भगवान महावीर की जीवनी व इतिहास पंचशील सिद्धान्त के प्रर्वतक एवं जैन धर्म के चौबिसवें तीर्थकंर महावीर स्वामी अहिंसा के मूर्तिमान प्रतीक थे। जिस युग में हिंसा, पशुबलि, जाति-पाँति के भेदभाव का बोलबाला था उसी युग में भगवान महावीर ने जन्म लिया। उन्होंने दुनिया को सत्य, अहिंसा जैसे खास उपदेशों के माध्यम से सही राह दिखाने की कोशिश की। अपने अनेक प्रवचनों से मनुष्यों का सही मार्गदर्शन किया। नाम Lord Mahavira / भगवान् महावीर जन्म 599 BC मृत्यु 527 BC पिता सिद्धार्थ माता त्रिशाला नवीन शोध के अनुसार जैन धर्म की स्थापना वैदिक काल में हुई थी। जैन धर्म के वास्तविक संस्थापक ऋषभदेव थे। महावीर स्वामी ने जैन धर्म में अपेक्षित सुधार करके इसका व्यापक स्तर पर प्रचार किया। महावीर स्वामी का जन्म वैशाली (बिहार) के निकट कुण्डग्राम में क्षत्रिय परिवार में हुआ था। बचपन का नाम वर्धमान था। पिता सिद्धार्थ, जो कुण्डग्राम के राजा थे एवं माता त्रिशला का संबन्ध भी राजघराने से था। राजपरिवार में जन्म होने के कारण महावीर स्वामी का प्रारम्भिक जीवन सुख-सुविधाओं से परिपूर्ण बीता। पिता की मृत्यु के पश्चात 30 वर्ष की आयु में इन्होने सन्यास ग्रहण कर लिया और कठोर तप में लीन हो गये। ऋजुपालिका नदि के तट पर सालवृक्ष के नीचे उन्हे ‘कैवल्य’ ज्ञान (सर्वोच्च ज्ञान) की प्राप्ति हुई जिसके कारण उन्हे ‘केवलिन’ पुकारा गया। इन्द्रियों को वश में करने के कारण ‘जिन’ कहलाये एवं पराक्रम के कारण ‘महावीर’ के नाम से विख्यात हुए। महावीर स्वामी द्वारा बताया गया पंचशील सिद्धांत अहिंसा – कर्म, वाणी, व विचार में किसी भी तरह की अहिंसा न हो, गलती से भी किसी को चोट ना पहुंचाई जाए सत्य – सदा सत्य बोलें अपरिग्रह – किसी तरह की संपत्ति न रखें, किसी चीज से जुडें नहीं अचौर्य (अस्तेय) – कभी चोरी ना करें ब्रह्मचर्य – जैन मुनि भोग विलास से दूर रहें, गृहस्त अपने साथी के प्रति वफादार रहें जैन धर्म, महावीर स्वामी के समय में कोशल, विदेह, मगध, अंग, काशी, मिथला आदि राज्यों में लोकप्रिय हो गया था। मौर्यवंश व गुप्त वंश के शासनकाल के मध्य में जैन धर्म पूर्व में उङिसा से लेकर पश्चिम में मथुरा तक फैला था। महावीर स्वामी की मृत्यु के लगभग दो सौ वर्ष पश्चात जैन धर्म मुख्यतः दो सम्प्रदाय में बंट गया: दिगम्बर जैन और श्वेताम्बर जैन। श्वेताम्बर जैन मुनि सफेद वस्त्र धारण करते हैं जबकि दिगम्बर जैन मुनियों के लिये नग्न रहना आवश्यक है। जैन धर्म ने भारतीय सभ्यता और संस्कृति के विभिन्न पक्षों को बहुत प्रभावित किया है। दर्शन, कला, और साहित्य के क्षेत्र में जैन धर्म का महत्वपूर्ण योगदान है। जैन धर्म में वैज्ञानिक तर्कों के साथ अपने सिद्धान्तो को जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास किया गया है। अहिंसा का सिद्धान्त जैन धर्म की मुख्य देन है। महावीर स्वामी ने पशु-पक्षी तथा पेङ-पौधे तक की हत्या न करने का अनुरोध किया है। अहिंसा की शिक्षा से ही समस्त देश में दया को ही धर्म प्रधान अंग माना जाता है। जैन धर्म से प्रेरित होकर कई राजाओं ने निर्धन वर्ग के लिये औषधालयों, विश्रामालयों एवं पाठशालाओं का निर्माण करवाया। जैन धर्म के 24 तीर्थकंरों के नाम इस प्रकार हैः- 1.ऋषभदेव, 2. अजीतनाथ, 3.सम्भवनाथ, 4.अभिनन्दन, 5.सुमतिनाथ, 6.पद्मप्रभु, 7.सुपार्श्वनाथ, 8.चन्द्रप्रभु, 9.सुविधि, 10.शीतल, 11.श्रेयांश, 12.वासुपुज्य, 13.विमल, 14.अनन्त, 15.धर्म, 16.शान्ति, 17.कुन्थ, 18.अर, 19.मल्लि, 20.मुनि सुब्रत, 21.नेमिनाथ, 22.अरिष्टनेमि, 23.पार्श्वनाथ, 24.महावीर स्वामी। महावीर स्वामी ने समाज में प्रचलित वर्ण व्यवस्था का विरोध किया था। भगवान महावीर का आत्म धर्म जगत की प्रत्येक आत्मा के लिए समान था। महावीर का ‘जीयो और जीने दो’ का सिद्धांत जनकल्याण की भावना को परिलाक्षित करता है।
गुरु गोरखनाथ जी की जीवनी एवं इतिहास
गुरु गोरखनाथ जी की जीवनी एवं इतिहास गुरु गोरखनाथ भारत की भूमि ऋषि-मुनियो और तपस्वियों की भूमि रही है। जिन्होंने अपने बौद्धिक क्षमता के दम पर भारत ही नहीं वरन सम्पूर्ण सृष्टि के भलाई के लिए बहुत योगदान दिया है। ऋषि-मुनियो के शिक्षा से हमें जीवन में सही राह चुनने का ज्ञान होता है। साधु महात्माओ द्वारा दिए गए ज्ञान-विज्ञान 21 वी सदी में भी बहुत प्रासंगिक हैं। महापुरुषों में ऐसे कई ऋषि-मुनि हुए जो बचपन से ही दैविये गुणों के कारण या तपस्या के फलस्वरूप कई प्रकार की सिद्धियाँ व शक्तियां प्राप्त कर लेते थे, जिनका उपयोग मानव कल्याण तथा धर्म के रक्षार्थ हेतु हमेशा से किया जाता रहा है। यह सिद्धियाँ और शक्तियाँ ऋषि-मुनियों को एक चमत्कारी तथा प्रभावी व्यक्तित्व प्रदान करती हैं और ऐसे सिद्ध योगियों के लिए भौतिक सीमाए किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न नहीं कर पाती है। पर इन शक्तियों को प्राप्त करना सहज नहीं है| परमशक्तिशाली ईश्वर द्वारा इन सिद्धियों के सुपात्र को ही एक कड़ी परीक्षा के बाद प्रदान किया जाता है। आज हम ऐसे एक सुपात्र सिद्ध महापुरुष जो साक्षात् शिवरूप माने जाते हैं के बारे में बात करेंगे| इनके बारे में कहा जाता है कि आज भी वह सशरीर जीवित हैं और हमारे पुकार को सुनते हैं और हमें मुसीबतो से पार भी लगाते हैं। हम बात कर रहे हैं महादेव भोलेनाथ के परम भक्त – गोरखनाथ शब्द का अर्थ गुरु गोरखनाथ को गोरक्षनाथ के नाम से भी जाना जाता है जिसका शाब्दिक अर्थ “गाय को रखने और पालने वाला या गाय की रक्षा करने वाला” होता है। सनातन धर्म में गाय का बहुत ही धार्मिक महत्व है। मान्यता है कि गाय के शरीर में सभी 33 करोड़ देवी-देवता निवास करते है। भारतीय संस्कृति में गाय को माता के रूप में पूजा जाता है। गुरु गोरखनाथ समाधि गुरु गोरखनाथ के नाम पर उत्तरप्रदेश में गोरखपुर नगर है। गुरु गोरखनाथ ने यहीं पर अपनी समाधि ली थी। गोरखपुर में बाबा गोरखनाथ का एक भव्य और प्रसिद्ध मंदिर है। इस मंदिर पर मुग़ल काल में कई बार हमले हुए और इसे तोड़ा गया लेकिन हर बार यह मंदिर गोरखनाथ जी के आशीर्वाद से अपने पूरे गौरव के साथ खड़ा हो जाता। बाद में नाथ संप्रदाय के साधुओं द्वारा सैन्य टुकड़ी बना कर इस मंदिर की दिन रात रक्षा की गई। भारत ही नहीं नेपाल में भी गोरखा नाम से एक जिला और एक गोरखा राज्य भी है | कहा जाता है कि गुरु गोरखनाथ ने यहाँ डेरा डाला था जिस वजह से इस जगह का नाम गोरखनाथ के नाम पर पड़ गया तथा यहाँ के लोग गोरखा जाति के कहलाये| गुरु गोरखनाथ के जन्म से जुड़ी असाधारण बात गुरु गोरखनाथ का जन्म स्त्री गर्भ से नहीं हुआ था बल्कि गोरखनाथ का अवतार हुआ था। सनातन ग्रंथो के अनुसार गुरु गोरखनाथ हर युग में हुए है तथा उनको महान चिरंजीवियों में से एक गिना जाता है | गुरु गोरखनाथ की उत्पत्ति गहन शोध का विषय है कई मॉडर्न इतिहासकारो का मानना है कि भगवान राम और श्री कृष्ण की तरह ही गुरु गोरखनाथ एक काल्पनिक किरदार हैं और कई इतिहासकारों का कहना है कि गुरु गोरखनाथ का काल 9 वी शताब्दी के मध्य में था। लेकिन सनातन पंचांग जो दुनिया का एकमात्र वैज्ञानिक कैलेंडर है की माने तो गुरुगोरखनाथ सभी युगो में थे तथा भगवान् श्री राम और भगवान् श्री कृष्ण से संवाद भी स्थापित किये थे | रोट उत्सव से जुड़ी रोचक जानकारी नेपाल के गोरखा नामक जिला में एक गुफा है जिसके बारे में कहा जाता है की गुरु गोरखनाथ ने यहाँ तपस्या की थी आज भी उस गुफा में गुरु गोरखनाथ के पगचिन्ह मौजूद है साथ ही उनकी एक मूर्ति भी है। इस स्थल पर गुरु गोरखनाथ के स्मृति में प्रतिवर्ष वैशाख पूर्णिमा को एक उत्सव का योजन होता है जिसे बड़े ही हर्षोउल्लास के साथ मनाया जाता है। इस उत्सव को “रोट उत्सव” के नाम से जाना जाता है। नेपाल नरेश नरेन्द्रदेव भी गुरु गोरखनाथ के बहुत बड़े भक्त थे| वह उनसे दिक्षा प्राप्त कर उनके शिष्य बन गए थे। तेजवंत गुरु मत्स्येन्द्रनाथ और गुरु गोरखनाथ शंकर भगवान को नाथ संप्रदाय के संस्थापक कहा जाता है | जिसके आदिगुरु भगवान दत्तात्रेय थे | भगवान् दत्तात्रेय के शिष्य मत्स्येन्द्रनाथ थे | वह ध्यान धर्म और प्रभु उपासना के उपरांत भिक्षाटन कर के जीवन व्यतीत करते हैं | एक बार भिक्षाटन करते हुए एक गाँव में गए | उन्होंने एक घर के बहार आवाज़ लगाई| घर का दरवाजा खुला और एक महिला ने मत्स्येन्द्रनाथ को अन्न दान किया और प्रणाम करते हुए कहा कि मेरा पुत्र नहीं है और आशीर्वाद माँगा कि मुझे एक पुत्र चाहिए जो वृद्धावस्था में मेरा उद्धार कर सके | मत्स्येन्द्रनाथ ने उस स्त्री को चुटकी भर भभूत दिया और बोले की इसका सेवन कर लो यथासमय तुम्हे जरूर पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी जो बहुत ही धार्मिक होगा और उसकी ख्याति देश-विदेश में बढ़ेगी। ऐसा आशीर्वाद देकर मत्स्येन्द्रनाथ अपने यात्रा क्रम में भिक्षाटन करते हुए आगे बढ़ गए | लगभग बारह वर्ष पश्चात् गुरु मत्स्येन्द्रनाथ यात्रा करते हुए उसी गांव में पहुंचे| भिक्षाटन करते हुए जब मत्स्येन्द्रनाथ उस घर के समीप गए तो उन्हें वो स्त्री याद आई जिसको उन्होंने भभूत खाने के लिए दिया था | द्वार पर आवाज लगाने के बाद वही स्त्री बहार आई। गुरु मत्स्येन्द्रनाथ ने बालक के बारे में पूछा तो स्त्री सकपका गई, डर और लज़्ज़ा के मारे उसके मुख से वाणी नहीं निकल रही थी | हिम्मत करते हुए स्त्री ने बताया कि, आप जब भभूत देकर गए तो आस-पड़ोस की महिलाएँ मेरा उपहास करने लगीं कि, मैं साधु-संतो के दिए हुए भभूत पर विश्वास करती हूँ… इसलिए, मैंने उस भभूत को सेवन करने के बजाय गोबर पर फेंक दिया | तब, गुरु मत्स्येंद्रनाथ ने अपने योगबल से पूर्ण स्थिति को जान लिया | उसके बाद वह चुपचाप उस तरफ बढे जिस तरफ उस स्त्री ने भभूत फेंका था | उस जगह पहुँच कर उन्होंने आवाज लगाई और तभी एक तेज से परिपूर्ण ओजस्वी 12 वर्ष का बालक दौड़ता हुआ गुरु मत्स्येन्द्रनाथ के पास आ गया और गुरु मत्स्येन्द्रनाथ उस बालक को लेकर अपने साथ चल दिए | यही
इंद्र देव जी की कहानी
इंद्र देव जी की कहानी भगवान इन्द्र (या इंद्र) हिन्दू धर्म में सभी देवताओं के राजा का सबसे उच्च पद था[1] जिसकी एक अलग ही चुनाव-पद्धति थी। इस चुनाव पद्धति के विषय में स्पष्ट वर्णन उपलब्ध नहीं है। वैदिक साहित्य में भगवान इन्द्र को सर्वोच्च महत्ता प्राप्त है लेकिन पौराणिक साहित्य में इनकी महत्ता निरन्तर क्षीण होती गयी और त्रिदेवों की श्रेष्ठता स्थापित हो गयी। आदित्यों में भगवान इन्द्र सबसे पहले आदित्य हैं। ऋग्वेद के लगभग एक-चौथाई सूक्तभगवान इन्द्र से सम्बन्धित हैं। 250 सूक्तों के अतिरिक्त 50 से अधिक मन्त्रों में उसका स्तवन प्राप्त होता है।[2] वह ऋग्वेद का सर्वाधिक लोकप्रिय और महत्त्वपूर्ण देवता है। उसे आर्यों का राष्ट्रीय देवता भी कह सकते हैं।[3] मुख्य रूप से वह वर्षा का देवता है जो कि अनावृष्टि अथवा अन्धकार रूपी दैत्य से युद्ध करता है तथा अवरुद्ध जल को अथवा प्रकाश को विनिर्मुक्त बना देता है।[4] वह गौण रूप से आर्यों का युद्ध-देवता भी है, जो दैत्यों के साथ युद्ध में उन आर्यों की सहायता करता है। भगवान इन्द्र का मानवाकृतिरूपेण चित्रण दर्शनीय है। उसके विशाल शरीर, शीर्ष भुजाओं और बड़े उदर का बहुधा उल्लेख प्राप्त होता है।[5] उसके अधरों और जबड़ों का भी वर्णन मिलता है।[6] उसका वर्ण हरित् है। उसके केश और दाढ़ी भी हरित्वर्णा है।[7] वह स्वेच्छा से विविध रूप धारण कर सकता है।[8] ऋग्वेद भगवान इन्द्र के जन्म पर भी प्रकाश डालता है। पूरे दो सूक्त भगवान इन्द्र के जन्म से ही सम्बन्धित हैं।[9] ‘निष्टिग्री’ अथवा ‘शवसी’ नामक गाय को उसकी माँ बतलाया गया है।[10] उसके पिता ‘द्यौः’ या ‘त्वष्टा’ हैं।[11] एक स्थल पर उसे ‘सोम’ से उत्पन्न कहा गया है। उसके जन्म के समय द्यावा-पृथ्वी काँप उठी थी। भगवान इन्द्र के जन्म को विद्युत् के मेघ-विच्युत होने का प्रतीक माना जा सकता है।[12] भगवान इन्द्र के सगे-सम्बन्धियों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है। अग्नि और पूषन् उसके भाई हैं।[13] इसी प्रकार देवी इन्द्राणी उसकी पत्नी[14] है। संभवतः देवी \’इन्द्राणी\’ नाम परम्परित रूप से पुरुष (पति) के नाम का स्त्रीवाची बनाने से ही है[15] मूल नाम कुछ और (\’शची\’)[16] हो सकता है। मरुद्गण उसके मित्र तथा सहायक हैं। उसे वरुण, वायु, सोम, बृहस्पति, पूषन् और विष्णु के साथ युग्मरूप में भी कल्पित किया गया है तीन चार सूक्तों में वह सूर्य का प्रतिरूप है।[17] भगवान इन्द्र एक वृहदाकार देवता है। उसका शरीर पृथ्वी के विस्तार से कम से कम दस गुना है। वह सर्वाधिक शक्तिमान् है। इसीलिए वह सम्पूर्ण जगत् का एक मात्र शासक और नियन्ता है। उसके विविध विरुद शचीपति (=शक्ति का स्वामी), शतक्रतु (=सौ शक्तियों वाला) और शक्र (=शक्तिशाली), आदि उसकी विपुला शक्ति के ही प्रकाशक हैं। सोमरस भगवान इन्द्र का परम प्रिय पेय है। वह विकट रूप से सोमरस का पान करता है। उससे उसे स्फूर्ति मिलती है। वृत्र के साथ युद्धके अवसर पर पूरे तीन सरोवरों को उसने पीकर सोम-रहित कर दिया था। दशम मण्डल के 119वें सूक्त में सोम पीकर मदविह्वल बने हुए स्वगत भाषण के रूप में अपने वीर-कर्मों और शक्ति का अहम्मन्यतापूर्वक वर्णन करते हुए भगवान इन्द्र को देखा जा सकता है। सोम के प्रति विशेष आग्रह के कारण ही उसे सोम का अभिषव करने वाले अथवा उसे पकाने वाले यजमान का रक्षक बतलाया गया है। भगवान इन्द्र का प्रसिद्ध आयुध ‘वज्र’ है, जिसे कि विद्युत्-प्रहार से अभिन्न माना जा सकता है। भगवान इन्द्र के वज्र का निर्माण ‘त्वष्टा’ नामक देवता-विशेष द्वारा किया गया था।भगवान इन्द्र को कभी-कभी धनुष-बाण और अंकुश से युक्त भी बतलाया गया है। उसका रथ स्वर्णाभ है। दो हरित् वर्ण अश्वों द्वारा वाहित उस रथ का निर्माण देव-शिल्पी ऋभुओं द्वारा किया गया था। इन्द्रकृत वृत्र-वध ऋग्वेद में बहुधा और बहुशः वर्णित और उल्लिखित है। सोम की मादकता से उत्प्रेरित हो, प्रायः मरुद्गणों के साथ, वह ‘वृत्र’ अथवा ‘अहि’ नामक दैत्यों (=प्रायः अनावृष्टि और अकाल के प्रतीक) पर आक्रमण करके अपने वज्र से उनका वध कर डालता है और पर्वत को भेद कर बन्दीकृत गायों के समान अवरुद्ध जलों को विनिर्मुक्त कर देता है। उक्त दैत्यों का आवास-स्थल ‘पर्वत’ मेघों के अतिरिक्त कुछ नहीं है, जिनका भेदन वह जल-विमोचन हेतु करता है। इसी प्रकार गायों को अवरुद्ध कर रखने वाली प्रस्तर-शिलाएँ भी जल-निरोधक मेघ ही हैं।[18] मेघ ही वे प्रासाद भी हैं जिनमें पूर्वोक्त दैत्य निवास करते हैं। इन प्रासादों की संख्या कहीं 90, कहीं 99 तो कहीं 100 बतलाई गई है, जिनका विध्वंस करके भगवान इन्द्र ‘पुरभिद्’ विरुद धारण करता है। वृत्र या अहि के वधपूर्वक जल-विमोचन के साथ-साथ प्रकाश के अनवरुद्ध बना दिये जाने की बात भी बहुधा वर्णित है। उस वृत्र या अहि को मार कर इन्द्र सूर्य को सबके लिये दृष्टिगोचर बना देता है। यहाँ पर उक्त वृत्र या अहि से अभिप्राय या तो सूर्य प्रकाश के अवरोधक मेघ से है, या फिर निशाकालिक अन्धकार से। सूर्य और उषस् के साथ जिन गायों का उल्लेख मिलता है, वे प्रातः कालिक सूर्य की किरणों का ही प्रतिरूप हैं, जो कि अपने कृष्णाभ आवास-स्थल से बाहर निकलती हैं। इस प्रकार भगवान इन्द्र का गोपपतित्व भी सुप्रकट हो जाता है। वृत्र और अहि के वध के अतिरिक्त अन्य अनेक उपाख्यान भी भगवान इन्द्र के सम्बन्ध में उपलब्ध होते हैं। ‘सरमा’ की सहायता से उसने ‘पणि’ नामक दैत्यों द्वारा बन्दी बनाई गई गायों को छीन लिया था। ‘उषस्’ के रथ का विध्वंस, सूर्य के रथ के एक चक्र की चोरी, सोम-विजय आदि उपाख्यान भी प्राप्त हैं। भगवान इन्द्र ने कम्पायमान भूतल और चलायमान पर्वतों को स्थिर बनाया है। चमड़े के समान उसने द्यावापृथिवी को फैला कर रख दिया है। जिस प्रकार एक धुरी से दोनों पहिये निकाल दिये जायँ, उसी प्रकार उसने द्युलोक और पृथ्वी को पृथक् कर दिया है। भगवान इन्द्र बड़े उग्र स्वभाव का है। स्वर्ग की शान्ति को भंग करने वाले वही एकमात्र देवता है। अनेक देवताओं से उसने युद्ध किया। उषस् के रथ को उसने भंग किया, सूर्य के रथ का एक चक्र उसने चुराया, अपने अनुयायी मरुतों को उसने मार डालने की धमकी दी। अपने पिता ‘त्वष्टा’ को उसने मार ही डाला। अनेक दैत्यों को भी उसने पराजित और विनष्ट किया, जिसमें से वृत्र, अहि, शम्बर, रौहिण के अतिरिक्त उरण विश्वरूप, अर्बुद, बल, व्यंश और नमुचि प्रमुख हैं। आर्यों के शत्रुभूत दासों अथवा दस्युओं को भी उसने युद्धों में पराभूत किया। कम
विष्णु देव जी की कहानी
विष्णु देव जी की कहानी हिंदू धर्म के अनुसार परमेश्वर के तीन मुख्य रूपों में से एक रूप हैं। पुराणों में त्रिमूर्ति विष्णु को विश्व का पालनहार कहा गया है। त्रिमूर्ति के अन्य दो भगवान शिव और ब्रह्मा को माना गया है। जहाँ ब्रह्मा को विश्व का सृजन करने वाला माना गया है वहीं शिव को संहारक माना गया है। विष्णु की पत्नी लक्ष्मी हैं। विष्णु का निवास क्षीरसागर है। उनका शयन शेषनाग के ऊपर है। सम्पूर्ण जीवों के आश्रय होने के कारण भगवान श्री विष्णु ही नारायण कहे जाते हैं। सर्वव्यापक परमात्मा ही भगवान श्री विष्णु हैं। यह सम्पूर्ण विश्व भगवान विष्णु की शक्ति से ही संचालित है। वे निर्गुण भी हैं और सगुण भी। वे अपने चार हाथों में क्रमश: शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण करते हैं। जो किरीट और कुण्डलों से विभूषित, पीताम्बरधारी, वनमाला तथा कौस्तुभमणि को धारण करने वाले, सुन्दर कमलों के समान नेत्र वाले भगवान श्री विष्णु का ध्यान करता है वह भव-बन्धन से मुक्त हो जाता है। पौराणिक संदर्भ पद्म पुराण के उत्तरखण्ड में वर्णन है कि भगवान श्री विष्णु ही परमार्थ तत्त्व हैं। वे ही ब्रह्मा और शिव सहित समस्त सृष्टि के आदि कारण हैं। जहाँ ब्रह्मा को विश्व का सृजन करने वाला माना जाता है वहीं शिव को संहारक माना गया है। विष्णु की सहचारिणी लक्ष्मी हैं। वे ही नारायण, वासुदेव, परमात्मा, अच्युत, कृष्ण, शाश्वत, शिव, ईश्वर तथा हिरण्यगर्भ आदि अनेक नामों से पुकारे जाते हैं। नर अर्थात जीवों के समुदाय को नार कहते हैं। कल्प के प्रारम्भ में एकमात्र सर्वव्यापी भगवान नारायण ही थे। वे ही सम्पूर्ण जगत की सृष्टि करके सबका पालन करते हैं और अन्त में सबका संहार करते हैं। इसलिये भगवान श्री विष्णु का नाम हरि है। मत्स्य, कूर्म, वाराह, वामन, हयग्रीव तथा श्रीराम-कृष्ण आदि भगवान श्री विष्णु के ही अवतार हैं। भगवान श्री विष्णु अत्यन्त दयालु हैं। वे अकारण ही जीवों पर करुणा-वृष्टि करते हैं। उनकी शरण में जाने पर परम कल्याण हो जाता है। जो भक्त भगवान श्री विष्णु के नामों का कीर्तन, स्मरण, उनके अर्चाविग्रह का दर्शन, वन्दन, गुणों का श्रवण और उनका पूजन करता है, उसके सभी पाप-ताप विनष्ट हो जाते हैं। यद्यपि भगवान विष्णु के अनन्त गुण हैं, तथापि उनमें भक्त वत्सलता का गुण सर्वोपरि है। चारों प्रकार के भक्त जिस भावना से उनकी उपासना करते हैं, वे उनकी उस भावना को परिपूर्ण करते हैं। अन्य नाम शिव , हरि , चक्रधारी , वासुदेव , नारायण , अच्युत , श्रीकांत , पीतांबर , सत्यनारायण , जगदीश , जनार्धन , दामोदर , जगन्नाथ आदि देवनागरी विष्णु जी तमिल लिपि விஷ்ணு कन्नड़ लिपि ವಿಷ್ಣು संबंध हिन्दू धर्म , वैष्णव निवासस्थान क्षीरसागर , वैकुंठ मंत्र ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय, ॐ विष्णवे नम:, ॐ नमो नारायणाय, हरिः ॐ। अस्त्र शंख (पाञ्चजन्य),चक्र (सुदर्शन), गदा (कौमोदकी) और पद्म, धनुष (सारंग), तलवार नंदक और फरसा परशू प्रतीक शालिग्राम और आंवले का पेड़ दिवस बृहस्पतिवार (गुरुवार) वर्ण पीला जीवनसाथी महालक्ष्मी देवी और वृन्दा संतान कामदेव सवारी पक्षीराज गरुड़ और नागराज शेषनाग शास्त्र श्रीमद् भागवत महापुराण, विष्णु पुराण, गरुड़ पुराण, , मत्स्य पुराण, नरसिंह पुराण,वामन पुराण, रामायण और महाभारत त्यौहार अनन्त चतुर्दशी , सभी एकादशी , सभी पूर्णिमा , कृष्ण जन्माष्टमी , राम नवमी , कल्कि जयंती , नारद जयंती , मत्स्य जयंती , कूर्म जयंती , वराह द्वादशी , वामन द्वादशी , नरसिंह जयंती , हयग्रीव जयंती , वेदव्यास जयंती , परशुराम जयंती आदि त्यौहार भगवान विष्णु जी जिनको वेदों में ईश्वर कहा है चतुर्भुज विष्णु जी को सबसे निकटतम मूर्त एवं मूर्त ब्रह्म कहा गया है। विष्णु जी को सर्वाधिक भागवत एवं विष्णु पुराण में वर्णन है और सभी पुराणों में भागवत पुराण को सर्वाधिक मान्य माना गया है जिसके कारण विष्णु जी का महत्व अन्य त्रिदेवों के तुलना में अधिक हो जाता है । गीता अध्याय ११ में विश्वस्वरूप विराट स्वरूप के अतिरिक्त चतुर्भुज स्वरूप के दर्शन देना सिद्ध करता है परमेश्वर का चतुर्भुज स्वरूप सुगम है। ऋग्वेद एवं अन्य वेदों में भी अनेको सूक्त विष्णु को समर्पित है जिसको विष्णु सूक्त भी कहा गया है। ऋग्वेद में सर्वप्रथम स्वतंत्र रूप से विष्णु जी को मंडल १ के सूक्त २२ में वर्णन आया है जिसमे विष्णु जी के वामन अवतार के तीन पग से तीन लोक मापने के वर्णन है । अन्य रिग्वेदिक सूक्त १५६, मंडल ७ सूक्त १०० में विष्णु के वर्णन हैं जिसमे विष्णु जी को इंद्र का मित्र एवं वृत्त के वध हेतु इंद्र की सहायता करना वर्णन है जिससे त्रिदेव के विष्णु की महत्ता समझ आती है । हिन्दू धर्म के आधारभूत ग्रन्थों में बहुमान्य पुराणानुसार विष्णु जी परमेश्वर के तीन मुख्य रूपों में से एक रूप हैं। पुराणों में त्रिमूर्ति विष्णु जी को विश्व या जगत का पालनहार कहा गया है। त्रिमूर्ति के अन्य दो रूप ब्रह्मा और शिव जी को माना जाता है। ब्रह्मा जी को जहाँ विश्व का सृजन करने वाला माना जाता है, वहीं शिव जी को संहारक माना गया है। मूलतः विष्णु जी और शिव जी तथा ब्रह्मा जी भी एक ही हैं यह मान्यता भी बहुशः स्वीकृत रही है। न्याय को प्रश्रय अन्याय के विनाश तथा जीव (मानव) को परिस्थिति के अनुसार उचित मार्ग-ग्रहण के निर्देश हेतु विभिन्न रूपों में अवतार ग्रहण करनेवाले के रूप में विष्णु जी मान्य रहे हैं। पुराणानुसार विष्णु जी की पत्नी लक्ष्मी हैं। कामदेव विष्णु जी के पुत्र थे। विष्णु जी का निवास क्षीर सागर है। उनका शयन शेषनाग के ऊपर है। उनकी नाभि से कमल उत्पन्न होता है जिसमें ब्रह्मा जी स्थित हैं। वह अपने नीचे वाले बाएँ हाथ में पद्म (कमल), अपने नीचे वाले दाहिने हाथ में गदा (कौमोदकी) ,ऊपर वाले बाएँ हाथ में शंख (पाञ्चजन्य) और अपने ऊपर वाले दाहिने हाथ में चक्र(सुदर्शन) धारण करते हैं। विष्णु की अनुपम विशेषता उनके तीन पाद-प्रक्षेप हैं, जिनका ऋग्वेद में बारह बार उल्लेख मिलता है। सम्भवतः यह उनकी सबसे बड़ी विशेषता है। उनके तीन पद-क्रम मधु से परिपूर्ण कहे गये हैं, जो कभी भी क्षीण नहीं होते। उनके तीन पद-क्रम इतने विस्तृत हैं कि उनमें सम्पूर्ण लोक विद्यमान रहते हैं (अथवा तदाश्रित रहते हैं)। ‘त्रेधा विचक्रमाणः’ भी प्रकारान्तर से उनके तीन पाद-प्रक्षेपों को ध्वनित करता है। ‘उरुगाय’ और ‘उरुक्रम’ आदि पद भी उक्त तथ्य के परिचायक हैं। मधु से आपूरित उनके तीन
गुरु गोबिन्द सिंह जी का इतिहास
गुरु गोबिन्द सिंह दशम सिख गुरु, खालसा के संस्थापक (1666-1708) गुरु गोबिन्द सिंह (जन्म: पौषशुक्ल सप्तमी संवत् 1723 विक्रमी तदनुसार 22 दिसम्बर 1666- ਜਯੋਤੀ ਜੋਤ 7 अक्टूबर 1708 ) सिखों के दसवें गुरु थे। आपके पिता जी श्री गुरू तेग बहादुर जी के बलिदान के उपरान्त 11 नवम्बर सन 1675 को 10 वें गुरू बने। आप एक महान योद्धा, चिन्तक, कवि, भक्त एवं आध्यात्मिक नेता थे। सन 1699 में बैसाखी के दिन उन्होंने खालसा पंथ (पन्थ) की स्थापना की जो सिखों के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण दिन माना जाता है। जन्म गोबिन्द राय 22 दिसंबर , 1666 पटना बिहार, भारत मृत्यु 7 अक्टूबर 1708 (उम्र 42) नांदेड़, महाराष्ट्र, भारत जातीयता सिख समुदाय पदवी सिखों के दसवें गुरु प्रसिद्धि कारण दसवें सिख गुरु, सिख खालसा सेना के संस्थापक एवं प्रथम सेनापति पूर्वाधिकारी गुरु तेग बहादुर उत्तराधिकारी गुरु ग्रंथ साहिब धार्मिक मान्यता सिख जीवनसाथी माता जीतो, माता सुंदरी, माता साहिब देवां बच्चे अजीत सिंह जुझार सिंह जोरावर सिंह फतेह सिंह माता-पिता गुरु तेग बहादुर, माता गूजरी गुरु गोबिन्द सिंह ने पवित्र ग्रंथ (ग्रन्थ) गुरु ग्रंथ साहिब को पूरा किया तथा उन्हें गुरु रूप में प्रतिष्ठित किया। बचित्तर नाटक उनकी आत्मकथा है। यही उनके जीवन के विषय में जानकारी का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत है। यह दसम ग्रन्थ का एक भाग है। दसम ग्रन्थ (ग्रन्थ), गुरु गोबिन्द सिंह की कृतियों के संकलन का नाम है। उन्होने अन्याय, अत्याचार और पापों का खत्म करने के लिए और गरीबों की रक्षा के लिए मुगलों के साथ 14 युद्ध लड़े। धर्म के लिए समस्त परिवार का बलिदान उन्होंने किया, जिसके लिए उन्हें \’सरबंसदानी\’ (पूरे परिवार का दानी ) भी कहा जाता है। इसके अतिरिक्त जनसाधारण में वे कलगीधर, दशमेश, बाजांवाले, आदि कई नाम, उपनाम व उपाधियों से भी जाने जाते हैं। गुरु गोविन्द सिंह जहाँ विश्व की बलिदानी परम्परा में अद्वितीय थे, वहीं वे स्वयं एक महान लेखक, मौलिक चिन्तक तथा संस्कृत सहित कई भाषाओं के ज्ञाता भी थे। उन्होंने स्वयं कई ग्रन्थों की रचना की। वे विद्वानों के संरक्षक थे। उनके दरबार में 52 कवियों तथा लेखकों की उपस्थिति रहती थी, इसीलिए उन्हें \’संत सिपाही\’ भी कहा जाता था। वे भक्ति तथा शक्ति के अद्वितीय संगम थे उन्होंने सदा प्रेम, सदाचार और भाईचारे का सन्देश दिया। किसी ने गुरुजी का अहित करने की कोशिश भी की तो उन्होंने अपनी सहनशीलता, मधुरता, सौम्यता से उसे परास्त कर दिया। गुरुजी की मान्यता थी कि मनुष्य को किसी को डराना भी नहीं चाहिए और न किसी से डरना चाहिए। वे अपनी वाणी में उपदेश देते हैं भै काहू को देत नहि, नहि भय मानत आन। वे बाल्यकाल से ही सरल, सहज, भक्ति-भाव वाले कर्मयोगी थे। उनकी वाणी में मधुरता, सादगी, सौजन्यता एवं वैराग्य की भावना कूट-कूटकर भरी थी। उनके जीवन का प्रथम दर्शन ही था कि धर्म का मार्ग सत्य का मार्ग है और सत्य की सदैव विजय होती है। गुरु गोबिंद सिंह जी का नेतृत्व सिख समुदाय के इतिहास में बहुत कुछ नया ले कर आया। उन्होंने सन 1699 में बैसाखी के दिन खालसा जो की सिख धर्म के विधिवत् दीक्षा प्राप्त अनुयायियों का एक सामूहिक रूप है उसका निर्माण किया। सिख समुदाय के एक सभा में उन्होंने सबके सामने पुछा – \”कौन अपने सर का बलिदान देना चाहता है\”? उसी समय एक स्वयंसेवक इस बात के लिए राज़ी हो गया और गुरु गोबिंद सिंह उसे तम्बू में ले गए और कुछ देर बाद वापस लौटे एक खून लगे हुए तलवार के साथ। गुरु ने दोबारा उस भीड़ के लोगों से वही सवाल दोबारा पुछा और उसी प्रकार एक और व्यक्ति राज़ी हुआ और उनके साथ गया पर वे तम्बू से जब बहार निकले तो खून से सना तलवार उनके हाथ में था। उसी प्रकार पांचवा स्वयंसेवक जब उनके साथ तम्बू के भीतर गया, कुछ देर बाद गुरु गोबिंद सिंह सभी जीवित सेवकों के साथ वापस लौटे और उन्होंने उन्हें पंज प्यारे या पहले खालसा का नाम दिया। उसके बाद गुरु गोबिंद जी ने एक लोहे का कटोरा लिया और उसमें पानी और चीनी मिला कर दुधारी तलवार से घोल कर अमृत का नाम दिया। पहले 5 खालसा के बनाने के बाद उन्हें छठवां खालसा का नाम दिया गया जिसके बाद उनका नाम गुरु गोबिंद राय से गुरु गोबिंद सिंह रख दिया गया। उन्होंने पांच ककारों का महत्व खालसा के लिए समझाया और कहा – केश, कंघा, कड़ा, किरपान, कच्चेरा। इधर 27 दिसम्बर सन् 1704 को दोनों छोटे साहिबजादे और जोरावर सिंह व फतेह सिंहजी को दीवारों में चुनवा दिया गया। जब यह हाल गुरुजी को पता चला तो उन्होंने औरंगजेब को एक जफरनामा (विजय की चिट्ठी) लिखा, जिसमें उन्होंने औरगंजेब को चेतावनी दी कि तेरा साम्राज्य नष्ट करने के लिए खालसा पंथ तैयार हो गया है। 8 मई सन् 1705 में \’मुक्तसर\’ नामक स्थान पर मुगलों से भयानक युद्ध हुआ, जिसमें गुरुजी की जीत हुई। अक्टूबर सन् 1706 में गुरुजी दक्षिण में गए जहाँ पर आपको औरंगजेब की मृत्यु का पता लगा। औरंगजेब ने मरते समय एक शिकायत पत्र लिखा था। हैरानी की बात है कि जो सब कुछ लुटा चुका था, (गुरुजी) वो फतहनामा लिख रहे थे व जिसके पास सब कुछ था वह शिकस्त नामा लिख रहा है। इसका कारण था सच्चाई। गुरुजी ने युद्ध सदैव अत्याचार के विरुद्ध किए थे न कि अपने निजी लाभ के लिए। औरंगजेब की मृत्यु के बाद आपने बहादुरशाह को बादशाह बनाने में मदद की। गुरुजी व बहादुरशाह के संबंध अत्यंत मधुर थे। इन संबंधों को देखकर सरहद का नवाब वजीत खाँ घबरा गया। अतः उसने दो पठान गुरुजी के पीछे लगा दिए। इन पठानों ने गुरुजी पर धोखे से घातक वार किया, जिससे 7 अक्टूबर 1708 में गुरुजी (गुरु गोबिन्द सिंह जी) नांदेड साहिब में दिव्य ज्योति में लीन हो गए। अंत समय आपने सिक्खों को गुरु ग्रंथ साहिब को अपना गुरु मानने को कहा व खुद भी माथा टेका। गुरुजी के बाद माधोदास ने, जिसे गुरुजी ने सिक्ख बनाया बंदासिंह बहादुर नाम दिया था, सरहद पर आक्रमण किया और अत्याचारियों की ईंट से ईंट बजा दी। गुरु गोविंदजी के बारे में लाला दौलतराय, जो कि कट्टर आर्य समाजी थे, लिखते हैं \’मैं चाहता तो स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानंद, परमहंस आदि के बारे में काफी कुछ लिख
लक्ष्मी माता की कहानी / लक्ष्मी माता की कथा
लक्ष्मी माता की कहानी / लक्ष्मी माता की कथा मां लक्ष्मी सुख, समृद्धि और धन की देवी है। जब लक्ष्मी माता का व्रत किया जाता है तो लक्ष्मी माता की कहानी सुनकर व्रत पूर्ण किया जाता है। लक्ष्मी माता के व्रत को ‘वैभव लक्ष्मी व्रत’ भी कहा जाता है। वैभव लक्ष्मी व्रत शुक्रवार के दिन रखा जाता है। इस व्रत को स्त्री या पुरुष कोई भी कर सकता है लक्ष्मी माता का व्रत रखने से सुख समृद्धि और धन की प्राप्ति होती हैं। दिवाली वाले दिन माता लक्ष्मी का व्रत किया जाता है और लक्ष्मी माता की कहानी सुनी जाती हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दिन मां लक्ष्मी पृथ्वी पर विचरण करने आती है। जो भी मां लक्ष्मी के सच्चे मन से आराधना करती है मां लक्ष्मी उस पर अपनी कृपा बरसाती हैं। दिवाली वाले दिन कई लोग व्रत रखते हैं और शाम के समय विधि विधान से व्रत खोलते हैं और लक्ष्मी माता की कहानी सुनी जाती है। तो आइए जानते हैं लक्ष्मी माता की पावन कथा – लक्ष्मी माता की कहानी – एक गांव में एक साहूकार रहता था। साहूकार के एक बेटी थी । वह हर रोज पीपल सींचने जाती थी । पीपल के वृक्ष में से लक्ष्मी जी प्रकट होती थी और चली जातीं । एक दिन लक्ष्मी जी ने साहूकार की बेटी से कहा – तू मेरी सहेली बन जा । तब लड़की ने कहा कि मैं अपने पिता से पूछकर कल आऊंगी । साहूकार की बेटी ने घर जाकर अपने पिता को सारी बात कह दी । तब उसके पिताजी बोले वह तो लक्ष्मी जी हैं । अपने को और क्या चाहिए तू लक्ष्मी जी की सहेली बन जा । दूसरे दिन वह लड़की फिर गईं । तब लक्ष्मी जी पीपल के पेड़ से निकल कर आई और कहा सहेली बन जा तो लड़की ने कहा , बन जाऊंगी और दोनों सहेली बन गई । लक्ष्मी जी ने उसको खाने का न्यौता दिया । घर आकर लड़की ने मां – बाप को कहा कि मेरी सहेली ने मुझे खाने का न्योता दिया है । तब बाप ने कहा कि सहेली के जीमने जाइयो पर घर को संभाल कर जाना । तब वह लक्ष्मी जी के यहां जीमने गई तो लक्ष्मी जी ने उसे शाल दुशाला ओढ़ने के लिए दिया , रुपये दिये , सोने की चौकी , सोने की थाली में छत्तीस प्रकार का भोजन(व्यंजन) करा दिया । जीम कर जब वह जाने लगी तो लक्ष्मी जी ने पल्ला पकड़ लिया और कहा कि में भी तेरे घर जीमने आऊंगी । तो उसने कहा आ जाइयो । वह घर जाकर चुपचाप बैठ गई । तब बाप ने पूछा कि बेटी सहेली के यहां जीमकर आ गईं ? और तू उदास क्यों बैठी है ? तो उसने कहा पिताजी मेरे को लक्ष्मी जी ने इतना दिया अनेक प्रकार के भोजन कराए परन्तु मैं कैसे जिमाऊंगी ? अपने घर में तो कुछ भी नहीं है । तब उसके पिता ने कहा कि गोबर मिट्टी से चौका लगाकर घर की सफाई कर ले । चार मुख वाला दीया जलाकर लक्ष्मीजी का नाम लेकर रसोई में बैठ जाना। लड़की सफाई करके लड्डू लेकर बैठ गई । उसी समय एक रानी नहा रही थी । उसका नौलखा हार चील उठा कर ले गई और उसके घर वह नौलखा हार डाल गई और उसका लड्डु ले गई। बाद में वह हार को तोड़कर बाजार में गई और सामान लाने लगी तो सुनार ने पूछा कि क्या चाहिए ? तब उसने कहा कि सोने की चौकी , सोने का थाल , शाल दुशाला दे दें , मोहर दें और सामग्री दें । छत्तीस प्रकार का भोजन हो जाए इतना सामान दें । सारी चीजें लेकर बहुत तैयारी करी और रसोई बनाई तब गणेश जी से कहा कि लक्ष्मी जी को बुलाओ । आगे – आगे गणेशजी और पीछे – पीछे लक्ष्मीजी आई । उसने फिर चौकी डाल दी और कहा , सहेली चौकी पर बैठ जा । जब लक्ष्मी जी ने कहा सहेली चौकी पर तो राजा रानी के भी नहीं बैठी , किसी के भी नहीं बैठी तो उसने कहा कि मेरे यहां तो बैठना पड़ेगा । फिर लक्ष्मीजी चौकी पर बैठ गई । तब उसने बहुत खातिर की । जैसे लक्ष्मी ने करी थी , वैसे ही उसने करी । लक्ष्मीजी उस पर खुश हो गईं । घर में खूब रुपया एवं लक्ष्मी हो गई । साहूकार की बेटी ने कहा , मैं अभी आ रही हूँ । तुम यहीं बैठी रहना और वह चली गई । लक्ष्मीजी गई नहीं और चौकी पर बैठी रहीं । उसको बहुत दौलत दी । हे लक्ष्मीजी जैसा तुमने साहूकार की बेटी को दिया वैसा सबको देना । कहते सुनते , हुंकारा भरते अपने सारे परिवार को दियो । पीहर में देना , ससुराल में देना । बेटे पोते को देना । है लक्ष्मी माता ! सबका कष्ट दूर करना , दरिद्रता दूर करना , सबकी मनोकामना पूर्ण करना । जय मां लक्ष्मी जी
जैन धर्म के पंचशील सिद्धांत बताए भगवान महावीर ने – Lord Mahavir told the Panchsheel principles of Jainism
जैन धर्म के पंचशील सिद्धांत बताए भगवान महावीर ने भगवान महावीर का जन्म तकरीबन ढाई हजार साल पहले (ईसा से 599 वर्ष पूर्व), वैशाली के गणतंत्र राज्य क्षत्रिय कुण्डलपुर में हुआ था। महावीर को \’वीर\’, \’अतिवीर\’ और \’सन्मति\’ भी कहा जाता है। तीर्थंकर महावीर स्वामी अहिंसा के मूर्तिमान प्रतीक थे। उनका जीवन त्याग और तपस्या से ओतप्रोत था। उन्होंने एक लँगोटी तक का परिग्रह नहीं रखा। हिंसा, पशुबलि, जात-पात का भेद-भाव जिस युग में बढ़ गया, उसी युग में भगवान महावीर का जन्म हुआ। उन्होंने दुनिया को सत्य, अहिंसा का पाठ पढ़ाया। उन्होंने दुनिया को जैन धर्म के पंचशील सिद्धांत बताए, जो हैं- अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, अचौर्य (अस्तेय) और ब्रह्मचर्य। सभी जैन मुनि, आर्यिका, श्रावक, श्राविका को इन पंचशील गुणों का पालन करना अनिवार्य है। महावीर स्वामी ने अपने उपदेशों और प्रवचनों के माध्यम से दुनिया को सही राह दिखाई और मार्गदर्शन किया। यद्यपि उनकी धर्मयात्राओं का ठीक वर्णन कहीं नहीं मिलता तो भी उपलब्ध वर्णनों से यही विदित होता है कि उनका प्रभाव विशेष रूप से क्षत्रियों और व्यवसायी वर्ग पर पड़ा, जिनमें शूद्र भी बहुत बड़ी संख्या में सम्मिलित थे। महावीर अहिंसा के दृढ़ उपासक थे, इसलिए किसी भी दिशा में विरोधी को क्षति पहुंचाने की वे कल्पना भी नहीं करते थे। वे किसी के प्रति कठोर वचन भी नहीं बोलते थे और जो उनका विरोध करता, उसको भी नम्रता और मधुरता से ही समझाते थे। इससे परिचय हो जाने के बाद लोग उनकी महत्ता समझ जाते थे और उनके आंतरिक सद्भावना के प्रभाव से उनके भक्त बन जाते थे। महावीर स्वयं क्षत्रिय और राजवंश के थे, इसलिए उनका प्रभाव कितने ही क्षत्रिय नरेशों पर विशेष रूप से पड़ा। जैन ग्रंथों के अनुसार राजगृह का राजा बिंबिसार महावीर का अनुयायी था। वहां पर इसका नाम श्रेणिक बताया गया है और महावीर स्वामी के अधिकांश उपदेश श्रेणिक के प्रश्नों के उत्तर के रूप में ही प्रकट किये गये हैं। आगे चलकर इतिहास प्रसिद्ध महाराज चंद्रगुप्त मौर्य भी जैन धर्म के अनुयायी बन गये थे और उन्होंने दक्षिण भारत में आकर जैन मुनियों का तपस्वी जीवन व्यतीत किया था। उड़ीसा का राजा खाखेल तथा दक्षिण के कई राजा जैन थे। इसके फलस्वरूप जनता में महावीर स्वामी के सिद्धांतों का अच्छा प्रचार हो गया और उनके द्वारा प्रचारित धर्म कुछ शताब्दियों के लिए भारत का एक प्रमुख धर्म बन गया। आगे चलकर अनेक जैनाचार्यों ने जैन और हिंदू धर्म के समन्वय की भावना को भी बल दिया, जिसके फल से सिद्धांत रूप से अंतर रहने पर भी व्यवहार रूप में इन दोनों धर्मों में बहुत कुछ एकता हो गई और जैन एक संप्रदाय के रूप में ही हिंदुओं में मिल जुल गये। महावीर स्वामी का सबसे बड़ा सिद्धांत अहिंसा का है, जिनके समस्त दर्शन, चरित्र, आचार−विचार का आधार एक इसी अहिंसा सिद्धांत पर है। वैसे उन्होंने अपने अनुयायी प्रत्येक साधु और गृहस्थ के लिए अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह के पांच व्रतों का पालन करना आवश्यक बताया है, पर इन सबमें अहिंसा की भावना सम्मिलित है। इसलिए जैन विद्वानों का प्रमुख उपदेश यही होता है− \’अहिंसा ही परम धर्म है। अहिंसा ही परम ब्रह्म है। अहिंसा ही सुख शांति देने वाली है। अहिंसा ही संसार का उद्धार करने वाली है। यही मानव का सच्चा धर्म है। यही मानव का सच्चा कर्म है। अहिंसा जैनाचार का तो प्राण ही है।\’ जैनियों के आचार−विचार, अहिंसा के विषय में चाहे जैसे रूढिवादी बन गये हों, पर इसमें संदेह नहीं कि महावीर स्वामी ने अपने समय में जिस अहिंसा के सिद्धांत का प्रचार किया, वह निर्बलता और कायरता उत्पन्न करने के बजाय राष्ट्र का निर्माण और संगठन करके उसे सब प्रकार से सशक्त और विकसित बनाने वाली थी। उसका उद्देश्य मनुष्य मात्र के बीच शांति और प्रेम का व्यवहार स्थापित करना था, जिसके बिना समाज कल्याण और प्रगति की कोई आशा नहीं रखी जा सकती। यद्यपि अहिंसा का प्रतिपादन सभी धर्मोपदेशकों ने अपने−अपने ढंग से किया है, पर जिस प्रकार महावीर और बुद्ध ने अहिंसा पर सबसे अधिक बल देकर उसी को अपने धर्म का मूलमंत्र बनाया, ऐसा किसी अन्य धर्म संस्था ने नहीं किया।
बौद्ध दर्शन के मूल सिद्धांत
बौद्ध दर्शन के मूल सिद्धांत बौद्ध दर्शन तीन मूल सिद्धांत पर आधारित माना गया है- 1.अनीश्वरवाद 2.अनात्मवाद 3.क्षणिकवाद। यह दर्शन पूरी तरह से यथार्थ में जीने की शिक्षा देता है। 1. अनीश्वरवा द बुद्ध ईश्वर की सत्ता नहीं मानते क्योंकि दुनिया प्रतीत्यसमुत्पाद के नियम पर चलती है। प्रतीत्यसमुत्पाद अर्थात कारण-कार्य की श्रृंखला। इस श्रृंखला के कई चक्र हैं जिन्हें बारह अंगों में बाँटा गया है। अत: इस ब्रह्मांड को कोई चलाने वाला नहीं है। न ही कोई उत्पत्तिकर्ता, क्योंकि उत्पत्ति कहने से अंत का भान होता है। तब न कोई प्रारंभ है और न अंत। 2. अनात्मवाद अनात्मवाद का यह मतलब नहीं कि सच में ही \’आत्मा\’ नहीं है। जिसे लोग आत्मा समझते हैं, वो चेतना का अविच्छिन्न प्रवाह है। यह प्रवाह कभी भी बिखरकर जड़ से बद्ध हो सकता है और कभी भी अंधकार में लीन हो सकता है। स्वयं के होने को जाने बगैर आत्मवान नहीं हुआ जा सकता। निर्वाण की अवस्था में ही स्वयं को जाना जा सकता है। मरने के बाद आत्मा महा सुसुप्ति में खो जाती है। वह अनंतकाल तक अंधकार में पड़ी रह सकती है या तक्षण ही दूसरा जन्म लेकर संसार के चक्र में फिर से शामिल हो सकती है। अत: आत्मा तब तक आत्मा नहीं जब तक कि बुद्धत्व घटित न हो। अत: जो जानकार हैं वे ही स्वयं के होने को पुख्ता करने के प्रति चिंतित हैं। 3. क्षणिकवा द इस ब्रह्मांड में सब कुछ क्षणिक और नश्वर है। कुछ भी स्थायी नहीं। सब कुछ परिवर्तनशील है। यह शरीर और ब्रह्मांड उसी तरह है जैसे कि घोड़े, पहिए और पालकी के संगठित रूप को रथ कहते हैं और इन्हें अलग करने से रथ का अस्तित्व नहीं माना जा सकता। उक्त तीन सिद्धांत पर आधारित ही बौद्ध दर्शन की रचना हुई। इन तीन सिद्धांतों पर आगे चलकर थेरवाद, वैभाषिक, सौत्रान्त्रिक, माध्यमिक (शून्यवाद), योगाचार (विज्ञानवाद) और स्वतंत्र योगाचार का दर्शन गढ़ा गया। इस तरह बौद्ध धर्म के दो प्रमुख सम्प्रदायों के कुल छह उपसम्प्रदाय बने। इन सबका केंद्रीय दर्शन रहा प्रतीत्यसमुत्पाद।
भगवान इंद्र देव की कहानी
भगवान इंद्र देव की कहानी हिन्दू धर्म में तैतीस करोड़ देवताओं की बात कही जाती है. इन सभी के स्वामी इंद्र थे. जिन्हें देवलोक का स्वामी माना गया हैं. धर्मग्रंथों में संभवतः अधिकतर कहानियों में देवराज इंद्र का उल्लेख अवश्य ही आता हैं. बहुत बार खलनायक के रूप में तो कभी लाचारी के रूप में भगवान इंद्र को पेश किया जाता हैं. एश्वर्य भोग की जिदंगी में व्यस्त इंद्र के सिंहासन पर हर समय विरोधियों की नजर रहा करती थी. चलिए आज की कहानी में आपकों देवराज इंद्र से जुड़ी कुछ रोचक जानकारी व इतिहास बताते हैं. आजकल जब हम इंद्र की बात करते है तो वह अधिकतर पौराणिक कथाओं में होता हैं. वह इंद्र जो स्वर्ग में रहता है, अप्सराओं और गन्धर्वों से घिरा रहता है. सोमपान करता है, एरावत पर बैठा है जिसके साथ में वज्र है और जिसके गुरु का नाम ब्रहस्पति हैं. एक ऐसा अय्यास राजा जो असुरो से डरता है और हमेशा ब्रह्मा से असुरों का संहार करने का कोई न कोई उपाय पूछता रहता हैं. वह ऋषियों से भी डरता हैं. और उनकी तपस्या को भंग करने के लिए अप्सराओं को भेजता है. वह उन राजाओं से भी डरता है जो यज्ञ करते है और वह उनके घोड़े चुरा लेता हैं. अर्थात हमें इंद्र की बतौर एक असुरक्षित राजा की कथा प्राप्त होती हैं. ये पौराणिक कथाएँ करीब 1500 वर्ष पुरानी हैं. जब पुराण लिखे गये थे. लेकिन इसके २२०० वर्ष पहले जब हम वेदकालीन इंद्र के बारे में सोचते है तब उनका एक अलग ही रूप दिखाई देता हैं. पौराणिक इंद्र, विष्णु, शिव और दुर्गादेवी से प्रार्थना करते है वह अपनी रक्षा के लिए, लेकिन वे ऋग्वेद के रक्षक भी है. वे वृत्र और वाला जैसे असुरों के साथ अपने व्रज से युद्ध करते हैं. और पानी व नदियों को घेरने वाली बाधाओं से मुक्त करते है अर्थात वे जल को मुक्त करने का काम करते हैं. इंद्र को लेकर रची गई कविताओं या वैदिक संहिताओं में इंद्र की प्रशंसा ही की गई हैं. यहाँ पर इंद्र एक बड़े शक्तिशाली यौद्धा हैं. वे युद्ध से नहीं डरते हैं. यहाँ पर न स्वर्ग का वर्णन है न ऐरावत का और न ही उनकी असुरक्षित भावना का. वैदिक और पौराणिक काल के बीच हमें बौद्ध, जैन और तमिल परम्पराओं के बारे में पता चलता हैं. 2000 वर्ष पूर्व हमें बौद्ध जैन एवं तमिल ग्रंथों में इंद्र का वर्णन मिलता हैं. लेकिन ये इंद्र न तो वैदिक इंद्र जैसे है न हि पौराणिक इंद्र जैसे हैं. बौद्ध ग्रंथों में इंद्र को शक्र कहा गया हैं. कहते है कि जब बुद्ध को निर्वाण प्राप्त हुआ तब वे ब्रह्मा के साथ इंद्र के सामने प्रस्तुत हुए. और उनसे एक इच्छा प्रकट की कि के अपने ज्ञान का प्रचार विश्व भर में करे. इंद्र के स्वर्ग को ३३ देवताओं का स्वर्ग माना जाता हैं. जो मेरु पर्वत के ऊपर हैं. वेदों में इंद्र की पत्नी का नाम इंद्राणी बताया जाता हैं. असुरों के साथ इंद्र के हमेशा युद्ध और मतभेद होते रहते हैं. जैन ग्रंथों में इंद्र को हमेशा तीर्थकरों की सेवा करते दिखाया गया हैं. इंद्राणी या सची के साथ. जब किसी तीर्थकर का जन्म होता है तब उस घटना स्थल पर इंद्र हमेशा प्रस्तुत होकर उनकी सेवा करते हैं. मन्दिरों में भी वे सेवक के रूप में दिखाए गये हैं. इसका अर्थ है वे देवों के राजा है लेकिन जैन तीर्थकरों के सेवक. तमिल ग्रंथों में वरुण को समुद्र का देवता माना गया हैं. मुरुगन को पहाड़ों का देवता तो इंद्र को मैदानों का देवता. मरु भूमि मरुस्थल को काली देवी के साथ जोड़ा गया हैं. और जंगलों को विष्णु के साथ. यहाँ पर इंद्र का अधिक वर्णन न होते हुए भी वे एक क्षेत्र से जुड़े हुए है न की पानी या स्वर्ग से. इस प्रकार पांच प्रकार के इन्द्रों का वर्णन मिलता हैं. वैदिक काल के इंद्र, पौराणिक काल के इंद्र, बौद्ध धर्म के इंद्र, जैन धर्म के इंद्र और तमिल परम्परा के इंद्र. कौन से इंद्र सत्य है, आजकल ऐरावत वाले इंद्र को हम ज्यादा सत्य मानते हैं. जो शिव विष्णु एवं अन्य देवों की आराधना करते हैं. इंद्र के कोई मन्दिर नहीं होते, लेकिन इंद्र की सबसे पुरानी छवि हमें पुणे के पास भाजा नामक एक बौद्ध गुफा में मिलती हैं. यह गुफा लगभग २२०० वर्ष पुरानी हैं. और यहाँ पर इंद्र ऐरावत के ऊपर बैठे दिखाई देते हैं. संभवतः यह ऐसी पहली छवि होगी, जिसमें वे ऐरावत पर बैठे हैं. इन्द्र के भाई हिमयुग के दौर में मेघ अर्थात बादल तथा जल को सबसे अधिक विनाशक माना जाता था. मेघ के अधिष्ठाता देव इंद्र जी तथा जल के देव वरुण थे. ये दोनों भाई हुआ करते थे. इंद्र भगवान के कई सारे भाई थे जिनमें विवस्वान्, अर्यमा, पूषा, त्वष्टा, सविता, भग, धाता, विधाता, वरुण, मित्र, इन्द्र और त्रिविक्रम आदि थे, ये सुर या देवताओं की श्रेणी में गिने जाते थे. भगवान इंद्र के स्तौले भाई असुर प्रवृत्ति के थे, जिनमें दो भाइयों हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष का नाम प्रमुखता से लिया जाता हैं. इनके एक बहन भी मानी गई है जिनका नाम सिंहिका था. इन्द्र के माता-पिता पत्नी और पुत्र भारत में कही भी इंद्र की पूजा नहीं होती हैं, हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार भगवान कृष्ण से पूर्व उत्तर भारत में इन्द्रोत्सव मनाया जाता था, मगर भगवान कृष्ण ने इसे बंद करवाकर गोपोत्सव, रंगपंचमी और होलीका की शुरुआत कर दी थी. कृष्ण के अनुसार ऐसे इंसान की पूजा व्यर्थ है जो ईश्वर के तुल्य न हो. अगर इंद्र के पिता की बात करे तो उनका नाम कश्यप माँ का नाम अदिति, सौतेले भाइयों की माँ का नाम दिति था. ऋषि कश्यप की 13 पत्नियाँ थी पहली रानी अदिति के पुत्र आदित्य कहलाए दिति के पुत्र दैत्य कहलाएं. इसी तरह दनु के दानव, अरिष्टा के गन्धर्व, सुरसा के राक्षस और कुद्रू के नाग कहलाएं. बात करें इनकी पत्नी की तो इन्द्र की पत्नी शचि थी जो असुरराज पुलोमा की बेटी थी, विवाह के बाद इसे इंद्राणी कहा गया. इनके पुत्रों का उल्लेख वेदों में भी देखने को मिलता हैं.
गुरु नानक देव जी के जन्म और जीवन के बारे में
गुरु नानक देव जी के जन्म और जीवन के बारे में श्री नानक देव जी का जन्म 15अप्रैल,1469 में गाँव तलवंडी आज के ननकाना साहिब में हुआ था जो वर्तमान में पाकिस्तान में स्थित है. गुरुनानक जी के जन्म दिन को नानक जयंती के रूप में देशभर में मनाया जाता है. इनकी माताजी का नाम तृप्ता तथा पिताजी का नाम कालू मेहता था. इनका नाम बड़ी बहिन नानकी के नाम पर रखा गया था. इन्होने बचपन में ही पंजाबी उर्दू तथा फ़ारसी भाषा का भी ज्ञान प्राप्त कर लिया था. इनके पिताजी गाँव के पटवारी थे, नानक जी ने बचपन में पशुचारण का कार्य लम्बे समय तक किया. इसी कार्य में उन्होंने गाँव की जनता को पहला चमत्कार दर्शाया था. एक दिन जब वे अपने मवेशियों को चरा रहे थे तो भक्ति में चित लग जाने से पशुओं द्वारा पूरे खेत को चर लिया था. एक किसान की शिकायत पर पंचायत बुलाई गई. जब लोगों ने खेत के नुकसान का जायजा लेने गये तो दंग रह गये, उस खेत में फसल यूँ ही खड़ी थी. उनका इस संसार से वैराग्य बचपन में ही हो गया था, सांसारिक सुख दुःख से कोसो दूर इनकी लग्न तो बस भगवान् में बसी थी. जब भी ये स्कूल गये शिक्षक से भगवान की सच्चाई की कोई सवाल दागते जिसका सवाल उनके पास नही था, रोज रोज की इसी बात से अध्यापक जी खिन्न हुए और नानक को घर छोड़ आए. इसके बाद इन्होने शिक्षा और सांसारिक जीवन के मोह का त्याग कर ईश्वर भक्ति जागरण सत्संग एवं यात्राओं में अपना जीवन व्यतीत करना शुरू कर दिया. बचपन में ही इन्होने कई ऐसे चमत्कार दिखाए जिससे गाँव के मुखिया एवं बड़ी बहिन की उनके प्रति श्रद्धा बढ़ गई. मात्र सोलह वर्ष की आयु में ही गुरु नानक जी का विवाह सुलक्खनी नामक कन्या के साथ सम्पन्न हो गया. जब वे ३२ साल के हुए तो इनके पहला पुत्र हुआ जिसका नाम श्रीचंद रखा गया था. इसके चार वर्ष बाद दूसरे पुत्र का जन्म हुआ जिसे लिखमिदास का नाम दिया गया. दो पुत्रों के जन्म के पश्चात गुरु नानक जी मरदाना, लहना, बाला और रामदास के साथ घर को त्याग दिया. नानक देव जी न तो पूर्ण रूप से आस्तिक थे ना ही नास्तिक. वे हिन्दू परिवार में जन्म मुस्लिम संस्कृति के बीच लम्बे समय तक रहे. दोनों संस्कृतियों धर्मों की अच्छी बातों का उन पर बड़ा प्रभाव पड़ा, उनकी जीवन शैली सूफी संतों जैसी हो गई थी. वे हमेशा अंधविश्वासों आडम्बरों तथा मूर्ति पूजा के विरोधी रहे. सर्वेश्वरवादी के रूप में इन्होने अपना जीवन जीया लोगों को अच्छी बाते अपने उपदेशों के रूप में बताई, वैचारिक परिवर्तन के समर्थक के रूप में इन्होने एक नव समाज की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो बहुदेववाद, आडम्बर से मुक्त एवं एक ईश्वर में विश्वास रखती थी. संसार से विरक्त सन्यासी जीवन जीने वाले नानक देव जी के अंतिम दिन बेहद चर्चित रहे, उनके विचारों से प्रभावित होकर लोग उन्हें अवतार का दर्जा देते थे. एक बार फिर इन्होने सन्यास का मार्ग छोड़ अपनों के बिच जीवन जीते हुए मानव धर्म के लिए कार्य किया. इन्ही समय इन्होने करतारपुर नगर बसाया इसी नगर में आश्वन कृष्ण १०, संवत् १५९७ (22 सितंबर 1539 ईस्वी) को नानकदेव जी की मृत्यु हो गई थी
देवो के देव महादेव जी की कहानी
देवो के देव महादेव जी की कहानी शंकर या महादेव आरण्य संस्कृति जो आगे चल कर सनातन शिव धर्म नाम से जाने जाते है में सबसे महत्वपूर्ण देवताओं में से एक है। वह त्रिदेवों में एक देव हैं। इन्हें देवों के देव महादेव भी कहते हैं। इन्हें भोलेनाथ, शंकर, महेश, रुद्र, नीलकंठ, गंगाधार आदि नामों से भी जाना जाता है। तंत्र साधना में इन्हे भैरव के नाम से भी जाना जाता है।[1] हिन्दू शिव घर्म शिव-धर्म के प्रमुख देवताओं में से हैं। वेद में इनका नाम रुद्र है। यह व्यक्ति की चेतना के अन्तर्यामी हैं। इनकी अर्धांगिनी (शक्ति) का नाम पार्वती है। इनके पुत्र कार्तिकेय , अय्यपा और गणेश हैं, तथा पुत्रियां अशोक सुंदरी , ज्योति और मनसा देवी हैं। शिव अधिक्तर चित्रों में योगी के रूप में देखे जाते हैं और उनकी पूजा शिवलिंग तथा मूर्ति दोनों रूपों में की जाती है। शिव के गले में नाग देवता विराजित हैं और हाथों में डमरू और त्रिशूल लिए हुए हैं। कैलाश में उनका वास है। यह शैव मत के आधार है। इस मत में शिव के साथ शक्ति सर्व रूप में पूजित है। अन्य नाम नीलकंठ, महादेव, शंकर, पशुपतिनाथ, नटराज, त्रिनेत्रधारी, भोलेनाथ, रुद्रशिव, कैलाशी , अर्धनारेश्नर, सिंघेश्वर, बैद्यनाथ , रुद्र , भैरव , विष्णु आदि संबंध हिन्दू देवता, परब्रह्म, परमात्मा, परमेश्वर निवासस्थान कैलाश पर्वत मंत्र ॐ नमः शिवाय अस्त्र त्रिशूल, पिनाक धनुष,डमरु, परशु और पशुपतास्त्र जीवनसाथी पार्वती (सती का पुनर्जन्म) और सती भाई-बहन सरस्वती (छोटी बहन) संतान कार्तिकेय ,गणेश , अशोकसुन्दरी , अय्यपा, मनसा देवी और ज्योति सवारी नंदी शंकर जी को संहार का देवता कहा जाता है। शंंकर जी सौम्य आकृति एवं रौद्ररूप दोनों के लिए विख्यात हैं। अन्य देवों से माना गया है। सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति एवं संहार के अधिपति शिव हैं। त्रिदेवों में भगवान शिव संहार के देवता माने गए हैं। शिव अनादि तथा सृष्टि प्रक्रिया के आदि स्रोत हैं और यह काल महाकाल ही ज्योतिषशास्त्र के आधार हैं। शिव का अर्थ यद्यपि कल्याणकारी माना गया है, लेकिन वे हमेशा लय एवं प्रलय दोनों को अपने अधीन किए हुए हैं। रावण, शनि, कश्यप ऋषि आदि इनके भक्त हुए है। शिव सभी को समान दृष्टि से देखते है इसलिये उन्हें महादेव कहा जाता है। शिव के कुछ प्रचलित नाम, महाकाल, आदिदेव, किरात, शंकर, चन्द्रशेखर, जटाधारी, नागनाथ, मृत्युंजय [मृत्यु पर विजयी], त्रयम्बक, महेश, विश्वेश, महारुद्र, विषधर, नीलकण्ठ, महाशिव, उमापति [पार्वती के पति], काल भैरव, भूतनाथ, ईवान्यन [तीसरे नयन वाले], शशिभूषण आदि। भगवान शिव को रूद्र नाम से जाता है रुद्र का अर्थ है रुत दूर करने वाला अर्थात दुखों को हरने वाला अतः भगवान शिव का स्वरूप कल्याण कारक है। रुद्राष्टाध्याई के पांचवी अध्याय में भगवान शिव के अनेक रूप वर्णित है रूद्र देवता को स्थावर जंगम सर्व पदार्थ रूप सर्व जाति मनुष्य देव पशु वनस्पति रूप मानकर के सराव अंतर्यामी भाव एवं सर्वोत्तम भाव सिद्ध किया गया है इस भाव से ज्ञात होकर साधक अद्वैत निष्ठ बनता है। पवित्र शिव पुराण एक लेख के अनुसार, कैलाशपति शिव जी ने देवी आदिशक्ति और सदाशिव से कहे है कि हे मात! ब्रह्मा तुम्हारी सन्तान है तथा विष्णु की उत्पति भी आप से हुई है तो उनके बाद उत्पन्न होने वाला में भी आपकी सन्तान हुआ। ब्रह्मा और विष्णु सदाशिव के आधे अवतार है, परंतु कैलाशपति शिव \”सदाशिव\” के पूर्ण अवतार है। जैसे कृष्ण विष्णु के पूर्ण अवतार है उसी प्रकार कैलाशपति शिव \”ओमकार सदाशिव\” के पूर्ण अवतार है। सदाशिव और शिव दिखने में, वेषभूषा और गुण में बिल्कुल समान है। इसी प्रकार देवी सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती (दुर्गा) आदिशक्ति की अवतार है। शिव पुराण के लेख के अनुसार सदाशिव जी कहे है कि जो मुझमे और कैलाशपति शिव में भेद करेगा या हम दोनों को अलग मानेगा वो नर्क में गिरेगा । या फिर शिव और विष्णु में जो भेद करेगा वो नर्क में गिरेगा। वास्तव में मुझमे, ब्रह्मा, विष्णु और कैलाशपति शिव कोई भेद नहीं हम एक ही है। परंतु सृष्टि के कार्य के लिए हम अलग अलग रूप लेते है । शिव स्वरूप शंकर जी पृथ्वी पर बीते हुए इतिहास में सतयुग से कलयुग तक, एक ही मानव शरीर एैसा है जिसके ललाट पर ज्योति है। इसी स्वरूप द्वारा जीवन व्यतीत कर परमात्मा ने मानव को वेदों का ज्ञान प्रदान किया है जो मानव के लिए अत्यंत ही कल्याणकारी साबित हुआ है। वेदो शिवम शिवो वेदम।। परमात्मा शिव के इसी स्वरूप द्वारा मानव शरीर को रुद्र से शिव बनने का ज्ञान प्राप्त होता है। शिव में परस्पर विरोधी भावों का सामंजस्य देखने को मिलता है। शिव के मस्तक पर एक ओर चंद्र है, तो दूसरी ओर महाविषधर सर्प भी उनके गले का हार है। वे अर्धनारीश्वर होते हुए भी कामजित हैं। गृहस्थ होते हुए भी श्मशानवासी, वीतरागी हैं। सौम्य, आशुतोष होते हुए भी भयंकर रुद्र हैं। शिव परिवार भी इससे अछूता नहीं हैं। उनके परिवार में भूत-प्रेत, नंदी, सिंह, सर्प, मयूर व मूषक सभी का समभाव देखने को मिलता है। वे स्वयं द्वंद्वों से रहित सह-अस्तित्व के महान विचार का परिचायक हैं। ऐसे महाकाल शिव की आराधना का महापर्व है शिवरात्रि पूजन शिवरात्रि की पूजा रात्रि के चारों प्रहर में करनी चाहिए। शिव को बिल्वपत्र, पुष्प, चन्दन का स्नान प्रिय हैं। इनकी पूजा के लिये दूध, दही, घी, गंगाजल, शहद इन पांच अमृत जिसे पञ्चामृत कहा जाता है, से की जाती है। शिव का त्रिशूल और डमरू की ध्वनि मंगल, गुरु से संबंधित हैं। चंद्रमा उनके मस्तक पर विराजमान होकर अपनी कांति से अनंताकाश में जटाधारी महामृत्युंजय को प्रसन्न रखता है तो बुधादि ग्रह समभाव में सहायक बनते हैं। महामृत्युंजय मंत्र शिव आराधना का महामंत्र है। सावन सोमवार व्रत को काफी फलदायी बताया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस व्रत को करने से भक्तों की सभी इच्छाओं की पूर्ति हो जाती है।[8] महाशिवरात्रि का व्रत अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए करते हैं। इस व्रत को अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग विधि से मनाया जाता है ॐ नमो शिवाय नमो नमः हर हर महादेव शिव शंभू
माता ज्वाला जी मंदिर का इतिहास
माता ज्वाला जी मंदिर का इतिहास हिन्दू लोग अपने सभी देवी देवताओं की पूजा बहुत ही श्रद्धा और विधि विधान से करते हैं । यह पर स्थित हर मंदिर की अपनी एक कहानी और अपना इतिहास है आज में आपको एक ऐसे ही एक मंदिर के बारे में बताने जा रही हूँ । आज में जिस मंदिर के बारे में बताने जा रही हु यह मंदिर 51 शक्ति पीठो में से एक है और इस मंदिर का नाम है ज्वाला माता मंदिर। माता ज्वाला देवी का यह मंदिर हिमाचल प्रदेश के कागड़ा जिले में स्थित हैं । कहा जाता हैं कि जब माता सती का जला हुआ शरीर लेकर भगवान शिव ब्रह्माण्ड में इधर उधर घूम रहे थे तभी माता के शरीर से उनकी जीभा इसी स्थान पर गिरी थी इसी कारण से इस स्थान का नाम ज्वाला देवी मंदिर पडा । इस मंदिर को जोता वाली माता का मंदिर और नगरकोट भी कहा जाता हैं । इस मंदिर को खोजने का श्रेय पांडवो को जाता हैं । मंदिर मैं माता की कोई भी मूर्ति स्थापित नहीं है अपितु माता यह स्वयं ज्वाला के रूप में उपस्थित है यहां पर माता का दर्शन ज्योति के रुप मे होते है ।जो हजारों सालों से यह इसी रूप में प्रज्वलित हैं । इस मंदिर से जुडी कुछ कथाए और मान्यताये है कहानी कुछ इस तरह है की भगवान शिव की शादी माता सती से हुई थी माता सती के पिता का नाम राजा दक्ष था वो भगवान शिव को अपने बराबर नहीं मानता था | एक बार महाराज दक्ष ने एक बहुत बड़ा यज्ञ का आयोजन किया उन्होंने सभी देवी देवताओं की निमंत्रण भेजा किन्तु भगवान शिव और माता सती को निमंत्रण नहीं भेजा गया | यह देखकर माता सती को बहुत क्रोध आया और उन्होंने वह जाकर अपने पिता से इस अपमान का कारण पूछने के लिए उन्होंने शिव भगवान से वह जाने की आज्ञा मांगी किन्तु भगवान शिव ने उन्हें वह जाने से मना की किन्तु माता सती के बार बार आग्रह करने पर शिव भगवान ने उन्हें जाने दिया | जब बिना बुलाए यज्ञ में पहुंची तो उनके पिता दक्ष ने उन्हें काफी बुरा भला कहा और साथ ही साथ भगवान शिव के लिए काफी बुरी भली बातें कही जिसे माता सती सहन नहीं कर पाई और उन्होंने उसी यज्ञ की आग में कूद कर अपनी जान दे दी | यह देख कर भगवान शिव को बहुत क्रोध आया और उन्होंने माता सती का जला हुआ शरीर अग्नी कुंड से उठा कर चारों और तांडव करने लग गये जिस कारण सारे ब्रह्मांड में हाहाकार मच गया यह देख कर लोग भगवान विष्णु के पास भागे तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के 51 टुकड़े किये ये टुकड़े जहाँ जहाँ गिरे वह पर शक्ति पीठ बन गए |इसी स्थान पर माता के शरीर से उनकी जीभा थी इसी कारण से इस स्थान का नाम ज्वाला देवी मंदिर पडा । इस मंदिर को जोता वाली माता का मंदिर और नगरकोट भी कहा जाता हैं । पौराणिक कथाओं के अनुसार प्राचीन काल मे माँ के एक बहुत ही प्रिय भक्त थे गुरु गोरखनाथ जी । जो माँ की पूजा अर्चना बहुत ही विधि विधान से ओर दिल से करता था एक बार गोरखनाथ को भूख लगी तब उसने माता से कहा कि आप आग जलाकर पानी गर्म करे , में भिक्षा मांगकर लाता हू। माँ ने भक्त के कहे अनुसार आग जलाकर पानी गर्म किया और गुरु गोरखनाथ का इंतजार करने लगी पर गोरखनाथ जी आज तक कभी लौट कर नही आए कहा जाता है कि माँ आज भी ज्वाला जलाकर अपने भक्त का इंतजार कर रही हैं । कहा जाता हैं कि कालांतर में इस स्थान को व्यवस्थित किया गुरु गोरखनाथ जी ने । यह पर प्रज्वलित माता की ये ज्वाला प्रकृति नही अपितु बहुत चमत्कारी है । माता के मंदिर के ऊपर की और जाने पर गुरु गोरखनाथ जी का मंदिर हैं जिसे गोरख डिब्बी के नाम से जाना जाता है । माता के मंदिर माता के 51 शक्ति पीठो में से एक है । जिन सभी की उत्पत्ति की कथा एक ही है यह पर स्थित सभी मंदिर शिव और शक्ति से जुड़े हुए है । इन सभी स्थलो पर माता सती के अंग गिरे थे । इस मंदिर से जुड़ी एक और कथा है कहा जाता हैं कि सतयुग में महाकाली के परम भगत राजा भूमिचन्द को माता का स्वपन में साक्षात्कार हुआ । जिसे प्रेरित होकर राजा ने यह पर एक सुंदर से मंदिर का निर्माण किया। बाद में महराजा रणजीत सिंह और रस्सज संसारचंद ने 1835 में इस मंदिर का निर्माण कराया । इस मंदिर के अंदर माता की नो ज्योतियां हैं जिनमें महाकाली , अनपूर्णा, चंडी, हिंगलाज, विंध्यवासिनी, महालक्ष्मी, सरस्वती, अम्बिका, अंजीदेवी के नाम से जाना जाता हैं। माता से जुड़ी एक और कथा जो काफी प्रचलित है । कहा जाता हैं कि जब अकबर दिल्ली का राजा हुआ करता था । उस समय ध्यानु नाम का माता का एक भक्त था । जो माता की दिल से पूजा करता था वह अपने गांव में ध्यानूभक्त के नाम से जाना जाता था । एक बार वह अपने सभी गांव वालों के साथ माता के दर्शन करने के लिए ज्वाला जी की ओर निकला । जब वह माता का जे कारा लगाते हुए दिल्ली से होकर गुजरने लगे तो मुगल बादशाह अकबर के सिपाहियों ने उन्हें रोका और बादशाह के दरबार में पेश होने को कहा जब ध्यानु भक्त अपने सभी गांव वाशियों के साथ अकबर के दरबार मे पहुचे । दरबार मे पहुंच कर अकबर ने उनसे पूछा कि तुम सब कहा जा रहे हो तब ध्यानु भक्त ने उन्हें बताया कि वो सब ज्योति वाली माता रानी के दर्शन करने जा रहे हैं अकबर ने ध्यानु भक्त से पूछा कि तुम्हारी यह माँ क्या क्या कर सकती हैं तब ध्यानु भक्त ने बड़े प्यार से उन्हें उत्तर दिया कि है महाराज वो तो सारी जगत की माँ है वो बहुत शक्तिशाली और दयालु है ऐसा कोई भी कार्य नही है जो माता रानी नहीं कर सकती ।
भगत कबीर जी का जन्म और इतिहास – Birth and History of Bhagat Kabir Ji
भगत कबीर जी का जन्म और इतिहास भगत कबीर एक भक्त थे और आध्यात्मिक कवि उत्तर परदेश, भारत में रहते थे। वह एक सख्त एकेश्वरवादी और अनुयायी थे, शायद गुरमत के संस्थापक। गुरु ग्रंथ साहिब में 17 रागों में 227 पद और कबीर के 237 श्लोक है। कबीर का जन्म मुस्लिम परिवार में हुआ था। वह हिंदू, मुस्लिम और सिखों द्वारा पूजनीय है। उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से एक शिक्षक और समाज सुधारक की भूमिका निभाई। अन्य भक्तों की तरह, कबीर भी कर्मकांड, देवताओं की पूजा, ब्राह्मणवाद, जाति व्यवस्था और हिंदू और मुस्लिम पुजारियों की भ्रामक अवधारणाओं में विश्वास नहीं करते थे। कबीरपंथी संप्रदाय जो कबीर की शिक्षाओं का पालन करते है, उन्हें अपने गुरु के रूप में संदर्भित करते है। सिख भी कबीर की शिक्षाओं का पालन करते है, जैसे कि गुरमत, कबीर, नानक, रविदास, भट्ट सभी समान है और सभी को गुरु माना जाता है और सिख गुरु ग्रंथ साहिब के सामने झुकते है, जिसमें कई लोगों की शिक्षा शामिल है जो भगवान के बारे में समान विचार रखते थे। प्रारंभिक जीवन जन्म कबीर जी के जीवन इतिहास के बारे में इतिहासकारों के कई विचार है: यह व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है कि उनका जन्म 1398 ईस्वी (गुरु नानक से 71 वर्ष पहले) में हुआ था। कबीरपंथियों (कबीर के अनुयायी) का कहना है कि वह 120 वर्ष की आयु तक जीवित रहे और अपनी मृत्यु की तिथि 1518 बताते है, लेकिन हजारी प्रसेद त्रिवेदी के शोध पर भरोसा करते हुए, एक ब्रिटिश विद्वान चार्लोट वॉडेनविल इन तिथियों को श्रेय देने के इच्छुक है और उन्होंने सिद्ध किया कि 1448 संत कबीर के निधन की सही तिथि है। कबीर का जन्म बनारस में हुआ था और नीरू और उनकी पत्नी नीमा ने उन्हें गोद लिया था, जिन्होंने उनका नाम कबीर (सर्वोच्च) रखा। माता लोई से कबीर का एक पुत्र हुआ जिसका नाम उन्होंने कमल और एक पुत्री का नाम कमली रखा। परंपरा से हिंदू होते हुए भी वे पालन-पोषण करके मुसलमान थे। पेशे से एक बुनकर, कबीर ने कहा कि उन्हें स्वयं भगवान ने भेजा था। बनारस में ब्राह्मणवाद पंद्रहवीं शताब्दी में बनारस ब्राह्मण कट्टरपंथियों और उनके शिक्षा केंद्र की सीट थी। इस शहर में जीवन के सभी क्षेत्रों पर ब्राह्मणों की मजबूत पकड़ थी। इस प्रकार जुलाहा की निचली जाति के कबीर को अपनी विचारधारा का प्रचार करने के लिए बेहद कठिन समय से गुजरना पड़ा। कबीर और उनके अनुयायी नगर में एक स्थान पर एकत्रित होकर ध्यान करते थे। ब्राह्मणों ने वेश्याओं और अन्य निम्न जातियों को उपदेश देने के लिए उनका उपहास किया। कबीर ने व्यंग्य से ब्राह्मणों की निंदा की और इस तरह अपने आसपास के लोगों का दिल जीत लिया। इसमें कोई शक नहीं कि बनारस शहर का आज सबसे प्रसिद्ध व्यक्ति कोई और नहीं बल्कि संत कबीर है। भले ही वह बनारस (शिवपुरी) में थे, उन्हें गुरमत ज्ञान नहीं मिला था- शिवपुरी में उन्होंने जो कुछ पाया वह पाखंडियों का एक समूह था, (सगल जनम शिवपुरी गवाया), वहां उन्होंने बीजक लिखा। मगहर गए। वहां उन्होंने गुरमत (अर्थात् \”पवित्र पुरुषों की संगति में\”) की स्थापना की और फिर से बानी लिखी जो गुरु ग्रंथ साहिब में मौजूद है। बनारस लौटने पर उन्होंने वही बानी का उपदेश दिया। मगहर में उनकी मृत्यु हो गई। हालांकि रामानंद जी उनके बाहरी गुरु थे, लेकिन अंततः कबीर ही थे जिन्होंने रामानंद जी को सच्चा ज्ञान दिया। वास्तव में, पिछले 3 युगों में, उन्होंने अपने नामों का खुलासा किया: सत सुकृत, मुनिंद्र और करुणामय। मुसलमानों ने बनारस पर आक्रमण किया बनारस अपने समय के दौरान एक मुस्लिम आक्रमणकारी तैमूर लंग या \”तमूर द लंगड़ा\” के हमले से तबाह हो गया था। कबीर ने मुल्लाओं और दिन में पांच बार काबा की ओर झुकने के उनके अनुष्ठानों की भी निंदा की। स्थापित और लोकप्रिय धर्मों की खुली निंदा के कारण, कबीर बनारस और उसके आसपास हिंदुओं और मुसलमानों दोनों के क्रोध का पात्र बन गया। कबीर ने अपनी मान्यताओं का प्रचार करने के लिए बनारस और उसके आसपास यात्रा की। वह पहले पूर्ण गुरु है जिन्होंने पूरी सृष्टि के रहस्यों को बड़े पैमाने पर दुनिया के सामने प्रकट किया है (उनके दो छंद देखें, दोनों शीर्षक: \”कर नैनों दीदार\”)। उन्हें पंडितों और मौलवियों के समान विरोध का सामना करना पड़ा।सुल्तान सिकंदर लोदी ने उसे डूबने, आग से और हाथी के पैरों के नीचे रौंदने जैसे विभिन्न तरीकों से उसे दंडित करने का प्रयास किया। संत-मत के उच्चतम रहस्यों को समेटे हुए उनके छंद, स्पष्ट रूप से आज भी आम आदमी के दिल के करीब है। प्रचलित कर्मकांडों की निंदा करने के लिए वह अक्सर कठोर भाषा का प्रयोग करते है। उनकी रचनाओं में \’बीजक\’, \’ग्रंथावली\’, \’शब्दावली\’ और \’अनुराग सागर\’ है। उनके शिष्यों में बनारस का राजा भी था। उनके पास प्रसिद्ध शिष्यों की एक आकाशगंगा थी जैसे: धर्मदास जी, मीर तकी, गणक जी, पीपा जी, धन्ना जी और सदाना जी। मृत्यु ऐसा कहा जाता है कि, जब वह स्वर्ग के लिए अपने रास्ते का नेतृत्व किया, तो अंतिम संस्कार के प्रदर्शन के मुद्दे पर हिंदुओं और मुसलमानों के बीच एक झगड़ा हुआ। आखिरकार, महान कबीर की याद में, उनके मकबरे के साथ-साथ एक समाधि मंदिर का निर्माण किया गया, जो अभी भी मगहर में एक दूसरे के बगल में खड़ा है।
श्री कृष्ण जी की जन्म कहानी
श्री कृष्ण जी की जन्म कहानी श्रीकृष्ण, हिन्दू धर्म में भगवान हैं। वे विष्णु के 8वें अवतार माने गए हैं। कन्हैया, श्याम, गोपाल, केशव, द्वारकेश या द्वारकाधीश, वासुदेव आदि नामों से भी उनको जाना जाता है। कृष्ण निष्काम कर्मयोगी, आदर्श दार्शनिक, स्थितप्रज्ञ एवं दैवी संपदाओं से सुसज्जित महान पुरुष थे। उनका जन्म द्वापरयुग में हुआ था। उनको इस युग के सर्वश्रेष्ठ पुरुष, युगपुरुष या युगावतार का स्थान दिया गया है। कृष्ण के समकालीन महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित श्रीमद्भागवत और महाभारत में कृष्ण का चरित्र विस्तृत रूप से लिखा गया है। भगवद्गीता कृष्ण और अर्जुन का संवाद है जो ग्रंथ आज भी पूरे विश्व में लोकप्रिय है। इस उपदेश के लिए कृष्ण को जगतगुरु का सम्मान भी दिया जाता है। कृष्ण वसुदेव और देवकी की 8वीं संतान थे। देवकी कंस की बहन थी। कंस एक अत्याचारी राजा था। उसने आकाशवाणी सुनी थी कि देवकी के आठवें पुत्र द्वारा वह मारा जाएगा। इससे बचने के लिए कंस ने देवकी और वसुदेव को मथुरा के कारागार में डाल दिया। मथुरा के कारागार में ही भादो मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को उनका जन्म हुआ। कंस के डर से वसुदेव ने नवजात बालक को रात में ही यमुना पार गोकुल में यशोदा के यहाँ पहुँचा दिया। गोकुल में उनका लालन-पालन हुआ था। यशोदा और नन्द उनके पालक माता-पिता थे। बाल्यावस्था में ही उन्होंने बड़े-बड़े कार्य किए जो किसी सामान्य मनुष्य के लिए सम्भव नहीं थे। अपने जन्म के कुछ समय बाद ही कंस द्वारा भेजी गई राक्षसी पूतना का वध किया , उसके बाद शकटासुर, तृणावर्त आदि राक्षस का वध किया। बाद में गोकुल छोड़कर नंद गाँव आ गए वहां पर भी उन्होंने कई लीलाएं की जिसमे गोचारण लीला, गोवर्धन लीला, रास लीला आदि मुख्य है। इसके बाद मथुरा में मामा कंस का वध किया। सौराष्ट्र में द्वारका नगरी की स्थापना की और वहाँ अपना राज्य बसाया। पांडवों की मदद की और विभिन्न संकटों से उनकी रक्षा की। महाभारत के युद्ध में उन्होंने अर्जुन के सारथी की भूमिका निभाई और रणक्षेत्र में ही उन्हें उपदेश दिया। 124 वर्षों के जीवनकाल के बाद उन्होंने अपनी लीला समाप्त की। उनके अवतार समाप्ति के तुरंत बाद परीक्षित के राज्य का कालखंड आता है। राजा परीक्षित, जो अभिमन्यु और उत्तरा के पुत्र तथा अर्जुन के पौत्र थे, के समय से ही कलियुग का आरंभ माना जाता है। वयस्कता भागवत पुराण कृष्ण की आठ पत्नियों का वर्णन करता है, जो इस अनुक्रम में( रुक्मिणी , सत्यभामा, जामवंती , कालिंदी , मित्रवृंदा , नाग्नजिती (जिसे सत्य भी कहा जाता है),भद्रा और लक्ष्मणा (जिसे मद्रा भी कहते हैं) प्रकट होती हैं। डेनिस हडसन के अनुसार, यह एक रूपक है, आठों पत्नियां उनके अलग पहलू को दर्शाती हैं। जॉर्ज विलियम्स के अनुसार, वैष्णव ग्रंथों में कृष्ण की पत्नियों के रूप में सभी गोपियों का उल्लेख है, लेकिन यह सभी भक्ति एवं आध्यात्मिक सम्बन्ध का प्रतीक है। और प्रत्येक के लिए कृष्ण पूर्ण श्रद्धेय है। उनकी पत्नी को कभी-कभी रोहिणी , राधा , रुक्मिणी, स्वामीनिजी या अन्य कहा जाता है। कृष्ण-संबंधी हिंदू परंपराओं में, वह राधा के साथ सबसे अधिक चित्रित होते हैं। उनकी सभी पत्नियां को और उनके प्रेमिका राधा को हिंदू परंपरा में विष्णु की पत्नी देवी लक्ष्मी के अवतार के रूप में माना जाता है। गोपियों को राधा के कई रूप और अभिव्यक्तियों के रूप में माना जाता है। कुरुक्षेत्र का महाभारत युद्ध महाभारत के अनुसार, कृष्ण कुरुक्षेत्र युद्ध के लिए अर्जुन के सारथी बनते हैं, लेकिन इस शर्त पर कि वह कोई भी हथियार नहीं उठाएंगे।दोनों के युद्ध के मैदान में पहुंचने के बाद और यह देखते हुए कि दुश्मन उसके अपने परिवार के सदस्य , उनके दादा, और उनके चचेरे भाई और प्रियजन हैं, अर्जुन क्षोभ में डूब जाते हैं और कहते है कि उनका ह्रदय उन्हें अपने परिजनों से लड़ने और मारने की अनुमति नहीं देगा। वह राज्य को त्यागने के लिए और अपने गाण्डीव (अर्जुन के धनुष) को छोड़ने के लिए तत्पर हो जाते है । कृष्ण तब उसे जीवन, नैतिकता और नश्वरता की प्रकृति के बारे में ज्ञान देते है। जब किसी को अच्छे और बुरे के बीच युद्ध का सामना करना पड़ता है तब , परिस्थिति की स्थिरता, आत्मा की स्थायीता और अच्छे बुरे का भेद ध्यान में रखते हुए , कर्तव्यों और जिम्मेदारियों को निभाते हुए , वास्तविक शांति की प्रकृति और आनंद और विभिन्न प्रकार के योगों को आनंद और भीतर की मुक्ति के लिए ऐसा योध अनिवार्य होता है । कृष्ण और अर्जुन के बीच बातचीत को भगवद् गीता नामक एक ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत किया गया है श्रीमद भगवद्गीता कुरु क्षेत्र की युद्धभूमि में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो उपदेश दिया था वह श्रीमद्भगवदगीता के नाम से प्रसिद्ध है। सभी हिन्दू ग्रंथों में, श्रीमद भगवत गीता को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। क्योंकि इसमें एक व्यक्ति के जीवन का सार है और इसमें महाभारत काल से द्वापर तक कृष्ण के सभी लीलाओ का वर्णन हैं। ऐसी मान्यता है की यह महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित है हालांकि, इसमें कोई प्रमाण नहीं है लेकिन भगवद गीता एक पुस्तक है जो अर्जुन और उनके सारथी श्री कृष्ण के बीच वार्तालाप पर आधारित है। गीता में सांख्य योग , कर्म योग, भक्ति योग, राजयोग, एक ईश्वरावाद आदि पर बहुत ही सुंदर तरीके से चर्चा की गई है। संस्करण और व्याख्याएं कृष्ण की जीवन कथा के कई संस्करण हैं, जिनमें से तीन का सबसे अधिक अध्ययन किया गया है: हरिवंश , भागवत पुराण और विष्णु पुराण । ये सब मूल कहानी को ही दर्शाते है हैं लेकिन उनकी विशेषताओं, विवरण और शैलियों में काफी भिन्नता हैं। सबसे मूल रचना, हरिवंश को एक यथार्थवादी शैली में बताया गया है जो कृष्ण के जीवन को एक गरीब ग्वाले के रूप में बताता है, लेकिन काव्यात्मक और अलौकिक कल्पना से ओतप्रोत है । यह कृष्ण की अवतार समाप्ति के साथ समाप्त नहीं होती। कुछ विवरणों अनुसार विष्णु पुराण की पांचवीं पुस्तक हरिवंश के यथार्थवाद से दूर हो जाती है और कृष्ण को रहस्यमय शब्दों और स्तम्भों में आवरण करती है कई संस्करणों में विष्णु पुराण की पांडुलिपियां मौजूद हैं। भागवत पुराण की दसवीं और ग्यारहवीं पुस्तकों को व्यापक रूप से एक कविष्ठ कृति माना जाता
अथ श्री बृहस्पतिवार व्रत कथा
॥ अथ श्री बृहस्पतिवार व्रत कथा ॥ भारतवर्ष में एक प्रतापी और दानी राजा राज्य करता था। वह नित्य गरीबों और ब्राह्मणों की सहायता करता था। यह बात उसकी रानी को अच्छी नहीं लगती थी, वह न ही गरीबों को दान देती, न ही भगवान का पूजन करती थी और राजा को भी दान देने से मना किया करती थी। एक दिन राजा शिकार खेलने वन को गए हुए थे, तो रानी महल में अकेली थी। उसी समय बृहस्पतिदेव साधु वेष में राजा के महल में भिक्षा के लिए गए और भिक्षा माँगी रानी ने भिक्षा देने से इन्कार किया और कहा: हे साधु महाराज मैं तो दान पुण्य से तंग आ गई हूँ। मेरा पति सारा धन लुटाते रहिते हैं। मेरी इच्छा है कि हमारा धन नष्ट हो जाए फिर न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी। साधु ने कहा: देवी तुम तो बड़ी विचित्र हो। धन, सन्तान तो सभी चाहते हैं। पुत्र और लक्ष्मी तो पापी के घर भी होने चाहिए। यदि तुम्हारे पास अधिक धन है तो भूखों को भोजन दो, प्यासों के लिए प्याऊ बनवाओ, मुसाफिरों के लिए धर्मशालाएं खुलवाओ। जो निर्धन अपनी कुंवारी कन्याओं का विवाह नहीं कर सकते उनका विवाह करा दो। ऐसे और कई काम हैं जिनके करने से तुम्हारा यश लोक-परलोक में फैलेगा। परन्तु रानी पर उपदेश का कोई प्रभाव न पड़ा। वह बोली: महाराज आप मुझे कुछ न समझाएं। मैं ऐसा धन नहीं चाहती जो हर जगह बाँटती फिरूं। साधु ने उत्तर दिया यदि तुम्हारी ऐसी इच्छा है तो तथास्तु! तुम ऐसा करना कि बृहस्पतिवार को घर लीपकर पीली मिट्टी से अपना सिर धोकर स्नान करना, भट्टी चढ़ाकर कपड़े धोना, ऐसा करने से आपका सारा धन नष्ट हो जाएगा। इतना कहकर वह साधु महाराज वहाँ से आलोप हो गये। साधु के अनुसार कही बातों को पूरा करते हुए रानी को केवल तीन बृहस्पतिवार ही बीते थे, कि उसकी समस्त धन-संपत्ति नष्ट हो गई। भोजन के लिए राजा का परिवार तरसने लगा। तब एक दिन राजा ने रानी से बोला कि हे रानी, तुम यहीं रहो, मैं दूसरे देश को जाता हूँ, क्योंकि यहाँ पर सभी लोग मुझे जानते हैं। इसलिए मैं कोई छोटा कार्य नहीं कर सकता। ऐसा कहकर राजा परदेश चला गया। वहाँ वह जंगल से लकड़ी काटकर लाता और शहर में बेचता। इस तरह वह अपना जीवन व्यतीत करने लगा। इधर, राजा के परदेश जाते ही रानी और दासी दुःखी रहने लगी। एक बार जब रानी और दासी को सात दिन तक बिना भोजन के रहना पड़ा, तो रानी ने अपनी दासी से कहा: हे दासी! पास ही के नगर में मेरी बहिन रहती है। वह बड़ी धनवान है। तू उसके पास जा और कुछ ले आ, ताकि थोड़ी-बहुत गुजर-बसर हो जाए। दासी रानी की बहिन के पास गई। उस दिन गुरुवार था और रानी की बहिन उस समय बृहस्पतिवार व्रत की कथा सुन रही थी। दासी ने रानी की बहिन को अपनी रानी का संदेश दिया, लेकिन रानी की बड़ी बहिन ने कोई उत्तर नहीं दिया। जब दासी को रानी की बहिन से कोई उत्तर नहीं मिला तो वह बहुत दुःखी हुई और उसे क्रोध भी आया। दासी ने वापस आकर रानी को सारी बात बता दी। सुनकर रानी ने अपने भाग्य को कोसा। उधर, रानी की बहिन ने सोचा कि मेरी बहिन की दासी आई थी, परंतु मैं उससे नहीं बोली, इससे वह बहुत दुःखी हुई होगी। कथा सुनकर और पूजन समाप्त करके वह अपनी बहिन के घर आई और कहने लगी: हे बहिन! मैं बृहस्पतिवार का व्रत कर रही थी। तुम्हारी दासी मेरे घर आई थी परंतु जब तक कथा होती है, तब तक न तो उठते हैं और न ही बोलते हैं, इसलिए मैं नहीं बोली। कहो दासी क्यों गई थी? रानी बोली: बहिन, तुमसे क्या छिपाऊं, हमारे घर में खाने तक को अनाज नहीं था। ऐसा कहते-कहते रानी की आंखें भर आई। उसने दासी समेत पिछले सात दिनों से भूखे रहने तक की बात अपनी बहिन को विस्तार पूर्वक सुना दी। रानी की बहिन बोली: देखो बहिन! भगवान बृहस्पतिदेव सबकी मनोकामना को पूर्ण करते हैं। देखो, शायद तुम्हारे घर में अनाज रखा हो। पहले तो रानी को विश्वास नहीं हुआ पर बहिन के आग्रह करने पर उसने अपनी दासी को अंदर भेजा तो उसे सचमुच अनाज से भरा एक घड़ा मिल गया। यह देखकर दासी को बड़ी हैरानी हुई। दासी रानी से कहने लगी: हे रानी! जब हमको भोजन नहीं मिलता तो हम व्रत ही तो करते हैं, इसलिए क्यों न इनसे व्रत और कथा की विधि पूछ ली जाए, ताकि हम भी व्रत कर सकें। तब रानी ने अपनी बहिन से बृहस्पतिवार व्रत के बारे में पूछा। उसकी बहिन ने बताया, बृहस्पतिवार के व्रत में चने की दाल और मुनक्का से विष्णु भगवान का केले की जड़ में पूजन करें तथा दीपक जलाएं, व्रत कथा सुनें और पीला भोजन ही करें। इससे बृहस्पतिदेव प्रसन्न होते हैं। व्रत और पूजन विधि बताकर रानी की बहिन अपने घर को लौट गई। सात दिन के बाद जब गुरुवार आया, तो रानी और दासी ने व्रत रखा। घुड़साल में जाकर चना और गुड़ लेकर आईं। फिर उससे केले की जड़ तथा विष्णु भगवान का पूजन किया। अब पीला भोजन कहाँ से आए इस बात को लेकर दोनों बहुत दुःखी थे। चूंकि उन्होंने व्रत रखा था, इसलिए बृहस्पतिदेव उनसे प्रसन्न थे। इसलिए वे एक साधारण व्यक्ति का रूप धारण कर दो थालों में सुन्दर पीला भोजन दासी को दे गए। भोजन पाकर दासी प्रसन्न हुई और फिर रानी के साथ मिलकर भोजन ग्रहण किया। उसके बाद वे सभी गुरुवार को व्रत और पूजन करने लगी। बृहस्पति भगवान की कृपा से उनके पास फिर से धन-संपत्ति आ गई, परंतु रानी फिर से पहले की तरह आलस्य करने लगी। तब दासी बोली: देखो रानी! तुम पहले भी इस प्रकार आलस्य करती थी, तुम्हें धन रखने में कष्ट होता था, इस कारण सभी धन नष्ट हो गया और अब जब भगवान बृहस्पति की कृपा से धन मिला है तो तुम्हें फिर से आलस्य होता है। रानी को समझाते हुए दासी कहती है कि बड़ी मुसीबतों के बाद हमने यह धन पाया है, इसलिए हमें दान-पुण्य करना चाहिए, भूखे मनुष्यों को भोजन
गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएं
गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु, गुरुर्देवो महेश्वर:! गुरु शाक्षात परंब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नम:!! कर्ता करे न कर सके, गुरु करे सो होय! तीन लोक नो खंड में, गुरु से बड़ा न कोय!! गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागूं पांव! बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो मिलाये!! गुरु बिन ज्ञानी न उपजे, गुरु बिन मिले न मोक्ष! गुरु बिन लखै न सत्य को, गुरु बिन मिटे न दोष!! सुख, समृद्धि और शांति की मंगल कामना के साथ आपको और आपके परिवार को \”गुरु पूर्णिमा\” की हार्दिक शुभकामनाएं!!! 🚩🌹📖🔱🔆🔔🌹🚩 https://www.instagram.com/p/Cf7_nA0h5iW/?igshid=YmMyMTA2M2Y= Maa Devi Raj Rani ji आप सब पर अपना आशीर्वाद बनाए रखें
हनुमान जी का जन्म की कहानी – story of birth of hanuman ji
हनुमान जी का जन्म ज्योतिषीयों की गणना के अनुसार बजरंगबली जी का जन्म चैत्र पूर्णिमा को मंगलवार के दिन चित्र नक्षत्र व मेष लग्न के योग में हुआ था। हनुमानजी के पिता सुमेरू पर्वत के वानरराज राजा केसरी थे और माता अंजनी थी। ज्योतिषीयों की गणना के अनुसार बजरंगबली जी का जन्म चैत्र पूर्णिमा को मंगलवार के दिन चित्र नक्षत्र व मेष लग्न के योग में हुआ था। हनुमानजी के पिता सुमेरू पर्वत के वानरराज राजा केसरी थे और माता अंजनी थी। हनुमान जी को पवन पुत्र के नाम से भी जाना जाता है और उनके पिता वायु देव भी माने जाते है। राजस्थान के सालासर व मेहंदीपुर धाम में इनके विशाल एवं भव्य मन्दिर है। पुंजिकस्थली यानी माता अंजनी पुंजिकस्थली देवराज इन्द्र की सभा में एक अप्सरा थीं। एक बार जब दुर्वासा ऋषि इन्द्र की सभा में उपस्थित थे, तब अप्सरा पुंजिकस्थली बार-बार अंदर-बाहर आ-जा रही थीं। इससे गुस्सा होकर ऋषि दुर्वासा ने उन्हें वानरी हो जाने का शाप दे दिया। पुंजिकस्थली ने क्षमा मांगी, तो ऋर्षि ने इच्छानुसार रूप धारण करने का वर भी दिया। कुछ वर्षों बाद पुंजिकस्थली ने वानर श्रेष्ठ विरज की पत्नी के गर्भ से वानरी रूप में जन्म लिया। उनका नाम अंजनी रखा गया। विवाह योग्य होने पर पिता ने अपनी सुंदर पुत्री का विवाह महान पराक्रमी कपि शिरोमणी वानरराज केसरी से कर दिया। इस रूप में पुंजिकस्थली माता अंजनी कहलाईं। वानरराज को ऋर्षियों ने दिया वर एक बार घूमते हुए वानरराज केसरी प्रभास तीर्थ के निकट पहुंचे। उन्होंने देखा कि बहुत-से ऋषि वहां आए हुए हैं। कुछ साधु किनारे पर आसन लगाकर पूजा अर्चना कर रहे थे। उसी समय वहां एक विशाल हाथी आ गया और उसने ऋषियों को मारना प्रारंभ कर दिया। ऋषि भारद्वाज आसन पर शांत होकर बैठे थे, वह दुष्ट हाथी उनकी ओर झपटा। पास के पर्वत शिखर से केसरी ने हाथी को यूं उत्पात मचाते देखा तो उन्होंने बलपूर्वक उसके बड़े-बड़े दांत उखाड़ दिए और उसे मार डाला। हाथी के मारे जाने पर प्रसन्न होकर ऋर्षियों ने कहा, \’वर मांगो वानरराज।\’ केसरी ने वरदान मांगा, \’ प्रभु , इच्छानुसार रूप धारण करने वाला, पवन के समान पराक्रमी तथा रुद्र के समान पुत्र आप मुझे प्रदान करें।\’ ऋषियों ने \’तथास्तु\’ कहा और वो चले गए। मां अंजना का क्रोधित होना एक दिन माता अंजनी, मानव रूप धारण कर पर्वत के शिखर पर जा रही थी। वे डूबते हुए सूरज की खूबसूरती को निहार रही थीं। अचानक तेज हवाएं चलने लगीं। और उनका वस्त्र कुछ उड़-सा गया। उन्होंने चारों तरफ देखा लेकिन आस-पास के पृक्षों के पत्ते तक नहीं हिल रहे थे। उन्होंने विचार किया कि कोई राक्षस अदृश्य होकर धृष्टता कर रहा। अत: वे जोर से बोलीं, \’कौन दुष्ट मुझ पतिपरायण स्त्री का अपमान करने की चेष्टा करता है?\’ तभी अचानक पवन देव प्रकट हो गए और बोले, \’देवी, क्रोध न करें और मुझे क्षमा करें। आपके पति को ऋषियों ने मेरे समान पराक्रमी पुत्र होने का वरदान दिया है। उन्हीं महात्माओं के वचनों से विवश होकर मैंने आपके शरीर का स्पर्श किया है। मेरे अंश से आपको एक महातेजस्वी बालक प्राप्त होगा। उन्होंने आगे कहा, \’भगवान रुद्र मेरे स्पर्श द्वारा आप में प्रविस्ट हुए हैं। वही आपके पुत्र रूप में प्रकट होंगे।\’ वानरराज केसरी के क्षेत्र में भगवान रुद्र ने स्वयं अवतार धारण किया। इस तरह श्रीरामदूत हनुमानजी ने वानरराज केसरी के यहां जन्म लिया। जय जय मंगलवीर हनुमान जी की
भगवान श्रीराम की कथा और इतिहास – Story and history of Lord Shri Ram
भगवान श्रीराम की कथा और इतिहास प्रभु श्री राम प्राचीन भारत में अवतरित हुए भगवान हैं। हिंदू धर्म में भगवान विष्णु के 10 अवतारों में से भगवान श्रीराम सातवें नंबर पर थे। रामायण ग्रंथ में प्रभु श्रीराम के विषय में हम सब को संपूर्ण जानकारी मिलती है,भगवान राम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता था हिंदू धर्म में भगवान श्रीराम को बहुत ही अधिक पूजनीय माना जाता है। भगवान श्री राम का जन्म अयोध्या के रघुकुल राज परिवार में हुआ था। उनकी माता का नाम कौशल्या और उनके पिता का नाम राजा दशरथ था। भगवान राम अपने तीन भाई के साथ जन्म लिए थे,जिनके नाम:- भरत शत्रुघ्न और लक्ष्मण था। प्रभु श्री राम के गुरु जी का नाम वशिष्ठ था। उनका विवाह राजा जनक की पुत्री सीता के साथ हुआ था। दोस्तों हिंदू धर्म में भगवान श्रीराम और माता सीता की जोड़ी आज भी एक आदर्श जोड़ी मानी जाती है। आगे चलकर भगवान राम और उनकी पत्नी माता सीता जी के दो पुत्र हुए थे:-लव और कुश। हनुमान प्रभु श्रीराम के सबसे बड़े भक्त माने जाते हैं। प्रभु श्री राम और उनके तीनों भाई अर्थात लक्ष्मण भरत और शत्रुघ्न ने गुरु वशिष्ठ के गुरुकुल में अपनी शिक्षा संपूर्ण की थी। भगवान राम और उनके तीनों भाई गुरु वशिष्ठ जी के आश्रम में शिक्षा पाकर वेदों और उपनिषदों के बहुत बड़े ज्ञाता बन गए। गुरुकुल में भगवान राम और उनके भाईओं में ज्ञान प्राप्त करते हुए अच्छे मानवीय और सामाजिक गुणों का उनमें संचार हुआ। सभी भाई अपने अच्छे गुणों और ज्ञान प्राप्ति की ललक में अपने गुरुओं के प्रिय बन गए। दोस्तों हमारे इतिहास और पुराण बतलाते हैं कि भगवान राम का जन्म ईसा पूर्व 5114 हुए थे। अगर आज के हिसाब से यह आंकड़ा लगाया जाए तो 5114 + 2016 = 7130 साल पहले प्रभु श्री राम इस धरती पर अवतरित हुए थे। दोस्तों यह शोध महर्षि बाल्मीकि की रामायण में उल्लेख की गई राम जन्म के आधार पर किया गया है। प्रभु श्री राम पर यह शोध वैज्ञानिक संस्था “आई” ने किया है। दोस्तों इस शोध में मुख्य भूमिका भारत के अशोक भटनागर कुलभूषण मिश्रा और सरोज बाला ने निभाई थी। इन सभी शोधकर्ताओं के अनुसार 10 जनवरी 5114 को प्रभु श्री राम का जन्म हुआ था। लेकिन कुछ शोधकर्ता मानते हैं कि भगवान राम का जन्म 7323 ईसा पूर्व हुआ था। भगवान श्री विष्णु जी ने राम अवतार अन्याय एवं दुष्ट राक्षस राजा रावण को खत्म करने के लिए और इस धरती को पाप से मुक्त कराने के लिए लिया था। राम अवतार में भगवान श्री विष्णु जी ने दुनिया के सामने विश्व पुत्र, भाई, पति और मित्र के गुणों को सामने रखा। श्री राम जी ने अपने पिता राजा दशरथ के कहने पर हंसते-हंसते 14 वर्ष का वनवास जाने के लिए तैयार हो गए। भगवान राम ने अपनी मित्रता का संदेश पूरी दुनिया को देते हुए बाली की हत्या कर अपने मित्र सुग्रीव का राज-पाठ उसे वापस दिलवाया। भगवान राम की कथा भगवान श्री राम को मर्यादा पुरुषोत्तम भी कहा जाता है। प्रभु श्रीराम ने अपने जीवन में मर्यादाओं का पालन करने के लिए अपना राज्य, मित्र, माता-पिता यहां तक की अपनी पत्नी माता सीता को भी छोड़ दिया था। भगवान राम का परिवार आदर्श भारतीय परिवार का प्रतिनिधित्व करता है। भगवान राम रघु कुल में जन्म लिए थे जिसकी परंपरा “प्राण जाए पर वचन न जाए” की थी। भगवान राम के पिता राजा दशरथ ने उनकी सौतेली माता कैकेयी को उनकी दो इच्छा (वर) पूरे करने का वचन दिया था। कैकेयी ने अपने इन दो वर के रूप में राजा दशरथ से अपने पुत्र भरत के लिए अयोध्या का राजसिहांसन, और प्रभु श्री राम के लिए 14 वर्ष का वनवास मांगा। अपने पिता के वचन की रक्षा के लिए भगवान राम ने खुशी-खुशी 14 वर्ष का वनवास जाना स्वीकार कर लिया। प्रभु श्री राम के साथ उनके छोटे सौतेले भाई लक्ष्मण और उनकी आदर्श पत्नी सीता ने एक अच्छे भाई और अच्छी पत्नी होने का उदाहरण पेश करते हुए उनके साथ वन जाना पसंद किए थे। फिर भरत ने न्याय के लिए अपने माता कैकेयी का आदेश ठुकरा दिया, और अपने बड़े भाई प्रभु राम के पास वन में जाकर उनके चरण पादुका अर्थात (चप्पल) ले आए,और फिर वही चरण पादुका को राजगद्दी पर रखकर राजकाज किया। सोमनाथ मंदिर से जुड़े अनसुलझे रहस्य जब भगवान राम अपनी पत्नी सीता और अपने भाई लक्ष्मण के साथ वनवास का समय भोग रहे थे। तब पत्नी सीता को रावण हरण अर्थात (चुरा) कर लंका ले गया। प्रभु राम ने हनुमान और अपने मित्र सुग्रीव की सहायता से माता सीता को ढूंढा,और समुंद्र में पुल बनाकर लंका गए और अपनी पत्नी सीता के लिए रावण के साथ भयंकर युद्ध किया। और अंत में राक्षस राज रावण को मारकर अपनी पत्नी माता सीता को वापस लेकर आए। जंगल में ही प्रभु श्री राम को हनुमान जैसा दोस्त और भक्त मिले। जिन्होंने भगवान राम के सारे कार्य पूरे किए। प्रभु श्रीराम के अयोध्या लौट जाने पर उनके भाई भरत ने अयोध्या का राज्य उनको ही सौंप दिया। प्रभु राम न्याय प्रिय राजा थे। प्रभु श्रीराम ने अपने जीवन काल में बहुत अच्छा शासन किया, इसलिए आज भी लोग अच्छे शासन को रामराज्य की उपमा देते हैं। दोस्तों हिंदू धर्म में के कई व्रत और त्यौहार जैसे दशहरा और दीपावली राम की जीवन कथा से जुड़े हुए हैं। रामनवमी का पावन पर्व प्रभु श्री राम के जन्म उत्सव के रूप में मनाया जाता है। प्रेम से बोलिये “जय श्री राम
माता चिंतपूर्णी जी का इतिहास
माता चिन्तपूर्णी का मन्दिर हिमाचल प्रदेश देवी देवताओं की भूमि है। प्रदेश के कोने-कोने में बहुत से प्रसिद्ध तीर्थ स्थल हैं, लेकिन ऊना जिला में स्थित प्रसिद्ध धर्मिक स्थल चिन्तपूर्णी काअपनी ही महत्व है। चिन्तपूर्णी अर्थात चिन्ता को दूर करने वाली देवी जिसे छिन्नमस्तिका भी कहा जाता है। छिन्नमस्तिका का अर्थ है-एक देवी जो बिना सर के है। कहा जाता है कि यहां पर पार्वती के पवित्र पांव गिरे थे। चिन्तपूर्णी जाने के लिए होशियारपुर, चंडीगढ़, दिल्ली, धर्मशाला, शिमला और बहुत से अन्य स्थानों से सीधे बसें यहां पहुंचती हैं। यहां पर वर्ष में तीन बार मेले लगते हैं। पहला चैत्रा मास के नवरात्रों में, दूसरा श्रावण मास के नवरात्रों में, तीसरा अश्विन मास के नवरात्रों में। नवरात्रों में यहां श्रधालुयों की काफी भीड़ लगी रहती है। चिन्तपूर्णी में बहुत सी धर्मशालाएं हैं, जो बस अड्डे के पास स्थित है और कुछ मन्दिर के निकट स्थित हैं। मन्दिर का इतिहास इस प्रकार से है। प्राचीन कथाओं के अनुसार कहा जाता है कि 14वीं शताब्दी में माई दास नामक दुर्गा भक्त ने इस स्थान की खोज की थी। माई दास का जन्म अठूर गांव, रियासत पटियाला में हुआ था। माई दास जी के दो बड़े भाई थे-दुर्गादास व देवीदास। माई दास का अध्कितर समय पूजा-पाठ में ही व्यतीत होता था। इसलिए वह परिवार के कार्यों में हाथ नहीं बटा पाते थे। इस लिए भाईयों ने माई दास जी को परिवार से अलग कर दिया। माई दास ने अपना समय पूजा-पाठ व दुर्गा भक्ति में व्यतीत करना जारी रखा। एक दिन माई दास जी अपने ससुराल जा रहे थे। रास्ते में एक वट वृक्ष के नीचे आराम करने बैठ गए। इसी वट वृक्ष के नीचे आजकल दुर्गा भगवती जी का मन्दिर है। वहां घना जंगल था। तब इस जगह का नाम छपरोह था, जिसे आजकल चिन्तपूर्णी कहते हैं। थकावट के कारण माईदास की आंख लग गई और स्वप्न में उन्हें दिव्य तेजस्वी कन्या के दर्शन हुए, जो उन्हें कह रही थी कि माईदास! इसी वट वृक्ष के नीचे बीच में मेरी पिंडी बनाकर उसकी पूजा करो। तुम्हारे सब दुख दूर होंगे। माईदास को कुछ समझ न आया और वह ससुराल चले गए, ससुराल से वापस आते समय उसी स्थान पर माईदास जी के कदम फिर रुक गए। उन्हें आगे कुछ न दिखाई दिया। वह फिर उसी वट वृक्ष के नीचे बैठ गए और स्तुति करने लगे। उन्होंने मन ही मन प्रार्थना की। हे दुर्गा मां यदि मैंने सच्चे मन से आपकी उपासना की है तो दर्शन देकर मुझे आदेश दो। बार-बार स्मृति करने पर उन्हें सिंह वाहनी दुर्गा के दर्शन हुए। देवी ने कहा कि मैं उस वट वृक्ष के नीचे चिरकाल से विराजमान हूं। लोग यवनों के आक्रमण तथा अत्याचारों के कारण मुझे भूल गए हैं। तुम मेरे परम भक्त हो। अतः यहां रहकर मेरी आराधना करो। यहां तुम्हारे वंश की रक्षा मैं करुंगी। माईदास जी ने कहा कि मैं यहां पर रहकर कैसे आपकी आराधना करुंगा। यहां पर घने जंगल में न तो पीने योग्य पानी है और न ही रहने योग्य उपयुक्त स्थान। मां दुर्गा ने कहा कि मैं तुमको निर्भय दान देती हूं कि तुम किसी भी स्थान पर जाकर कोई भी शिला उखाड़ो वहां से जल निकल आएगा। इसी जल से तुम मेरी पूजा करना। आज इसी वट वृक्ष के नीचे मां चिन्तपूर्णी का भव्य मन्दिर है और वह शिला भी मन्दिर में रखी हुई है, जिस स्थान पर जल निकला था वहां आज सुन्दर तालाब है। आज भी उसी स्थान से जल निकाल कर माता का अभिषेक किया जाता है। पुराणों के अनुसार यह स्थान चार महारुद्र के मध्य स्थित है। एक और कालेश्वर महादेव, दूसरी ओर शिववाड़ी, तीसरी ओर नारायण महादेव, चौथी ओर मुचकंद महादेव हैं। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार ऐसा विश्वास किया जाता है कि सती चंडी की सभी दुष्टों पर विजय के उपरांत, उनके दो शिष्यों अजय और विजय ने सती से अपनी खून की प्यास बुझाने की प्रार्थना की थी। यह सुनकर सती चंडी ने अपना मस्तिष्क छिन्न कर लिया। इसलिए सती का नाम छिन्नमस्तिका पड़ा।
खाटू श्याम बाबा जी की कहानी
खाटू श्याम बाबा जी की कहानी हिन्दू धर्म के अनुसार, खाटू श्याम जी ने द्वापरयुग में श्री कृष्ण से वरदान प्राप्त किया था कि वे कलयुग में उनके नाम श्याम से पूजे जाएँगे। श्री कृष्ण बर्बरीक के महान बलिदान से काफ़ी प्रसन्न हुए और वरदान दिया कि जैसे-जैसे कलियुग का अवतरण होगा, तुम श्याम के नाम से पूजे जाओगे। तुम्हारे भक्तों का केवल तुम्हारे नाम का सच्चे दिल से उच्चारण मात्र से ही उद्धार होगा। यदि वे तुम्हारी सच्चे मन और प्रेम-भाव से पूजा करेंगे तो उनकी सभी मनोकामना पूर्ण होगी और सभी कार्य सफ़ल होंगे। श्री श्याम बाबा की अपूर्व कहानी मध्यकालीन महाभारत से आरम्भ होती है। वे पहले बर्बरीक के नाम से जाने जाते थे। वे अति बलशाली गदाधारी भीम के पुत्र घटोत्कच और दैत्य मूर की पुत्री मोरवी के पुत्र हैं। बाल्यकाल से ही वे बहुत वीर और महान योद्धा थे। उन्होंने युद्ध कला अपनी माँ तथा श्री कृष्ण से सीखी। नव दुर्गा की घोर तपस्या करके उन्हें प्रसन्न किया और तीन अमोघ बाण प्राप्त किये; इस प्रकार तीन बाणधारी के नाम से प्रसिद्ध नाम प्राप्त किया। अग्निदेव प्रसन्न होकर उन्हें धनुष प्रदान किया, जो उन्हें तीनों लोकों में विजयी बनाने में समर्थ थे। महाभारत का युद्ध कौरवों और पाण्डवों के मध्य अपरिहार्य हो गया था, यह समाचार बर्बरीक को प्राप्त हुए तो उनकी भी युद्ध में सम्मिलित होने की इच्छा जागृत हुई। जब वे अपनी माँ से आशीर्वाद प्राप्त करने पहुँचे तब माँ को हारे हुए पक्ष का साथ देने का वचन दिया। वे अपने नीले रंग के घोड़े पर सवार होकर तीन बाण और धनुष के साथ कुरूक्षेत्र की रणभूमि की ओर चल पड़े। सर्वव्यापी श्री कृष्ण ने ब्राह्मण भेष धारण कर बर्बरीक के बारे में जानने के लिए उन्हें रोका और यह जानकर उनकी हँसी उड़ायी कि वह मात्र तीन बाण से युद्ध में सम्मिलित होने आया है; ऐसा सुनकर बर्बरीक ने उत्तर दिया कि मात्र एक बाण शत्रु सेना को परास्त करने के लिए पर्याप्त है और ऐसा करने के बाद बाण वापस तूणीर में ही आएगा। यदि तीनों बाणों को प्रयोग में लिया गया तो पूरे ब्रह्माण्ड का विनाश हो जाएगा। यह जानकर भगवान् कृष्ण ने उन्हें चुनौती दी की इस वृक्ष के सभी पत्तों को वेधकर दिखलाओ। वे दोनों पीपल के वृक्ष के नीचे खड़े थे। बर्बरीक ने चुनौती स्वीकार की और अपने तूणीर से एक बाण निकाला और ईश्वर को स्मरण कर बाण पेड़ के पत्तों की ओर चलाया। बाण ने क्षणभर में पेड़ के सभी पत्तों को वेध दिया और श्री कृष्ण के पैर के इर्द-गिर्द चक्कर लगाने लगा, क्योंकि एक पत्ता उन्होंने अपने पैर के नीचे छुपा लिया था; बर्बरीक ने कहा कि आप अपने पैर को हटा लीजिए अन्यथा ये बाण आपके पैर को भी वेध देगा। तत्पश्चात, श्री कृष्ण ने बालक बर्बरीक से पूछा कि वह युद्ध में किस ओर से सम्मिलित होगा; बर्बरीक ने अपनी माँ को दिये वचन को दोहराया और कहा युद्ध में जो पक्ष निर्बल और हार रहा होगा उसी को अपना साथ देगा। श्री कृष्ण जानते थे कि युद्ध में हार तो कौरवों की निश्चित है और इस कारण अगर बर्बरीक ने उनका साथ दिया तो परिणाम गलत पक्ष में चला जाएगा। अत: ब्राह्मणरूपी श्री कृष्ण ने वीर बर्बरीक से दान की अभिलाषा व्यक्त की। बर्बरीक ने उन्हें वचन दिया और दान माँगने को कहा। ब्राह्मण ने उनसे शीश का दान माँगा। वीर बर्बरीक क्षण भर के लिए अचम्भित हुए, परन्तु अपने वचन से अडिग नहीं हो सकते थे। वीर बर्बरीक बोले एक साधारण ब्राह्मण इस तरह का दान नहीं माँग सकता है, अत: ब्राह्मण से अपने वास्तिवक रूप से अवगत कराने की प्रार्थना की। ब्राह्मणरूपी श्री कृष्ण अपने वास्तविक रूप में आ गये। श्री कृष्ण ने बर्बरीक को शीश दान माँगने का कारण समझाया कि युद्ध आरम्भ होने से पूर्व युद्धभूमि पूजन के लिए तीनों लोकों में सर्वश्रेष्ठ क्षत्रिय(राजपूत कुल) के शीश की आहुति देनी होती है; इसलिए ऐसा करने के लिए वे विवश थे। बर्बरीक ने उनसे प्रार्थना की कि वे अन्त तक युद्ध देखना चाहते हैं। श्री कृष्ण ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली। श्री कृष्ण इस बलिदान से प्रसन्न होकर बर्बरीक को युद्ध में सर्वश्रेष्ठ वीर की उपाधि से अलंकृत किया। उनके शीश को युद्धभूमि के समीप ही एक पहाड़ी पर सुशोभित किया गया; जहाँ से बर्बरीक सम्पूर्ण युद्ध का जायजा ले सकते थे। फाल्गुन माह की द्वादशी को उन्होंने अपने शीश का दान दिया था इस प्रकार वे शीश के दानी कहलाये। महाभारत युद्ध की समाप्ति पर पाण्डवों में ही आपसी विवाद होने लगा कि युद्ध में विजय का श्रेय किसको जाता है? श्री कृष्ण ने उनसे कहा बर्बरीक का शीश सम्पूर्ण युद्ध का साक्षी है, अतएव उससे बेहतर निर्णायक भला कौन हो सकता है? सभी इस बात से सहमत हो गये और पहाड़ी की ओर चल पड़े, वहाँ पहुँचकर बर्बरीक के शीश ने उत्तर दिया कि श्री कृष्ण ही युद्ध में विजय प्राप्त कराने में सबसे महान पात्र हैं, उनकी शिक्षा, उपस्थिति, युद्धनीति ही निर्णायक थी। उन्हें युद्धभूमि में सिर्फ उनका सुदर्शन चक्र घूमता हुआ दिखायी दे रहा था जो शत्रु सेना को काट रहा था। महाकाली, कृष्ण के आदेश पर शत्रु सेना के रक्त से भरे प्यालों का सेवन कर रही थीं। श्री कृष्ण वीर बर्बरीक के महान बलिदान से काफी प्रसन्न हुए और वरदान दिया कि कलियुग में तुम श्याम नाम से जाने जाओगे, क्योंकि उस युग में हारे हुए का साथ देने वाला ही श्याम नाम धारण करने में समर्थ है। उनका शीश खाटू नगर (वर्तमान राजस्थान राज्य के सीकर जिला) में दफ़नाया गया इसलिए उन्हें खाटू श्याम बाबा कहाजाता है। एक गाय उस स्थान पर आकर रोज अपने स्तनों से दुग्ध की धारा स्वतः ही बहा रही थी। बाद में खुदाई के बाद वह शीश प्रकट हुआ, जिसे कुछ दिनों के लिए एक ब्राह्मण को सूपुर्द कर दिया गया। एक बार खाटू नगर के राजा को स्वप्न में मन्दिर निर्माण के लिए और वह शीश मन्दिर में सुशोभित करने के लिए प्रेरित किया गया। तदन्तर उस स्थान पर मन्दिर का निर्माण किया गया और कार्तिक माह की एकादशी को शीश मन्दिर में सुशोभित किया गया, जिसे बाबा श्याम के