा जाता है। ईद भाई चारे व आपसी मेल का तयौहार है ईद के दिन लोग एक दूसरे के दिल में प्यार बढाने और नफरत को मिटाने के लिए एक दूसरे से गले मिलते हैं। ईद का त्योहार सबको साथ लेकर चलने का संदेश देता है। ईद पर हर मुसलमान चाहे वो आर्थिक रुप से संपन्न हो या न हो, सभी एकसाथ नमाज पढ़ते हैं और एक दूसरे को गले लगाते हैं। इस्लाम में चैरिटी ईद का एक महत्वपूर्ण पहलू है। हर मुसलमान को धन, भोजन और कपड़े के रूप में कुछ न कुछ दान करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। जकात यानी दान को हर मुसलमान का फर्ज कहा गया है। ये गरीबों को दिए जाने वाला दान है। मुस्लिम अपनी संपत्ति को पवित्र करने के रूप में अपनी सालाना बचत का एक हिस्सा गरीब या जरूरतमंदों को जकात के रूप में देते हैं।
अजमेर शरीफ़ दरगाह का इतिहास || History of ajmer sharif dargah
राजस्थान राज्य के अजमेर में स्थित ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह भारत के प्रमुख तीर्थस्थलों में से एक है। यह दरगाह, पिंकसिटी जयपुर से करीब 135 किलोमीटर दूर, चारों तरफ अरावली की पहाड़ियों से घिरे अजमेर शहर में स्थित है। अजमेर शरीफ की दरगाह के नाम से यह पूरे देश में प्रसिद्ध है। इस दरगाह से सभी धर्मों के लोगों की आस्था जुड़ी हुई है। इसे सर्वधर्म सद्भाव की अदभुत मिसाल भी माना जाता है। ख्वाजा साहब की दरगाह में हर मजहब के लोग अपना मत्था टेकने आते हैं। ऐसी मान्यता है कि जो भी ख्वाजा के दर पर आता है कभी भी खाली हाथ नहीं लौटता है, यहां आने वाले हर भक्त की मुराद पूरी होती है। ख्वाजा की मजार पर देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू, बीजेपी के दिग्गत नेता स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी, देश की पहली महिला पीएम इंदिरा गांधी, बराक ओबामा समेत कई नामचीन और मशहूर शख्सियतों ने अपना मत्था टेका है। इसके साथ ही ख्वाजा के दरबार में अक्सर बड़े-बड़े राजनेता एवं सेलिब्रिटीज आते रहते हैं और अपनी अकीदत के फूल पेश करते हैं एवं आस्था की चादर चढ़ाते हैं। ऐसा माना जाता है, लाखों धर्मों की आस्था से जुड़ी अजमेर शरीफ की दरगाह का निर्माण सुल्तान गयासुद्दीन खिलजी ने करवाया था इसके बाद मुगल सम्राट हुमायूं समेत कई मुगल शासकों ने इसका विकास करवाया। मान्यता है की कोई भी इनके दरबार से खाली हाथ नहीं जाता। यही कारण है की यहाँ सभी धर्मों के लोग अपनी फ़रियाद लेकर आते हैं। अजमेर शरीफ दरगाह के दर्शन के लिए उर्स का त्यौहार सर्वोत्तम समय का माना जाता है। उर्स के मौके पर लाखों की संख्या में लोग अजमेर शरीफ जाते हैं। इस उत्सव के अवसर पर यह पवित्र मजार 24 घंटे श्रद्धालु के लिए खुला रहता है।
महावीर स्वामी का जीवन परिचय || Biography of mahavir swami
• महावीर स्वामी जैन धर्म के 24वें तथा अंतिम तीर्थंकर थे। वे बुद्ध के बाद भारतीय गास्तिक आचार्यों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। महावीर का जन्म 540 बी.सी.ई में वैशाली के कुण्डाग्राम में हुआ था। • महावीर के पिता का नाम सिद्धार्थ था, जो वण्जिसंघ के एक राज्य कुण्डाग्राम के ज्ञातृक क्षत्रिय थे। महावीर के बचपन का नाम वर्धमान (महावीर स्वामी) पहले ऋषभदत्त नामक ब्राह्मण की पत्नी देवनंदा के गर्भ में आयो परंतु चूंकि अभी तक सारे तीर्थंकर क्षत्रिय वंश के थे। • कल्पसूत्र के अनुसार ज्योतिषियों महावीर के लिए भी चक्रवर्ती राजा था महान सन्यायी बनाने की भविष्यवाणी की थी। महावीर के पुत्री का नाम प्रियदर्शना (अणोज्जी) था। • महावीर के दामाद जामालि था, जिसे महावीर स्वामी ने स्वयं दीक्षिण किया था। इस प्रकार संभवतः जामालि महावीर स्वामी का प्रथम शिष्य था। • महावीर के केवल्य (ज्ञान) प्राप्ति के 14वें वर्ष में जामालि ने विद्रोह किया और एक अलग बहुतरवाद चलाया। विद्रोह का कारण कियमाणकृत सिद्धांत कार्य होते ही पूरा हो जाना था। अतः जामालि ने बहुतरवाद चलाया। जामाति के दो वर्षों बाद तीसगुप्त ने जैन धर्म में दूसरा विद्रोह किया। • महावीर ने 30 वर्ष की आयु में अपने बड़े भाई राजा नदिवर्धन से आशा लेकर गृह त्याग किया और कठिन तपस्या की। •. कल्पसूत्र एवं आचरंग सूत्र में महावीर के कठोर तपश्चर्या एवं कायावलेश का वर्णन है। कल्पसूत्र से पता चलता है कि प्रारम्भ में महावीर ने 1 वर्ष 1 माह तक वस्त्र धारण कर तपस्या किया और उसके पश्चात् वस्त्र त्यागकर नंगे रहने लगे एवं भोजन हथेली पर लेना शुरू किया। • तपस्वी वेश में महावीर भ्रमण करते हुए नालन्दा पहुंच जहाँ उनकी मुलाकात गवस्खलिगोशाल से हुई। यह महावीर का शिष्य बन गया, किंतु 6 वर्षों के बाद गोशाल ने उनका साथ छोड़कर एक अलग आजीवक सम्प्रदाय की स्थापना की। • 12 वर्ष कठोर तपस्या के बाद 42वें वर्ष में जन्धिका ग्राम में समीप हजुपालिका नदी के तट पर साल के वृक्ष केनीचे वर्धमान को केवल्प (ज्ञान) प्राप्त हुआ। •. केवल्य (ज्ञान) की प्राप्ति के बाद वे केवलिन कहलाए, अपनी समस्त इन्द्रियों को जीतने के कारण जन कहलाए तथा अतुल पराक्रम दिखाने के कारण वे महावीर कहे गए। बौद्ध धर्म के ग्रंथों में महावीर स्वामी को \’निगण्ठनाथपुत्र कहा गया है।
बौद्ध धर्म की विशेषताएँ || Features of buddhism
* बौद्ध धर्म ईश्वर और आत्मा को नहीं मानता है । इस बात को हम भारत के धर्मों के इतिहास में क्रांति कह सकते हैं । बौद्ध धर्म शुरू में दार्शनिक वाद-विवादों के जंजाल में फँसा नहीं था इसलिए यह सामान्य लोगों को भाया । यह विशेष रूप से निम्न वर्णों का समर्थन पा सका क्योंकि इसमें वर्ण व्यवस्था की निंदा की गई है । * बौद्ध संघ का दरवाजा हर किसी के लिए खुला रहता था चाहे वह किसी भी जाति का क्यों न हो । संघ में प्रवेश का अधिकार स्त्रियों को भी था जिससे उन्हें पुरुषों की बराबरी प्राप्त होती थी । ब्राह्मण धर्म की तुलना में बौद्ध धर्म अधिक उदार और अधिक जनतांत्रिक था । * बौद्ध धर्म वैदिक क्षेत्र के बाहर के लोगों को अधिक भाया और वे लोग आसानी से इस धर्म में दीक्षित हुए । मगध के निवासी इस धर्म की ओर तुरंत उन्मुख हुए, क्योंकि कट्टर ब्राह्यण उन्हें नीच मानते थे और मगध आर्यों की पुण्य भूमि आर्यावर्त्त अर्थात आधुनिक उत्तर प्रदेश की सीमा के बाहर पड़ता था । अभी भी उत्तर बिहार के लोग गंगा के दक्षिण मगध में मरना पसंद नहीं करते हैं । * बुद्ध के व्यक्तित्व और धर्मोपदेश की प्रणाली दोनों ही बौद्ध धर्म के प्रचार में सहायक हुए । वे भलाई करके बुराई को भगाने तथा प्रेम करके घृणा को भगाने का सयास करते थे । निंदा और गाली से उन्हें क्रोध नहीं आता था । * कठिन स्थितियों में भी वे धीर और शांत बने रहते थे और अपने विरोधियों का सामना चातुर्य और प्रत्युत्पन्नमति से करते थे । कहा जाता है कि एक बार एक अज्ञानी व्यक्ति ने उन्हें गालियाँ दीं । वे चुपचाप सुनते रहे ।उस व्यक्ति का गाली देना बंद हुआ तो उन्होंने पूछा ”वत्स, यदि कोई दान को स्वीकार नहीं करे तो उस दान का क्या होगा ?” विरोधी ने उत्तर दिया, ”वह देने वाले के पास ही रह जाएगा ।” तब बुद्ध ने कहा, ”वत्स, में तुम्हारी गालियाँ स्वीकार नहीं करता ।” * जनसाधारण की भाषा पालि को अपनाने से भी बौद्ध धर्म के प्रचार में बल मिला । इससे आम जनता बौद्ध धर्म सुगमता से समझ पाई । गौतम बुद्ध ने संघ की स्थापना की जिसमें हर व्यक्ति जाति या लिंग के भेद के बिना प्रवेश कर सकता था । * भिक्षुओं के लिए एक ही शर्त थी कि उन्हें संघ के नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करना होगा । बौद्ध संघ में शामिल होने के बाद इसके सदस्यों को इंद्रियनिग्रह अपरिग्रह (धनहीनता) और श्रद्धा का संकल्प लेना पड़ता था । * इस प्रकार बौद्ध धर्म के तीन प्रमुख अंग थे: बुद्ध, संघ और धम्म । संघ के तत्त्वावधान में सुगठित प्रचार की व्यवस्था होने से बुद्ध के जीवनकाल में ही बौद्ध धर्म ने तेजी से प्रगति की । मगध कोसल और कौशांबी के राजाओं अनेक गणराज्यों और उनकी जनता ने बौद्ध धर्म को अपना लिया । * बुद्ध के निर्वाण के दो सौ साल बाद प्रसिद्ध मौर्य सम्राट् अशोक ने बौद्ध धर्म ग्रहण किया । यह युग-प्रवर्त्तक घटना सिद्ध हुई । अशोक ने अपने धर्मदूतों के द्वारा इस धर्म को मध्य एशिया पश्चिमी एशिया और श्रीलंका में फैलाया और इसे विश्व धर्म का रूप दिया । * आज भी श्रीलंका बर्मा और तिब्बत में तथा चीन और जापान के कुछ भागों में बौद्ध धर्म प्रचलित है । अपनी जन्मभूमि से तो यह धर्म लुप्त हो गया परंतु दक्षिण एशिया दक्षिण-पूर्व एशिया और पूर्वी एशिया के देशों में जीता-जागता है ।
जैन धर्म के ग्रंथ || Scriptures of jainism
जैन धर्म सहित्यिक रूप से बहुत धनी था। अनेक धार्मिक ग्रंथ लिखे गए हैं। ये ग्रंथ संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश भाषाओं में लिखे गए थे । केवल ज्ञान, मनपर्यव ज्ञानी, अवधि ज्ञानी, चतुर्दशपूर्व के धारक तथा दशपूर्व के धारक मुनियों को आगम कहा जाता था तथा इनके द्वारा दिए गए उपदेशों को भी आगम नाम से संकलित किया गया। दिगम्बर जैनों द्वारा समस्त 45 आगम ग्रंथों को चार भाग में विभाजित किया गया है – प्रथमानुयोग, करनानुयोग, चरणानुयोग, द्रव्यानुयोग। दिगम्बरों का मानना है कि आगम ग्रंथ समय के साथ-साथ अलग-अलग होते गए हैं। श्वेतांबर जैनों का प्रमुख ग्रंथ कल्पसूत्र माना जाता है। साथ ही आचार्य उमास्वामी द्वारा रचित ‘तत्वार्थ सूत्र’ एक ऐसा ग्रंथ है जो सभी जैनों द्वारा स्वीकृत है। इसमें 10 अध्याय तथा 350 सूत्र हैं। दिगम्बरों के प्राचीन साहित्य की भाषा शौरसेनी थी, जो एक प्रकार की अपभ्रंश ही थी।आदिकालीन साहित्य में सबसे प्रमाणिक रूप में जैन ग्रंथ ही प्राप्त होते हैं। जैन कवियों द्वारा अनेक प्रकार के ग्रंथ रचे गए।उन्होंने पुराण काव्य, चरित काव्य, कथा काव्य, रास काव्य आदि विविध प्रकार के ग्रंथ रचे। स्वयंभू, पुष्प दंत, हेमचंद्र, सोमप्रभ सूरी, जिनधर्म सूरी आदि मुख्य जैन कवि हैं। स्वयंभू को हिन्दी का प्रथम कवि भी स्वीकार किया जाता है जिनकी प्रमुख रचना ‘पउमचरिउ’ है जिसमें रामकथा का वर्णन है। अधिकतर जैन ग्रंथों का आधार हिन्दू कथाएं ही बनी।
यीशु की कहानी || Story of jesus
ईसाई धर्म को क्रिश्चियन धर्म भी कहते हैं। इस धर्म के संस्थापक प्रभु ईसा मसीह है। ईसा मसीह को पहले से चले आ रहे प्रॉफेट की परंपरा का एक प्रॉफेट माना जाता हैं। इब्रानी में उन्हें येशु, यीशु या येशुआ कहते थे परंतु अंग्रेजी उच्चारण में यह जेशुआ हो गया। यही जेशुआ बिगड़कर जीसस हो गया। आओ जानते हैं जीसस क्राइस्ट के जीवन की कहानी।ईसा मसीह के जन्म के संबंध में मतभेद है। इस संबंध में हमें चार सिद्धांत मिलते हैं। पहला \’ल्यूक एक्ट\’ के अनुसार उनका परिवार नाजरथ गांव में रहता था। उनके माता पिता नाजरथ से जब बेथलहेम पहुंचे तो वहां एक जगह पर उनका जन्म हुआ। कहते हैं जब यीशु का जन्म हुआ तब मरियम कुंआरी थीं। मरियम योसेफ नामक बढ़ई की धर्म पत्नी थीं। जिस वक्त ईसा मसीह का जन्म हुआ उस वक्त परियों वहां आकर उन्हें मसीहा कहा और ग्वालों का एक दल उनकी प्रार्थना करने पहुंचा।यह भी कहा जाता है कि मरियम को यीशु के जन्म के पहले एक दिन स्वर्गदूत गाब्रिएल ने दर्शन देकर कहा था कि धन्य हैं आप स्त्रियों में, क्योंकि आप ईश्वर पुत्र की माता बनने के लिए चुनी गई हैं। यह सुनकर मदर मरियम चकित रह गई थीं। कहते हैं कि इसके बाद सम्राट ऑगस्टस के आदेश से राज्य में जनगणना प्रारंभ हुई जो सभी लोग येरुशलम में अपना नाम दर्ज कराने जा रहे थे। यीशु के माता पिता भी नाजरथ से वहां जा रहे थे परंतु बीच बेथलेहम में ही माता मरियम ने एक बालक को जन्म दिया। एक दूसरे सिद्धांत के अनुसार अर्थात \’मैथ्यू एक्ट\’ के अनुसार ईसा का जन्म तो बेथलहम में हुआ था था परंतु वहां के राजा हिरोड ने बेथलहेम में दो साल से कम उम्र के सभी बच्चों को मारने का आदेश दे दिया दिया था, यह जानकर ईसा मसीह का परिवार वहां से मिस्र चला गया था। फिर वहां से कुछ समय बाद वे नजारथ में बस गए थे। \’गॉस्पेल ऑफ मार्क\’ और \’गॉस्पेल ऑफ जॉन\’ ने इनके जन्म स्थान का जिक्र नहीं किया है, लेकिन उनका संबंध नाजरथ से बताया है।ईसाई धर्मपुस्तक के अनुसार माता मरियम गलीलिया प्रांत के नाजरथ गांव की रहने वाली थी और उनकी सगाई दाऊद के राजवंशी युसुफ नामक बढ़ई से हुई थी। कहते हैं कि विवाह के पूर्व ही वह परमेश्वर के प्रभाव से गर्भवती हो गई थीं। परमेश्वर के संकेत के चलते युसुफ या योसेफ ने उन्हें अपनी पत्नी स्वीकार कर लिया। विवाह के बाद युसुफ गलीलिया प्रांत छोड़कर यहूदी प्रांत के बेथलेहम नामक गांव में आकर रहने लगे और वहीं पर ईसा मसीह का जन्म हुआ। परंतु वहां के राजा हेरोद के अत्याचार से बचने के लिए वे मिस्र जाकर रहने लगे थे और बाद में जब ई.पूर्व. हेरोद का निधन हो गया तो वे पुन: बेथलेहम आए और वहां पर 6 ईसापूर्व ईसा मसीह का जन्म हुआ और फिर वे वहां से पुन: नाजरेथ में बस गए थे। जो भी हो यह तो सिद्ध होता ही है कि ईसा मसीह के माता पिता नाजरथ के रहने वाले थे और बेथलेहेम में ईसा का जन्म हुआ था। अब वे बेथलेहम क्यों गए थे यह रहस्य बना रहेगा।कि फिर जब ईसा मसीह लगभग 12 वर्ष के हुए तो येरुशलम में उन्हें यहूदी पुजारियों से ज्ञान चर्चा करते हुए बताया गया है। ईसा मसीह खुद यहूदी ही थे। पुजारियों से चर्चा के बाद वे कहां चले गए यह कोई नहीं जानता। बाइबल में 13 से 29 वर्ष की उनकी उम्र का कोई जिक्र नहीं मिलता है। हालांकि यह भी कहा जाता है कि कुछ समय बाद ईसा ने यूसुफ का पेशा सीख लिया और लगभग 30 साल की उम्र तक नाजरथ में रहकर वे बढ़ई का काम करते रहे।उनकी असल कहानी तब प्रारंभ होती है जबकि वे 30 वर्ष की उम्र में यहून्ना (जॉन) नामक संत से बाप्तिस्मा (दीक्षा) लेते हैं और फिर वे लोगों को उपदेश देना प्रारंभ कर देते हैं। उनके उपदेश यहूदी धर्म की मान्यताओं से भिन्न होते हैं और जब वे नबूवत का दावा करते हैं तो यहूदियों के कट्टरपंथियों में इसको लेकर रोष फैल जाता है। हालांकि जनता के बीच वे लोकप्रिय हो जाते हैं। जनता यह मानने लगी थी कि यही है वो मसीहा जो हमें रोम साम्रज्य से मुक्ति दिलाएगा। उस वक्त यहूदी बहुल राज्य पर रोमन सम्राट् तिबेरियस का शासन था जिसने पिलातुस नामक एक गवर्नर नियुक्त कर रखा था जो राज्य की शासन व्यवस्था देखता था। यहूदी मानते थे कि हम राजनीतिक रूप से परतंत्र हैं और वे 4 शतब्दियों से इंतजार कर रहे थे ऐसे मसीहा का जो उन्हें इस गुलामी से मुक्त कराएगा। फिर जब सन् 27ई. में योहन बपतिस्ता यह संदेश लेकर बपतिस्मा देने लगे कि \’पछतावा करो, स्वर्ग का राज्य निकट है\’, तो यहूदियों में आशा की लहर दौड़ गई और वे उम्मीद करने लगे कि मसीह शीघ्र ही आने वाला है। ऐसे में ईसा मसीह का सरल भाषश में उपदेश देना और लोगों की सहायदा करना यह संकेत दे गया कि ये ही मसीहा है। वे लोगों के बीच लोकप्रिय हो गए। उनकी लोकप्रियता से कट्टरपंथी यहूदियों के साथ ही रोमनों में भी चिंता की लहर दौड़ गई थी।हालांकि ईसा मसीह कहते थे कि मैं मूसा के नियम तथा नबियों की शिक्षा रद्द करने नहीं, बल्कि पूरी करने आया हूं। ईसा मसीह यहूदियों के पर्व मनाने के लिए राजधानी येरुशलम के मंदिर में आया तो करते थे, किंतु वह यहूदी धर्म को अपूर्ण समझते थे। वह शास्त्रियों द्वारा प्रतिपादित जटिल कर्मकांड का विरोध करते थे और नैतिकता को ही धर्म का आधार मानकर उसी को अपेक्षाकृत अधिक महत्व देते थे। जनता उनकी शिक्षा और उनके द्वारा किए गए चमत्कार देखर मुग्ध हो गई और उन्होंने उन्हें नबी मान लिया। तब ईसा ने यह प्रकट किया कि मैं ही मसीहा हूं, ईश्वर का पुत्र हूं और स्वर्ग का राज्य स्थापित करने स्वर्ग से उतरा हूं।… ईसा मसीह ने अपने संदेश के प्रचार के लिए बारह शिष्यों को चुनकर उन्हें विशेष शिक्षण और अधिकार प्रदान किए। स्वर्ग के राज्य के इस संदेश के कारण ईसा के प्रति यहूदी नेताओं में विरोध उत्पन्न हुआ। वे समझने लगे थे कि ईसा स्वर्ग का जो राज्य
बौद्धधर्म की सफलता के कारण || Reasons for the success of buddhism
धार्मिक सरलता ● यह कहना अनुचित नहीं कि भारत में बौद्धधर्म का उदय एक धार्मिक क्रांति के फलस्वरूप था वह धार्मिक क्रांति वैदिक धर्म के कर्मकाण्डों और पुरोहितों के प्रभाव के विरुद्ध हुई थी। जिस समय बौद्धधर्म का अभ्युदय हुआ उस समय की सामाजिक तथा धार्मिक स्थितियाँ उसके अनुकूल थीं वैदिक धर्म काफी पुराना था उसमें पहले जैसी सरलता, स्वाभाविकता और पवित्रता नहीं रह गयी थी। प्रारम्भ में यज्ञादि अनुष्ठानों में इतना आडम्बर नहीं था लेकिन बाद में धार्मिक कर्मकांड को ही साध्य समझा जाने लगा। लोग सदाचार को भूलकर कर्मकांड की बीमारियों में दिमाग खपाने लगे। यज्ञों तथा बलिदानों में ऐसी जटिलता आ गयी थी और उन पर इतना अधिक धन व्यय करना पड़ता था कि ये साधारण व्यक्ति की पहुँच के बाहर की चीज हो गये थे। अतएव, जब बुद्ध ने वैदिक कर्मकांड का विरोध करते हुए ब्राह्मणों की श्रेष्ठता को चुनोती देना शुरू किया तो अनेक लोग उनके उपदेशों से प्रभावित हो गये और उनका शिष्य बनना स्वीकार किया बुद्ध के उपदेश सरत तथा सादा थे। उनका आधार सदाचार था न कि पूजा पाठा ऐसी दशा में जनता का उनकी ओर आकृष्ट होना स्वाभाविक था। इस बात में कोई सन्देह नहीं कि महात्मा बुद्ध ने जीवन की जो व्यवस्था की उसमें किसी प्रकार की दार्शनिक जटिलता अथवा दुर्बोधता का अभाव था। बुद्ध ने सरल और स्पष्ट शब्दों में समझाया कि मानव जीवन दुखमय है। बुद्ध का व्यक्तित्व ● बौद्धधर्म के प्रचार में महालय बुद्ध के चुम्बकीय व्यक्तित्व का बहुत योग था। उनका व्यक्तित्व बड़ा प्रभावशाली, तेजस्वी और महान् था। उनका चरित्र इतना सरल और पवित्र था कि जो भी उनके सम्पर्क में आया उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रहा। वास्तव में उन्होंने अपने सिद्धांतों को अपने जीवन में पूर्णरूपेण चरितार्थ करके दूसरों पर अपने विचार की श्रेष्ठता की धाक जमायी। कुछ स्वार्थी लोगों ने उन्हें बदनाम करने का यत्न किया किन्तु उनके चरित्र की उच्चता के सामने उनके सारे यत्न विफल रहे। मनुष्य को चाहिए कि वह क्रोध पर प्रेम से, बुराई पर भलाई से, लोभ पर उदारता से और झूठ पर सच्चाई से विजय प्राप्त करें। अपने इस उपदेश को बुद्ध ने स्वयं अपने जीवन में पूर्णरूपेण निवाहा तात्पर्य यह है कि बुद्ध के धर्म की लोकप्रियता के और कुछ भी कारण रहे हो किन्तु उनके चरित्र ने अपने आप जनता का दिल जीत लिया। बुद्ध के अद्भुत अलोकिक और महान् व्यक्तित्व ने बौद्धधर्म की उन्नति में महत्वपूर्ण भाग लिया, जिससे उसका उत्थान अति शीघ्र हुआ। बुद्ध स्वयं एक राजकुमार थे किन्तु उन्होंने राजसुखों को छोड़कर लोककल्याण के लिए सन्यासव्रत ग्रहण कर लिया था। इस कारण सभी बुद्ध के व्यक्तित्व से प्रभावित थे वो गालियाँ सुनने पर भी मानसिक सन्तुलन बनाये रखते थे। उनकी दृष्टि में मनुष्य मनुष्य में कोई भेद नहीं था बौद्ध धर्म के प्रचार में इस बात से बड़ी सहायता प्रचार शैली की रोचकता ● बुद्ध ने जिस प्रचार शेली को अपनाया वह नितांत सरल, सुबोध और लोकरुचि के अनुकूल थी। उन्होंने लोककथाओं, लोकोक्तियों और मुहावरों को अपनी शिक्षाओं में प्रचुरता से प्रयोग किया। अपने सिद्धांतों को समझाने के लिए वे जिन उदाहरणों और उपमाओं का प्रयोग करते थे, उनका सीधा सम्बन्ध मनुष्य के दैनिक \’जीवन से होता था। वे अपने उपदेशों में हास्य और व्यंग्य का भी उचित मात्रा में पुट दिया करते थे जिससे उनमें रोचकता आ जाती थी। वे गूढ़ तत्वज्ञानी होने के साथ व्यावहारिक जीवन में भी निपुण थे। उनके द्वारा दिये गये दृष्टांत उनकी व्यावहारिक निपुणता का परिचय देते हैं। बुद्ध ने अपने शिष्यों को भी इसी नीति का अनुसरण करने की शिक्षा दी, जिससे बौद्धधर्म का प्रचार कार्य सरल हो गया। तर्कसम्मत धर्म ● बोद्ध धर्म के उत्थान का प्रमुख कारण उसका तर्कसम्मत होना था। बुद्ध ने अन्धविश्वास का परित्याग करके तर्क को अपनाया। उनकी तर्कपूर्ण धार्मिक विवेचना की सरलता हिन्दू धर्म के बड़े बड़े दिग्गज महारथियों तक को परास्त कर निरुत्तर कर दिया करती थी। बड़े-बड़े प्रसिद्ध विद्वान और महाकश्यप सारिपुत्र जैसे हिन्दू धर्म के महान आचार्य तक पराजित होकर उनके शिष्य बन गये थे।
इस्लाम धर्म का इतिहास || History of islam
इस्लाम एक एकेश्वरवादी धर्म है जो अल्लाह की तरफ़ से अंतिम रसूल और नबी, पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब सल्ल. द्वारा इंसानों तक पहुंचाई गई अंतिम ईश्वरीय किताब (क़ुरआन) की शिक्षा पर स्थापित है। इस्लाम शब्द का अर्थ है – ‘अल्लाह को समर्पण’। इस प्रकार मुसलमान वह है, जिसने अपने आपको अल्लाह को समर्पित कर दिया, अर्थात इस्लाम धर्म के नियमों पर चलने लगा। इस्लाम धर्म का आधारभूत सिद्धांत अल्लाह को सर्वशक्तिमान, एकमात्र ईश्वर और जगत का पालक तथा हज़रत मुहम्मद (सल्ल) को उनका संदेशवाहक या पैगम्बर मानना है। यही बात उनके ‘कलमे’ में दोहराई जाती है – ला इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मदुर्रसूलुल्लाह अर्थात ‘अल्लाह एक है, उसके अलावा कोई दूसरा नहीं और मुहम्मद उसके रसूल या पैगम्बर।’ कोई भी शुभ कार्य करने से पूर्व मुसलमान यह क़लमा पढ़ते हैं। इस्लाम में अल्लाह को कुछ हद तक साकार माना गया है, जो इस दुनिया से काफ़ी दूर सातवें आसमान पर रहता है। वह अभाव (शून्य) में सिर्फ़ ‘कुन’ कहकर ही दुनिया रचता है। उसकी रचनाओं में आग से बने फ़रिश्ते और मिट्टी से बने मनुष्य सर्वश्रेष्ठ हैं। गुमराह फ़रिश्तों को ‘शैतान’ कहा जाता है। इस्लाम के अनुसार मनुष्य सिर्फ़ एक बार दुनिया में जन्म लेता है। मृत्यु के पश्चात पुनः वह ईश्वरीय निर्णय (क़यामत) के दिन जी उठता है और मनुष्य के रूप में किये गये अपने कर्मों के अनुसार ही ‘जन्नत’ (स्वर्ग) या ‘नरक’ पाता है।
भारत में बौद्ध धर्म लगभग नष्ट हो गया इसके निम्नलिखित कारण थे || Buddhism was almost destroyed in India due to the following reasons
(1) बौद्ध संघों में भ्रष्टाचार का प्रवेश – महात्मा बुद्ध की मृत्यु के उपरान्त । आचार-विचार को शुद्ध रखने के नियम धीरे-धीरे शिथिल हो गए और बौद्ध भिक्षुओं में भ्रष्टाचार उत्पन्न हो गया। अत: लोग विलासी एवं पाखण्डी भिक्षुओं से घृणा करने लगे। (2) बौद्धों में तान्त्रिक प्रथाओं की उत्पत्ति – धीरे-धीरे बौद्धों में तन्त्रवाद (जादू-टोने) आदि का प्रवेश हो गया। महात्मा बुद्ध के पिछले जीवन के सम्बन्ध में हजारों व्यर्थ की कथाएँ प्रचलित हो गई। अत: इस धर्म से लोगों का विश्वास उठने लगा। (3) बौद्धों का दो सम्प्रदायों में विभाजन – महात्मा बुद्ध की मृत्यु के उपरान्त बौद्ध \’महायान\’ और \’हीनयान\’ नामक दो सम्प्रदायों में बँट गए, जिससे इनकी शक्ति घटने लगी। महायान बौद्धों ने मूर्ति-पूजा, योग तथा हिन्दुओं के कई अन्य सिद्धान्त अपना लिए, जिससे बौद्धों और हिन्दुओं में बहुत कम भेदभाव रह गया। धीरे-धीरे महायान बौद्ध हिन्दू धर्म में मिल गए तथा हिन्दुओं ने भी बुद्ध को अवतार मान लिया। (4) हिन्दू धर्म में सुधार- ब्राह्मणों ने बौद्धों का सफलतापूर्वक सामना करने के लिए अपने धर्म में अनेक सुधार कर लिए और बहुत-सी बुराइयों को दूर कर दिया। (5) शंकराचार्य और कुमारिल भट्ट का प्रचार – शंकराचार्य और कुमारिल भट्ट, दोनों ही वैदिक धर्म के कट्टर समर्थक थे और बौद्धों के नास्तिकवाद को बिल्कुल पसन्द नहीं करते थे। उन्होंने बौद्ध पण्डितों को अनेक स्थानों पर शास्त्रार्थ मैं पराजित किया और सम्पूर्ण देश में पुन: वैदिक धर्म का प्रचार किया। उनके प्रचार से हिन्दू धर्म जाग उठा और बौद्ध धर्म का हास होने लगा। (6) शुंग, गुप्त और राजपूत राजाओं का हिन्दू धर्म को संरक्षण – शुंग, गुप्त तथा राजपूत राजा हिन्दू धर्म के महान् समर्थक थे। उनके काल में पुनः यज्ञों और संस्कृत भाषा का महत्त्व बढ़ा और हिन्दू धर्म में एक नई जागृति उत्पन्न हुई।इसीलिए बौद्धों का प्रभाव घटने लगा। (7) तुर्कों के आक्रमण – 12वीं और 13वीं शताब्दी में तुर्कों ने बौद्धों के उद्दन्तपुरी विहार, नालन्दा विहार और अन्य विहारों को नष्ट कर दिया। उन्होंने सहस्रों बौद्धों को मार भगाया। अनेक बौद्ध भिक्षु अपनी जान बचाकर तिब्बत भाग गए। अत: तुर्कों द्वारा बंगाल और बिहार की विजय से बौद्ध धर्म को असह्य धक्का लगा।
बौद्ध धर्म के सिद्धांत || Principles of buddhism
महात्मा बुद्ध ने प्राचीन काल में बौद्ध धर्म प्रचार मौखिक रूप से ही किया था इसके पश्चात उनके शिष्य ने भी उनके धर्म का प्रचार किया था बाद में उनके शिष्यों ने महात्मा बुध के धर्म प्रचार के मुख्य बातों को लिखित रूप में संकलित किया महात्मा बुद्ध के उपदेशों के संकलन को त्रिपिटक के नाम से जाना जाता है यह तीन प्रकार के होते हैं इन त्रिपिटक ओम त्रिपिटक के द्वारा बौद्ध धर्म के सिद्धांतों का पता चलता है. बौद्ध धर्म के सिद्धांत :- 1. चार आर्य सत्य:- महा महात्मा बुद्ध ने अपने प्रथम उपदेश में अपनी शिक्षाओं के सर को प्रस्तुत किया. इन्हें चार आर्य सत्य कहा जाता था क्योंकि यह सिद्धांत चार सत्यम पर आधारित है. यह निम्न प्रकार से है:- * दुख- महात्मा बुद्ध के अनुसार जीवन ही दुखों से भरा है. उनका कहना है क्षणिक सुख को सुख मानना और दूरदर्शिता है. मानव जीवन दुखों से परिपूर्ण है महात्मा बुध के अनुसार जन्म भी दुख है, प्रिय वियोग भी दुख है, मरण भी दुख है, अप्रिय मिलन भी दुख है, इच्छित वस्तु की अप्राप्ति भी दुख है. महात्मा बुध के अनुसार सांसारिक सुख वास्तविक सुख है क्योंकि इसके नष्ट होने की चिंता हमेशा लगी रहती है. * दुख के कारण:- दुख के बहुत से कारण हैं. महात्मा बुद्ध के अनुसार दुख का मूल कारण है. अगर किसी की इच्छा पूरी नहीं होती है होता है या इच्छा के रास्ते में किसी की रुकावट आती है तो दुख आता है. * दुख निरोध:- महात्मा बुध के अनुसार दुखों से मुक्ति पाने के लिए दुख उत्पन्न करने वाले कारणों का समाधान करना अनिवार्य है. इच्छा पर विजय प्राप्त करने के बाद दुख को दूर किया जा सकता है. दुख निरोध को है महात्मा बुद्ध ने दुख निवारण माना है. * दुख निरोध मार्ग:- महात्मा बुद्ध के अनुसार योगिक क्रियाएं या तपस्या जो शारीरिक यातनाएं ना तो तृष्णा ओं का अंत कर सकते हैं ना पुनर्जन्म से मुक्ति दिला सकते हैं. महात्मा बुद्ध ने बताया कि तृष्णा और वासनाओं का विनाश तथा दुखों का निरोध अष्टांगिक मार्ग के अनुसरण से ही हो सकता है. 2. अष्टांगिक मार्ग:- दुखों पर विजय प्राप्त करने के लिए अथवा उनसे मुक्ति पाने के लिए महात्मा बुद्ध ने बहुत से रास्ते बताएं. महात्मा बुद्ध के बताए मार्गों को अष्टांगिक मार्ग कहते हैं. अष्टांगिक मार्ग आठ प्रकार के होते हैं:- * सम्यक् दृष्टि – महात्मा बुद्ध का कहना है चार आर्य सत्य को समझते हुए अष्टांग मार्ग और दृष्टि रखना, अर्थात वित्तीय दृष्टि को त्याग कर यथार्थ स्वरूप पर ध्यान देना. * सम्यक् संकल्प – दूसरों को हानि पहुंचाते हुए धन के संग्रह नहीं करने की निश्चय करना. सुख सुविधा विलासिता आदि में आदि से बचने का संकल्प करना. * सम्यक् वाक् – अपनी बोली पर नियंत्रण रखना झूठ बोलना, निंदा अपशब्द आदि के प्रयोग से बचना. * सम्यक् कर्मान्त – ऐसे कर्म से बचना चाहिए जिससे समाज अथवा किसी व्यक्ति की हानि हो, बल्कि ऐसे कार्य करना चाहिए जिससे दूसरों को लाभ मिले. * सम्यक् आजीविका – अपनी आजीविका के लिए वैसे चीजों को बेचना, जिससे दूसरों का नुकसान हो जैसे कि शराब बेचना, जानवर काटना आदि से बचना चाहिए, बल्कि अच्छे साधनों के द्वारा अपनी जीविकोपार्जन करना चाहिए. * सम्यक् व्यायाम – अपने मस्तिष्क को मेरे विचारों में से दूर रखना चाहिए और अच्छे विचारों से भरना चाहिए. * सम्यक् स्मृति – अपने ज्ञान को हमेशा याद रखना चाहिए तथा दुर्गुण भाव को अपने मन में कभी ना आने देना चाहिए. * सम्यक् समाधि – जो उपरोक्त सात नियमों का पालन करके खुद को परिपूर्ण कर लेता है. उसे अपनी चित्त की एकाग्रता के लिए समाधि ले लेना चाहिए. 3. दस शील :- इसके अलावा महात्मा बुद्ध ने प्रतिदिन के जीवन में व्यवहार में लाने के लिए दस बिंदुओं पर बड़ा बल दिया है. इसे दस शील के नाम से जाना जाता है. ये निम्नलिखित हैं:- * सत्य बोलना * अहिंसा का पालन करना * ब्रह्मचर्य के अनुसार जीवन का पालन करना * चोरी से बचना * धन संग्रह की प्रवृत्ति से बचना * सुगंधित पदार्थों का त्याग करना * कोमल शैया का त्याग करना * नृत्य, गायन, मादक, कामोत्तेजक वस्तुओं का त्याग करना * असमय भोजन का त्याग करना * बुरे विचारों का त्याग करना महात्मा बुद्ध के अनुसार इस संसार में सभी निश्चित है. यहां तक की आत्मा का भी कोई अस्तित्व नहीं है. जीवन का आगमन आत्मा का पुनर्जन्म अथवा आवागमन नहीं बल्कि मनुष्य की एक क्रिया और उसकी प्रतिक्रिया का परिणाम है. महात्मा बुद्ध को ना ईश्वर में विश्वास था और ना आत्मा में. उनको पूजा, बली, यज्ञ आदि में भी विश्वास नहीं था. उसने लोगों को सत्य ज्ञान और कर्म ज्ञान के अनुसार कर्म को नष्ट करके निर्वाण प्राप्ति का मार्ग बताया था.
विण बोलियां सब कीछ जाणदा || Vin boleya sab kish janda
विण बोलियां सब कीछ जाणदा विण बोलियां सब कीछ जाणदा किस आगे कीजै अरदास किस आगे कीजै अरदास विण बोलियां सब कीछ जाणदा विण बोलियां सब कीछ जाणदा बबिहा सगळी धरती जे फिरै उड़ चढ़े आकाश बबिहा सगळी धरती जे फिरै उड़ चढ़े आकाश उड्ड चढ़े आकाश विण बोलियां सब कीछ जाणदा विण बोलियां सब कीछ जाणदा किस आगे कीजै अरदास किस आगे कीजै अरदास विण बोलियां सब कीछ जाणदा विण बोलियां सब कीछ जाणदा सतगुरु मिलिए जल पाइए चूखे भूख पियास सतगुरु मिलिए जल पाइए चूखे भूख पियास चूखे भूख पियास विण बोलियां सब कीछ जाणदा विण बोलियां सब कीछ जाणदा किस आगे कीजै अरदास किस आगे कीजै अरदास विण बोलियां सब कीछ जाणदा विण बोलियां सब कीछ जाणदा जियो पिंड सब तिस का सब किछ तिस कै पास जियो पिंड सब तिस का सब किछ तिस कै पास सब किछ तिस कै पास विण बोलियां सब कीछ जाणदा विण बोलियां सब कीछ जाणदा किस आगे कीजै अरदास किस आगे कीजै अरदास विण बोलियां सब कीछ जाणदा विण बोलियां सब कीछ जाणदा नानक घट घट एको वरतदा शब्द करै प्रगास नानक घट घट एको वरतदा शब्द करै प्रगास शब्द करै प्रगास विण बोलियां सब कीछ जाणदा विण बोलियां सब कीछ जाणदा किस आगे कीजै अरदास किस आगे कीजै अरदास विण बोलियां सब कीछ जाणदा विण बोलियां सब कीछ जाणदा वाहेगुरु वाहेगुरु… वाहेगुरु वाहेगुरु वाहेगुरु वाहेगुरु… वाहेगुरु वाहेगुरु वाहेगुरु वाहेगुरु… वाहेगुरु वाहेगुरु वाहेगुरु वाहेगुरु… वाहेगुरु वाहेगुरु वाहेगुरु वाहेगुरु… वाहेगुरु वाहेगुरु विण बोलियां सब कीछ जाणदा विण बोलियां सब कीछ जाणदा विण बोलियां सब कीछ जाणदा विण बोलियां सब कीछ जाणदा
दुर्गा अष्टमी के शुभ अवसर पर राजेश्वरी धाम देवी राज रानी वैष्णो मंदिर,जालंधर में बड़ी श्रद्धा पूर्वक अष्टमी का आयोजन किया गया
मां के चरणों में स्वर्ग है मां दुर्गा आप सबकी मनोकामनाएं पूरी करें और आप सब पर अपना आशीर्वाद बनाए रखें राजेश्वरी धाम देवी राजरानी वैष्णो मंदिर बस्ती शेख रोड,जालंधर में बड़ी श्रद्धा पूर्वक दुर्गा अष्टमी का आयोजन किया गया | इस मौके पर मां भगवती के सुंदर भजनों का गुणगान किया गया मां का गुणगान करने पहुंची पार्टियों में पवन पुजारी एंड पार्टी, पंकज ठाकुर एंड पार्टी द्वारा भजनों का गुणगान किया गया मंदिर प्रबंधक कमेटी के प्रधान श्री कैलाश बब्बर द्वारा आए हुए भजन गायकों को माता की चुनरी देकर सम्मानित किया अष्टमी के दौरान मां देवी राज रानी जी ने भक्तों को दर्शन देकर आशीर्वाद दिया और मंदिर प्रबंधक कमेटी के प्रधान श्री कैलाश बब्बर ने मंदिर में सेवा करने वाले सभी भक्तों को मां की चुनरी और मां का स्वरूप देकर सम्मानित भी किया अष्टमी के दौरान राजेश्वरी धाम वेलफेयर ट्रस्ट के मेंबर विजय दुआ, सुरेंद्र अरोड़ा, रामकिशन नानू, ज्योति बब्बर, अमन बत्रा, जतिन बब्बर, युदराज सिंह, राजीव सहदेव, सतीश बब्बर, नवीन बब्बर, पंकज ठाकुर, पवन नागपाल, मनमोहन अरोड़ा, जतिन मिंटू, टिम्मी अरोड़ा, किशन लाल, पंकज अरोड़ा, विजय बेगोवाल व अन्य मेंबर मौजूद थे दुर्गा अष्टमी के दौरान मंदिर प्रबंधक कमेटी की ओर से विशाल भंडारे का आयोजन भी किया गया मंदिर प्रबंधक कमेटी के प्रधान श्री कैलाश बब्बर ने मीडिया से बातचीत करते हुए कहां मां भगवती सबकी झोलिया भरे और सभी भक्तों से कहा कि हर महीने की दुर्गा अष्टमी पर आकर मां का आशीर्वाद प्राप्त करें और भंडारे का आयोजन भी हर महीने किया जाता है
दर्शन देख जीवां गुरु तेरा || Darshan dekh Jiwan guru tera
दर्शन देख जीवां गुरु तेरा – २ पूरण करम होये प्रभु मेरा – २ एह बिनंती सुन प्रभु मेरे – २ देहे नाम कर अपने चेरे – २ अपनी शरण राख प्रभु दाते – २ गुर-प्रसाद किनै बिरले जाते – २ दर्शन देख जीवां गुरु तेरा – २ सुनो बिनो प्रभ मेरे मीता – २ चरण कमल बसे मेरे चीता – २ दर्शन देख जीवां गुरु तेरा – २ नानक एक करे अरदास – २ बिसर नाही पूरण गुण तास – 2 दर्शन देख जीवां गुरु तेरा – २ दर्शन देख जीवां गुरु तेरा – २ पूरण करम होये प्रभु मेरा – २
सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र की कहानी || Story of satyawadi raja harishchandra in hindi
एक बार राजा हरिश्चंद्र के सपने में गेरुआ वस्त्र धारण किए हुए एक साधु आए, जिन्होंने सम्राट से उनका पूरा राज पाठ दक्षिणी में मांगा लिया। राजा इतने दयालु थे, कि वह कभी भी अपने शरण में आए हुए किसी भी साधु को खाली हाथ नहीं लौटने देते थे, इसलिए राजा हरिश्चंद्र ने अपना पूरा राज्य उन साधु के नाम कर दिया। अगले दिन जब सवेरा हुआ तो राजा के दरबार में एक साधु ने दर्शन दिया।महाराजा हरिश्चंद्र को उस साधु ने अपना सपना याद करवाया, जिसमें उन्होंने अपना सारा राजपाट साधु के नाम कर दिया था।जैसे ही हरीश चंद्र जी को अपना सपना स्मरण हुआ, तो बिना किसी देरी के उन्होंने हामी भरी और अपना विशाल राज्य उन साधु के नाम कर दिया। दरअसल साधु के वेश में वह महात्मा और कोई नहीं, बल्कि स्वयं महर्षि विश्वामित्र थे जो राजा हरिश्चंद्र की परीक्षा लेने आए थे। इसके आगे साधु ने राजा से दक्षिणा की मांग की। हरीश चंद्र जी ने अपने सिपाहियों को शाही खजाने में से भेंट लाने के लिए कहा। लेकिन साधु ने उन्हें स्मरण कराया की राजा ने तो पहले ही सब कुछ साधु के नाम कर दिया है, तो वह राजकोष में से खजाना भला उन्हें दक्षिणा के रूप में कैसे दे सकते हैं।राजा हरिश्चंद्र बड़े दुविधा में पड़ चुके थे, उसी बीच साधु ने क्रोध में आकर उनसे कहा, कि यदि आप मुझे दक्षिणा नहीं दे सकते तो आप मेरा अपमान कर रहे हैं। राजा ने साधु को आश्वासन देते हुए कहा, कि हे देवात्मा मैं आपको दक्षिणा जरूर दूंगा, बस मुझे कुछ समय दीजिए।इसके बाद महाराज अपने पत्नी और पुत्र के साथ राज्य को छोड़कर पावन नगरी काशी में चले गए। यहां उन्होंने स्वयं को बेचना चाहा लेकिन कोई भी उन्हें खरीदने को तैयार ही नहीं था। थोड़े परिश्रम के बाद राजा हरिश्चंद्र ने अपनी पत्नी और पुत्र को एक ब्राह्मण दंपत्ति के यहां बेच दिया जहां, रानी तारामती एक सेविका के रूप में काम करने लगी। राजा ने स्वयं को श्मशान में रहने वाले एक चांडाल को बेचा, जो अंतिम संस्कार किया करता था। चांडाल ने महाराजा हरिश्चंद्र को खरीद लिया और एक सेवक बनाकर रख लिया। महाराजा ने कैसे भी स्वयं तथा अपनी पत्नी और पुत्र को नीलाम कर के दक्षिणा इकट्ठा किया, जिससे उन्होंने साधु को दक्षिणा चुकाया। सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन एक दिन जब रोहिताश्व वन में भगवान की पूजा के लिए पुष्प इकट्ठा कर रहा था, तो उसे एक सांप ने दंस लिया जिसके बाद वह मूर्छित हो गया। तारामती अपने मूर्छित पुत्र को लेकर चारों ओर मदद की गुहार लगा रही थी, लेकिन तब तक रोहिताश्व की मृत्यु हो चुकी थी। तारामती अपने पुत्र के मृत शरीर का अंतिम संस्कार करने के लिए शमशान पहुंची तो वहां उनकी मुलाकात अपने पति राजा हरिश्चंद्र से हुई। तारामती ने पुत्र की मृत्यु की बात बताई और बताया कि उनके पास शमशान कर चुकाने के लिए कुछ भी नहीं है। लेकिन फिर भी राजा हरिश्चंद्र जी अपने मालिक के प्रति वफादार रहे और बिना श्मशान कर चुकाए अपने खुद के पुत्र का अंतिम संस्कार करने से इंकार कर दिया।विवश होकर तारामती ने साड़ी का आंचल फाड़कर शमशान कर चुकाने का निश्चय किया। जैसे ही रानी तारामती ने अपना आंचल फाड़ने की चेष्टा की उसी क्षण आकाश से मेघ गर्जना हुई और एक आकाशवाणी हुई।उस आकाशवाणी मे महर्षि विश्वामित्र जी ने महाराजा हरिश्चंद्र को आशीर्वाद दिया और साथ ही उनके पुत्र रोहिताश्व को भी जीवित कर दिया। तथा साथ ही उनका पूरा राज पाठ ज्यों का त्यों वापस लौटा दिया। उसी क्षण श्मशान में ही देवताओं ने राजा हरिश्चंद्र और रानी तारामती पर पुष्प वर्षा किया। राजा हरिश्चंद्र जी का नाम भी पूरे विश्व में बड़े आदर सत्कार के साथ लिया जाता है। राजा हरिश्चंद्र जी के जीवन से प्रेरित होकर कई नाट्य कलाएं और कथाएं की जाती हैं।
जैन धर्म के उदय के कारण || Reasons for the rise of jainism
जैन धर्म हालाँकि प्राचीन धर्मों में से एक माना जाता है पर इस धर्म का उदय महावीर स्वामी के बाद हुआ। इसके अनेक कारण थे। इस दौरान अनेक राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक परिवर्तन हुए। ये सभी परिवर्तन इस धर्म के उदय का कारण बनें। जिनमें से कुछ मुख्य कारण इस प्रकार हैं ● छठी सदी ईसा पूर्व में ब्राह्मणों द्वारा अनेक धार्मिक आडम्बर फैलाए जा रहे थे। इस समय के आते-आते ऋग्वेद आदि में वर्णित बातों को तोड़-मरोड़कर अपने फायदे के लिए प्रयोग किया जाने लगा था। ●इस वक्त 16 महाजनपदों का उदय हुआ था। अतः सत्ता संघर्ष में शामिल क्षत्रिय वर्ण भले ही सत्ता के शीर्ष पर स्थित पहुँच गए थे पर अभी भी उनके स्थान को ब्राह्मणों से नीचे देखा जाता था। इस प्रकार सामाजिक रूप से समाज में एक खाईं बनने लगी थी। क्षत्रियों ने भी वर्ण व्यवस्था का विरोध किया। अगर हम महावीर स्वामी को और उनके समकालीन बुद्ध को भी देखें तो वह भी क्षत्रिय ही थे। ● वैश्य वर्ण भी इस वक्त तक काफी व्यापक रूप में स्थापित हो गया था। आर्थिक रूप से अधिक सम्पन्न होने के बावजूद भी वैश्यों का स्थान ब्राह्मण और क्षत्रिय के नीचे तीसरे स्थान पर ही था। साथ ही सम्पत्ति का कुछ हिस्सा ब्राह्मणों द्वारा पूजा-पाठ आदि कर्म-कांडो के नाम पर लिया जाता था। इस तरह इस वर्ग में भी एक तरह का असंतोष ज़रूर व्याप्त था। इस धर्म की प्रवृत्ति ऐसी न होने के कारण इसे वैश्यों द्वारा संरक्षण और बढ़ावा भी दिया गया। ●शूद्र वर्ण की स्थिति वेदों के बदलते नैरेटिव के साथ दिन पर दिन गिरती चली जा रही थी। जहाँ एक ओर ऋग्वेद में सभी वर्णों की महत्ता को बराबर स्वीकार किया था वहीं इस काल तक उनकी स्थिति बदतर हो चली थी। ●एक वर्ग जो कृषकों का था उनमें बलि प्रथा के कारण असंतोष व्याप्त था। गाय आदि की बलि इस वक्त में दी जाती थी। समय के साथ गाय और बैल पवित्रता के साथ-साथ एक व्यवसायिक रूप से फायदेमंद जानवर बने। किसान एक ऐसी व्यवस्था चाहते थे जिसमें पशु-बलि न हो। ● अब अगर हम वैश्विक स्थिति को देखें तो उस वक्त चीन में कन्फ्यूसियस, इरान में ज़रथ्रुष्ट तथा युनान में पाइथागोरस का उदय हुआ था। अतः विश्व के विभिन्न देशों में भी नए विचारों का जागरण हो रहा था। चूंकि भारत प्राचीन काल से ही व्यवसाय आदि के माध्यम से इन देशों से जुड़ा हुआ था अतः इसके प्रभाव से भारत नहीं रहा जिसके फलस्वरूप यहाँ भी रूढ़िवादी परम्पराओं को गिराकर नए आदर्श की स्थापना की कोशिश की गई।
कर किरपा तेरे गुण गावा || Kar Kirpa tere gun gava
कर किरपा तेरे गुण गावा, नानक नाम जपत सुख पावा, तू वड दाता अन्तर्यामी, सब मे हैं रविया पुरण प्रभ स्वामी, कर किरपा तेरे गुण गावा मेरे प्रभ प्रीतम प्राण अधारा, हॅव सूंड़-सूंड़ जीवा नाम तुमारा, कर किरपा तेरे गुण गावा तेरी शरण मेरे सतगुुरु मेरे पूरे, मन निर्मल होये संता दूरे, कर किरपा तेरे गुण गावा चरण कमल हिर्दय उरधारे, तेरे दर्शन कऊ जाई बल्हारे, कर किरपा तेरे गुण गावा कर कृपा तेरे गुण गावा, नानक नाम जपत सुख पावा, कर किरपा तेरे गुण गावा
कोई बोलै राम राम कोई खुदाए || Koi bole ram ram koi khudaye
कोई बोलै राम राम कोई खुदाए कोई सेवै गुसईआ कोई अलाहि कोई बोलै राम राम कोई खुदाए कोई सेवै गुसईआ कोई अलाहि ..x2 कारण करण, करण करीम किरपा धार, धार रहीम ..x2 कोई बोलै राम राम, कोई खुदाए कोई सेवै गुसईआ, कोई अलाहि ..x4 कोई नावै तीरथ, कोई हज जाए कोई करै पूजा, कोई सिर निवाए ..x2 कोई करै पूजा, कोई सिर निवाए कोई बोलै राम राम, कोई खुदाए कोई सेवै गुसईआ, कोई अलाहि ..x4 कोई पड़ै बेद, कोई कतेब कोई ओढै नील, कोई सुपेद ..x2 कोई ओढै नील, कोई सुपेद कोई बोलै राम राम, कोई खुदाए कोई सेवै गुसईआ, कोई अलाहि ..x4 कोई कहै तुरक, कोई कहै हिंदू कोई बाछै भिस्त, कोई सुरगिंदू ..x2 कोई बाछै भिस्त, कोई सुरगिंदू कोई बोलै राम राम, कोई खुदाए कोई सेवै गुसईआ कोई अलाहि ..x4 कहु नानक जिन, हुकम पछाता प्रभ साहिब का, तिन भेद जाता ..x2 प्रभ साहिब का, तिन भेद जाता कोई बोलै राम राम कोई खुदाए कोई सेवै गुसईआ कोई अलाहि ..x4 कारण करण करीम ॥ किरपा धार रहीम ॥१॥ रहाउ ॥ कोई बोलै राम राम कोई खुदाए ॥ कोई सेवै गुसईआ कोई अलाहि ॥१॥
जैन धर्म का इतिहास || History of jainism
जैन धर्म को भारत के प्राचीन धर्मों में से एक माना जाता है। जैन ग्रंथों के अनुसार यह धर्म अनंतकाल से माना जाता रहा है, हालाँकि यह जनमानस में बड़े स्तर पर महावीर स्वामी के बाद फैलता नज़र आता है। जैन शब्द को ‘जिन’ शब्द से निकला हुआ माना जाता है। जिन’ शब्द ‘जि’ धातु से निकला है जिसका अर्थ है जीतना। इस धर्म की परंपरा का निर्वाह तीर्थंकरों के माध्यम से होता हुआ आज के स्वरूप तक पहुँचा है। जैन धर्म में 24 तिर्थंकर हुए। जिसमें से पहले थे ऋषभदेव तथा अंतिम महावीर स्वामी। इस धर्म की प्राचीनता को सिद्ध करते हुए ऋषभदेव को राजा भरत का पिता तक माना जाता है। जैन धर्म अपने साहित्यिक पक्ष का भी धनी रहा है जो इसकी प्राचीनता को पुष्ट करता है। यह धर्म ‘अहिंसा’ के सिद्धांत को बहुत ही सख़्ती से मानता है। इस धर्म के दो प्रमुख सम्प्रदाय हैं – ‘दिगम्बर‘ और ‘श्वेतांबर‘। जैनियों के धार्मिक स्थल को जिनालय कहा जाता है। जैन बिलो के अनुसार वस्तु का स्वाभाव समझा जाता है, इसलिए जब से सृष्टि है तब से धर्म है, और जब तक सृष्टि है, तब तक धर्म रहेगा, अर्थात् जैन धर्म सदा से अस्तित्व में था और सदा रहेगा। इतिहासकारो द्वारा जैन धर्म का मूल भी सिंधु घाटी सभ्यता से जोड़ा जाता है जो हिन्द आर्य प्रवास से पूर्व की देशी आध्यात्मिकता को दर्शाता है। सिन्धु घाटी से मिले जैन शिलालेख भी जैन धर्म के सबसे प्राचीन धर्म होने की पुष्टि करते है।अन्य शोधार्थियों के अनुसार श्रमण परम्परा ऐतिहासिक वैदिक धर्म के हिन्द-आर्य प्रथाओं के साथ समकालीन और पृथक हुआ।जैन ग्रंथो के अनुसार वर्तमान में प्रचलित जैन धर्म भगवान आदिनाथ के समय से प्रचलन में आया। यहीं से जो तीर्थंकर परम्परा प्रारम्भ हुयी वह भगवान महावीर या वर्धमान तक चलती रही जिन्होंने ईसा से ५२७ वर्ष पूर्व निर्वाण प्राप्त किया था। उनके अनुसार यह धर्म बौद्ध धर्म के पीछे उसी के कुछ तत्वों को लेकर और उनमें कुछ ब्राह्मण धर्म की शैली मिलाकर खडा़ किया गया।
बौद्ध धर्म का इतिहास और रोचक जानकारिया || History and interesting facts of Buddhism
भारत में कई धर्मों को मानने वाले लोग रहते हैं. जिसमें बौद्ध धर्म के अनुयायी भी शामिल हैं. बौद्ध धर्म एक प्राचीन भारतीय धर्म (Indian Religion) है और आज के समय में दुनिया के प्रमुख धर्मों में से एक है. यह भारत की श्रमण परम्परा से निकला धर्म और दर्शन है. बौद्ध धर्म (Buddhism) की स्थापना तथागत भगवान बुद्ध ने करीब 2600 वर्ष पहले की थी. बौद्ध धर्म को मानने वाले ज्यादातर चीन, जापान, कोरिया, थाईलैंड, कंबोडिया, श्रीलंका, नेपाल, भूटान और भारत जैसे कई देशों में रहते हैं| बौद्ध धर्म के बारे में कुछ महत्वपूर्ण और रोचक जानकारिया – 1. बुद्ध की जन्म-मृत्यु “ईसा पूर्व 536 – ईसा पूर्व 483” मानी जाती है. हाल ही में हुए शोध से पता चला है कि बुद्ध का जन्म प्रचलित जन्म वर्ष से करीब एक सदी पहले हुआ था, “ईसा पूर्व 623 – ईसा पूर्व 543” को बुद्ध का जीवनकाल माना जाता है. 2. गौतम बुद्ध की मृत्यु के बाद बुद्ध के शरीर के अवशेषों को आठ भागों में बांट कर उन पर आठ स्तूपों का निर्माण कराया गया. 3. बुद्ध का असली नाम सिद्धार्थ गौतम था. “बुद्ध” एक सम्मान जनक उपाधि है यह कोई व्यक्तिगत नाम नहीं है. इसका अर्थ है “जागृत व्यक्ति.” 4. बौद्ध धर्म में कोई एक केंद्रीय ग्रंथ नहीं है. बौद्ध धर्म के अनेक ग्रंथ है, जिन्हें कोई भी व्यक्ति अपने संपूर्ण जीवन काल में नहीं पढ़ सकता. बौद्ध ग्रंथों में सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ “त्रिपिटक” को माना जाता है. 5. बुद्ध का जन्म नेपाल के लुम्बिनी में वेसाक पूर्णिमा के दिन एक बगीचे में हुआ था. 6.. बौद्ध धर्म में अन्य धार्मिक प्रथाओं की तरह, किसी व्यक्ति को एक निर्माता, ईश्वर या देवताओं में विश्वास करने की आवश्यकता नहीं होती. तीन मौलिक अवधारणाओं में बौद्ध धर्म विश्वास करता है. 1. कुछ भी स्थायी नहीं है. 2. सभी कार्यों के परिणाम होते हैं. 3. इसे बदलना संभव है. 7.आधिकारिक तौर पर दुनिया के छ: देश बौद्ध राष्ट्र हैं. भूटान, कंबोडिया, श्रीलंका, थाईलैंड, लाओस और म्यांमार. वहीं मंगोलिया, काल्मिकिया और चीन दुनिया में वे देश हैं जो आधिकारिक तौर पर बौद्ध राष्ट्र नहीं है लेकिन बौद्ध धर्म को समर्थन करते हैं. और उसका प्रचार प्रसार करते हैं. 8. वैज्ञानिकों ने जब बौद्ध भिक्षुओं के मस्तिष्क का अध्ययन किया, तो पाया कि ध्यान ने भिक्षुओं के मस्तिष्क की तरंगों को इस तरह से बदल दिया जिससे खुशी और लचीलेपन की भावना कई गुना बढ़ गईं. 9. बुद्ध की प्रथम मूर्ति मथुरा कला के अंतर्गत बनी थी. वहीं सर्वाधिक बुद्ध की मूर्तियों का निर्माण गंधार शैली के अंतर्गत किया गया था. 10. दुनिया का पहला विश्व धर्म होने के साथ ही बौद्ध धर्म पहला प्रचारक धर्म भी था जो अपने मूल स्थान से दूर-दूर तक पूरी दुनिया में फैला था.